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नजरिया 6
 
द शो मस्ट गो ऑन

  • प्रांजल धर

युवा मीडिया टिप्पणीकार

  नेताओं के भाषण सुनने के लिए लोग दूर&दराज के गांव&देहात से अपने जरूरी काम छोड़कर आया करते थे। चौपालों में बैठकर अखबार बांचे जाते थे। पर आज की तुरंताबाज राजनीति और स्टिंग&टेपमूलक मीडिया मिल& जुलकर अलग तरीके का ही समां बांधते हैं। गौर करने वाली बात है कि पिछले तीन&चार दशक में न सिर्फ राजनीति बदली] वोट बैंक बदले] मतदाताओं की संख्या और उनका गठन&संगठन बदला] बल्कि पत्रकारिता भी ^जर्नलिज्म^ के रास्ते आगे बढ़ते हुए ^मीडिया^ तक चलकर आ गई। एक उदाहरण के तौर पर दिल्ली में आम आदमी पार्टी और केजरीवाल का उदाहरण दिया जा सकता है] जिसका उत्पन्न होना और जोरदार तरीके से सत्ता हासिल करना हमारे समय और समाज के राजनीतिक परिवर्तन के साथ&साथ सोशल मीडिया की भूमिका को भी उजागर करता है

 

आज हम जिस समाज में रह रहे हैं] उसमें केवल कलम और स्याही की ही पत्रकारिता नहीं है] बल्कि उससे भी आगे बढ़कर चौबीसों \kaVs के खबरिया चैनल हैं और इनसे भी कहीं ज्यादा और कई गुना आगे बढ़कर पल&पल की खबर देने वाला सोशल मीडिया है। हम एक ऐसे समाज में रह रहे हैं जहां हमें पलक झपकते ही पल&पल की खबरें मिल रही हैं। ये समाचार हमें टीवी चैनलों से मिल रहे हैं। टेलीविजन एक दृश्य& श्रव्य माध्यम है और चौबीसों \kaVs के खबरिया चैनलों के उदय के चलते पिछले एक&दो दशकों से पत्रकारिता और पत्रकारों की प्रकूति बदली है। भारतीय राजनीतिक पटल पर हुआ बदलाव इसका एक कारण भी है और इसी का एक प्रभाव भी। भारतीय राजनीति में कभी नारेबंदी] लामबंदी] जेल भरो और अनेक बुनियादी आंदोलन हुआ करते थे] जिनमें जनता सशरीर उपस्थित होकर आंदोलन को गति प्रदान करती थी। नेताओं के भाषण सुनने के लिए लोग दूरदराज के गांव&देहात से अपने जरूरी काम छोड़कर आया करते थे। चौपालों में बैठकर अखबार बांचे जाते थे। पर आज की तुरंताबाज राजनीति और स्टिंग& टेपमूलक मीडिया मिल&जुलकर अलग तरीके का ही समां बांधते हैं। गौर करने वाली बात है कि पिछले तीन&चार दशक में न सिर्फ राजनीति बदली] वोट बैंक बदले] मतदाताओं की संख्या और उनका गठन&संगठन बदला बल्कि पत्रकारिता भी ^जर्नलिज्म^ के रास्ते आगे बढ़ते हुए ^मीडिया^ तक चलकर आ गई। एक उदाहरण के तौर पर दिल्ली में आम आदमी पार्टी और केजरीवाल का उदाहरण दिया जा सकता है] जिसका उत्पन्न होना और जोरदार तरीके से सत्ता हासिल करना हमारे समय और समाज के राजनीतिक परिवर्तन के साथ&साथ सोशल मीडिया की भूमिका को भी उजागर करता है।

