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vad 45 28-04-2018
 
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नजरिया 10
 
आंदोलनों को पैा किया है नुक्कड़ नाटकों ने

  • अरविंद गौड़

प्रतिष्ठित रंगकर्मी

अन्ना आंदोलन और दामिनी आंदोलन में नुक्कड़ नाटक ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। नाटक ने लोगों को भरोसा दिलाया कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ा जा सकता है। सिर्फ नारेबाजी से नहीं] आप जब तक नहीं बोलेंगे] तब तक खत्म नहीं हो सकता है। यह सवाल लेकर हम लोगों के पास गए। दिल्ली और आस-पास से करीब ५-७ लाख लोग जोड़े हमने नाटक के माध्यम से। उनसे बातचीत की] महीनों तक द्घूमते रहे। नतीजा क्या हुआ कि जंतर- मंतर पर जब पहला अनशन हुआ तो लोगों ने उसमें सहयोग दिया। रामलीला मैदान तक तो लोग लाखों की संख्या में जा पहुंचे। तो पूरे आंदोलन में नुक्कड़ नाटक की बहुत बड़ी भूमिका जागरूकता फैलाने में रही है

जब देश आजाद हुआ था] सभी के पास बहुत  सारे सपने थे] बहुत सारी योजनाएं थीं] समाज कैसे काम करेगा] हमारा गणतंत्र कैसा होगा] जो समस्याएं थीं वो कैसे हल होंगी। सबसे पहले तो यह था कि देश इतने la?k"kks± के बाद आजाद हुआ था तो आर्थिक] सामाजिक] राजनीतिक सवाल मुंह बाएं खड़े थे। भारतीय राजनीति में नेहरू युग के बाद] इंदिरा गांधी का दौर आया] आपातकाल के बाद एक नया दौर आया जहां केंद्र में गैर कांग्रेसी सरकार बनी। तो लोग लोकतंत्र में समझदार हुए। आज पहले से ज्यादा लोग लोकतंत्र के बारे में जानते हैं। अपने हक के बारे में जानते हैं। लेकिन राजनितिक परिपक्वता जो होनी चाहिए थी वो नहीं दिखाई देती है। देश ने तरक्की की] आर्थिक तरक्की की] सामाजिक भी हुई] लेकिन जिस तरह से पूरा परिवर्तन होना चाहिए था जिसमें हमारे नेताओं की भूमिका होनी चाहिए थी] वो पूरी ब्यूरोक्रेसी के कंट्रोल में चली गई। ब्यूरोक्रेसी ज्यादा मजबूत है। नेता भी ब्यूरोक्रेसी का इस्तेमाल करते हैं। अपने लाभ के लिए ब्यूरोक्रेसी नेताओं का इस्तेमाल करती है] सिस्टम का इस्तेमाल करती है।

आजादी से लेकर आज तक लगातार हमारे सामने सवाल खड़े हुए हैं क्योंकि लोकतंत्र अब लूटतंत्र और भ्रष्टतंत्र की ओर बढ़ रहा है। बड़े-बड़े द्घोटाले इतने सालों में सामने आए हैं। उसके खिलाफ आंदोलन भी हुए हैं] लोग सड़कों पर भी उतरे] लाठियां खाईं] चीजें बदलती हुई दिखाई भी देने लगीं] लेकिन मंशा ईमानदार न होने की वजह से वैसा का वैसा नजर आया। इसी दशक में भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन हुआ] रामलीला मैदान से लेकर जंतर मंतर तक। इस आंदोलन ने पूरे देश को कहीं-न-कहीं उद्वेलित किया। उन सवालों के कारण सत्ता परिवर्तन तो हो गया लेकिन वह सवाल अब भी वहीं-के-वहीं खड़े हैं। भ्रष्टाचार वैसा-का- वैसा ही है] गरीबी वैसी-की-वैसी ही है। 

