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नजरिया 12
 
जेपी आंदोलन ने तैयार की नेताओं की फौज

  • सुरेंद्र किशोर

वरिष्ठ पत्रकार

संपूर्ण क्रांति का नारा देने के बाद जेपी ने सत्याग्रहियों से अपील की थी कि वे क्रांति के लक्ष्य को हासिल करने के लिए क्रांतिकारी चरित्र भी अपनाएं। उन्होंने यह भी कहा कि जो साथी पुरुष या महिला] क्रांति के इतने बड़े कार्य में लगे हुए हैं] उनसे यह आशा और अपेक्षा है कि समाज में जिन मूल्यों की स्थापना के लिए वे la\k"kZZ कर रहे हैं] उन्हें वे अपने जीवन में भी  उतारने का पूरा प्रयत्न करेंगे। सादा रहन&सहन] जीवन में सच्चाई] ईमानदारी] विवाह में तिलक दहेज का बहिष्कार] आपसी भाईचारा] la\k"kZZ के प्रति वफादारी] जाति] संप्रदाय] प्रांत आदि के भेदभावों से ऊपर उठकर हर देशवासी के प्रति समानता की भावना] श्रम और श्रमिक के प्रति आदर आदि ऐसे गुण हैं] जो हम में से हरेक में होने चाहिए

दो अक्टूबर] १९७२ की बात है। पटना के हिंदी साहित्य सम्मेलन भवन में गांधी जयंती मनाई जा रही थी। जय प्रकाश नारायण मुख्य वक्ता थे। मंच के नीचे श्रोताओं के बीच उनकी पत्नी प्रभावती जी बैठी हुई थीं। मैं भी श्रोताओं में था। जब जेपी का भाषण थोड़ा लंबा होने लगा तो प्रभावती जी ने खड़ी होकर जेपी से कहा कि ^अब आप मत बोलिए।^

दरअसल] वह जेपी के स्वास्थ्य का ध्यान रखकर ऐसा कह रही थीं। जेपी ने उनकी बात मान ली। दरअसल प्रभावती जी नहीं चाहती थीं कि जेपी अतिरिक्त शारीरिक मेहनत और मानसिक परेशानी वाला कोई काम करें। यानी उन दिनों यह भी कहा जाता था कि प्रभावती जी अगर जीवित रहती थीं तो जेपी बिहार आंदोलन में संभवतः शामिल नहीं होते। पर] दुर्भाग्यवश १९७३ के अप्रैल में दो दुःखद ?kVukएं हो गईं। प्रभावती जी का निधन हो गया और जेपी के सहयोगी रहे सूरज नारायण सिंह की रांची में हत्या कर दी गई। मजदूर आंदोलन के दौरान प्रतिद्वंद्वी गुट के गुंडों ने लाठियों से पीट&पीट कर सूरज बाबू की हत्या कर दी थी। सूरज बाबू स्वतंत्रता आंदोलन के बड़े क्रांतिकारी नेता थे। पहले प्रजा समाजवादी पार्टी में थे। हत्या के समय वे समाजवादी पार्टी के विधायक थे। इंदिरा गांधी एक बार उन्हें मिलीजुली सरकार का मुख्यमंत्री बनवाना चाहती थी] पर मार्क्सवादी रुझान के सूरज बाबू को कुछ दूसरी चीजें ही पसंद थीं। सूरज बाबू की हत्या के बाद गांधी मैदान की शोकसभा में जेपी बहुत क्षुब्ध एवं विह्वल दिखे। लगा कि उनके भीतर का विद्रोही मन एक बार फिर उफान मार रहा है। यह पृष्ठभूमि थी।

इस बीच मार्च] १९७४ में  छात्रों&युवकों ने बिहार में कठिन आंदोलन छेड़ दिया जो हिंसक एवं अराजक हो गया था। आंदोलन] भ्रष्टाचार] महंगाई] बेरोजगारी और गलत शिक्षा नीति के खिलाफ था] पर जब हिंसा&आगजनी हो गई तो उस पर जेपी का बयान आया] ^हिंसा और तोड़फोड़ से क्रांति नहीं होती।^