आज आप शाम को प्राइम टाइम में देख सकते हैं कि ये चैनल किस प्रकार की राजनीतिक बहसें आयोजित करते हैं। इसमें जनता के कुछ प्रतिनिधियों को बुलाया जाता है] कुछ ऐसे लोगों को बुलाया जाता है जो मतदाताओं की तरफ से बोलते हैं और कुछ बीच&बचाव करने वाले ^विशेषज्ञों^ को बुलाया जाता है। अभी ज्यादा दिन नहीं बीते जब तमिलनाडु उच्च न्यायालय द्वारा शादी से पहले मर्दानगी के परीक्षण वाले फैसले पर सीएनएन आईबीएन में बहस आयोजित की गई थी। बहस आयोजित की थी भूपेंद्र चौबे ने। पर दुर्भाग्यवश या चैनलों की ही भाषा में कहें तो सौभाग्यवश यह बहस लिंगोत्तेजना से लेकर लिंग&शैथिल्य के लक्षणों को जांचने वाली अधिक हो गई। मूल विषय तो पता नहीं कहां चला गया। दरअसल आज की राजनीति भी ऐसी ही हो गई है] जहां आभासी दुनिया के सपनों के माध्यम से वोट मांगे जाते हैं और उसके बाद भुलावे में रखने के लिए मतदाताओं और दर्शकों का ध्यान ही भटका दिया जाता है।

करीब चार साल पहले से ही दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में इंटरनेट और सोशल मीडिया की फैलती चादर में राजनीतिक दलों ने पांव डालना प्रारम्भ कर दिया था। और ऐसा हो भी क्यों न] सोशल मीडिया का उपयोग करने वाले ज्यादातर लोग युवा हैं। बताया गया है कि भारत युवाओं का देश बन चुका है। ऐसे में] युवाओं तक पहुंचने के लिए लगभग हर राजनीतिक संगठन और हर संस्थान इंटरनेट&सोशल मीडिया का सहारा ले रहा है। आंकड़ों की भाषा में कहें तो इस समय भारत में तेरह करोड़ से अधिक इंटरनेट कनेक्शन हैं जिनमें से साढ़े छह करोड़ से अधिक लोग फेसबुक पर मौजूद हैं] जहां उन्हें बगल में तड़पती अपनी दादी से ज्यादा चिंता अमेरिका में बैठे चैटिंग फ्रैंड्स की रहती है। ऐसे फ्रेंड्स जिनसे शायद वे कभी मिले नहीं] और शायद वे कभी मिलेंगे भी नहीं। सोशल मीडिया के प्रयोक्ताओं की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है जिसका अंदाजा इस बात से लग सकता है कि फेसबुक के इस्तेमाल में भारत] अमरीका के बाद दूसरे स्थान पर है। राजनीति यह जानती है कि स्कूल] कॉलेज हों या विज्ञापन देने वाली बड़ी&छोटी कंपनियां&हर कोई सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहा है युवा लोगों तक पहुंचने के लिए। यही युवा लोग नए और ऊर्जित मतदाता हैं। हर राजनीतिक दल सोशल मीडिया के लिए अपनी&अपनी रणनीति तय कर रहा है।

