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नजरिया 3
 
दलित आंदोलन का विस्तार

  • कंवल भारती

दलित चिंतक

यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत के कोने&कोने में दलित आंदोलन का विस्तार हुआ है] जिसने दलितों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक और लड़ना सिखाया है। दलित साहित्य का भी विकास लगभग सभी भारतीय भाषाओं में तेजी से हुआ] जिसने मुख्यधारा के चिंतन में एक नया विमर्श पैदा किया है। यह उस दौर की पीढ़ी का परिणाम है] जिसे आरक्षण के कारण आगे बढ़ने का अवसर मिला। अगर यह अवसर उसे नहीं मिला होता] तो शायद अभी भी दलितों में कोई मध्यवर्ग बनने की प्रक्रिया पैदा नहीं होती

 

सन्‌ १९४७ के बाद] सभी सरकारें यह कहते हुए नहीं थकतीं कि उन्होंने दलितों के लिए यह किया है] वह किया है] आदि आदि। पर सच यह है कि सरकारों ने अपनी राजनीति से जाति समस्या को बद&से&बदतर बनाने का काम किया है। भूमि सुधार] हरित क्रांति] गरीबी हटाओ] या नौकरियों में आरक्षण] कोई भी मामला हो] उन सब में सभी सरकारें&केंद्र की भी और राज्य की भी असफल रही हैं। उनकी बहुसंख्यक आबादी आज भी भुखमरी] गरीबी] बेकारी और अशिक्षा में जीने को अभिशप्त है। ऐसा क्यों है\ कुछ कारणों पर विचार करना जरूरी है। भूमि हदबंदी कानून ने मझोली जातियों के किसानों का वह वर्ग तैयार किया] जिसने अपने नए अवतार में] दलितों के निकटतम उच्च सवर्ण वर्ग की भूमिका निभाई। यह वर्ग भूमिहीन दलित मजदूरों को अपने सामाजिक और आर्थिक हित में] उनका भरपूर दमन करता है और उनको ब्राह्मणवाद के दलदल में फंसाकर रखता है। हरित क्रांति के लिए कूषि क्षेत्र का पूंजीकरण किया गया] जो जरूरी भी था। पर उसे सरकारों ने जिस तरह प्रायोजित किया] उसका भरपूर लाभ देश के जमींदारों और बड़े किसानों को ही मिला। दलितों के लिए इसके परिणाम बहुत ही कष्टकारी हैं।

गरीबी हटाओ के राजनीतिक कार्यक्रम ने] दलितोत्थान के नाम पर] दलितों की आकांक्षाओं और आशाओं को तो बढ़ाया] पर उसका लाभ उन्हें उतना नहीं मिला] जितना उसने गैर& दलितों के गरीब वर्गों में अभाव की भावनाओं को पैदा किया। इसने दलितों और गैर&दलितों के बीच खतरनाक तनाव पैदा करने में ज्यादा भूमिका निभाई। गरीबी जाति विशेष की समस्या नहीं है] वह संपूर्ण भारतीय समाज की समस्या है। इसलिए] उसका हल जाति विशेष के लिए योजनाएं बनाकर कभी नहीं हो सकेगा। गरीबी के लिए भारत की आर्थिक नीतियां जिम्मेदार हैं। ये नीतियां पूंजीवादी हैं] जो अमीरों के हित में हैं। ये नीतियां हर क्षेत्र में लागू की जा जा रही हैं] जिसके परिणाम स्वरूप हर क्षेत्र में अमीरी और गरीबी के बीच की खाई बढ़़ती जा रही है। अमीर जहां और अमीर होता रहा है] वहां गरीब और गरीब होता जा रहा है। भारत की गरीबी का उन्मूलन समाजवादी नीतियों में है] जिसके पक्ष में भारत की ब्राह्मणवादी&पूंजीवादी राजशाही इसलिए नहीं है] क्योंकि उससे एक बहुसंख्यक दलित आबादी] गरीबी से मुक्त होकर] उसकी सत्ता के लिए चुनौती बन सकती है। 

दलितों के लिए नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था को कोई सरकार खत्म नहीं कर सकती] क्योंकि वह व्यवस्था भारत के संविधान में दी हुई है। हालांकि] यह व्यवस्था केवल सरकारी नौकरियों के लिए है] पर संविधान में इस व्यवस्था को रखते समय डॉ  .आंबेडकर को यह नहीं मालूम था कि आने वाले समय में भारत की सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के स्थान पर निजीकरण की नीतियों को अपनाएगी] और आर्थिक उदारीकरण के नाम पर इतनी अंधी हो जाएगी कि सार्वजनिक क्षेत्र को पूरी तरह तहस&नहस कर देंगी। आज लगभग सभी सार्वजनिक क्षेत्रों का निजीकरण हो चुका है] और निजी क्षेत्र के किसी भी उपक्रम और उद्यम को सरकार ने आरक्षण की व्यवस्था लागू करने के लिए बाध्य नहीं किया है। जाहिर है कि इससे सरकारी क्षेत्र की नौकरियों के अवसर कम&से &कम हुए हैं] और] जहां कुछ अवसर हैं भी] तो वहां सरकारें संविदा के आधार पर नियुक्तियां कर रही हैं] जिसे ठेका प्रथा कहा जाता है। इस ठेका प्रथा में न नौकरी सुरक्षित है और न सामाजिक सुरक्षा। इस ठेका प्रथा में एक नियत वेतन मिलता है] जो पद के अनुरूप निर्धारित मूल वेतन से भी कम होता है] उसमें मकान] मंहगाई और नगर भत्तों का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। यह नियुक्ति सिर्फ एक वर्ष के लिए होती है] और अगले वर्ष के लिए कुछ निश्चित नहीं है& पूर्व नियुक्त व्यक्ति की सेवा समाप्त भी हो सकती है] आगे बढ़ भी सकती है और उसके स्थान पर नई भर्ती भी की जा सकती है। इस ठेका प्रथा के तहत सिर्फ तीसरी और चौथी श्रेणी के कर्मचारी ही नहीं] बल्कि इंजीनियर और डॉक्टर तक संविदा पर अल्पतम मानदेय पर नौकरी कर रहे हैं। इसमें भी सर्वाधिक संख्या दलित वर्गों की है। ऐसा क्यों हो रहा है\ क्या सिर्फ सरकार की निजीकरण की व्यवस्था लागू करने के कारण हो रहा है। क्या भारत के लोगों ने इसी आजादी का सपना देखा था\

