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vad 45 28-04-2018
 
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नजरिया 5
 
सियासत की बदलती जमीन

  • अनंत विजय

वरिष्ठ पत्रकार

दक्षिणपंथी विद्वानों की संख्या इस वजह से कम नजर आती है कि आजादी के पैंसठ साल बाद तक उनको अवसर से वंचित किया जाता रहा। जो भी राष्ट्रवादी बातें करता या राष्ट्रवादी विषयों पर शोध करता या जो भी वामपंथ से अलग हटकर भारत और भारतीयता की बात करता उसको आगे बढ़ने से रोक दिया जाता रहा है

 

आजाद भारत के इतिहास में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई है। इसके पहले की गैर कांग्रेसी सरकारों में कांग्रेस या पूर्व कांग्रसी नेताओं की अहम भूमिका रहा करती थी। इस बार की एनडीए सरकार का नेतृत्व नरेंद्र मोदी कर रहे हैं जिनके विचार अटल बिहारी वाजपेयी से मेल खा सकते हैं लेकिन मिजाज नहीं। अटल बिहारी वाजपेयी शासन और विचारधारा को आगे बढ़ाने के मामले में थोड़े सॉफ्ट थे] लेकिन नरेंद्र मोदी विचारधारा को लेकर सजग ही नहीं हैं] बल्कि उसको स्थापित करने के लिए मजबूती के साथ प्रयत्नशील भी हैं। नरेंद्र मोदी के विचारधारा को आगे बढ़ाने के प्रयास में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संद्घ मजबूती के साथ खड़ा है। 

इस बार सरकार ने तय किया है कि सभी संस्थानों पर अपने या अपने विचारधारा से मेले खाते लोग बिठाए जाएं। अब इन्हीं अपने लोगों को बिठाने की प्रक्रिया में गजेन्द्र चौहान जैसे लोगों की नियुक्तियां हुई हैं। अभी आने वाले दिनों में इस तरह की और नियुक्तियां होंगी। विश्वविद्यालय के कुलपतियों से लेकर भाषा] कला और संस्कूति संगठनों तक में। यह सच है कि बौद्धिक जगत में वामपंथी विचारधारा की तुलना में दक्षिणपंथी विचारधारा में विद्वानों की संख्या कम है। लेकिन जो हैं उसके आधार पर ही सबकुछ अपने माफिक करने की कोशिश हो रही है और आगे भी होती रही है। हम देखें तो दक्षिणपंथी विद्वानों की संख्या इस वजह से कम नजर आती है कि आजादी के पैंसठ साल बाद तक उनको अवसर से वंचित किया जाता रहा। जो भी राष्ट्रवादी बातें करता या राष्ट्रवादी विषयों पर शोध करता या जो भी वामपंथ से अलग हटकर भारत और भारतीयता की बात करता उसको आगे बढ़ने से रोक दिया जाता रहा है। ना तो विश्वविद्यालयों में उनकी नियुक्ति हो पाती थीं और ना ही किसी शोध संस्थान में उनको शोध करने दिया जाता था। 

ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं जहां वामपंथ से इतर सोच रखने वाले छात्रों और शोधार्थियों को बेवजह तंग किया गया हो और उनको समान अवसर से वंचित रखा गया हो। इस तरह की बौद्धिक अस्पृश्यता ने वामपंथ से इतर विचार रखने वालों को हतोत्साहित किया। गजेन्द्र के मसले पर संद्घर्ष का वृहत्तर अर्थ है। वामपंथी विचारधारा वाले लोगों को यह लगने लगा कि ये सरकार आने वाले दिनों में उनके सांस्कूतिक साम्राज्य को खत्म कर देगी लिहाजा वो भी आक्रामक हो गई। गजेंद्र तो एक बहाना मात्र है जिसकी आड़ में वामपंथी अपने खत्म होते साम्राज्य को बचाने की जुगत में आगे आए। दूसरी वजह यह है कि उनको यह भी लगने लगा कि अगर उनकी विचारधारा के लोग सत्तानशीं नहीं रहे तो उनके कारनामे खुलेंगे। जैसे भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद में सत्ता परिवर्तन के बाद यह बात सामने आने लगी कि किस तरह से करदाताओं के पैसों की लूट चल रही थी और एक एक प्रोजेक्ट चार दशक से अधिक वक्त से तैंतालीस साल से एक ही व्यक्ति कर रहा था। इस तरह के खुलासों से बचने के लिए गजेंद्र जैसी नियुक्तियों पर विवाद खड़े होते रहेंगे।