जब कोई प्राकूतिक आपदा आती है] तो इसके राजनीतिक कोण को भी मीडिया उस तरीके से दिखाता है] जिस तरीके से पहले नहीं दिखाया जाता था। कुछ महीनों पहले जम्मू&कश्मीर में आई बाढ़ को खबरिया चैनलों ने खूब दिखाया। जलप्रलय और हनहनाती नदियां। भरभराकर ढहते द्घर और पानी में बहते चले जाते जीव&जंतु। बीच&बीच में राजनेताओं के बयान। नामी चैनलों की एकाध महिला एंकर हेलीकॉप्टर से बाढ़ का मुआयना करती दिखीं। जब अपने विजुअलों के जरिए उन्होंने बताया कि यह किसी प्राकूतिक आपदा से कम नहीं है] तभी जाकर अहसास हुआ कि सचमुच यह बाढ़ कितनी भयंकर है। चैनलों ने ऐसे&ऐसे दृश्य दिखाए कि दर्शकों की रूह कांप गई। हेडलाइंस टुडे ने लानत&मलामत की कि आखिर इस बाढ़ की पूर्व चेतावनी क्यों नहीं दी गई\ चैनलों ने बताया कि क्या इसे प्रशासन की लापरवाही न माना जाए\ इसी बीच तेलंगाना के मुख्यमंत्री को एक चैनल ने हिटलर क्या कहा कि वे लगे तेलुगु भाषा में फिल्मी डायलॉग देने लगे। बोले कि चैनल वालो] अगर तेलंगाना की बेइज्जती हुई तो गर्दन दस मीटर गहरे गड्ढे में गाड़ दूंगा। राजनीति बिल्कुल थ्री&डी एक्शन फिल्म की भाषा में नजर आई। ऐसा करिश्मा केवल आज की राजनीति और केवल आज के चैनल ही कर सकते हैं। क्या पुराने जमाने में अखबारों के पास ऐसा करिश्मा करने की ताकत थी\ अगर होती तो वे भी दो&एक अंग्रेजी चैनलों की तरह हेडिंग लगाते कि ^मीडिया पर हिटलर का हमला^। इसके बाद क्या होना था। हो गई प्रेस की भाषा] मानहानि और राजनेता के कर्तव्यों पर बहस शुरू। ऐसी राजनीतिक बहस जो ^क्लासिकल^ है। जिसे चैनल केवल इसलिए आयोजित करते हैं क्योंकि आयोजन तो हर हाल में करना ही है। द शो मस्ट गो ऑन! हमारे चैनल राजनीतिक बहसों और हमलों को लेकर बहुत ही ज्यादा संवेदनशील हैं। वे किसी भी तरीके का कोई हमला हरगिज नहीं बर्दाश्त कर सकते। हां] यह बात अलग है कि हमारी भावनाओं या विचारों या जीवनशैली पर जो हमले वे खुद करते हैं] उन पर आप बात न कीजिए।

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि समाज में होने वाली सभी राजनीतिक \kVukओं को ये चैनल नहीं दिखाते। ये जनता से जुड़ी राजनीतिक \kVukओं की बजाय केवल चुनी हुई] सेलेब्रिटी मूलक \kVukओं को दिखाते हैं। जो राजनीति ग्लैमरस हो] उसका प्रचार& प्रसार करते हैं। सेलेक्टिव परसेप्शन का ऐसा खेल देखकर कई बार बहुत अफसोस होता है। इसी तरीके के एक उदाहरण में एबीपी चैनल ने एक ट्रक पर आते हुए एक मुसलमान आदमी को पकड़ा। हमारे प्रधानमंत्री को वह कह रहा था कि जो मदद देनी हो] सीधे देना। कहने का मतलब कि किसी बिचौलिये को मत देना] नहीं तो मदद को वही निगल लेंगे। राजनीति और सोशल मीडिया का रिश्ता पुराना नहीं है। इसका कोई लंबा इतिहास नहीं है। यहां सिर्फ वर्तमान को ही इतिहास बनाकर पेश किया जाता है। अगर याद हो तो इंडिया अगेंस्ट करप्शन ने फेसबुक के जरिए एक बड़ी आबादी को भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे से जोड़ा था और फिर कामयाबी की कालीन पर चहलकदमी करते हुए बात बढ़ती ही चली गई। इस आंदोलन के बाद एक तरह से सोशल मीडिया की शक्ति का अनुमान राजनीतिक हलकों में लोगों को लगा। जिसके बाद हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गूगल हैंग आउट हो या फिर ट्विटर पर बड़े नेताओं की उपस्थिति] फेसबुक पर राजनीतिक दलों के पन्ने हों या फिर यू&ट्यूब पर तृणमूल का अपना चैनल] ये सारे प्रयास लोगों को राजनीतिक दलों से जोड़ने की कोशिश ही हैं।