हिंदुस्तान के अंदर दिक्कत यह है कि जो हमारी गरीबी अमीरी की रेखा है वह बहुत ज्यादा बढ़ रही है। अमीर और अमीर होता जा रहा है] गरीब वहीं पर है अब तक। अगर तुलना करें पहले के आंदोलन और वर्तमान दौर के आंदोलन में तो बहुत फर्क आया है। पहले की लड़ाई में सीधे-सीधे मालूम था कि मिल मालिकों से लड़ना है। जो मजदूरों के हित में काम नहीं कर रहा है] मजदूरों को तनख्वाह नहीं दे रहा है या उनका शोषण हो रहा था। तब की लड़ाई में लोगों को उसका दुश्मन पता होता था। पता होता था कि जमींदार है] इसके खिलाफ लड़ाई है या सामंत है इसके खिलाफ लड़ाई है। उस समय समाज का एक बहुत बड़ा तबका लड़ाई में जुड़ता भी था। आजादी के बाद के आंदोलनों को देखें] किसानों का आंदोलन] मजदूरों का या जेपी आंदोलन देख लीजिए जिसे आजादी के बाद का सबसे बड़ा आंदोलन माना जाता है। इसमें लोग सड़कों पर आए] सरकार के खिलाफ मुहिम चली। किसी ने नहीं सोचा था कि कोई कांग्रेस को हटा सकेगा] लेकिन लोगों ने एकजुट होकर हटा दिया। जनता पार्टी पहली गैर कांग्रेसी सरकार के तौर पर आई। ऐसा लगने लगा था कि परिवर्तन आएगा] लेकिन जैसे-जैसे वक्त बीता सब वापस से पहले जैसा हुआ। जनता पार्टी की पूरी प्रक्रिया फेल हो गई। इस आंदोलन से छोटे-छोटे क्षेत्रीय दल बने। क्षेत्रीय दल तो बने] युवा नेता भी निकले और अलग-अलग दलों में गए लेकिन वह उस जज्बे को कायम नहीं रख पाए जो जेपी आंदोलन से पनपा था। कोई जाति की राजनीति में फंस गया] कोई कुटुंब की राजनीति में फंस गया।

अब बात करें आंदोलन में बदलाव की] समय के साथ-साथ कैसे परिवर्तन आया। मैं पिछले २०-२५ सालों से आंदोलन से जुड़ा हुआ हूं। हमलोग सड़कों की लड़ाई लड़े हैं। दिल्ली के मजदूर की लड़ाई थी] उसके विस्थापन के खिलाफ लड़ाई थी] हम कारखाने के गेट पर जाकर लंच के समय नाटक करते थे] सवाल उठाते थे] गाने गाते थे] रैलियां करते थे] उसमें लोगों की हिस्सेदारी होती थी। कुछ नकारात्मक ताकतें मजबूत होनी शुरू हो गईं। सफदर हाशमी की हत्या उसी का परिणाम थी कि आपके खिलाफ अगर कोई आवाज उठता है तो आप उसको मार दो। ये वो दौर था जहां आपको विरोधियों का सामना करना पड़ता था। कहीं-न -कहीं निराशा का दौर था जहां व्यक्ति बाजारवाद के हिसाब से अपनी जिंदगी जी रहा था। आर्थिक उबाल बहुत तेजी से था। यहां से भ्रष्टाचार भी बढ़ा। नतीजा क्या हुआ कि एक गुस्सा पूरे देश में था] लोग एक बार फिर इकट्ठे हुए सामने आए और एक पूरा आंदोलन खड़ा हो गया। अब के आंदोलन में संसाधन बदल गए हैं। अब हमारे पास मॉडल गजट्स हैं] हमारे पास सोशल मीडिया-मीडिया है। आंदोलन को बढ़ाने में सोशल मीडिया और इन गजट्स का इस्तेमाल हुआ। अब यह एक नयापन आया है आंदोलन और राजनीति में क्योंकि आंदोलन और राजनीति में इन माध्यमों का इस्तेमाल हुआ है।

आंदोलानों में नुक्कड़ की भूमिका को हम इस तरह देख सकते हैं कि नुक्कड़ नाटक का जन्म ही आंदोलन से हुआ है। नुक्कड़ नाटक का मतलब होता है जनता का थिएटर] जनता का नाटक] जहां उनकी बातें] उनकी समस्याएं] उनका सवाल] उनके आस-पास जो हो रहा है या उनकी उम्मीदों को दर्शाना। लोगों को एक बल देना कि हां परिवर्तन हो सकता है। आप खड़े हों] इकट्ठा हों। लोगों तक पहुंच कर नाटक किया जाता है। मनोरंजन के लिए कहीं-न-कहीं अवेयरनेस के लिए] राजनीतिक चेतना पैदा करने के लिए नुक्कड़ नाटक का जन्म हुआ है।