इस पर सूत्र पकड़ कर उस आंदोलन के कुछ समझदार नेताओं ने जेपी से मुलाकात की और आंदोलन का नेतृत्व करने का उनसे आग्रह किया। जेपी ने कहा कि नेतृत्व तो आप ही कीजिए] मैं मार्गदर्शन करूंगा। साथ ही जेपी ने अहिंसक बने रहने की शर्त रखी। शर्त मान ली गई। पर बाद में कुछ ऐसी ?kVukएं द्घटीं कि जेपी ने नेतृत्व देना भी शुरू कर दिया। उससे पहले एक और ?kVuk हुई थी। उससे भी जेपी खिन्न थे। १९७१ के लोकसभा चुनाव के बाद भारी बहुमत से सत्ता में आने के बाद इंदिरा गांधी एकाधिकारवादी हो गई थीं। जेपी ने उसके खिलाफ इंडियन एक्सप्रेस में लेख लिखा। इंदिरा जी इस पर जेपी से नाराज हो गईं।

जेपी न्यूज एजेंसी ^समाचार भारती^ के अध्यक्ष थे। समाचार भारती के किसी काम के लिए वह प्रधान मंत्री से मिलना चाहते थे। वे दिल्ली गए। प्रधानमंत्री के ऑफिस को खबर करवाई। समय मांगा। प्रधानमंत्री ने पूछा कि क्यों मिलना चाहते हैं\ जब बताया गया कि समाचार भारती के काम से] तो इंदिरा जी ने कहलवा दिया कि इसके लिए वे सूचना मंत्री गुजराल से मिल लें। संभवतः जेपी गुजराल से मिले बिना पटना लौट आए।

इधर जेपी ने जब आंदोलन का नेतृत्व संभाला तो आंदोलन में गंभीरता आ गई। जेपी ने वामपंथी छात्र&युवा संगठनों से भी अपील की थी कि वे आंदोलन में शामिल हों] पर उन्हें la\k परिवार से एतराज था। जबकि सीपीआई १९६७ में जनla\k के साथ बिहार मंत्रिमंडल में थी। बाद में १९८९ में कम्युनिस्ट और भाजपा ने मिलकर वीपी सिंह की सरकार बनवाई।

सन १९७४ का साल जेपी आंदोलन यानी बिहार आंदोलन के लिहाज से काफी हलचल भरा साल रहा। अगले साल के मध्य में तो आपातकाल ही लग गया। यानी सतह पर आंदोलन संभव नहीं था। हां] भूमिगत आंदोलन जरूर जारी रहा। अधिक लोग अहिंसक ढंग से और जार्ज फर्नांडिस और उनके साथी डायनामाइट के साथ। जय प्रकाश नारायण ने १९७४ में पटना के गांधी मैदान की अपनी जन सभा में छात्रों से आंदोलन के लिए उनका एक साल मांगा। इंदिरा ब्रिगेड के सदस्यों ने जेपी के नेतृत्व में पटना में निकले जुलूस पर गोलियां चलाईं और बम फोड़े। पर जेपी ने तब लोगों से माफी मांगी जब उनके आंदोलनकारियों ने बदतमीजी की। जय प्रकाश नारायण ने आंदोलनकारी छात्रों द्वारा एक कांग्रेस विधायक के साथ की गई अभद्रता के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगी।

उन दिनों आंदोलनकारी विधायकों का \ksjko करके उनसे इस्तीफा मांग रहे थे। इस सिलसिले में आंदोलनकारियों द्वारा जहां&तहां कुछ बदतमीजियां भी हुईं। आंदोलन जब आगे बढ़ा और सरकार ने मांगों को कोई महत्व नहीं दिया तो जेपी ने बिहार विधान सभा के सदस्यों से सदन की सदस्यता से इस्तीफा दे देने की अपील की। जेपी ने कहा कि अब बिहार विधान सभा जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करती। अधिकतर प्रतिपक्षी विधायकों ने सदन की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। हालांकि कांग्रेस सदस्यों द्वारा इस्तीफे का सवाल ही नहीं उठता था।

इस्तीफे की मांग के समर्थन में आंदोलनकारियों ने विधान मंडल भवन के \ksjko का कार्यक्रम शुरू किया। इस \ksjko के दौरान आंदोलनकारियों ने एक कांग्रेसी विधायक के साथ सभा भवन के गेट पर दुर्व्यवहार कर दिया। विधायक का कुर्ता फाड़ा गया। उनके खिलाफ भद्दे नारे लगाए गए और उन्हें रिक्शे से नीचे 

