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vad 45 28-04-2018
 
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नजरिया 9
 
महिला मुक्ति में हिंसा बड़ी बाधा

  • अनीता भारती

दलित अधिकारी के लिए सक्रिय

हमारे मन में अंदर तक जातीयता और गरीबों के प्रति नफरत कूट&कूट कर भरी है] जो दलित आदिवासी गरीब&गुरबों के प्रति संवेदनहीन होने में दिखाई दे जाती है। यहां उच्च मध्यम जातिवादी समाज 'वर्ग' आधारित उत्पीड़न पर चुप्पी लगा जाता है] वहीं गरीब] दलित] पिछड़े हर जगह ऐसी नृशंस हत्याओं के खिलाफ खड़े नजर आते हैं। निर्भया के हक और न्याय की लड़ाई में जिस तरह से प्रत्येक वर्ग ने न्याय पाने के लिए एकजुटता दिखाई] वैसी एकजुटता किसी दलित और गरीब लड़की के लिए उच्च मध्यमवर्ग एवं उच्च जाति के लोग नहीं दिखा पाते। आज ऐसे दोहरे मानदंड] जातीय पूर्वाग्रह और किसी भी तरह की अन्यायी मानसिकता से लड़ने की जरूरत है। तभी पूरे स्त्री समाज की लड़ाई को कामयाबी से लड़ा जा सकेगा। कोई सफल लड़ाई चाहे वह अत्याचार के खिलाफ हो या हक पाने के लिए] वह टुकड़ों में नहीं लड़ी जा सकती

 

दलित महिलाओं में अपने अधिकारों के प्रति चेतना का दायरा दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। इसमें कोई शक नहीं कि आने वाले कुछ वर्षों में यह चेतना गांव&गांव] शहर&शहर yka?krh हुई अपने हक&हकूकों की लड़ाई को एक मजबूत अंजाम तक जरूर ले जाएगी। राजनीति से लेकर लेखन] लेखन से लेकर सामाजिक जागरूकता और सामाजिक जागरूकता से लेकर सांस्कूतिक बदलाव में आने वाले समय में वह अपनी युगांतर भूमिका अदा करती नजर आएंगी। मिसाल के तौर पर हमारे बीच समाज के हर फ्रंट पर दलित महिलाओं की सशक्त उपस्थिति दिखने लगी है। वे अपने अधिकारों] सवालों और मुद्दों को एकजुट हो रही हैं। दलित महिलाएं अपनी भागीदारी और हिस्सेदारी को लेकर अन्य आंदोलन चाहे वह स्त्री आंदोलन हो] दलित आंदोलन हो या फिर असंगठित क्षेत्र के कामगारों का आंदोलन हो] हर जगह वह अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रही हैं। दलित राजनीति में आज दलित महिला चेहरे एक से अनेक दिखने लगे हैं। सरपंची से लेकर स्वयं उद्यमी बनने तक का वे सफर कर रही हैं। 

सामाजिक उत्पीड़न से रू&ब&रू होते हुए] अपनी जान का बलिदान देते हुए भी अपनी जीवटता का परचम लहरा रही हैं। कुछ साल पहले ही भगाणा की चार नाबालिग बेटियां अपने साथ हुए बलात्कार के खिलाफ] न्याय पाने के लिए जंतर मंतर पर बैठकर अपना आक्रोश जता रही थीं और पूरे दलित समुदाय को अन्याय] शोषण और उत्पीड़न के खिलाफ एकजुट कर रही थीं। दलित बेटियों में शिक्षा का स्तर बेशक धीरे&धीरे ही सही मगर ऊपर जा रहा है। वे अपने सपनों को उड़ान देने की कोशिश कर रही हैं। परंतु इन सब संभावनाओं के बाद भी दलित महिलाओं की स्थिति बेहद सोचनीय है। दलित महिला पर जिस तरह से सामाजिक हिंसा की जाती है] उससे उसकी न केवल गरिमा का हनन होता है अपितु इसमें उसके इंसान होने व उसके अस्तित्व को स्वीकार करने का एक हद दर्ज का ब्राह्मणीकल जातिवादी नकार छिपा हुआ है। यही वजह है कि आज जबकि हम मंगल ग्रह पर नई दुनिया बनाने का सपना लेकर चल रहे हैं वहीं दूसरी तरफ दलित &आदिवासी महिलाओं के ऊपर हो रहे शारीरिक और मानसिक हमले चरम पर हैं। दलित&आदिवासी महिलाएं तब तक मुक्त नहीं हो सकतीं या दूसरे शब्दों में कहें तो दलित आदिवासी महिलाओं को मुक्त करने के लिए पूरे भारतीय समाज को सामाजिक हिंसा करने की जातिवादी मानसिकता और जाति के खिलाफ लड़ाई का बिगुल फूंकना पड़ेगा। 