आजादी के दौरान इप्टा के रूप में आंदोलन का एक मंच तैयार हुआ। बाद के दौर में इप्टा से प्रेरणा लेकर बहुत सारे थिएटर ग्रुप्स आए। नुक्कड़ नाटक शुरुआत से ही आंदोलन के साथ जुड़ा रहा। लोगों से जुड़ा रहा] सवालों से जुड़ा रहा। विशेष तौर पर राजनीतिक विचारधारा के साथ जुड़ा रहा जहां राजनीतिक प्रोपगंडा और प्रचार के लिए इस्तेमाल होता रहा है। लोग इससे द्घबराए भी] लोगों ने नुक्कड़ नाटक को कुचलने की बहुत कोशिश की। बहुत सारे नुक्कड़ कर्मियों को मारा भी गया] अरेस्ट भी किया गया। हमारी टीम को कई बार पुलिस उठाकर ले जाती थी] हमें ३-४ द्घंटे रोककर फिर छोड़ती थी। ऐसी बहुत सारी द्घटनाएं द्घटीं। नुक्कड़ नाटक के विरोध की प्रतिनिधित्व ताकत जो हैं वह छोटे- छोटे शहरों में आ रही थीं। चाहे भागलपुर हो] पटना हो] आरा हो] इलाहबाद या फिर कानपुर] लखनऊ] बनारस हर जगह उनकी लपटें थीं। ३-४ लड़के इकट्ठे होते थे] लगता था गलत हो रहा है] नाटक तैयार किया और कर दिया। यह एक विरोध का] प्रतिरोध के सवालों का तरीका बन गया था। आपातकाल तक इसमें बहुत उबाल आया] युवा जुड़ते थे। ये सब चीजें बहुत तेजी से बढ़ी। 

जब सफदर की हत्या हुई तब एहसास हुआ कि किस तरह नुक्कड़ नाटक लोगों के लिए खतरा बन जाता है। देश में विभिन्न लोगों ने अलग-अलग स्तरों पर काम करना शुरू किया। कुछ छात्र संगठनों के साथ मिलकर काम करते थे। जब मैंने शुरू किया तो उस समय हम मजदूरों के साथ करते थे। उनके सवालों को लेकर] उनके राशन को लेकर] उनके वेतन को लेकर] मुआवजे को लेकर] उन पर पुलिस के अत्याचार पर नाटक करते थे। जब आंदोलन होते हैं तो नाटकों की जरूरत ज्यादा हो जाती है। आंदोलन को पैदा करने में] लोगों तक पहुंचने में नाटक का बहुत योगदान है। हमने डोमेस्टिक वर्कर्स के लिए नाटक किया है] बाल मजदूरी के खिलाफ भी किया है। अन्ना आंदोलन में हमलोगों ने जगह-जगह जाकर हजारों की संख्या में नुक्कड़ नाटक किया] ७-८ लोगों की टीमें बनाकर किया। जब हम नुक्कड़ नाटक करते थे तो लोग पूछते थे] भ्रष्टाचार कैसे खत्म होगा। हमने कहा हमें भी नहीं पता है] लेकिन लड़ना तो पड़ेगा। नतीजा क्या हुआ कि नुक्कड़ नाटक पूरे आंदोलन का केंद्र बन गया। 

अन्ना आंदोलन और दामिनी आंदोलन में नुक्कड़ नाटक ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। लोगों का भरोसा दिलाया कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ा जा सकता है। सिर्फ नारेबाजी से नहीं] आप जब तक नहीं बोलेंगे] तब तक खत्म नहीं हो सकता है। यह सवाल लेकर हम लोगों के पास गए। दिल्ली और आस-पास से करीब ५-७ लाख लोग जोड़े हमने] नाटक के माध्यम से। उनसे बातचीत की] महीनों तक द्घूमते रहे। नतीजा क्या हुआ कि जंतर- मंतर पर जब पहला अनशन हुआ तो लोगों ने उसमें सहयोग दिया। रामलीला मैदान तक तो लोग लाखों की संख्या में जा पहुंचे। तो पूरे आंदोलन में नुक्कड़ नाटक की बहुत बड़ी भूमिका जागरूकता फैलाने में रही है। इससे लोगों को खड़ा करने का काम किया है। बहुत सारे वालंटियर्स बने।