खींचने की कोशिश हुई। आंदोलनकारी चाहते थे कि वे विधानसभा की सदस्यता से तुरंत इस्तीफा दे दें। जेपी को १३ जून  की  इस ?kVuk का पता चला तो उन्होंने १४ जून को ही इस ?kVuk के लिए उस विधायक से क्षमा याचना करते हुए विधानसभा के तत्कालीन स्पीकर हरिनाथ मिश्र को  पत्र लिखा। जेपी ने स्पीकर से यह भी आग्रह किया कि उनके पत्र को विधान सभा में पढ़कर सुना दिया जाए। 

इस माफीनामा का अच्छा असर हुआ। आंदोलनकारी छात्र&युवक भी सावधान हुए और आंदोलन के विरोधियों को भी थोड़ा संतोष हुआ कि उनके साथ राह चलते बदसलूकी नहीं होगी। दरअसल उस समय आंदोलन का असर बढ़ रहा था और पुलिस आंदोलनकारियों से आंदोलन विरोधियों की सब जगह रक्षा करने की स्थिति में नहीं थी।

इसी पृष्ठभ्ूामि में पांच जून] १९७४ को पटना के बेली रोड पर विधायक फ्लैट के एक कांग्रेसी विधायक फुलेना राय के मकान से कांग्रेस के कुछ उत्पाती तत्वों ने जेपी के लौटते जूलूस के पिछले हिस्से पर गोलियां चला दीं। बाद में इस सिलसिले में विधायक और उनके समर्थक गिरफ्तार भी हुए] पर इस ?kVuk को लेकर बिहार की राजनीति और भी गरमा गई। यह ?kVuk तब हुई जब जेपी एक जूलूस में राज्यपाल आरडी भंडारे को ज्ञापन देकर लौट रहे थे। ज्ञापन पर एक करोड़ ३७ लाख लोगों के दस्तखत थे। ज्ञापन में यह मांग की गई थी कि चूंकि बिहार विधानसभा ने अपनी उपयोगिता खो दी है] इसलिए इसे भंग करके दुबारा चुनाव होना चाहिए।

प्रतिपक्षी दल के एक प्रमुख राष्ट्रीय नेता ने पटना में यह आरोप लगाया कि उन्हें यह सूचना मिली है कि जेपी पर गोलियां चलाने वालों को सरकार की तरफ से दस लाख रुपए मिले थे। पांच जून को जेपी ने गांधी मैदान में एक बड़ी सभा को संबोधित किया और ^संपूर्ण क्रांति^ का आह्वान किया। बिहार में जारी तेज आंदोलन को देखते हुए केंद्र सरकार ने केंद्रीय बलों के करीब ५० हजार जवानों को बिहार भेजा। केंद्रीय बल आंदोलनकारियों के प्रति तनिक भी नरम नहीं थे। इस पृष्ठभूमि में जन सभा में जेपी ने पुलिस बल से  अपील की कि ^मैं यह नहीं कहता कि सिपाही सरकार के खिलाफ विद्रोह करें] पर इतना अवश्य कहूंगा कि शांत आंदोलनकारियों पर बल प्रयोग के आदेश को वे ठुकरा दें।^

उन्होंने मंच पर बैठे बिहार सरकार के पूर्व पुलिस मंत्री और समाजवादी नेता रामानंद तिवारी से अपील की वे पुलिस थानों में जाएं और सिपाहियों को इस संबंध में दिशा निर्देश करें।

जेपी के इस भाषण का कांग्रेस और तत्कालीन प्रधानमंत्री  इंदिरा गांधी ने यह कहते हुए काफी उपयोग किया कि ^देखिए अब जेपी पुलिस को भी विद्रोह करने के लिए उकसा रहे हैं। यह कैसा आंदोलन है\^ 

पार्ट & २

 जेपी ने पटना के गांधी मैदान की उस सभा के मंच से यह भी आशंका जाहिर की कि ^पता नहीं आपसे यह मेरी अंतिम मुलाकात हो] क्योंकि यह सरकार जंगली हो गई है। किसी भी समय कुछ भी कर सकती  है।^ बाद में इन पंक्तियों के लेखक को एक कांग्रेसी विधायक ने कहा कि जेपी को गिरफतार करने में बिहार सरकार इसलिए हिचक रही है] क्योंकि जेपी को दिल की बीमारी है और किसी भी समय कुछ भी हो गया तो मुश्किल हो जाएगी। 