यह वाकई गौर और नोटिस करने वाली बात है कि देश में जिस तेजी से महिलाओं के साथ हो रहे बलात्कार] छेड़खानी] एसिड अटैक] हत्या आदि की ?kVukएं बढ़ती जा रही हैं] उनके बारे में प्रगतिशील सोच रखने वाले] जाति के खिलाफ लड़ने वाले] जाति रहित समाज समानता आधारित समाज का सपना देखने वाले लोग जातीय हिंसा को पढ़&सुन देखकर बहुत चिंतित और दुखी हो रहे हैं। इसी दुख और निराशा में डूबकर] देश के सभी वर्ग और तबके के लोग&बाग इस सामाजिक हिंसा के विरोध का कोई और रास्ता ना पाकर निराशा की स्थिति में सड़कों पर उतर आए हैं। उनका निराश होकर सड़कों पर उतरना तथा व्यवस्था के विरुद्ध होकर जंतर&मंतर से लेकर हर आम खास जगह इकट्ठे होकर विरोध&प्रदर्शन&धरने आदि करने पर उतारु होना यह बताता है कि देश के लोग अब चाहते हैं कि महिलाओं और वंचित तबके की महिलाओं पर होने वाली हिंसा रुके। इसे रोकने के लिए ऐसा सख्त कानून बने जो महिला हिंसा के अपराधी को कड़ी से कड़ी सजा दिला सके। स्त्री हिंसा के खिलाफ चल रही आंधी में अधिकांश लोगों का तो यह भी मानना था कि अब कानून से भी कुछ नहीं होगा अब तो ऐसे बलात्कारियों और अपराधियों को सबके सामने और सरे राह क्रूर से क्रूर सजा देना ही सबसे उपयुक्त और कारगर इलाज होगा। मगर इन सब बातों और वक्तव्यों से परे यह सोचने वाली बात है कि आज देश के कोने&कोने से आ रही हिंसा और अत्याचार की ?kVukएं अभी हाल में ही ज्यादा बढ़ी हैं या इस तरह की ?kVukओं का देश में पहले से ही कोई इतिहास रहा है। बेशक लोग आज किसी महिला के साथ ?kVh किसी भी तरह की हिंसा की ?kVuk पर फौरी तौर पर प्रभावित] दुखी और क्रोधित होकर अपनी भावनाओं को आक्रामक रूप में व्यक्त कर देते हैं] पर यह बात भी ध्यान देने लायक है कि यह मात्र संयोग है या कोई षड्यंत्र कि इस हिंसा के पीछे छिपे धार्मिक] सामाजिक और जातीय इतिहास के सूत्रों पर हमारी नजर भी नहीं जाती या फिर हम जानबूझकर डालना नहीं चाहते। इस देश में कभी ऐसा रहा होगा जब स्त्रियों की बहुत इज्जत रही हो और उन्हें मर्द के बराबर सारे अधिकार और सम्मान प्राप्त रहे हों। और अब एकाएक सब कुछ उल्टा हो गया हो। समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़ी दलित स्त्री पर हमेशा से जातीय और धार्मिक अत्याचार होते रहे हैं। दलित स्त्री हजारों साल से अपने ऊपर तरह&तरह के अमानवीय अत्याचार झेलती आ रही है। अब नई बात यह हुई है कि आधुनिकता की तरफ बढ़ रहे समाज में इसी तरह के अत्याचार और हिंसा के चपेट में तथाकथित उच्च शिक्षित और उच्च जातीय वर्ग की महिलाएं भी आने लगी है। इस वर्ग और जाति की महिलाओं को हिंसा के शिकार होते हुए देखना] यह लोगों के लिए बहुत बड़ी बात और अनोखी बात है। अपने वर्ग और जाति की औरत पर हिंसा देख तुरंत लोगों की सहानुभूति स्वानुभूति में बदल जाती है। तुरंत लोगों की संवेदनशीलता जाग जाती है और सब तुरंत हर तरीके से व्यवस्था को कोसने लगते हैं। एक तरफ हमारा व्यवहार अपने वर्ग से प्रभावित होकर किसी ?kVuk पर अपनी प्रतिक्रिया देता है तो दूसरी तरफ हम और हमारा समाज दलित गरीब पीड़ित महिलाओं के खिलाफ संवेदनहीनता के उस क्रूर धरातल पर पहुंच चुका है जहां उनके साथ हर रोज &हर द्घंटे हो रहे बलात्कार और अत्याचार&प्रताड़ना को आम एवं ध्यान ना देने वाली बात मानकर भूला देता है। यदि हम हर तरह की हिंसा का विरोध एक ही तरह एक ही स्वर से करें तो निश्चित ही हम जल्दी दिन पर दिन महिलाओं पर बढ़ती हिंसा का मुकाबला कर सकते हैं और उसके खूनी पंजे तोड़ सकते हैं। पर दुख तो इस बात का है कि हजारों सालों से हमारे तथाकथित 'यत्र नारी पूज्यंते] रमन्ते तत्र देवता' वाले समाज में गरीब दलित मजदूर किसान] आदिवासी समाज की महिलाओं के साथ हमेशा भयानक सामाजिक हिंसा होती रही है। तब इस ब्राह्मणीय जातिवादी पितृसत्ता एवं धर्म द्वारा प्रायोजित हिंसा के खिलाफ हम एक शब्द नहीं बोलते उस समय ऐसा महसूस होता है जैसे सबकी संवेदनशीलता को लकवा मार गया हो। तब यह सहानुभूति कभी स्वानुभूति का रूप नहीं ले पाती। 

