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vad 45 28-04-2018
 
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औरत भीतर आजादी

  • निवेदिता

सामाजिक कार्यकर्ता एवं लेखिका

आजादी के बाद ८० का दशक भारत में स्त्री आंदोलन का दशक माना जाता है। महिलाएं एक तरफ स्त्री के मसले पर लड़ रही थीं दूसरी तरफ देश में चले सभी प्रमुख आंदोलनों में उनकी हिस्सेदारी रही। राजनीति में अपनी हिस्सेदारी से लेकर वह जल] जंगल और जमीन की लड़ाई में लगी रहीं। बिहार में जमीन की लड़ाई में मूल रूप से वामपंथी पार्टियों का असर रहा है। ८० के दशक में नक्सल आंदोलन का विस्तार हुआ। राजनीतिक शक्तियों के रूप में खुद को स्थापित करने के लिए उन्होंने संसदीय राजनीति का रास्ता चुना। १९८५ में उनका मुख्य हिस्सा चुनावी संद्घर्षों में शामिल हो गया। ७४ के जनआंदोलन से वे अलग&थलग ही रहे। जन आंदोलन और चुनावों में भागीदारी के जरिए दलित और अति पिछड़ी जातियों के गरीब तबकों के बीच खासकर मध्य बिहार में भाकपा माले का व्यापक विस्तार हुआ। इस तबके के बीच जनता दल जैसी पार्टियों का भी गहरा असर था। दलित और पिछड़ों के सामाजिक और राजनीतिक विस्तार को देख कर बड़े भूस्वामियों और उच्च वर्ग के किसान जातीय राजनीति के नाम पर गोलबंद होना शुरू हुए। बिहार में कई जातीय नरसंहार हुए। जिसमें सबसे ज्यादा दलित और पिछड़ी जाति की महिलाएं और बच्चे निशाना बने

 

आजादी के बाद देश में जो समाजिक] आर्थिक व राजनीतिक बदलाव हुए उस बदलाव में स्त्रियों की साझेदारी रही है। साझेदारी से ज्यादा उसने ?kj और बाहर के मोर्चे पर दोहरी लड़ाई लड़ी। पर ये लड़ाईयां इतिहास के पन्नों में दर्ज नहीं हुईं। जो कुछ नाम दर्ज हैं वे इसलिए कि इन नामों के बिना इतिहास लिखा नहीं जा सकता था। वर्जीनिया वुत्फ ने एक जगह लिखा है ^इतिहास में जो कुछ अनाम है वह औरतों के नाम है^। 

इतिहास में औरतों की भूमिका हमेशा से अदृश्य रही है। उसकी एक वजह है कि हम इतिहास चेतन नहीं रहे। इतिहासकारों ने प्रतीकों] लोक गाथाओं] गीतों व अन्य स्रोतों को कभी समेटने की कोशिश नहीं की। हम जानते हैं कि व्यवस्थित रूप से इतिहास रचने की मंजिल पर पहुंचने से पहले ऐसे सभी समुदाय पहले चरण में आत्मगत ब्योरों का इस्तेमाल करते हैं ताकि उनकी बुनियाद पर इतिहास लिखने की इमारत खड़ी की जा सके। 

आशा रानी बोहरा ने जब ^महिलाएं और स्वराज^ किताब लिखनी शुरू की तो उन्हें तथ्य जुटाने में १२ वर्ष लगे। उन्होंने एक जगह लिखा है कि आजादी के आंदोलन में स्त्रियों की भूमिका पर लिखने के लिए जब सामग्री जुटाने लगी तो गहरी निराशा हुई।  माना जाता है कि उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी की शुरुआत में अनेक महिला आंदोलन हुए। पर उन आंदोलनों का कोई इतिहास नहीं मिलता। यही वह क्षण है जब स्त्री आंदोलन व देश में हुए आंदोलन का पुनर्मूल्याकंन जरूरी है ताकि मुक्ति की सामाजिक परंपरा में एक नया अध्याय जोड़ा जा सके। 

जब देश में आजादी के आंदोलन की लहर थी तो बिहार भी उस आग में लहक रहा था। औपनिवेशिककाल में बिहार में बंगालियों] कायस्थों और मुसलमानों का अभिजात तबका काबिज था] जमींदारी मुख्यतः भूमिहारों] राजपूतों] ब्राह्मणों] मुसलमानों और कायस्थों के हाथ में थी। १९२० के असहयोग आंदोलन] १९३२ के सविनय अवज्ञा आंदोलन में राजपूत और भूमिहार जाति ने बढ़&चढ़कर हिस्सा लिया। और यह समुदाय राजनीति में अपना प्रभाव बनाने लगा। उसी दौर में महिलाएं वोट देने के अधिकार को लेकर आंदोलन कर रही थीं। यह त्रासदी है कि जिस आंदोलन की शुरुआत महिलाओं ने बींसवीं सदी के आरंभ में की थी आज उसी तरह का आंदोलन राजनीति में ३३ प्रतिशत हिस्सेदारी को लेकर है। आजाद मुल्क में भी महिलाओं को उसके हिस्से का हक लेने के लिए लड़ना पड़ रहा है। 