संपूर्ण क्रांति का नारा देने के बाद जेपी ने सत्याग्रहियों से अपील की थी कि वे क्रांति के लक्ष्य को हासिल करने के लिए क्रांतिकारी चरित्र भी अपनाएं। उन्होंने यह भी कहा कि जो साथी पुरुष या महिला] क्रांति के इतने बड़े कार्य में लगे हुए हैं] उनसे यह आशा और अपेक्षा है कि समाज में जिन मूल्यों की स्थापना के लिए वे la\k"kZZ कर रहे हैं] उन्हें वे अपने जीवन में भी  उतारने का पूरा प्रयत्न करेंगे। सादा रहन&सहन] जीवन में सच्चाई] ईमानदारी] विवाह में तिलक दहेज का बहिष्कार] आपसी भाईचारा] la\k"kZZ के प्रति वफादारी] जाति] संप्रदाय] प्रांत आदि के भेदभावों से ऊपर उठकर हर देशवासी के प्रति समानता की भावना] श्रम और श्रमिक के प्रति आदर आदि ऐसे गुण हैं] जो हम में से हरेक में होने चाहिए। पर इस देश की राजनीति के लिए यह दुःखद बात रही कि जेपी आंदोलन से जुड़े नेता व कार्यकर्ता बाद में बाद के वर्षों में सत्ता में जब जाने लगे तो उनमें से अनेक लोगों ने जेपी की भावना का तिरस्कार किया और जनता के साथ धोखा ही किया। हालांकि ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं रही जिसने जेपी के कहे का ध्यान रखा। हां] वैसे लोगों में नामी गिरामी लोग कम थे। अब एक बार फिर जून १९७४ की ?kVukओं को याद करें। पांच जून की सभा में जेपी ने कहा था कि ^गांधी ने लोगों से अपना जीवन मांगा था। मैं सिर्फ एक साल मांग रहा हूं। नया बिहार बनाने के लिए विद्यार्थियों से अपील करता हूं कि वे एक साल के लिए कालेज और विश्व विदयालयों को बंद रखें।

इससे पहले तीन जून १९७४ को पटना में सीपीआई ने एक बड़ा जन प्रदर्शन किया था। उसमें करीब तीस हजार लोग शामिल हुए।सभा हुई जिसको एसए डांगे ने संबोधित किया। डांगे ने अपने भाषण में बिहार में जारी जेपी आंदोलन का कड़ा विरोध किया।उसके एक दिन बाद यानी ४ जून को पटना की सड़कों पर केंद्रीय सुरक्षा बल के हजारों जवानों ने फ्लैग मार्च किया। बताया गया कि यह सब ५ जून के जेपी मार्च को ध्यान में रखते हुए उसे विफल करने के लिए किया गया। इससे बिहार में भारी राजनीतिक हलचल और कुछ हद तक तनाव भी रहा। इसके बावजूद जेपी के आह्‌वान पर बड़ी संख्या में लोग राज्य भर से ५ जून को पटना एकत्र हुए।

बिहार सरकार के वित्त मंत्री दारोगा प्रसाद राय ने १० जून १९७४ को बिहार विधान सभा में बताया कि छात्र आंदोलन के लंबा खिंचने के कारण और कुछ दूसरे कारणों से राज्य का ओवर ड्राफ्ट बढ़कर ४८ करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। राज्यपाल के अभिभाषण पर हुई बहस का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर ने  कहा कि सोशलिस्ट पार्टी के एक विधायक /उनका इशारा कर्पूरी ठाकुर की ओर था/हस्त रेखा विशेषज्ञ के यहां गये थे। उस विशेषज्ञ ने विधायक से कहा कि यदि आप निर्धारित समय से पहले विधान सभा की सदस्यता से इस्तीफा दे देंगे तो आप अगली बार मुख्य मंत्री बन जाएंगे। संयोग से १९७७ में यह बात सही भी हो गई।कर्पूरी ठाकुर मुख्य मंत्री बन गए। हालांकि गफूर ने यह बात हंसी मजाक में कही थी।