आज स्त्रियों के ऊपर हिंसा कई रूपों में हो रही है। बलात्कार] शारीरिक और मानसिक छेड़छाड़ से लेकर गाली&गलौज] मार& पिटाई] द्घर से निकाल देना] हत्या] दहेज ना देने के लिए जिंदा जला देना] एकतरफा प्रेम या शारीरिक या मानसिक संबंध में असहमति दर्ज करने पर एसिड अटैक होना] कामकाज की जगह यौन शोषण और यौन प्रताड़ना होना] जबर्दस्ती जातिगत पेशा करने पर मजबूर करना] पूरी मजदूरी ना देना] बंधुआ मजदूरी करवाना] मैला खिलाना] डायन और चुडै़ल कहकर पत्थरों से मार देना या हत्या कर देना] नंगा द्घुमाना] किसी सार्वजनिक जगह पर जाने की पाबंदी लगाना] धार्मिक अंधविश्वास एवं रूढ़ियों को मानने को मजबूर करना] खेतों में हल ना चलाने देना] पंचायत में चुने जाने पर भी पंचायती कामकाज ना करने देना] देह&व्यापार के लिए मजबूर करना] द्घरेलू कामगार रहते हुए तमाम मानवीय हकों से वंचित रहना और न जाने कितने प्रकार हैं जिनसे स्त्री खासकर दलित स्त्री रात&दिन जूझती है। पर इन सब अत्याचारों पर तो समाज की नजर भी नहीं जाती है। यह स्त्रियों के जीवन में रोज आम बात की तरह ?kVrs रहते हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक भारत में हर द्घंटे में दो बलात्कार के मामले थाने में दर्ज होते हैं। ये वे मामले हैं जो किसी तरह दर्ज हो पाते हैं। इसके अलावा जो थाने तक नहीं पहुंच पाते] उनकी संख्या न जाने कितनी होगी। भारत के सामाजिक ढांचे में इस समस्या को लेकर क्या दृष्टि और आग्रह रहे हैं] यह किसी से छिपा नहीं है। देश की राजधानी और देश का दिल कही जाने वाली दिल्ली बलात्कार के मामले में सबसे आगे है। आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली में २०११ में बलात्कार के ५६८ मामले दर्ज हुए] जबकि मुंबई में २१८। पिछले चार सालों की तुलना में बलात्कार की ?kVukओं में करीब तीस फीसद की बढ़ोतरी हुई है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि हम कहां खड़े हैं और किस ओर जा रहे हैं। एक महिला संस्था सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ वीमेन के अनुसार] 'भारत में प्रतिदिन ४२ महिलाएं बलात्कार का शिकार बनती हैं। इसका अर्थ है कि प्रत्येक ३५वें मिनट में एक औरत के साथ बलात्कार होता है।' यही नहीं] साल&दर&साल स्त्रियों के साथ छेड़छाड़] तेजाबी हमलों] अपहरण] खरीद&फरोख्त] हत्या&आत्महत्या आदि की ?kVukओं में लगातार बढ़ोतरी हो रही है।