और फिर नई राजनीति अगर शॉर्ट&कट में भरोसा रखती है] तो मीडिया भी इसमें भरपूर विश्वास रखता है। चौबीसों \kaVs चलने वाले खबरिया चैनलों के पत्रकार आखिर कैमरामैन के साथ फील्ड की कितनी खाक छानें। इसीलिए जब खबर नहीं मिलती तो खबर बनाई जाती है। ब्रेकिंग न्यूज की बजाय मेकिंग न्यूज! और जब खबर बनती भी नहीं] तब राजनीतिक बहसें आयोजित की जाती हैं। ऐसी बहस आगे चलकर महाबहस की शक्ल अख्तियार करती चली जाती हैं।

चैनलों के पत्रकार कभी&कभार खुद को] दो&चार पल के लिए ही सही] जनता का नुमाइंदा मानने की खुशफहमी पाल लेते हैं। फिर शुरू होती है ऐसी चिंताओं की चिन्ता जो हमें परेशान कर सकती है। मसलन] दर्शकों के मुंह से अक्सर सुनने में आता है कि ^एनडीटीवी^ को संसद की चिंता खाए जा रही है तो ^इंडिया टीवी^ भूत&प्रेत और जादू&टोनों से परेशान है। ये चाहे खुद परेशान न हों] पर दर्शकों को जरूर चिंतित और परेशान कर दिया करते हैं। यही तो चैनलों की कला है। आपको चिंता गिफ्ट कर दी और खुद रफ्फूचक्कर। वैसे ^इंडिया टीवी^ ^आप की अदालत^ में कई बार रोचक कार्यक्रम भी पेश करता है लेकिन अफसोस यह है कि वे सिर्फ रोचक ही होते हैं] उनमें राजनीति या जनसेवा का कोई भी सारतत्त्व नहीं होता। कहने को यह ^देश का सबसे बड़ा मुकदमा^ होता है] लेकिन वैसी कुछ वैचारिकी नहीं दिखती जैसी एक जिम्मेदार चैनल से उम्मीद की जाती है। कार्यक्रम के अंत तक आते&आते दर्शकों को महज इतना ही याद रहता है कि एक जज था जो हथौड़ी पीट&पीटकर अदालत की कार्रवाई को शुरू करने का निर्देश दिए जा रहा था।

दंगों और धर्म को लेकर जताई गई चैनलीय चिंताएं भी कुछ कम नहीं हैं। इनकी जितनी चिंता राजनीति को है] उससे कम चिन्ता चैनलों को नहीं है। चैनल केंद्रीय मंत्रियों को बोलते हुए दिखाते हैं क्योंकि धार्मिक भावनाओं का सवाल है। साइबर सुरक्षा के मद्देनजर पूछा जाता है कि दंगा फैलाने वाले वीडियो  अपलोड करने वालों का पता दीजिए। पर धर्म के बरअक्स कभी&कभी इनके अपने अंतःपुर में भी गड़बड़ियां हो जाती हैं। और अफसोस कि वे जाहिर भी हो जाती हैं! कुछ समय पहले एक न्यूज चैनल में काम करने वाली महिला एंकर ने ऑफिस के सामने जहरीला पदार्थ खाकर खुदकुशी करने की कोशिश की थी। ऑफिस स्टाफ ने उसको अस्पताल में भर्ती कराया। बाद में किसी तरह वह बच गई। चैनलों को दिखाने के लिए मसाला मिल गया। कुछ तो प्रतिस्पर्धा के कारण] कुछ खबर का महिला से जुड़ी होने की वजह से और कुछ इसलिए कि यह खुद पत्रकारों की अपनी बिरादरी से जुड़ी खबर थी। पुलिस ने बताया कि महिला एक नामी चैनल में बतौर एंकर काम कर रही थी और खुदकुशी की कोशिश करने से महज एक दिन पहले ही उसने इस्तीफा दिया था। महिला एंकर ने चैनल के दो वरिष्ठ सहकर्मियों पर आत्महत्या के लिए उकसाने] मानसिक रूप से परेशान करने सहित अलग& अलग धाराओं में तहरीर दर्ज कराई। यह भी कम सनसनीखेज नहीं रहा कि इस टीवी एंकर ने आत्महत्या के प्रयास से पहले फेसबुक पर एक सुसाइड नोट भी पोस्ट किया था। इसमें उसने आत्महत्या वाले दिन सुबह किए गए पोस्ट में सबको आखिरी गुडबॉय कहा था। अपने नोट में उसने खुद को बेहद मजबूत और मेहनती बताया। उसमें लिखा कि जो लोग सारी जिंदगी अपने ख्वाबों को पूरा करने के लिए मेहनत करते हैं और जी&जान लगा देते हैं उनके लिए एक सुबह अपने बिखरे सपनों के साथ उठना मौत से कम नहीं। उधर न्यूज चैनल ने इस मामले की सूचना पहले ही पुलिस को दे दी थी। टीवी प्रबंधन को महिला एंकर के वॉल पर कुछ लिखने की बात पता चल गई थी। इसी आधार पर प्रबंधन ने पुलिस कंट्रोल रूम को सूचित किया था।