पार्ट &३ 

जून महीने में प्रशासन द्वारा जार्ज फर्नांडीस को बिहार से बाहर कर दिया गया। राज्य के बाहर से आकर जेपी आंदोलन की मदद करने की कोशिश करने वाले नेताओं को बिहार सरकार आम तौर पर राज्य से निकाल बाहर ही कर रही थी।  

एक तत्कालीन कांग्रेसी विधायक प्रो शम्भु शरण ठाकुर ने एक बयान जारी करके यह आरोप लगाया कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए और एक भारतीय व्यापारी विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देने के लिए  विधायकों को पैसे का प्रलोभन दे रहे हैं। आंदोलन में दो बड़े पड़ाव १९७४ के अक्टूबर और नवंबर में आए।

२ से ४ अक्टूबर तक लगातार बिहार बंद का आह्वान जेपी ने किया था। बिना किसी जोर जबर्दस्ती के बिहार पूरी तरह बंद रहा।आजादी के बाद वैसा पूर्ण बंद कभी नहीं देखा गया। दूसरी ?kVuk ४ नवंबर को हुई जब जेपी के जुलूस पर पुलिस ने ज्यादती की। यहां तक कि खुद जेपी पर भी सीआरपीएफ जवान ने 

जबर्दस्त लाठी चला दी। उस लाठी को नाना जी देशमुख तथा दूसरे लोगों ने रोका अन्यथा अर्थ हो जाता। इस तरह आंदोलन बढ़ता गया और लंबा खिंचने के कारण आम छात्रों&युवकों की रुचि आंदोलन में कम होने लगी।

मुझे याद है। पांच जून १९७५ को संपूर्ण क्रांति दिवस के अवसर पर पटना के कदम कुआं स्थित कांग्रेस मैदान से आंदोलनकारियों का जुलूस निकला था। उसमें सिर्फ ५५ लोग शामिल थे।भले जुलूस के आगे बढ़ने पर उनकी संख्या बढ़ी होगी। यानी आंदोलन में ठहराव आ रहा था कि इसी बीच १२ जून को इलाबाद हाई कोर्ट का निर्णय आ गया। इंदिरा गांधी की लोक सभा की सदस्यता समाप्त कर दी थी।

इंदिरा जी पद पर काम रहने की जिद पर अड़ गईं। जेपी तथा अन्य प्रतिपक्षी नेताओं ने प्रधानमंत्री से इस्तीफे की मांग करनी शुरू की। बड़ी सभाएं होने लगीं। इंदिरा जी ने जन उभार से बचने के लिए और अपनी गद्दी बचाने के लिए इमरजेंसी थोप दी। करीब सवा लाख लोगों को जेलों में ठूंस दिया। प्रेस पर पूर्ण सेंसरशिप लगा दी गई। नागरिकों के मौलिक अधिकार भी छीन लिए गए। इससे आंदोलन को ताकत मिल गयी।उनका जन समर्थन बढ़ा।

इमरजेंसी के बंधन के कारण ऊपरी तौर पर तो सबकुछ शांत दिख रहा था] तो कुछ लोगों को छोड़कर भीतर&भीतर अधिकतर लोग धधक रहे थे] उसका प्रकटीकरण १९७७ के लोक सभा नतीजे में हुआ। इंदिरा गांधी की सत्ता छिन गई। खुद इंदिरा गांधी और उनके पुत्र संजय गांधी चुनाव हार गए। पर इस बीच इंदिरा गांधी ने जेपी पर यह बड़ा आरोप लगाया कि जेपी ने सेना को विद्रोह करने के लिए उकसाया। क्या यह आरोप सही था\

खुद इंदिरा जी की नजर में तो वह आरोप सही ही था। उन्होंने इस आरोप को देश में इमरजेंसी लगाने का  मुख्य कारण बताया था। पर खुद जेपी तथा कई अन्य लोग इस आरोप को गलत बताते रहे। इंदिरा गांधी ने जेपी आंदोलन में शामिल  दलों पर तो यह भी आरोप लगाया था कि ये सांप्रदायिक भावना उभारने वाले और देश की एकता भंग करने वाले लोग हैं। पर सिर्फ उन्नीस महीने बाद वही लोग यानी जनता पार्टी के नेतागण जब सत्ता में आ गए तो पता चला कि न तो वे सांप्रदायिक भावना उभारने वाले लोग थे और न देश की एकता भंग करने वालों में शामिल थे। पर अपनी तानाशाही का बचाव करने  के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री लगातार ऐसे आरोप लगाती रहीं।   