कितने शर्म की बात है एक तरफ हम चांद और मंगल पर जीवन बसाने की तैयारी कर रहे हैं और दूसरी तरफ ५० प्रतिशत आबादी को महज वस्तु के रूप में देखते हुए उसकी देह और मन के साथ तरह&तरह के अमानुषिक व्यवहार कर रहे हैं या किए जाने की जमीन तैयार कर रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष २०११ में देशभर में बलात्कार के कुल ७]११२ मामले सामने आए] जबकि २०१० में ५]४८४ मामले ही दर्ज हुए थे। २००१ और २०१० के बीच एक लाख चालीस हजार से भी ज्यादा दर्ज किए। एक पहलू यह भी है कि जो अपराध रिकार्ड में आ पाते हैं] जरूरी नहीं कि उनमें सबको सजा मिल जाए। इस तरह] एक लाख चालीस हजार से भी ज्यादा दर्ज मामलों में कम से कम एक लाख ऐसे अभियुक्त थे] जिन्हें प्रमाण के अभाव में निर्दोष मानकर उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया गया। इन एक लाख बाइज्जत बरी लोगों में १० प्रतिशत ऐसे बलात्कारी थे जिन्होंने अबोध] छोटी नन्हीं मासूम नाबालिग बच्चियों से बलात्कार किया था। यह बात भी गौरतलब है कि ९० प्रतिशत मामलों में बलात्कारी जान&पहचान के लोग पाए गए हैं] जिनमें पड़ोसी] रिश्तेदार] मित्र एवं पारिवारिक मित्र या द्घर के बुजुर्ग आदि शामिल होते हैं। मात्र १० प्रतिशत बलात्कारी ही अनजान लोग होते हैं। हालांकि बलात्कार की शिकार होने वालों में किसी भी उम्र की महिलाओं को देखा जा सकता है] लेकिन इनमें छोटी बच्चियों से लेकर युवा लड़कियां ज्यादा होती हैं] जिसमें सबसे ज्यादा संख्या दलित&आदिवासी बच्चियां और युवतियों की होती है। इनके साथ केवल शारीरिक रूप से बलात्कार जैसा अपराध नहीं होता है] बल्कि इस ?kVuk में सामाजिक अवस्थितियों के कारण मानसिक और भाषिक] कई&कई स्तरों पर अत्याचार की शिकार होती हैं। लेकिन समूची स्त्री जाति के साथ दैनिक नित्यकर्म की तर्ज पर भिन्न&भिन्न तरीके से मानसिक और भाषिक छेड़छाड़] फब्ती कसना] गाली&गलौज] मार&पिटाई] टोका&टाकी की जाती है। उन पर तरह तरह की पाबंदियां थोपी जाती हैं। स्त्रियों के खिलाफ प्रताड़ना के असंख्य दंशों को कहीं आंकड़ों में कैद नहीं किया जा सकता है। मानसिक प्रताड़ना और बलात्कार की यह स्थिति स्त्रियों के जीवन&मरण के साथ पल&पल ?kVrh&बढ़ती रहती है। 

दिनों दिन बलात्कार की बढ़ती ?kVukएं जहां हमें एक ओर मानसिक रूप से बीमार पड़ते समाज की ओर इशारा कर रही हैं] वहीं यह शासन&प्रशासन की विफलता की कहानी भी है। समाज में न केवल महिलाओं के साथ बलात्कार की ?kVukएं बढ़ी हैं] बल्कि तेजाब फेंकने और जला कर मार देने की ?kVukओं में भी तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। सवाल है कि तमाम कानून और सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद महिलाओं के खिलाफ हिंसा और बलात्कार की ?kVukएं दिन&प्रतिदिन क्यों बढ़ती जा रही हैं। इसका जवाब हमें हाल ही में संयुक्त राष्ट्र द्वारा विभिन्न एजेंसियों के साथ मिल कर एशिया प्रशांत के छह देशों के पुरुषों पर किए गए सर्वेक्षण के नतीजों में मिलता है। इस सर्वेक्षण में बांग्लादेश] चीन] कंबोडिया] इंडोनेशिया] श्रीलंका और पापुआ न्यू गिनी के दस हजार से अधिक पुरुषों से शोधकर्ताओं ने बात की। इसकी रिपोर्ट लैंसेट ग्लोबल हेल्थ के ऑनलाइन संस्करण में प्रकाशित हुई है। इस अध्ययन के मुताबिक हर चौथे पुरुष ने कम&से&कम एक महिला के साथ बलात्कार करने की बात स्वीकार की है। इस अध्ययन में पुरुषों के बलात्कार करने के पीछे चार बातें निकल कर आईं कि उन्होंने बलात्कार मजे के लिए] सेक्स की जरूरत के लिए] मर्द होने के अधिकार का प्रयोग करने के लिए और स्त्रियों से नाराज होकर उन्हें सजा देने के लिए किया। इस सर्वेक्षण में एक बात और निकल कर आई है कि कभी&कभी गरीबी और प्रताड़ित बचपन में भी हिंसा के तत्व व्यक्तित्व में शामिल हो जाते हैं। बलात्कारियों को कानून द्वारा दंड न मिलना और समाज में स्त्रियों के प्रति हिंसा&शोषण&अपराध की मौन और मुखर स्वीकूति भी बलात्कार का मुख्य कारण बनती है।

