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नजरिया 11
 
सत्ता सापेक्ष वामपंथ

  • राकेश सिन्हा

la?k विचारक

वामपंथ में उग्रता और la?kर्ष की अद्भुत क्षमता है। लेकिन भारतीय वामपंथ के तो जैसे मायने ही अलग हैं। यहां वामपंथ हमेशा ही सत्ता सापेक्ष रहा है। आज इन्हें सरकारी संस्थानों में प्रतिनिधित्व दे दिया जाए तो सब शांत हो जाएगा। ये सरकार के साथ ऐसे चलेंगे जैसे कभी जुदा ही न थे। अपनी सत्ता सापेक्ष प्रवृतियों के कारण ही वामपंथियों ने शैक्षणिक संस्थानों में अपनी प्रभुता स्थापित की। इससे उन्हें बौद्धिक नेतृत्व तो मिल गया] लेकिन इनकी पार्टियों को इसकी कीमत अपना जनाधार खोकर चुकानी पड़ी। यही कारण है कि मौजूदा दौर में इन पार्टियों से भी बड़ा कद उनके छद्म धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों का है। लेकिन ये सब भी अपना अस्तित्व तभी तक बनाए रखेंगे जब तक ये नीति निर्धारण में शुमार हैं। इधर सत्ता का प्रश्रय हटा और उधर ये बौद्धिक आतंकवाद भी नेस्तनाबूद हो जाएगा 

भारत माता की जय] यह सिर्फ एक नारा नहीं है। इसके पीछे एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भारत में राष्ट्रवाद के अभ्युदय की है। भारत में राष्ट्रवाद को एक भूमि का टुकड़ा या योग का साधन नहीं माना गया है] बल्कि राष्ट्रवाद का तात्पर्य मां और संतान के संतान के संबंध से है। इसी संबंध के अनुकूल भारत में राष्ट्रवाद का विकास हुआ है। यही कारण है कि १८५७ के संग्राम से लेकर लगातार ^भारत माता की जय^ ही स्वतंत्रता का एक प्रमुख नारा बना रहा है। यह कोई राजनीतिक नारा नहीं है। कुछ नारे ऐसे होते हैं जो प्रतिकूल परिस्थितियों में लगाए जाते हैं। उसी में से एक नारा है ^भारत माता की जय^। इस नारे के कई आयाम हैं। पहला] यह नारा भारत की विरासत का प्रतीक है। इस विरासत में बौद्धिक और सांस्कूतिक दोनों है। जिससे भारत को पूरी दुनिया में एक प्रमुखता मिली है। दूसरा] हम राष्ट्रवाद को एक जीवंत सिद्धांत मानते हैं] जो व्यक्ति में राष्ट्र के प्रति सरोकार पैदा करता है। तीसरा] हम अपनी मातृभूमि को स्वर्ग से भी महत्त्वपूर्ण मानते हैं। महर्षि बाल्मीकि ने कहा है हमारी मातृभूमि धरती का वह स्थान है जिसका समांतर नहीं है। हमारी मातृभूमि जैसी भी हो] वो स्वर्ग से भी भली लगती है। चौथा आयाम जो लोग कहते हैं कि भारत माता की जय नहीं बोलेंगे] वे वास्तव में एक नारे से नहीं मुकर रहे] बल्कि मुस्लिम लीग की मानसिकता के तहत ऐसे नारों] मुहावरों] अवधारणाओं को खारिज कर रहे हैं जो भारतीय राष्ट्रवाद के मूल प्रतीक थे। इसका एक उदाहरण - १९२० में कांग्रेस का अधिवेशन नागपुर में हुआ था उस अधिवेशन में मोहम्मद अली जिन्ना बोलने आए थे। तब तक महात्मा गांधी भारतीय राजनीति के शिखर पर पहुंच चुके थे। उनकी त्याग और तपस्या को देखते हुए लोग उन्हें मोहनदास करमचंद गांधी की जगह महात्मा गांधी के रूप में स्वीकार चुके थे। महात्मा गांधी स्वयं राष्ट्रवाद के प्रतीक बन चुके थे। अधिवेशन में जिन्ना ने महात्मा गांधी को मिस्टर मोहनदास करमचंद गांधी कहकर संबोधित किया। इसका विरोध हुआ और सभी धर्मों के प्रतिनिधियों ने एक स्वर में कहा कि ^आप इनको महत्मा गांधी कहिए^। उस वक्त गांधी जी को महात्मा गांधी न कहने के पीछे जिन्ना का तर्क था कि महात्मा शब्द में धार्मिकता का भाव आता है। भारत में जो शब्द या मुहावरे बने हैं] मातृभूमि की संस्कूति और परंपरा से निकले हैं। महात्मा हम किसी मुसलमान को भी कह सकते हैं। जहां तक इस नारे को कहने की बात है] तो इसे लेकर सड़क पर चलते हुए किसी व्यक्ति से जबरन थोड़े कहा जा सकता है कि वो इसे कहे ही। जो लोग ये बात कह रहें हैं कि हम अधिकार के तहत कह रहे हैं] इसमें कुछ भी गलत नहीं है। जो लोग ऐसा कह रहे हैं कि भारत माता की जय का नारा लगाने के लिए उनसे जबरदस्ती की जा रही है] तो मैं समझता हूं कि वो गैरजरूरी उत्तेजना पैदा करने के लिए ऐसा कह रहे हैं।