जहां तक सैनिकों को भड़काने का आरोप है] उसके बारे में समकालीन पत्रकार प्रभाष जोशी ने कुछ यूं लिखा है]^ सैनिक और पुलिस के लिए जेपी को चेतावनी इसलिए जारी करनी पड़ी थी क्योंकि इंदिरा गांधी ने सर्वोच्च न्यायालय में अपनी पसंद के मुख्य न्यायाधीश एएन राय को बैठाने के बाद जनरल टीएन रैना को सेनापति बनाया था जो कश्मीरी थे और उनके नजदीकी माने जाते थे। इंदिरा जी ने खुफियागिरी की जिम्मेदारी काक को सौंपी थी जो कश्मीरी तो थे ही इंदिरा जी के बफादार भी थे। बीएसएफ उन्होंने अश्विनी कुमार को सौंपी थी जिन पर उनका विश्वास था। इन नियुक्तियों के साथ ही दिल्ली के सरकारी और राजनीतिक हलकों में उन उपायों की भी बात होती रहती थी जो बिहार आंदोलन से निपटने के लिए इंदिरा गांधी अपना सकती थी। इनमें एक उपाय जिस पर सरकारी मशीनरी में काम हो रहा था] सेना के इस्तेमाल का भी था। इस आशंका का सामना करने के लिए लोगों को सावधान करने और पुलिस और सेना को अपने कर्तव्य की याद दिलाने लिए जेपी खुले तौर पर सार्वजनिक सभाओं में ऐसा कहते थे। वे कोई षड्यंत्र नहीं रच रहे थे न ही सेना और पुलिस को बगावत के लिए भड़का रहे थे। वे एक आशंका  से लोगों को खबरदार कर रहे थे।^

इसी संबंध में जब एक टीवी पत्रकार ने हाल में लालकूष्ण आडवाणी से सवाल किया तो जेपी का बचाव करने के बदले वे गोलमोल जवाब देकर बचते नजर आए। इस असत्य आधार को देखते हुए ck?k और बकरी की कहानी याद आती है। एक ck?k ने एक बकरी को मार कर खा जाने का निर्णय किया। पर वह उससे पहले बकरी को उसका कसूर बता देना चाहता था। बकरी नदी के किनारे पानी पी रही थी। ck?k ने उसके पास जाकर कहा कि तुम मेरा पानी जूठा कर रही हो। बकरी ने कहा कि मैं कैसे जूठा कर सकती हूं\ मैं तो नदी की धारा के निचले हिस्से में पानी पी रही हूं।

 इस पर ck?k ने कहा कि तुम्हारे पिता ने मेरा पानी गंदा किया था। यह कह कर ck?k] बकरी को मार कर  खा गया। इंदिरा गांधी ने २५ जून १९७५ की रात में एक असत्य के बहाने देश के लोकतंत्र की हत्या कर दी। उससे ठीक पहले जेपी ने  २५ जून १९७५ को दिल्ली के रामलीला मैदान की सभा में  कहा था कि ^जब ये लोग देशभक्ति के नाम पर] लोकतंत्र के नाम पर] कानून के नाम पर जो भी हुक्म दें] और उसका आप पालन करें तो यह पालन है या उसका अपमान है\ यह सोचने के लिए मैं बार&बार चेतावनी देता रहा हूं। सेना को यह सोचना है कि जो आदेश मिलते हैं] उनका पालन करना चाहिए कि नहीं\

देश की सेना के लिए आर्मी एक्ट है। उसमें लिखा हुआ है कि भारत की लोकतंत्र की रक्षा करना उसका कर्तव्य है। लोकतंत्र और संविधान की रक्षा करने का उसका कर्तव्य है। हमारा कांस्टीट्यूशन डेमोक्रेटिक है और इसलिए कह रहा हूं कि लोकतंत्र की रक्षा उसका कर्तव्य है। . . ....और यह प्रधानमंत्री उसे आदेश दे तो उसके पीछे कौन सी ताकत होगी\ जिस प्रधानमंत्री के हाथ&पैर इतने बंधे हों जो पार्लियामेंट में तो बैठ सकती हों] पर वोट नहीं सकती हों उनके आदेश\^ उससे पहले ^एवरीमेंस^ नामक पत्रिका को दिए गए अपने इंटरव्यू में जेपी ने कहा था कि ^पुलिस को यह बताना मैं अपना कर्तव्य समझता हूं कि मैं उसे बगावत करने को नहीं कह रहा हूं। उन्हें अपना कर्तव्य करना चाहिए। लेकिन उन्हें ऐसे आदेशों का पालन नहीं करना चाहिए जो गैर कानूनी हों और जिन्हें उनकी आत्मा न मानती हों।^