दरअसल] भारत में बलात्कार के पीछे मुख्य कारण हमारे भारतीय समाज में स्त्री हिंसा की मौन और मुखर स्वीकूति ही है। धर्म ग्रंथों से लेकर आख्यान&पुराणों तक में अनेक ऐसे किस्से और कहानियां प्रचलित हैं] जिनमें स्त्री का दमन और स्त्री अस्मिता पर हमलों का न केवल खूब वर्णन किया गया है] बल्कि उनके साथ हुए अन्याय को भी जायज ठहराया गया है। चाहे वह रावण की बहन शूर्पणखा की नाक काटना हो या फिर द्रौपदी का चीर&हरण। गर्भवती सीता को त्याग देना हो या बेकसूर अहिल्या को पत्थर में तब्दील कर उसे सजा देने की बात। कूष्ण द्वारा नदी में नहाती गोपियों के वस्त्र छुपा लेने को हम बेहद महान लीला मानते हैं और उसे हर तरीके से सही ठहराने की कोशिश रहते हैं। हिंदू धर्मग्रंथों में अनेक उदारण ऐसे मिल जाएंगे जहां पिता ने पुत्री के साथ बलात्कार किया या फिर कोई देवता धोखे से महिला के पति का रूप धारण करके उसके साथ छल से शारीरिक संबंध बना कर भाग गया। मगर हर मामले या कहानी में छली पुरुष को दंडित करने के बजाय देवता पद और स्त्री को किसी न किसी रूप में सजा ही दी गई। ऐसी कहानियां न केवल समाज में प्रचलित हं] बल्कि उनका आज तक महिमामंडन जारी है। 

सच तो यह है कि हमारा समाज महिलाओं और दलितों के प्रति हमेशा से ही हिंसा और उनके शोषण का समर्थक रहा है। इस बात को साबित करने के लिए इतिहास में अनेक उदाहरण मिल जाएंगे। समाज में कुरीतियां और अंधविश्वास न केवल पलते रहे हैं] बल्कि उन्हें पूरा प्रश्रय भी दिया जाता रहा है। पतिव्रता स्त्री का महिमामंडन और अपनी मर्जी से जीने वाली] अपने जीवन के फैसले लेने वाली स्त्री का मान&मर्दन यहां हमेशा से होता रहा है। धर्म की ध्वजा के नीचे पल रहे पापों पर चर्चा करना आज भी पाप ही समझा जाता रहा है। दलित स्त्रियों के बलात्कार पर आधारित देवदासी प्रथा और बेडनी प्रथा आज भी खत्म नहीं हुई है। दलित आदिवासी स्त्रियों का बलात्कार करना] उन्हें नंगा करके द्घुमाना] मैला खिलाना] पेशाब पिलाना] सरेआम पीटना] डायन और चुड़ैल कहकर मार डालना] ये सारी तस्वीरें दलित& आदिवासी महिलाओं की सोचनीय स्थिति को बताती हैं और धर्म और जाति आधारित भारतीय समाज के क्रूर चेहरे को उजागर करती हैं।

