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बड़े आंदोलन की पृष्ठभूमि बननी तय

  • इम्तियाज अहमद

प्रतिष्ठित समाजशास्त्री

भारत में सत्ता पाने के लिए जो समीकरण है] वह उच्च जाति का हिंदू] मुस्लिम और दलित। यही लोग किसी पार्टी या व्यक्ति को सत्ता की कुर्सी तक पहुंचाते और नीचे उतारते हैं। नेहरू के समय भी और इंदिरा गांधी के समय भी शुरू में यही समीकरण चला। इसलिए आजादी के बाद से मुस्लिम कांग्रेस की छत्रछाया में अपने को महफूज समझता था। आपातकाल के समय और उसके बाद इंदिरा गांधी के हिंदुवादी राजनीति करने से मुस्लिम बिदक गया। फिर बाबरी मस्जिद विध्वंस होने पर मुस्लिम कांग्रेस से और ज्यादा अलग हो गया। तब मुस्लिम अलग&अलग दलों के साथ जाने लगा। आज की तारीख में मुस्लिम वोट किसी एक दल के साथ नहीं है। कहीं वह कांग्रेस] कहीं समाजवादी पार्टी तो कहीं लालू] नीतीश कुमार के साथ तो कहीं ममता और मायावती को वोट देता है। कांग्रेस पिछले पांच&सात साल से इस कोशिश में लगी है कि इंदिरा गांधी और उनके समय से पहले की स्थिति को पुनः प्राप्त किया जाए। लेकिन अब संदर्भ और समय बदल गया है। इसलिए कांग्रेस का उस स्थिति में लौटना बहुत कठिन है

 

भारत में सामाजिक अन्याय के खिलाफ लड़ाई नई नहीं है। ईसा पूर्व छठीं शताब्दी में पहली बार यह लड़ाई शुरू हुई थी। बुद्ध और जैन धर्म उसके उदाहरण हैं। मध्यकालीन भारत में भक्ति और सूफी आंदोलन को भी इसी रूप में देखा जाता है। कबीर और नानक जैसे महान समाज सुधारकों ने इसी युग में जन्म लिया। आधुनिक भारत में खासकर हिंदुओं में व्याप्त वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था को चुनौती देने के लिए ज्योतिबा फुले से लेकर डॉ बीआर अंबेडकर तक यह कारवां आगे बढ़ा। १९५० में संविधान का लागू होना आधुनिक भारतीय इतिहास में सामाजिक न्याय के लिए एक लैंडमार्क है। कम&से&कम इसमें किसी के साथ लिंग] जाति] धर्म नस्ल के आधार पर भेदभाव से मनाही है। भारतीय समाज में शोषण के खिलाफ एक तरह से यह लिखित जंग की शुरुआत थी।

जब यहां साम्राज्यवाद कायम हो गया था तो उस समय धीरे&धीरे भारतीय जनता में उसके विरोध के लिए चेतना जागी। उस चेतना के सहारे कांग्रेस ने आंदोलन खड़ा किया। हमारा समाज विभिन्न समुदायों में बंटा हुआ है। उस वक्त ¼कांग्रेस गठन के समय½ एक महत्वपूर्ण सवाल यही था कि किस प्रकार बंटे हुए समाज को इस आंदोलन से जोड़ा जाए। एक तरफ रामराज्य का नारा बुलंद हुआ तो दूसरी तरफ खिलाफत का। आंदोलन का नेतृत्व करने वालों को यह भ्रम था कि यदि सभी समुदायों] संप्रदायों के बल का उपयोग नहीं किया गया तो आंदोलन ध्वस्त हो जाएगा। आंदोलन की शुरुआत में कांग्रेस के साथ अभिजात्य वर्ग के लोग जुड़े थे। बाद में आम लोग भी धीरे&धीरे कांग्रेस से जुड़ने लगे। खासकर गांधी के आगमन और उनके कांग्रेस के साथ जुड़ने पर। इसीलिए इसका पूरा श्रेय गांधी जी को जाता है। तभी से स्वतंत्रता संद्घर्ष जनांदोलन बना। जैसे&जैसे स्वतंत्रता आंदोलन जोर पकड़ा तो अल्पसंख्यक खासकर मुस्लिम समाज की चिंता बढ़ी। इसी चिंता का नतीजा मुस्लिम लीग है। जिसे १९०६ में बनाया गया। कांग्रेस स्वतंत्रता आंदोलन में सभी समुदायों को साथ लेकर चल रही थी। इसी कारण कई मुस्लिम उसके साथ भी रहे। जो आजादी और बंटवारे के बाद उसका वोट बैंक बना।

