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जनपदों से 
 
एयर मार्शल की जमीनी जंग

 

  • आकाश नागर

 

सीमा पर दुश्मनों से टक्कर लेने वाले जांबाज एयर मार्शल को एक पूर्व विधायक से अपनी जमीन बचाने की जंग में पसीने छूट रहे हैं

 

सितारगंज (ऊधमसिंह नगर। तराई की जमीनों के विवाद अक्सर सुर्खियों में आते रहे हैं। एक विवाद ऐसा भी है जिसमें एक सेवानिवृत्त वायुसेना प्रमुख एअर मार्शल कुंवर दलइंद्रजीत सिंह को सितारगंज के पूर्व विधायक नारायण पाल से जंग लड़नी पड़ रही है। दोनों ही किच्छा- सितारगंज रोड पर लौका गांव में तीन एकड़ जमीन पर अपना-अपना दावा कर रहे हैं। मामला अब न्यायालय तक जा पहुंचा है।

 

जानकारी के अनुसार कुछ साल पहले लौका गांव निवासी एवं वर्ष २००९ में वायुसेना प्रमुख पद से सेवानिवृत्त हुए एयर मार्शल सिंह के पिता  पूर्व लेफ्टिनेंट कर्नल कुंवर जगवंत सिंह के किच्छा- सितारगंज रोड पर खेत नंबर ८ पर कुछ लोगों ने अतिक्रमण कर लिया था। उन्होंने वहां अपने अस्थाई निवास बना लिए थे। इस जमीन पर कर्नल परिवार ने केस भी जीत लिया था। इसके बाद भी अतिक्रमणकारी जमीन से हटने को तैयार नहीं थे। तब उन्होंने तत्कालीन विधायक नारायण पाल से एक समझौता किया कि जमीन को अतिक्रमण मुक्त कराने पर तीन एकड़ जमीन उनके कॉलेज के लिए दान दी जाएगी। इसके बाद विधायक ने अपने संबंधों का इस्तेमाल कर जमीन को अतिक्रमण मुक्त कराया।

 

वादे के मुताबिक जमीन खाली करवाने की एवज में ३ एकड़ जमीन विधायक के कॉलेज के लिए दान देने की प्रक्रिया शुरू हुई। पूर्व लेफ्टिनेंट कर्नल कुंवर जगवंत सिंह के तीन पुत्रों में आपसी सहमति के बाद उनके सबसे बड़े बेटे कर्नल कुंवर इकबाल इन्द्रजीत सिंह की लौका गांव स्थित जमीन में से तीन एकड़ जमीन कॉलेज के लिए देने पर रजामंदी हुई। बताया जाता है कि सितारगंज के तत्कालीन विधायक नारायण पाल ने तब जमीन लेने से मना कर दिया। जुलाई २००९ में १० लाख रुपए में इस जमीन का बकायदा विक्रयनामा परमजीत सिंह के नाम दिखाया गया। इसके बाद परमजीत ने यह जमीन नारायण पाल को दान में दे दी। वर्ष २००९ में जब कुंवर जगवंत सिंह के बेटे कुंवर दलइन्द्रजीत सिंह एयर मार्शल के पद से रिटायर्ड होकर अपने गांव लौका पहुंचे तो उन्होंने पाया कि जमीन बंदोबस्त (राजस्व विभाग ने विधायक नारायण पाल को जिस जमीन को देना चाहिए था उसके स्थान पर दूसरी जमीन दे दी है। बकौल कुंवर दलइन्द्रजीत सिंह बंदोबस्त विभाग ने नारायण पाल को दी जाने वाली जमीन का चिह्नीकरण मेरी जमीन पर कर वहां पिलर लगा दिया। लौका के जिस खेत खाता नंबर-९ में जमीन दी गई वह मेरे नाम थी। इसे बकायदा मैंने आरटीआई के माध्यम से भी निकलवाया। नक्शा बंदोबस्ती में भी यह स्पष्ट था। लेकिन नारायण पाल किच्छा टनकपुर नेशनल हाईवे से सटी हुई फ्रंट की जमीन लेना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने राजस्व विभाग से भी सेटिंग कर ली थी।

 