विभिन्न जाति और वर्ग की महिलाओं के साथ हुए बलात्कारों पर दृष्टि डालें तो पता चलता है कि इन बलात्कारों को लेकर समाज] न्याय] मीडिया और सत्ता का अलग&अलग रवैया है। पिछले दिनों ?kVh तीन बलात्कार की ?kVukएं जो बेहद अमानुषिक और क्रूर तरीके से अंजाम दी गई थीं] उनमें एक ३१ जुलाई को मुंबई की एक अंग्रेजी पत्रिका की फोटो पत्रकार के साथ पांच युवकों द्वारा शक्ति मिल में किया गया बलात्कार था। इस ?kVuk के खिलाफ बेहद सशक्त विरोध दर्ज हुआ] जैसा 'निर्भया' के समय पूरा भारतीय समाज गुस्से से उबल पड़ा था] उसी तरह इस फोटो पत्रकार के लिए भी समाज ने आवाज उठाई। मीडिया की त्यौरियां चढ़ गईं] महिला नेताओं के भाषणों में रूलाई फूट पड़ी। देश की बेटी निर्भया के बाद देश की इस दूसरी बेटी के लिए पूरा राष्ट्र और  मीडिया अपने आप ही अति भयंकर रूप से उद्वेलित हो गया। पुलिस ने अपराधी को एक&दो दिन की कड़ी मशक्कत के बाद पकड़ लिया और उसकी पहचान भी कर ली। पुलिस और मीडिया और प्रशासन की चुस्ती की दाद देनी पडेग़ी कि मामले के सारे पहलू इतनी जल्दी सुलझ गए।

दूसरी ?kVuk हरियाणा राज्य के जींद जिले की है। २४ अगस्त को शिक्षिका&पद का पेपर देने जा रही एक दलित युवती को अपहरण के बाद यातनाएं देकर बलात्कार करने के बाद हत्या कर दी गई। जिस दिन यह युवती परीक्षा देने निकली उसी दिन शाम को लड़की के पिता को फोन आया कि उस युवती के सारे सर्टिफिकेट सड़क किनारे एक पन्नी में पड़े हैं। लड़की के पिता इस फोन को समझ नहीं पाए। देर शाम तक जब युवती द्घर नहीं लौटी तब युवती के पिता लड़की के और रिश्तेदार थाने गए और फोन पर आए कॉल का नंबर दिखाकर पुलिस से युवती को ढूंढ़ने की गुहार लगाते हुए अपनी लड़की के अपहरण होने की बात कही। पुलिस काफी ना&नुकुर करने के बाद फोन करने वाले के गांव पहुंची और वहां लड़की को न पाकर वापस लौट आई। अगले दिन युवती के पिता के पास युवती के मृत शरीर की शिनाख्त करने के लिए पुलिस का फोन आया। लड़की के पिता ने अपनी बेटी की पहचान कर ली। लड़की की लाश देखकर और पुलिस की लापरवाही से लोग भड़क उठे] उन्होंने पुलिस पर आरोपियों को पकड़ने और ढूंढ़ने का दबाव बनाने के लिए प्रदर्शन किया। लेकिन पुलिस ने इसे टालने लायक मामला मान लिया था और किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई। जब गांव के दलितों ने पुलिस की लापरवाही के खिलाफ प्रदर्शन किया तो पुलिस ने गांव वालों पर खूब लाठियां चलाईं। सबसे अधिक क्रूर चेहरा पुलिस का तब आया जब उसने मृत लड़की के शरीर को 'किक' मारी। हमेशा कि तरह इसकी खबर भी अखबार और अन्य मीडिया में नहीं आई। और तो और] न तो लड़की की लाश का ठीक से पोस्टमार्टम हुआ और न उसके लिए जन&सहानुभूति का सैलाब उमड़ा। हां] दलित संगठनों ने जरूर इस पर अपना आक्रोश जताना अपनी जिम्मेदारी समझी। वे हरियाणा के जींद जिले में जाकर पूरी खबर खोद लाए। मृत युवती का तीसरी बार पोस्टमार्टम कराया। अपराधियों को गिरफ्तार करवाने के लिए जंतर&मंतर पर विशाल धरना दिया। पर इतना सब करने के बाद भी इस ?kVuk का न तो मीडिया ने और न ही प्रशासन ने संज्ञान लिया। 