मुस्लिम लीग को उतनी कामयाबी नहीं मिली। यदि मिली भी तो १९४१ और खासकर १९४४ में मिली। मुस्लिम लीग को सफलता मिलने का कारण यह भी था कि १९३७ में कांग्रेस ने सरकार बनाने की जो नीति अपनाई उस दौरान मुस्लिम समाज के कुछ लोगों को लगा कि उनके हितों की रक्षा नहीं हो रही है] इसलिए वे लोग विकल्प के तौर पर मुस्लिम लीग के साथ हो गए। उसका असर कहीं&न& कहीं बाद में भी कांग्रेस के वोट बैंक पर पड़ा। बेशक आजादी के बाद कुछ दशकों तक मुस्लिम या अन्य दलित वर्ग कांग्रेस के साथ मजबूती से रहा] लेकिन बाद के समय में धीरे& धीरे उनका जनाधार खिसकता गया। जिसके कारण ¼वर्तमान सरकार को छोड़कर½ गठबंधन सरकार का काल शुरू हो गया। कोई नहीं कह सकता कि २०१९ में किसी एक दल को बहमुत मिलेगा। मुस्लिमों] दलितों और पिछड़े वर्गों का आधार कांग्रेस से खिसकने के कारण ही देश में क्षेत्रीय दलों का उभार हुआ। समुदाय विशेष के वोट बैंक को आधार बनाते हुए नेता कांग्रेस का दामन छोड़ते गए और नई पार्टी बनती गई। यदि कांग्रेस उस समय ही उनकी जनभावनाओं का ख्याल रखती और उस पर काम करती तो शायद आज देश में इतनी तादाद में राजनीतिक दल नहीं होते। दलितों] मुसलमानों की जरूरतों और मांग को वे पूरा करते तो वे साथ रहते। आज यूपीए या एनडीए में सभी विचारधाराओं के लोग और दल हैं। उस वक्त हमें इसका अनुभव नहीं था। १९३७ में कांग्रेस ने सरकार बनाई। उस सरकार ने जिन्ना की मांग नहीं मानी। आज गठबंधन सरकार चलाने का अनुभव यदि तब होता तो शायद आज पाकिस्तान भी नहीं होता।

आजादी के बाद कांग्रेस को सभी वर्गों का पूर्ण समर्थन मिला] लेकिन पार्टी में नेतृत्व अगड़े समाज के लोगों के हाथ में रहा। शुरू से कांग्रेस में जो समूह थे वह बड़े लोगों के थे। अभिजात्य वर्ग नेतृत्व और अग्रिम पंक्ति में रहा। यह बात गांधी के समय भी थी और आजादी के बाद नेहरू के समय में भी रही। सामाजिक प्रगतिशीलता का माध्यम कांग्रेस थी जिससे आप नेता बन सकते थे ताकि जिला] राज्य स्तर पर नेतृत्व कर सकें। नेहरू के कार्यकाल तक यह रहा। वे नए लोगों को पार्टी से जोड़ते थे और उन्हें आगे बढ़ाते थे। इंदिरा गांधी के आने के बाद यह खत्म हुआ। उन्होंने एक नीति अपनाई 'शक्ति का केंद्रीकरण'। धीरे&धीरे नए और छोटे लोगों को आगे लाने की कांग्रेस की क्षमता खत्म हो गई। आज कांग्रेस की बड़ी कमी है तो वह यह कि आम लोगों से कोई नया नेता उभरकर नहीं आ रहा है। इंदिरा गांधी १९६९&७० के बाद से कांग्रेस को 'अपनी पार्टी' की तरह चलाने लगीं। उसमें जब वे अपने को शक्तिहीन देखने लगी थीं तो उन्होंने आपातकाल लगा दिया। आपातकाल के समय उन्होंने कई लोगों को दबाने का काम किया। मेरा अपना विचार यही है कि इंदिरा गांधी के समय से कांग्रेस की क्षमता धीरे&धीरे ?kVus लगी थी जिसके कारण अलग&अलग राज्यों से नए&नए लोग उभरकर आते थे।