दामिनी के आंदोलन से पहले हमलोग महिलाओं के हकों के लिए आवाज उठा ही रहे थे] तमाम औरतों के सवाल को लेकर] आजादी के सवाल को लेकर काम कर रहे थे। इसके बाद हम लोगों तक पहुंचे] बात की। नाटक करने से ज्यादा होता है संवाद करना। नतीजा यह हुआ कि हजारों लोग राष्ट्रपति भवन पर इकट्ठे हो गए जिसमें 'अस्मिता' की टीम सबसे आगे थी। हमने कोशिश की कि वो आंदोलन शांतिपूर्वक हो। लोग किसी पार्टी की टोपी या झंडा लेकर न आएं। वहां पर हमने सब पार्टियों के झंडे और टोपी को हटवा कर कहा कि नागरिक के रूप में आएं पार्टी के रूप में नहीं] लोगों ने किया भी। पूरा दिन लाठी चार्ज हुआ] आंसू गैस के गोले भी फेंके गए] सब कुछ हुआ मगर वो डटे रहे। अगले दिन भी यही हुआ] इंडिया गेट पर पुलिस की बर्बरता हुई। उससे लोगों में गुस्सा पनपा] सवालों को लेकर जागरूकता आई। ऐसा नहीं है कि महिलाओं के प्रति सवाल खत्म हो गए हैं या उनके प्रति हिंसा खत्म हो गई है। तो इस आंदोलन से नुक्कड़ नाटक ने लोगों के अंदर एक सजगता भरी।

अब नुक्कड़ नाटक की शक्ल बदल गई है। पहले नुक्कड़ नाटक सत्ता परिवर्तन के लिए करते थे] मिल मालिकों से लड़ाई के लिए करते थे] सामंतों से] जमींदारों से लड़ाई के लिए करते थे। लेकिन अब कॉर्पोरेट जमाना है] शोषण का रूप बदल गया है। अब जो नुक्कड़ नाटकों की लड़ाई है वो हमारे आस पास के सवालों के लिए है] जो हम रोज जिंदगी में झेलते हैं। लोगों में पहले से ज्यादा लोकप्रिय हुआ है] पहले से ज्यादा चर्चित है] पहले से ज्यादा लोगों तक पहुंचा है] समाज के अंदर रेस्पेक्ट बना है। और उसका परिणाम यह हुआ है कि २० साल पहले जब नुक्कड़ नाटक करते थे तो पुलिस आती थी और नाटक बंद करा देती थी] पकड़ कर ले जाती थी] लेकिन आज पुलिस के आने पर लोग उसका विरोध करते हैं और नाटक रोकने नहीं देते हैं। यह बदलाव आया है। लोगों को पता है हम जो बात कर रहे हैं ईमानदारी के साथ कर रहे हैं। लोग खड़े होते हैं] नाटक करने के बाद आधा- आधा द्घंटा बात करते हैं। नुक्कड़ नाटक के माध्यम से एक नई पीढी खड़ी कर दी है जो सवालों को लेकर सामने आ रही है। 

नुक्कड़ नाटक की ताकत को देखते हुए राजनीतिक पार्टियों ने भी इसका इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। पिछले दस सालों में राजनीतिक पार्टियों ने अपने प्रचार के लिए नुक्कड़ नाटक का इस्तेमाल किया है क्योंकि उनको लगता है कि यह सबसे ताकतवर प्रचार का माध्यम है। कॉर्पोरेट कंपनियों ने अपने ब्रांड के प्रचार के लिए नुक्कड़ नाटक का प्रचार करना शुरू कर दिया है। सरकार अपनी योजनाओं के लिए नुक्कड़ नाटक का इस्तेमाल कर रही है। इसका मतलब नुक्कड़ नाटक की ताकत तो है।

¼सैयद तहसीन अली से बातचीत पर आधारित½

 
         
 
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