चैनल आज राष्ट्र&प्रमुखों की विदेशी यात्राओं को लाइव दिखाते हैं। अब पहले जैसी मजबूरी नहीं रही कि आप केवल निर्धारित समय पर रेडियो के समाचारों का इंतजार करें या सुबह तक का इंतजार करें कि कब अखबार आएगा और दूसरे देशों से होने वाले राजनीतिक समझौतों के बारे में जानकारी हासिल की जाए। टाइम्स नाउ पर एक बार नजमा हेपतुल्ला ने पहले ^हिंदू^ कहा] फिर ^हिंदी^ कह दिया और आनन&फानन में पूरी बहस बिल्कुल गलत दिशा में चली गई क्योंकि इस चैनल के अंग्रेजी पत्रकार ने ^हिंदी^ शब्द को ^हिंदी भाषा^ समझ लिया। यह बात अलग है कि इस चैनल ने चुनावों के दौरान खुद ही स्वयं को ^भारत के निर्वाचन समाचारों का मुख्यालय^ द्घोषित कर रखा था। निजी चैनलों पर दो तीन हाइप वाले मुद्दों] बल्कि कहना चाहिए कि आइटमों को लेकर महासंग्राम की हास्यास्पद स्थिति बनी रहती है। जबरदस्ती टांग&खिंचाई का माहौल। एक&एक बात को बीस& बीस बार दुहराना। वही थकाऊ और निरर्थक प्रपंचमूलकता और वही नीरस प्रस्तुतीकरण जिससे कोई लाख चाहकर भी कुछ जान&समझ या सीख नहीं सकता। तिस पर तुर्रा यह कि हम तो एजुकेट करने का जिम्मा संभालते हैं।

ये चैनल असल राजनीतिक खबरें कम और कयासबाजियां ज्यादा दिखाते हैं। ये साबित करते हैं कि न सिर्फ राजनीति सतही हुई है] बल्कि मीडिया भी अधिकाधिक सतही होता चला गया है। कौन बन सकता है मंत्री या किस तरह होगा मंत्रिमंडल का विस्तार जैसे भविष्यवाणी&सदृश समाचार आपको खूब मिलेंगे जबकि समाचारों की किसी भी क्लासिकल परिभाषा में यह शामिल ही नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि समाचार किसी ऐसी छोटी&मोटी \kVuk की भविष्यवाणी से अधिक निश्चयात्मक रूप से \kV चुकी \kVuk से संबंधित होता है। कल यह हो जाएगा] अगले साल प्रलय आ जाएगी] फलां तारीख को इस द्घर में भूत द्घुसेगा] ऐसी बातें समाचार नहीं हो सकतीं। अटकलबाज मीडिया के इस दौर में सूचना का प्रवाह रोका नहीं जाता] बल्कि सूचना को नियंत्रित किया जाता है या उसको ^मैनेज^ किया जाता है। मसलन] एक नामी चैनल ने दिखाया कि क्या होता अगर कश्मीर में हेलीकॉप्टर न पहुंच पाता] क्या होता अगर ये राहत सामग्रियां न गिराई गईं होतीं\ दर्शक सोचता रहता है कि हाय राम! या अल्लाह!