आज यदि बात की जाए वामपंथियों की तो राजनीति में वामपंथियों की निरर्थकता लगभग जग जाहिर है और शैक्षणिक संस्थानों में जो हो रहा है उससे भी रही-सही उपस्थिति अब खत्म होने के कगार पर है। ऐसे में यह अशांति और आक्रोश किसी विचार के लिए न होकर तरस के योग्य ही है। वामपंथ में उग्रता और la?kर्ष की अद्भुत क्षमता है। लेकिन भारतीय वामपंथ के तो जैसे मायने ही अलग हैं। यहां वामपंथ हमेशा ही सत्ता सापेक्ष रहा है। आज इन्हें सरकारी संस्थानों में प्रतिनिधित्व दे दिया जाए तो सब शांत हो जाएगा। ये सरकार के साथ ऐसे चलेंगे जैसे कभी जुदा ही न थे। अपनी सत्ता सापेक्ष प्रवृतियों के कारण ही वामपंथियों ने शैक्षणिक संस्थानों में अपनी प्रभुता स्थापित की। इससे उन्हें बौद्धिक नेतृत्व तो मिल गया] लेकिन इनकी पार्टियों को इसकी कीमत अपना जनाधार खोकर चुकानी पड़ी। यही कारण है कि मौजूदा दौर में इन पार्टियों से भी बड़ा कद उनके छद्म धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों का है। लेकिन ये सब भी अपना अस्तित्व तभी तक बनाए रखेंगे जब तक ये नीति निर्धारण में शुमार हैं। इधर सत्ता का प्रश्रय हटा और उधर ये बौद्धिक आतंकवाद भी नेस्तनाबूद हो जाएगा।

अभी तक बौद्धिक धौंस के कारण ही वामपंथियों ने आरएसएस को हाशिए पर रखा हुआ था। लेकिन अब जब हर जगह la?k के लिए दरवाजे खुल रहे हैं] उसकी आवाज की गूंज से छटपटाहट हो रही है] कौतुहल भी है। la?k हमेशा अपनी विचारधारा पर अडिग रहा है। लेकिन चूंकि देश के बौद्धिक संस्थानों के द्वार पहले सिर्फ इनके लिए खुलते थे और अब जब दूसरे भी आ रहे हैं तो सिंहासन डोलता हुआ दिख रहा है। लिहाजा खबर भी यही बनती है कि आरएसएस का आदमी बन गया है। उसकी योग्यता की ओर कोई ध्यान आकर्षित नहीं करता।