राजनीतिक रुप से बिहार हमेशा से चेतन शील रहा है। १९१७ में महात्मा गांधी के आगमन के बाद पर्दा प्रथा] बाल विवाह] सती प्रथा] शिक्षा जैसे सवालों के साथ&साथ असहयोग] स्वदेशी खिलाफत और खादी के आंदोलन में महिलाओं ने जमकर हिस्सा लिया। १९१२ में पटना में राममोहन राय ने सेमिनरी में महिला सम्मेलन का आयोजन किया गया। श्रीमती मधोलकर ने इसकी अध्यक्ष्ता की और बाल&विवाह के खिलाफ समिति बनाने का सुझाव दिया। १९२८ में महिलाओं ने साइमन कमीशन का जबरदस्त विरोध किया। बिहार में लेजिस्लेटिव कौंसिल में महिलाओं को वोट देने के अधिकार व लैंगिक भेदभाव को लेकर नवंबर] १९२१ को एक प्रस्ताव पेश किया गया। १९१९ के एक्ट के अनुसार वे वोट नहीं दे सकती थीं। कौंसिल में इस मसले पर जमकर बहस हुई और यह प्रस्ताव १० वोटों से गिर गया। कोलकाता में पेश महिलाओं के मताधिकार देने से संबंधित प्रस्ताव भी भारी मतों से पराजित हो गया। पर महिलाएं हिम्मत नहीं हारीं। उनके la?k"kZ जारी रहे। लंबी लड़ाई के बाद बिहार और उड़़ीसा में १९२९ में यह अधिकार महिलाओं को मिला। 

अतीत में हुए la?k"kZ को देखते हुए हम ये कह सकते हैं स्त्री के भीतर आजादी की आग है। और उसकी पहली लड़ाई है वर्चस्वविहीन समाज की स्थापना। यही वजह है कि आज नारीवाद परिवार में श्रम के विभाजन] परिवारिक संबंधों में उसकी उपस्थिति और सत्ता में उसकी जगह को लेकर आंदोलित है। महत्वपूर्ण बात यह है कि स्त्रियों का आंदोलन एकालाप में नहीं चलता। सामाजिक] राजनीतिक और आर्थिक आंदोलन में स्त्रियों की भूमिका का भले ही आकलन नहीं हुआ हो] सच तो यह है कि सभी आंदोलनों में उसकी भागीदारी रही है। देश में ७० के दशक में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में बड़ा आंदोलन हुआ। जिस आंदोलन ने सत्ता की नींव हिला दी। उसमें बड़ी संख्या में स्त्रियों ने हिस्सा लिया। कॉलेज] स्कूलों से निकल कर निरंकुश सत्ता के खिलाफ वे सड़कों पर थीं। स्त्री जब भी किसी आंदोलन का हिस्सा होती हैं तो वह एक साथ कई वर्जनाओं को तोड़ती है। 

स्त्री आंदोलन को महत्त्वपूर्ण आयाम देने वाली सिमोन द बोवुआर कहतीं हैं ^मात्र वर्ग la?k"kZ के द्वारा ही स्त्री&मुक्ति के महान लक्ष्य को हासिल नहीं किया जा सकता है। चाहे साम्यवादी हों] माओवादी हों] या राष्ट्रवादी औरत हर जगह हर खेमें में अधीनस्थ की स्थिति में है] सबसे निचले पायदान पर खड़ी है।^

जब देश में ७४ का आंदोलन हो रहा था उसी दौर में देश के कई हिस्सों में स्त्री हिंसा के वीभत्स मामले सामने आ रहे थे। यह वही दौर था जब रूप कंवर को सती के नाम पर जबरन जला दिया गया। इस अमानवीय ?kVuk के fo:)  महिलाओं ने जबरदस्त आंदोलन किए। ९२ आते&आते देश  को हिला देने वाली एक अन्य ?kVuk हुई। भंवरी बाई बलात्कार की शिकार हुईं।