फरवरी २०१० में नारायण पाल ने इस जमीन पर कॉलेज बनाने के सपने को पूरा करने के उद्देश्य से धारा १४३ के तहत लैण्ड यूज चेंज भी करा लिया। यह नजरी नक्शा में स्पष्ट हुआ कि जमीन का जहां दावा किया जा रहा है वहां न होकर कहीं और ही है। मामले ने तूल पकड़ा तो २० नवंबर २०१० को नारायण पाल के समर्थकों ने इस विवादास्पद जमीन पर चहारदीवारी लगानी शुरू कर दी। इसके बाद सितारगंज में दो गुट बन गए। एक गुट नारायण पाल का तो दूसरा एअर मार्शल कुंवर दलइन्द्रजीत सिंह का था। धरना- प्रदर्शन का दौर भी खूब चला। मामला न्यायालय में चला गया। मई २०११ में न्यायालय ने कहा कि जब तक दूसरा पक्ष (नारायण पाल जवाब नहीं देंगे तब तक वह जमीन पर नहीं जायेगा। पूर्व विधायक नारायण पाल की तरफ से कोर्ट में कोई लिखित जवाबनामा नहीं दिया गया है। बहरहाल उनका कहना है कि उनकी जमीन हड़पने के लिए विधायक उन्हें तरह-तरह से परेशान करते रहे हैं। उनके अनुसार इस क्रम में उन पर सबसे पहले २७ दिसंबर २०१० को श्रीराम नामक एक व्यक्ति ने एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज कराया। इसके बाद १५ दिसंबर २०११ को पंप और ड्रिल चोरी कराने का मामला दर्ज कराया गया। जिसको झुठा करार दिया गया। जबकि अगस्त २०११ में उन पर मानहानि का मामला दर्ज कराया गया। कुंवर दलइन्द्रजीत सिंह का कहना है कि यह सभी मामले उन पर पूर्व विधायक नारायण पाल ने दर्ज करवाए। दूसरी तरफ जब पूर्व विधायक नारायण पाल से बात की गई तो उन्होंने कहा कि मामला न्यायालय में विचाराधीन है। इसलिए मैं कुछ नहीं कहूंगा।

 

प्रधानाध्यापकों के इंतजार में स्कूल

 

  • जसपाल नेगी

 

पौड़ी। गढ़वाल मण्डल में सरकारी स्कूलों के हाल भी अजीब हैं। कहीं शिक्षक ज्यादा हैं तो कहीं बहुत कम। वर्तमान में यदि गढ़वाल मण्डल की शिक्षा व्यवस्था पर नजर डाली जाए तो यहां के अधिकांश माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षण के साथ-साथ प्रशासनिक व्यवस्था की स्थिति भी काफी दयनीय है। प्रधानाचार्यों और प्रधानाध्यापकों का टोटा इसका मुख्य कारण है। मंडल में माध्यमिक स्कूलों के प्रधानाचार्यों और प्रधानाध्यापकों के सैकड़ों पद खाली हैं। आधे से अधिक माध्यमिक विद्यालय बिना मुखिया के ही संचालित हो रहे हैं। 

 

उल्लेखनीय है कि शिक्षकों की कमी के चलते माध्यमिक विद्यालयों में चरमराती शिक्षा व्यवस्था किसी से छिपी नहीं है। मंडल में एलटी शिक्षकों और प्रवक्ताओं के सैकडो़ं पद खाली हैं। इस कारण इस नये शैक्षणिक सत्र में भी शिक्षा व्यवस्था ढर्रे पर नहीं आ पा रही है। इन परिस्थितियों के बीच अधिकांश विद्यालयों में प्रधानाचार्यों के पद रिक्त होने से इसमें प्रशासनिक व्यवस्थाएं भी पहेली बनी हुई हैं। गढ़वाल की प्राथमिक शिक्षा पर नजर डाली जाए तो पूरे मण्डल के सातों जिलों पौड़ी चमोली देहरादून उत्तरकाशी रुद्रप्रयाग टिहरी एवं हरिद्वार में कुल ७०७७ प्राथमिक विद्यालय एवं १९६० राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय हैं। अर्थात कुल विद्यालय ९०३७ हैं। यदि जनपदवार देखा जाए तो पौड़ी में राजकीय प्राथमिक विद्यालय १६६५ एवं ४२९ राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय हैं। पौड़ी जनपद में १३६७ प्रधानाध्यापक के पद स्वीकूत होने के बावजूद १२९६ प्रधानाध्यापक ही कार्यरत हैं। ७१ पद रिक्त पड़े हैं। साथ ही प्राइमरी के सहायक अध्यापकों के १९६१ पदों में से ३८३ पद रिक्त हैं। उच्च प्राथमिक विद्यालयों में प्रधानाध्यापकों के १३ एवं सहायक अध्यापकों के १७ पद रिक्त हैं। 

 