नियुक्तियों की आड़ में खेले गए इस खेल में छात्रों को मोहरा बनाया गया। हाल के अनुभवों को देखते हुए यह साफ तौर पर कहा जा सकता है कि यह राजनीतिक लड़ाई है और उसी के औजारों से लड़ी भी जा रही है। राजनीति के इस खेल में यथास्थितिवाद को चुनौती देने से विरोध का बवंडर तो उठेगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार उस बवंडर को किस तरह से शांत कर अपनी विचारधारा को स्थापित करती है। ये सारा मामला सांस्कूतिक नहीं है] बल्कि देश की सियासत में जो बुनियादी बदलाव आ रहा है उसके संकेत मात्र हैं। हम बहुधा इन विषयों को सांस्कूतिक संस्थानों पर कब्जे की लड़ाई भर मान लेते हैं जो कि इसका एक बहुत ही छोटा पहलू है।

भारत को जब आजादी मिली थी तब जवाहरलाल नेहरू जी ने आधी रात को अपने ऐतिहासिक भाषण में ट्रिस्ट विद डेस्टिनी का जुमला इस्तेमाल किया था] लेकिन अब सड़सठ-अड़सठ साल बाद देश की राजनीति की मुठभेड़ डेस्टिनी की बजाए रियलिटी से हो रही है यानी ट्रिस्ट ऑफ रियलिटी। आजादी के बाद भारतीय राजनीति में कई बदलाव आए। राजनीति पर खोखला होते चले जाने का आरोप भी लगा। भारतीय राजनीति और समाज में पिछले छह दशक में जुगाड़ चलता है कि मानसिकता प्रबल होती चली गई। मशहूर पत्रकार जॉन इलियट ने अपनी किताब इंप्लोजन में भारतीय राजनीति के इस पहलू को बखूबी उजागर किया है। भारत की राजनीतिक व्यवस्था में नेताओं] अफसरों और कॉरपोरेट के गठजोड़ ने देश का बेड़ा गर्क कर दिया। इस गठजोड़ ने ना केवल देश को लूटा] बल्कि देश की प्राकूतिक संपदा पर भी डाका डाला और गरीबों को उनके अधिकारों से सालों तक वंचित रखा और इस वक्त भी उनको उनके हक से दूर रखने में ये गठजोड़ बहुत हद तक कामयाब रहा है। उधर भारतीय राजनीति में वंशवाद की फसल भी लहलहाती जा रही है। प्रजातंत्र में राजनीतिक वंशवाद जारी है और अपनी राजनीतिक विरासत अपने उत्तराधिकारी को सौंपने के लिए तमाम तरह के दंद-फंद किए जा रहे हैं। भारतीय राजनीति में जनता कई बार बदलाव चाहती है। उसकी आकांक्षा भुनाकर आजादी के बाद कई बार राजनीतिक दलों ने सत्ता पर कब्जा जमाया।