आजादी के बाद ८० का दशक भारत में स्त्री आंदोलन का दशक माना जाता है। महिलाएं एक तरफ स्त्री के मसले पर लड़ रही थीं दूसरी तरफ देश में चले सभी प्रमुख आंदोलन में उनकी हिस्सेदारी रही। राजनीति में अपनी हिस्सेदारी से लेकर वह जल] जंगल और जमीन की लड़ाई में लगी रहीं। बिहार में जमीन की लड़ाई में मूल रूप से वामपंथी पार्टियों का असर रहा है। ८० के दशक में नक्सल आंदोलन का विस्तार हुआ। राजनीतिक शक्तियों के रूप में खुद को स्थापित करने के लिए उन्होंने संसदीय राजनीति का रास्ता चुना। १९८५ में उनका मुख्य हिस्सा चुनावी संद्घर्षों में शामिल हो गया। ७४ के जनआंदोलन से वे अलग&थलग ही रहे। जन आंदोलन और चुनावों में भागाीदारी के जरिए दलित और अति पिछड़ी जातियों के गरीब तबकों के बीच खासकर मध्य बिहार में भाकपा माले का व्यापक विस्तार हुआ। इस तबके के बीच जनता दल जैसी पार्टियों का भी गहरा असर था। दलित और पिछड़ों के सामाजिक और राजनीतिक विस्तार को देखकर बड़े भूस्वामियों और उच्च वर्ग के किसान जातीय राजनीति के नाम पर गोलबंद होना शुरू हुए। बिहार में कई जातीय नरसंहार हुए। जिसमें सबसे ज्यादा दलित और पिछड़ी जाति की महिलाओं और बच्चे निशाना बने। दरअसल ७२ से ८५ के बीच तानाशाही बनाम लोकशाही] केंद्र में जनता प्रयोग की विफलता और विपक्षी शक्तियों का बिखराव और ८४ में इंदिरा गांधी की हत्या और राष्ट्रीय एकता जैसे सवाल ने दलितों और पिछड़ों के मुद्दे को पीछे ढकेल दिया। 

९० के दशक आते&आते यह एक बड़ा मुद्दा बना। फिर आया मंडल का दौर। जिसने देश में जातीय उन्माद पैदा किए। पर पिछड़ों व दलितों की भागीदारी जैसे सवाल अब राजनीतिक सवाल थे जिससे कोई पार्टी बच नहीं सकती थी।पिछले २०&२५ साल में निश्चय ही सामाजिक परिवर्तन के लिहाज से यादगार काल है] जिसने परंपरागत राजनीतिक ढांचे को ध्वस्त कर दिया। वंचित समुदायों में नई राजनीतिक चेतना आई। राजनीतिक परिवर्तन के काल में इसे चिह्नित किया गया। इसी काल में लोगों को आवाज मिली और इसी दौर में अति पिछड़ों को पंचायतों में आरक्षण मिला। महिलाओं को आरक्षण मिला। 

पर बात यहीं खत्म नहीं होती। जैसे&जैसे स्त्री अपने अधिकार के प्रति सजग हुई उस पर हमले तेज हुए। इस सदी में भी निर्भया बलात्कार जैसे जद्घन्य मामले सामने आए। जिसने देश को आंदोलित किया। उसी आंदोलन का नतीजा है कि बलात्कार के fo:) कड़े कानून बने।

स्त्री जानती है भिन्न&भिन्न वर्गों एवं वर्णों तथा जातियों के बीच नए&नए समीकरणों से चाहे कुछ भी नहीं मिला हो पर वह लड़ रही है। अपनी क्षमता और कौशल को और अधिक तराश रही है। वह इस अमानवीय परंपरा के fo:) खड़ी है। पूंजीवादी पितृसत्ता ऊपर से चाहे जितनी उदार और सरल लगे भीतर से बड़ी जटिल है। प्रभा खेतान कहती हैं कि दोष इसकी संरचना में ही है। हमें इस संरचना से ही अलग होना होगा। इसके लिए स्त्री समूह की जरूरत है। उसे हर मोर्चे पर लड़ना होगा। दुनिया की आधी आबादी स्त्रियों की है] दुनिया में दो तिहाई काम औरतें करतीं हैंं] लेकिन दुनिया की सबसे गरीब कौम औरत ही है। 

ये औरत कौन है जो लड़ रही है? जो जीने का हक मांग रही है जो जानती है अपमान सहती हुई शोषणग्रस्त आधी आबादी जब विद्रोह करेगी तो उसमें सच्ची आग और तड़प होगी। वह फूटती&लरजती जहां&जहां बहेगी वहीं से इतिहास का नया अध्याय लिखा जाएगा। जो नारा कार्ल मार्क्स ने दुनिया के मजदूरों के लिए दिया था वह नारा उसके लिए है। वह कह रही है दुनिया की स्त्रियां एक हों तुम्हारे पास खोने के लिए कुछ नहीं है।

 
         
 
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प्रेम भारद्वाज

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