तीसरी ?kVuk दिल्ली की है] जिसमें एक झुग्गी&बस्ती में रहने वाली गरीब युवती को चार&पांच लोग गर्दन पर चाकू की नोंक रख द्घसीटते हुए ले गए और उसके साथ बलात्कार किया। बलात्कार की इस खबर को एक अंग्रेजी के अखबार ने मुंबई की फोटो जनर्लिस्ट से साथ हुई ?kVuk की बड़ी खबर छापते हुए इस गरीब युवती के बलात्कार की सूचना को मात्र दो&तीन लाइनों में निबटा दिया। इन्हीं तीन लाइनों की खबर को पढ़ कर एक ऑस्ट्रेलिया डॉट कॉम के एक पत्रकार ने इस खबर की तह में जाने के लिए यहां एक दुभाषिया का सहारा लिया और उस लड़की को खोज कर बात करके पूरी ?kVukक्रम को सामने रखा। इस आस्ट्रेलियन पत्रकार को संदेह था कि यह युवती साधनहीन होगी] निम्न वर्ग से होगी। उसका शक सही निकला। जब उसने अखबार के संपादक से इस नाइंसाफी के लिए जानना चाहा तो अखबार के संपादक ने उसे कहा कि इस खबर की 'शॉक वैल्यू' उतनी बड़ी नहीं है। इस शॉक&हीन आम खबर पर भी पुलिस&प्रशासन से लेकर समाज और न्याय व्यवस्था तक किसी ने भी अपना मुंह नहीं खोला। कारण जींद और दिल्ली में ?kVh ?kVuk के केंद्र में दलित युवतियां थीं। कुछ समय पहले भी एक ऐसी ही बलात्कार की छोटी सी खबर छपी थी जिसे पुलिस द्वारा लो&प्रोफाइल केस बता कर मामला बंद कर दिया गया था। जब हमने पूरी तहकीकात की तो वह लो&प्रोफाइल केस एक दलित युवती का था। २०१६ में जनवरी से जुलाई तक झारखंड में करीब सवा आठ सौ दलित& आदिवासी महिलाओं&बच्चियों के साथ बलात्कार हुए] लेकिन समूचे देश में यह खबर किसी को नोटिस लेने लायक नहीं लगी।

चौथी ?kVuk एक नाबालिग लड़की से धार्मिक गुरु आसाराम द्वारा बलात्कार की ?kVuk है। इस खबर के साथ दिलचस्प पहलू यह है कि जो लोग निर्भया के बलात्कारियों के लिए फांसी की सजा मांग रहे थे] जो निर्भया के लिए कैंडिल मार्च निकाल रहे थे] जो उसे देश की बेटी बताकर उसके साथ हुए अन्याय पर चीख रहे थे] उनमें से बहुत सारे इस नाबालिग बच्ची के खिलाफ सारे तर्क गढ़ कर आसाराम की रिहाई की मांग कर रहे थे।

इन मामलों और इन चारों लड़कियों की पृष्ठभूमि को देखें तो बहुत कुछ भारत के जनमानस को समझने का मौका मिल जाता है। दिल्ली की पैरा मेडिकल छात्रा और मुंबई में फोटो पत्रकार बलात्कार कांड का व्यापक पैमाने पर विरोध] धरने&प्रदर्शन मीडिया कवरेज और प्रशासन में हड़कंप मच जाना इंगित करता है कि इस देश में 'वर्ग' और 'जाति' देख कर ही अधिकांश चीजें तय होती हैं। इससे पहले भी कई उदाहरण सामने हैं] चाहे वह जेसिका लाल का मामला हो या प्रियदर्शनी मट्टू। खैरलांजी कांड में बलात्कार के बाद मारी गई दलित स्त्रियों का परिवार अभी भी अपने ऊपर होने वाले अमानुषिक अत्याचारों के लिए न्याय का इंतजार कर रहा है। 

मीडिया में कवरेज से लेकर न्याय होने की प्रकिया तथा प्रशासन द्वारा चुस्ती&फुर्ती से उठाए गए सारे कदम वर्ग&जाति को देखकर तय होते हैं। निर्भया कांड में महज नौ महीने में फैसला भी आ गया। जबकि हजारों दलित आदिवासी गरीब बच्चियों और युवतियों के साथ हुए बलात्कार के केस अपने फैसले होने के इंतजार में दम तोड़ देते हैं। दलित आदिवासी युवतियों के साथ न्याय प्रक्रिया की लापरवाही] पुलिस और शासन की लापरवाही की वजह समाज में जातीय पूर्वाग्रह का होना है] क्योंकि सब जगह वर्चस्वकारी जातियों के लोग बैठे हैं। ऐसे में उम्मीद लगाना कि इन दलित&आदिवासी और गरीब बच्चियों के साथ न्याय होगा] बेमानी लगता है। एक तरफ बलात्कारी अपनी जातीय हैसियत और धन&बल के बूते छूट जाते हैं या छूट पा जाते हैं] वहीं बलात्कार पीड़िताएं एक लंबी सजा युक्त जिंदगी जीती हैं। 