इस देश में ज्यादातर चुनाव और राजनीतिक जंग परसेप्शन के आधार पर लड़े और जीते जाते रहे हैं। नारों और जुमलों ने कई सरकारें बनवाई और गिरवाईं। बस नारे के क्लिक करने की जरूरत होती है। ज्यादा पीछे नहीं जाते हुए अगर हम देखें तो इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ के नारे पर कई चुनाव जीते] राजा नहीं फकीर है के जुमले पर वीपी सिंह देश के पीएम बने। सुशासन बाबू का तमगा लगाकर नीतीश लगातार चुनाव जीतते रहे हैं। मजबूत शासन देने के दावे और वादे पर नरेंद्र मोदी पहली बार बीजेपी को केंद्र में बहुमत दिलवाया। नरेंद्र मोदी ने जिस तरह की जुमलेबाजी पिछले लोकसभा चुनाव में की और सफलता हासिल की] वो राजनीति शास्त्र के छात्रों के लिए शोध का विषय हो सकता है। उसी तरह से दिल्ली विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग का ऐलान कर सत्ता पर ऐतिहासिक बहुमत से काबिज हुए। द इंसाइक्लोपीडिया ऑफ द इंडियन नेशनल कांग्रेस ¼१९७८-८३½ के पच्चीसवें खंड में इंदिरा गांधी ने कहा था कि 'कांग्रेस अपने डायनमिक प्रोग्राम्स और आम जनता से जुड़ी नीतियों की बदौलत अपने आपको बचा सकती है। हम कांग्रेस के सरवाइवल के लिए तो लड़ ही रहे हैं] लेकिन भारत की जनता की लड़ाई भी लड़ रहे हैं।' अब यहां भी यह साफ तौर पर देखा जा सकता है कि किस तरह से इंदिरा गांधी ने बेहद चतुराई के साथ अपनी लड़ाई को जनता की लड़ाई बताया। नतीजा यह हुआ कि इमरजेंसी के बाद सतहत्तर के चुनाव में बुरी तरह से मात खानेवाली कांग्रेस अस्सी में बहुमत से सरकार में आई। तो भारतीय राजनीति में] खासकर चुनाव में बहुत कुछ भावनात्मक स्तर पर होता है। भावना के इस निर्माण के कई कारक होते हैं।

भारतीय राजनीति में १९९१ के बाद बुनियादी बदलाव आया। २१ जून १९९१ में जब नरसिम्हा राव ने अपनी सरकार बनाई तो आर्थिक सुधार ने देश की दशा और दिशा बदल दी और भारतीय राजनीति भी इससे अछूती नहीं रही। जब नरसिंह राव ने देश की बागडोर संभाली थी तो देश की अर्थव्यवस्था बदहाल थी। विदेशी मुद्रा भंडार आश्चर्यजनक रूप से कम था। विदेशी निवेश के नाम पर लगभग शून्य की स्थिति थी। यहां से देश की राजनीति ने एक बार करवट बदली। हमारे देश को आजाद हुए तकरीबन छह दशक से ज्यादा हो गए हैं] अगर राजनीतिशास्त्र के लिहाज से किसी भी देश के लोकतंत्र का आकलन करें तो इसके लिए छह सात दशक की यात्रा बहुत लंबी नहीं मानी जाती है। सिर्फ उन्नीस सौ पचहत्तर के इमरजेंसी के दौर को छोड़ दें तो उसके अलावा हमारे लोकतंत्र पर कोई गंभीर संकट खड़ा नहीं हुआ। इंदिरा गांधी के इमरजेंसी को भी देश की जनता ने महज दो ढाई साल ही में उखाड़ फेंका। इमरेंजसी के खिलाफ देशभर में जनता के उठ खड़े होने का जो इतिहास है वो भारतीय लोकतंत्र की मजबूती का भी सबूत है। देश की जनता अपने नागरिक अधिकारों को लेकर बेहद सतर्क और जागरूक है और इस पर किसी भी तरह की पाबंदी या कटौती उसे किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं है। भारतीय लोकतंत्र और उसकी सफलता को लेकर 

राजनीतिशास्त्र के विदेशी विद्वान और विश्लेषक हमेशा से आशंका ही जताते रहे हैं। वो अमेरिका] इंगलैंड और अन्य यूरोपीय देशों की लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के आधार और कसौटी पर भारतीय लोकतंत्र को कसते और परखते रहे हैं। उन्हें लंबे समय से भारतीय लोकतंत्र की सफलता में संदेह रहा है।