भारत में सत्ता पाने के लिए जो समीकरण है] वह उच्च जाति का हिंदू] मुस्लिम और दलित। यही लोग किसी पार्टी या व्यक्ति को सत्ता की कुर्सी तक पहुंचाते और नीचे उतारते हैं। नेहरू के समय भी और इंदिरा गांधी के समय भी शुरू में यही समीकरण चला। इसलिए आजादी के बाद से मुस्लिम कांग्रेस की छत्रछाया में अपने को महफूज समझता था। आपातकाल के समय और उसके बाद इंदिरा गांधी के हिंदुवादी राजनीति करने से मुस्लिम बिदक गया। फिर बाबरी मस्जिद विध्वंस होने पर मुस्लिम कांग्रेस से और ज्यादा अलग हो गया। तब मुस्लिम अलग&अलग दलों के साथ जाने लगा। आज की तारीख में मुस्लिम वोट किसी एक दल के साथ नहीं है। कहीं वह कांग्रेस] कहीं समाजवादी पार्टी तो कहीं लालू] नीतीश कुमार के साथ तो कहीं ममता और मायावती को वोट देता है। कांग्रेस पिछले पांच&सात साल से इस कोशिश में लगी है कि इंदिरा गांधी और उनके समय से पहले की स्थिति को पुनः प्राप्त किया जाए। लेकिन अब संदर्भ और समय बदल गया है। इसलिए कांग्रेस का उस स्थिति में लौटना बहुत कठिन है। इसीलिए गठबंधन सरकारें बनती गईं क्योंकि सिंगल पार्टी का बहुमत आना बहुत मुश्किल है। २०१४ के चुनाव में नरेंद्र मोदी ने इस बिखरे वोट को अपने नारे से एक करने की सफल कोशिश की। हालांकि तब भी उन्हें कई विशेष धर्म या समुदाय का समर्थन नहीं मिला। वहां वो भी नाकामयाब रहे। दो साल बाद स्थिति फिर से पूर्व की तरह ही लग रही है। आज यही प्रतीत होता है कि यदि आज चुनाव होगा तो शायद ही किसी पार्टी को बहुमत मिले।

भारत में जातिवादी राजनीति के लिए आज अलग&अलग क्षेत्रीय पार्टियों को जिम्मेवार बताया जाता है। लेकिन मेरा मानना है] इसके लिए कांग्रेस की नीति और राजनीति सबसे बड़े कारण हैं। हो सकता है कि कुछ मामले में नेताओं की महत्त्वकांक्षा से भी इसे बल मिला होगा। लेकिन यदि कांग्रेस की नीति सही होती तो ऐसा नहीं होता] क्योंकि कांग्रेस में भारत की जनता ने लंबे समय तक अपना विश्वास जताया था। १९८० के दशक में आरक्षण के चलते एक नया बदलाव देश में आया है। मंडल आयोग की सिफारिश लागू होने के बाद हिंदू समाज के दलितों को मौका दिया गया। उसका कितना लाभ उस समाज को हुआ या नहीं इसकी समीक्षा अलग से की जा सकती है। लेकिन एक मौका जरूर मिला। उसी तरह के आरक्षण की जरूरत अब मुस्लिम पिछड़ों की जरूरत बन गई है] क्योंकि आजादी के बाद अब तक केंद्र की सत्ता में काबिज सरकार ने उन्हें उठाने के लिए कुछ नहीं किया। इसलिए यह उनकी जरूरत हो गई है। यदि अब भी उस समाज के लोगों को आगे नहीं लाया गया तो भविष्य में एक बड़े आंदोलन की पृष्ठिभूमि बनना तय है। 

¼सैयद तहसीन अली से बातचीत पर आधारित½

 
         
 
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