चूंकि भारतीय समाज में दलित& आदिवासी या वंचित समाज के साथ जाति और धर्म के नाम पर हमेशा अत्याचार होते आए हैं] खासकर स्त्रियों को हमेशा दैहिक अत्याचार की भट्टी से गुजरना पड़ता रहा है] इसलिए लोगों ने इन्हें सहज मान स्वीकार कर लिया है। इसलिए इनके साथ क्रूर अत्याचार की ?kVukएं होने के बाद भी लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता। वे दलित समाज के प्रति अति तक जाकर संवेदनहीन हो चुके हैं। पर जब इसी तरह की कोई क्रूर ?kVuk तथाकथित सभ्य उच्च जातीय समाज में द्घट जाती है तो उनकी संवेदना चारों तरफ से फूट&फूटकर निकलने लगती है। क्या बलात्कार की पीड़ा और भयावहता किसी के लिए कम या ज्यादा हो सकती है? अगर ऐसा नहीं तो किसी&किसी ?kVuk पर ही हमारी संवेदना क्यों उछाल मारती है और क्यों किसी निचली कही जाने वाली जाति की औरतों पर हो रहे लगातार बलात्कारों पर हमें कुछ महसूस नहीं होता। मुंबई की पत्रकार का मामला हो या दामिनी निर्भया कांड दोनों में ही मध्यवर्ग को अपनी बेटियों का चेहरा नजर आ जाता है] जबकि अन्य दलित &गरीब पिछड़ी बच्चियों के लिए नहीं। जब इन झुग्गी बस्तियों में गांवों में गरीब] दलित बच्चियों के साथ वे नृशंस ?kVukएं होती हैं तो हमारी प्रतिक्रिया कुछ नहीं होती।

इस कुछ न होने के कई कारण हैं जिसमें सबसे पहला तो यही है कि हमारी ?k`.kk उस वर्ग के खिलाफ है जो कहीं न कहीं हमारे उस मर्म पर चोट करती हुई हमें असुरक्षा का बोध देती है कि यदि ये सशक्त हो गए तो हमसे अपना हक मांगने और छीनने लायक हो जाएंगे। दूसरे हम दलितों और आदिवासियों के प्रति इतने असंवेदनशील हो चुके हैं कि इतनी ?kVukओं को सहजता से लेते हुए यह मान चुके हैं उनके साथ ऐसा होना आम बात है और ऐसा होता रहता है। हमारे मन में अंदर तक जातीयता और गरीबों के प्रति नफरत कूट&कूट कर भरी है] जो दलित आदिवासी गरीब& गुरबों के प्रति संवेदनहीन होने में दिखाई दे जाती है। यहां उच्च मध्यम जातिवादी समाज 'वर्ग' आधारित उत्पीड़न पर चुप्पी लगा जाता है] वहीं गरीब] दलित] पिछड़े हर जगह ऐसी नृशंस हत्याओं के खिलाफ खड़े नजर आते हैं। निर्भया के हक और न्याय की लड़ाई में जिस तरह से प्रत्येक वर्ग ने न्याय पाने के लिए एकजुटता दिखाई] वैसी एकजुटता किसी दलित और गरीब लड़की के लिए उच्च मध्यमवर्ग एवं उच्च जाति के लोग नहीं दिखा पाते। आज ऐसे दोहरे मानदंड] जातीय पूर्वाग्रह और किसी भी तरह की अन्यायी मानसिकता से लड़ने की जरूरत है। तभी पूरे स्त्री समाज की लड़ाई को कामयाबी से लड़ा जा सकेगा। कोई सफल लड़ाई चाहे वह अत्याचार के खिलाफ हो या हक पाने के लिए] वह टुकड़ों में नहीं लड़ी जा सकती।

 
         
 
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क्या मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और और वित्त मंत्री प्रकाश पंत के बीच शीतयुद्ध चल रहा है?

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वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह से रोविंग एसोसिएट एडिटर गुंजन कुमार की बातचीत 

जेपी के आंदोलन में संपूर्ण क्रांति तो थी। मगर उनका मूल लक्ष्य था दिल्ली में

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