राजनीति में बाल की खाल निकालकर इतिहास खंगालने में भी चैनल माहिर हैं। सीएनएन आईबीएन के एंकर ने जब सांसदों की हरकत को गुंडागिरी कहा तो तृणमूल कांग्रेस के सांसद ने कहा कि इसमें गुंडागीरी नहीं है] हां मीडिया जरूर इसे गुंडागिरी बताता चला जा रहा है। तब एक चैनल इसी बात के इतिहास पर पिल पड़ा कि अब तक किस&किस सांसद ने कब&कब शिष्टाचार के अनुरूप व्यवहार नहीं किया है। इसी तरह जब भारत रत्न देने की बात उठी तो यह शुरू हुई सुभाष चंद्र बोस] अटल बिहारी वाजपेयी और ध्यानचंद से। लेकिन कुछ ही द्घंटों में चैनलों ने भारत रत्न के इतने ^हकदारों^ के नाम इतिहास से खोजकर गिना डाले कि उनकी सूची तक बनाना असंभव लगने लगा। ऐसा लगने लगा कि भारत रत्न जैसे कोई गाजर&मूली हो कि जिसको चाहा उसको दे दिया। क्या ऐसी बहसें एक सभ्य लोकतंत्र की मर्यादा के अनुकूल कही जा सकती हैं] जो राजनीति को जन कल्याण मूलक बनाने की बजाय मुद्दे को ही भटका दिया करती हैं\

चाहे कांग्रेस हो या भारतीय जनता पार्टी या फिर सोशल मीडिया के जरिए अपनी पैठ बनाने वाली आम आदमी पार्टी हो] सबने अपने&अपने आधार पर बनाई गई रणनीतियों के हिसाब से काम किया। इसके अलावा तमाम छोटे दलों ने भी सोशल मीडिया पर धीरे&धीरे अपने पांव पसारे हैं। गरीब लोगों की समस्याएं सुनने की कोशिशें भी की हैं। इस प्रक्रिया में देश में तमाम ऐसे दल भी व्यस्त रहे जिनका जनाधार इतना कम था कि उनके अपने भौगोलिक क्षेत्रों से इतर शायद ही उन्हें कोई जानता हो। पिछले दिनों आईआरआईएस नॉलेज फाउंडेशन के एक प्रतिवेदन में कहा गया था कि कम&से&कम १६० लोकसभा क्षेत्रों में सोशल मीडिया उम्मीदवारों की जीत या हार तय करने की स्थिति में था। हालांकि इसके बारे में कोई पूरे भरोसे के साथ कुछ नहीं कह सकता] लेकिन कोई इस बात से इनकार भी नहीं कर सकता कि सोशल मीडिया की कोई&न&कोई भूमिका चुनावों में जरूर रही है। पर असली सवाल तो यह है कि क्या सोशल मीडिया पर लाइक या अनलाइक करने वाले लोग वोट में तब्दील हो सकेंगे\ सोशल मीडिया पर कई मुद्दों को लेकर लोग राय बनाने की कोशिश करते हैं। इसका फायदा उठाने की कोशिश राजनीतिक दलों ने भी की है। लाइक] ट्वीट] रीट्वीट] कमेंट] शेयर और टैगिंग के दौर में असल में बचता क्या है] टिकता क्या है] महत्व तो इसी बात का है। ये बातें क्या वोट में बदली जा सकीं या नहीं] इसका जवाब देना अभी बाकी ही है। बदलती विचारधाराओं के अंतर्जाल में राय और मुद्दे बदलते जा रहे हैं और इसका फायदा राजनीतिक दलों को कैसे होता है] इस पर और अधिक गहरे विचारमंथन की आवश्यकता है। क्या फेसबुक की सहमति किसी प्रतिबद्धता से संबंधित है या फिर इस सहमति और प्रतिबद्धता के बीच अलग& अलग दीवारें मौजूद हैं\