याद रहे कि १२ जून १९७५ को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राय बरेली से इंदिरा गांधी का चुनाव रद कर दिया था। उन पर चुनाव में भ्रष्ट तरीके अपनाने का आरोप साबित हो गया था। सुप्रीम कोर्ट से भी उन्हें कोई तत्काल राहत नहीं मिली थी। यदि आपातकाल लगाकर चुनाव कानून नहीं बदला जाता तो इंदिरा गांधी को पद छोड़ना पड़ता। इसलिए उन्होंने अपनी कुर्सी बचाने के लिए देश पर आपातकाल थोप दिया।करीब एक लाख राजनीतिक नेताओं और कार्यकर्ताओं को जेलों में ठूंस दिया। पूरे देश को एक खुला कारागार बना दिया। वह अपनी पार्टी के किसी अन्य नेता को प्रधानमंत्री बनाकर अपनी कानूनी समस्या के निपटारे में लग सकती थीं। पर उन्हें किसी अन्य नेता पर भरोसा नहीं था।

इसीलिए इंमरजेंसी के लिए उन्होंने तरह& तरह के बहाने ढूंढे। १९७७ के आम चुनाव में कांग्रेस को बुरी तरह पराजित करके आम लोगों ने यह बता दिया कि इमरजेंसी लगाने का आधार सही गलत  था। जेपी आंदोलन में रगड़ाई का भी यह असर था कि आपातकाल में अधिकतर नेता&कार्यकर्ता नहीं टूटे। १९ महीने जेलों में रहे। जो भूमिगत थे उन्हें तो और अधिक कष्ट था। पर इंदिरा जी ने इमरजेंसी लगाने के बाद देश को यह संदेश दिया  कि ^मुझे विश्वास है कि आप सभी गहरे और व्यापक षड्यंत्र से अवगत होंगे जो उस समय से रचा जा रहा है जब मैंने भारत के जन साधारण के लाभ के लिए कुछ प्रगतिशील उपाय करने शुरू किए। विद्घटनकारी तत्व पूर्ण रुप से सक्रिय हैं और सांप्रदायिक भावना उभारी जा रही है जिससे हमारी एकता को खतरा है। कुछ लोग सैनिकों और पुलिस को विद्रोह करने के लिए उकसाने लगे हैं।^

यदि आंदोलन के बीच में ही इमरजेंसी नहीं लग जाती तो जय प्रकाश को यह मौका मिल जाता और आंदोलन के लोगों का अनी कल्पना के अनुसार शिक्षण कर सकते थे। वे क्या चाहते थे] उसकी चर्चा इस लेख में ऊपर की जा चुकी है। कॉलेजों से निकले अधकचरे युवा&छात्र नेतागण आंदोलन की तपिस से प्रौढ़ तो बन चुके थे] पर उनका बाजाप्ता राजनीतिक व सामाजिक दृष्टि से प्रशिक्षण नहीं हो सका। हालांकि आंदोलन ने राजनीतिक नेताओं व कार्यकर्ताओं की एक बड़ी फौज जरूर तैयार कर दी। स्वाभाविक ही था कि उनमें से कुछ अच्छे निकले तो कुछ बुरे। समुद्र मंथन से अमृत निकलता है तो विष भी। दूसरी बात यह भी हुई कि जेल से छूटने के बाद जय प्रकाश डायलिसिस पर निर्भर हो गए और आंदोलन से निकली सरकारों पर जन दबाव बनाने की स्थिति में नहीं रहे।

 
         
 
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,क्या उत्तराखंड में ऐसी कोई सरकार आयेगी जो जंगलों को जलने से रोक सके

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  • अपूर्व जोशी

मेरा स्पष्ट मानना है कि सार्वजनिक स्थलों पर किसी भी प्रकार की धार्मिक गतिविधि को नहीं किया जाना चाहिए फिर चाहे वह जुमे की नमाज हो या फिर नवरात्रों में

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