आज की तारीख में आरएसएस एक ऐसी हकीकत है जिससे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। महज आंखें बंद कर लेने से कबूतर बिल्ली की मार से बच नहीं सकता। कोई इसका जवाब दे कि आरएसएस अगर गलत विचारधारा है तो इतनी तेजी से प्रसार क्यूं हो रहा है। यह जो आरोप है कि सरकार पर दबाव डालकर la?k अपनी विचारधारा थोप रहा है। यहां विचारधारा को थोपने का कोई सवाल ही नहीं है। लेकिन हम बौद्धिक विकास को समग्रता से विकसित करना चाहते हैं। हमारा रवैया मौजूदा बुद्धिजीवियों जैसा नहीं है जो la?k के प्रति पक्षपाती रवैया रखते हैं। त्रासदी यह है कि ये लोग la?k की विचारधारा का आलोचनात्मक विवेचन करने में भी विश्वास नहीं रखते। हम यही चाहते हैं कि शिक्षण संस्थानों में गुरु गोलवलकर और नंबूदरीपाद दोनों को पढ़ाया जाए। 

वामपंथियों को यह समझना होगा कि la?k के प्रति जिस वैचारिक अस्पृश्यता का उन्होंने पोषण किया था उसके दिन अब लद गए हैं। यह एक नए युग की शुरुआत है। इन सबने मिलकर भारतीय विमर्श को विकलांग कर दिया था। लेकिन अब ऐसा नहीं है। वामपंथियों को राष्ट्रभक्ति की दुहाई देते पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे से परहेज करना होगा। सिर्फ उनके चाहने भर से या इनके विचार के अनुरूप पाकिस्तान जिंदाबाद या भारत तेरे टुकड़े होंगे को राष्ट्रभक्ति की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है। वामपंथ का जो बौद्धिक अधिपत्य है उसे बौद्धिक स्तर पर ही तोड़ा जाएगा न कि बुल्डोजर से।

मौजूदा समय एक शैक्षणिक संस्थान में जो दिख रहा है संकट वह नहीं है। संकट यह है कि उस संस्थान ने जो प्रतिष्ठा अर्जित की] उसके मंच पर यह सब हो रहा है। परिसर में ऐसी ?kVuk,a होती रही हैं जो देश की अखंडता पर सवाल उठाती हैं। कांग्रेस ने कई दशक पहले आल इंडिया रेवोलुशनरी स्टूडेंट्स फेडरेशन को प्रतिबंधित किया था। लेकिन वहां इससे जुड़ी डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स यूनियन खुलेआम काम कर रही है। दुखद यह भी है कि कुछ बौद्धिक शिक्षण संस्थानों में एक ऑर्गेनिक संबंध बन गया है जिसके कारण यह बहस हमेशा होती रही है कि भारत एक बहुराष्ट्रवादी देश है। राम एक मिथ हैं या असलियत] इस पर बौद्धिक विवाद हो सकता है] लेकिन उस पर विरोध प्रदर्शन का क्या औचित्य है। हम अगर मोदी] la?k या भाजपा पर आपके विरोध पर सवाल करें तब वह तो फासीवाद हो सकता है लेकिन देश की अखंडता पर किसी के भी विरोध पर हम मुखर सवाल खड़ा करेंगे। अगर एक छात्रla?k अध्यक्ष की मौजूदगी में पाकिस्तान जिंदाबाद और देश विरोधी नारे लगे और यह देशद्रोह नहीं है तो फिर हमें देशद्रोह की नई परिभाषा तलाश करनी होगी। यह ध्यान रहे कि भारतीय राष्ट्रवाद पर सवाल खड़ा करना उनके लिए सहज हो सकता है पर हमारे लिए असहज है] था और रहेगा।

¼सैयद तहसीन अली से बातचीत पर आधारित½

 
         
 
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