राजनीतिज्ञों के बयान पकड़ने में चैनलों की तारीफ करनी होगी। गोवा के एक विधायक लद्घु मामलेदार ने टिप्पणी की थी कि बिकिनी इस देश को महाशक्ति बनने से रोक रही है। कहने का मतलब कि परमाणु बम तो हमें महाशक्ति का दर्जा दिलाता है] लेकिन बिकिनी परमाणु बम से भी अधिक शक्तिशाली है इसलिए हम महाशक्ति बनने से रुक जाते हैं। चैनल पूरा कपड़ा पहनकर महाशक्ति बनना सिखाते हैं। स्टूडियो की वीरता और एंकरों के देश प्रेम के कारण अपना देश पूर्णतः सुरक्षित लगता है। पर असली सुरक्षा तो तब है जब देश के सभी लोगों को रोटी] कपड़ा और मकान मिल जाए] बीमारियों से उन्हें मुक्ति मिल जाए। कहना न होगा] कि राजनीति और सोशल मीडिया दोनों को मिलकर इस दिशा में एक लंबा काम करना पड़ेगा ताकि खुशहाली आ सके।

 

 

आधुनिक सभ्यता की सबसे बड़ी कमी यह है कि वह दुनिया को अपने मानदंडों के अनुसार आधुनिक नहीं बना सकती। बारी&बारी से वह कुछ इलाकों को प्रलोभित करती है कि ^तुमको आधुनिक बना सकती हूं अमेरिकी ढंग से नहीं] तो रूसी ढंग से।^ पूरी दुनिया को एक समय के अंदर आधुनिक बना सकने का दावा अभी तक वह कर नहीं सकी है। अतः यह सभ्यता दुनिया के बड़े हिस्से को उपनिवेश बनाकर ही रख सकती है] जिसके लिए आधुनिक सभ्यता का अर्थ उपभोग का कुछ सामान मात्र है।

 

प्राचीन सभ्यता का सबसे बड़ा अपराध यह है कि राष्ट्रीयता और सामाजिक समता के मूल्य उसमें नहीं हैं। जो भारतीय सभ्यता अब बची हुई है] उसकी सारी प्रवृत्ति इन मूल्यों के विरुद्ध है। मनुष्य] मनुष्य की बराबरी या आपसी प्रेम पारंपरिक भारतीय संस्कृति के विरुद्ध है। ऐसे मनुष्य की संवेदनहीनता] यंत्र की संवेदनहीनता से कम खतरनाक नहीं है। मानव के प्रति उदासीनता प्राचीन हिंदू संस्कृति का गुण था या नहीं] या वह वर्तमान की एक विकृति है] यह स्पष्ट नहीं है। प्राचीन भारतीय मान्यता न सिर्फ सामाजिक समता के विरुद्ध है] बल्कि वह आध्यात्मिक समता की अवधारणा को भी नकारती है। उसके अनुसार कुछ लोगों की आत्मा ही द्घटिया दरजे की होती है। बुद्ध ने इस मानवविरोधी प्रवृत्ति को बदलने की कोशिश की थी। लेकिन आधुनिक हिंदू मनुष्य की विरासत में बुद्ध की धारा नहीं है। पश्चिमी सभ्यता का सबसे बड़ा गुण यह है कि उसने मानव की गरिमा और सामाजिक समानता को मूल्यों के तौर पर विकसित किया है। राष्ट्रीयता और अंतरराष्ट्रीय की भावना भी इन मूल्यों पर आधारित है। हिंदू मनुष्य जब तक इन मूल्यों को आत्मसात नहीं कर लेता है] तब तक वह पश्चिम से बेहतर एक नई सभ्यता बनाने का दावा नहीं कर सकता।

&किशन पटनायक


 
         
 
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