देहरादून में राजकीय प्राथमिक विद्यालयों की संख्या ९५६ और राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालयोंं की संख्या २९३ है जिसमें ४६५ प्राइमरी प्रधानाध्यापकों के पदों के सापेक्ष १३० पद रिक्त पडे़ हैं। प्राइमरी विद्यालयों के सहायक अध्यापकों के १३७४ पदों में से १४९ पद रिक्त चल रहे हैं। वहीं उच्च प्राथमिक विद्यालयों के स्वीकूत १५० पदों में से मात्र ६६ अध्यापक कार्यरत हैं। वहीं उत्तरकाशी में ७५७ राजकीय प्राथमिक विद्यालय और २५८ राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय हैं। यहां पर प्राथमिक विद्यालयों में ३१८ प्रधानाध्यापकों के सापेक्ष मात्र २५६ प्रधानाध्यापक कार्यरत हैं बाकी ६२ पद यहां पर रिक्त चल रहे हैं। सहायक अध्यापकों के भी १०८७ पदों के सापेक्ष २६२ पद रिक्त चल रहे हैं। उच्च प्राथमिक विद्यालयों में स्वीकूत १४६ पदों में से २९ पद रिक्त चल रहे हैं। 

 

चमोली जिले में ९८८ राजकीय प्राथमिक विद्यालय एवं ३१२ राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय हैं। जिसमें ५१० प्रधानाध्यापकों के सापेक्ष ४८३ ही कार्यरत हैं। प्राइमरी के १५०२ सहायक अध्यापकों के सापेक्ष यहां पर ३०१ पद रिक्त चल रहे हैं। वहीं उच्च प्राथमिक की यदि बात की जाए तो १६० प्रधानाध्यापकों में से ११९ प्रधानाध्यापक ही कार्यरत हैं और स्वीकूत ९६९ पदों में से २२८ पद रिक्त चल रहे हैं। 

 

यही स्थिति रुद्रप्रयाग में राजकीय प्राथमिक विद्यालयों की है यहां पर ५६९ और १६४ राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय हैं। यहां पर प्राइमरी स्कूलों के लिए स्वीकूत प्रधानाध्यापकों के ३२२ पदों में से ५ पद रिक्त चल रहे हैं। सहायक अध्यापकों के ७६१ पदों में से ५०३ अध्यापक ही कार्यरत हैं जिसमें २५८ पद रिक्त चल रहे हैं। यही स्थिति उच्च प्राथमिक शिक्षा की है जिसमें प्रधानाध्यापकों के स्वीकूत ९२ पदों में से ५६ ही कार्यरत हैं। सहायक अध्यापकों के ४४३ पदों में से ३६ पद रिक्त चल रहे हैं। 

 

टिहरी जिले में राजकीय प्राथमिक विद्यालय १४७२ और ३३३ राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय हैं। जिसमें प्रधानाध्यापकों के स्वीकूत १००२ पदों में से ८० पद रिक्त चल रहे हैं। १४८२ सहायक अध्यापकों के सापेक्ष यहां पर मात्र ११९२ ही कार्यरत हैं २९० पद रिक्त चल रहे हैं। यही हाल उच्च प्राथमिक शिक्षा का है जिसमें प्रधानाध्यापकों के स्वीकूत २६० पदों में से २८ पद रिक्त हैं। यहां पर सहायक अध्यापकों के स्वीकूत १०३२ पदों में से १८७ पद रिक्त चल रहे हैं। 

 

हरिद्वार जिले में भी कमोबेश यही स्थिति है। यहां पर ६७१ राजकीय प्राथमिक विद्यालय और १७१ राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय हैं। जिसमें प्राथमिक विद्यालयों में स्वीकृत ५९३ पदों में से ५४३ अध्यापक ही कार्यरत हैं जिसमें ५० पद रिक्त चल रहे हैं। वहीं सहायक अध्यापकों के लिए स्वीकूत १७७९ पदों में १६०४ ही कार्यरत हैं जिसमें १७५ पद रिक्त चल रहे हैं। उच्च प्राथमिक शिक्षा के अन्तर्गत भी प्रधानाध्यापकों के ५५ स्वीकूत पदों के सापेक्ष ४५ पदों पर ही प्रधानाध्यापक नियुक्त हैं। जिसमें १० पद रिक्त चल रहे हैं। सहायक अध्यापकों के लिए स्वीकूत ६१४ पदों में से ८९ पद रिक्त चल रहे हैं। माध्यमिक शिक्षा के अपर निदेशक एनएस राणा कहते हैं कि गढ़वाल मण्डल में दुर्गम क्षेत्रों की अपेक्षा सुगम क्षेत्रों में शिक्षकों की कमी है जिसे दूर करने के प्रयास नयी नियुक्तियों के माध्यम से होंगे। वर्तमान में दुर्गम में सेवाएं दे रहे शिक्षकों को सुगम क्षेत्र में नियुक्त किया जायेगा। नयी नियुक्तियां दुर्गम क्षेत्रों में की जायेंगी। 

 

 

 
         
 
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  • दिनेश पंत

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