भारत की विविधता उनको लोकतंत्र की सफलता में सबसे बड़ी बाधा लगती रही है। जाति] धर्म और संप्रदाय के आधार पर बंटा भारतीय समाज लोकतंत्र के नाम पर एकजुट रहेगा] इसमें पश्चिमी विद्वानों को संदेह रहता है। देश और लोकतंत्र को लेकर अलग-अलग मतों और विचारधारा के लेखकों और विचारकों की अलग अलग राय है। भारत में लोकतंत्र सिर्फ एक शासन व्यवस्था नहीं है] बल्कि यह लोगों के लिए यह एक जीवनशैली है और देश की राजनीतिक संस्कूति में बहुत गहरे तक अपनी पैठ बना चुकी है। प्रोफेसर वार्ष्णेय मानते हैं कि अंग्रेजों के वक्त जो संद्घीय ढांचा था उसको अपनाकर भारत ने अपने लोकतंत्र को मजबूत किया। आशुतोष वार्ष्णेय का मानना है कि ब्रिटिश व्यवस्था को अपनाने से कांग्रेस की लोकतंत्र को लेकर एक समझ विकसित हुई जिसे जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में मजबूती मिली] वहीं उनका यह भी मानना है कि मुस्लिम लीग को ब्रिटिश व्यवस्था की विरासत से कोई फायदा नहीं हुआ क्योंकि उनके नेतृत्व में इस व्यवस्था को मजबूत करने की ना तो चाहत थी और ना ही इच्छा शक्ति और विजन। विविधताओं भरे इस देश में अगर क्षेत्रीय आकांक्षाओं को अहमियत मिलती है तो देश का लोकतंत्र मजबूत होता है। प्रोफेसर आशुतोष वार्ष्णेय तो यहां तक कहते हैं कि देश में जातियों की बहुतायत इस देश को जोड़े रखने में अहमियत रखती है। उनके मुताबिक एक ही जाति के लोगों के अलग-अलग प्रदेशों में अलग-अलग नेता हैं। उदाहरण के तौर पर उन्होंने यादव जाति का अध्ययन किया है। उत्तर प्रदेश में इस जाति की रहनुमाई मुलायम सिंह यादव के पास है तो बिहार में इस जाति के अगुवा लालू प्रसाद यादव हैं। इन दोनों नेताओं की स्वीकार्यता अपने प्रदेश से बाहर दूसरे प्रदेशों में नहीं है। आशुतोष वार्ष्णेय का तर्क है कि पिछड़ी जातियों के अलग अलग तरह के नेतृत्व की वजह से ये जातियां पूरे देश में एकजुट नहीं हो पाती हैं] लिहाजा लोकतंत्र के लिए उनके खतरा बनने की संभावना कम रहती है। 

भारतीय राजनीति पर बगैर धर्म की चर्चा किए बातचीत अधूरी है। अस्सी के दशक में ही धर्म के आधार पर जारी गतिविधियों की परिणति मंदिर-मस्जिद विवाद को लेकर उठे जनज्वार में होती है। वो दौर धर्म की राजनीति का उत्स था। उस दौर में चुनिंदा धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ देशभर एक अजीब किस्म की प्रतिक्रिया देखने को मिली और जिसका नतीजा ध्रुवीकरण में हुआ। यहीं से भारतीय राजनीति में भारतीय जनता पार्टी को लोकप्रियता मिलनी शुरू हुई। नब्बे के दशक के आखिरी वर्षों में जब देश में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनी तो विचारकों ने इसे धर्म आधारित राजनीति बताकर उस पर चिंता जताना शुरू कर दिया था। उसके बाद के दिनों में एक बार फिर से कथित धर्मनिरपेक्ष सरकार ने देश पर शासन किया जो इतिहास है। भारत में धर्म पर आधारित राजनीति को लेकर चिंता जताई जा सकती है] जतानी भी चाहिए] लेकिन भारतीय लोकतंत्र अब इतना मजबूत हो चुका है कि इस तरह की राजनीति करने वालों को भी अपना रास्ता बदलना पड़ रहा है। उन्हें यह बात अच्छी तरह से पता है कि धर्म के रास्ते पर चलकर राजनीति में फौरी तौर पर तो सफलता प्राप्त की जा सकती है] लेकिन स्थायी राजनीति का रास्ता कहीं और से निकलता है।

 
         
 
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