दलितों के नौकरियों में आरक्षण दो कारणों से एक आडंबर बनकर रह गया है। पहला कारण तो यह है कि भारत की सभी सरकारों ने प्राथमिक शिक्षा की स्थिति को बद&से&बदतर बना दिया है] भले ही करोड़ों रुपए इस शिक्षा पर प्रतिवर्ष खर्च किए जाते हैं] परंतु यह खर्च प्राथमिक शिक्षा की स्थिति को सुधारने के लिए नहीं] वरन्‌ उसे और बदतर करने के लिए किया जा रहा है] जिसमें मिड&डे मील की भूमिका और भी विनाशकारी है। किसी समय सरकारी स्तर पर चलने वाले प्राथमिक और मीडिल स्कूलों की स्थिति बहुत अच्छी थी] विशेषकर साठ और सत्तर के दशकों में। दलित और कमजोर वर्गों के ही नहीं] बल्कि सामान्य श्रेणी के मध्यवर्गीय लोगों की पीढ़ी भी उन्हीं स्कूलों से पढ़कर निकली है। किंतु ऐसा इसलिए संभव हुआ था] क्योंकि उस दौर में निजीकरण के राक्षस ने जन्म नहीं लिया था] और सरकारों में भी समाज&सुधार की उत्कंठा थी] जो आज नहीं है। आज जाति समस्या] द्घोर गरीबी] बेरोजगारी और पिछड़ापन राजनीति में शर्म का विषय नहीं है] बल्कि चुनाव जीतने के हथियार बन चुके हैं। दूसरा कारण यह है कि राजनीतिक पार्टियों ने आरक्षण को वोट की राजनीति का हथियार बना दिया है। जैसे ही कोई संगठन या नेता आरक्षण खत्म करने की बात करता है] उस पर राजनीति शुरू हो जाती है] और दलित वोटों की आवश्यकता के मद्देनजर भाजपा भी] आरक्षण के पक्ष में आ जाती है] जबकि वह उसके पक्ष में बिल्कुल नहीं है। आरक्षण की राजनीति जिस स्तर से भी हो रही है] वह दलितों को भुलावे में रखने के लिए हो रही है। 

यह विडंबना नहीं है] बल्कि हकीकत है कि आजादी के बाद] पहली और दूसरी पीढ़ी के जिन दलितों का] आरक्षण के द्वारा] शैक्षिक और आर्थिक विकास हुआ] आज वही पीढ़ी समृद्ध है। शेष दलित समाज को सरकारों ने साजिश के तहत एक लाभार्थी वर्ग में बदल दिया है। दूसरे शब्दों में] सरकारें यह मानकर चल रही हैं कि समाज में कुछ कमजोर वर्ग हैं] जिन्हें विशेष सुविधाओं की जरूरत है। वे समझती हैं कि उन्हें स्पेशल कंपोनेंट प्लान] शादी&बीमारी&अनुदान] निर्बल आवास योजना] सुअर पालन और मुर्गी पालन के लिए सस्ता ऋण] सस्ता राशन वितरण या मनरेगा आदि योजनाओं से लाभान्वित करके उनका विकास किया जा सकता है। सरकारों ने इस वर्ग को अपनी साजिशों से इतना बेबस और निर्भर बना दिया है कि वह यह बोध खो बैठा है कि उसका हित किसमें है और उसे क्या चाहिए\

अभी कुछ दिन पहले मैं 'युद्धरत आम आदमी' में दलित लेखक प्रहलाद चंद्र दास की कहानी 'मोहरे' पढ़ रहा था। कहानी में द्घनु बाबू का क्षेत्र दलित के लिए आरक्षित हो जाता है] जिससे उनका खेल बिगड़ जाता है। तब वह अपने गांव के एक वफादार दलित मास्टर शिवचरण को पार्टी का टिकट दिलवा देते हैं और अपना पैसा खर्च करके उसे जितवा भी देते हैं। वह विधायक बन जाता है] पर काम सब द्घनु बाबू के अनुसार ही करता है। वह सिर्फ मोहरा है। परिणाम यह होता है कि द्घनु बाबू अपने सारे अपराधों] यहां तक कि हत्या के मामले में भी शिवचरण को शामिल कर लेते हैं। शिवचरण की गरीबी दूर हो जाती है] उसके भाई भी ठेका&परमिट लेकर मालामाल हो जाता है] पर] उसके समाज में कोई विकास नहीं हो पाता है। भारतीय राजनीति में दलितों की राजनीतिक भागीदारी का यही विद्रूप है। दलितों की राजनीतिक भागीदारी के बावजूद] उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति में बहुत ज्यादा परिवर्तन नहीं आया है। आजादी के बाद आरक्षण के सहारे बनने वाले दलित जातियों के अधिकांश विधायक] सांसद और मंत्री समृद्ध हो गए] उनकी भावी पीढ़ियों का उद्धार हो गया। आज उनकी सन्तानें न केवल राजनीति में] बल्कि प्रशासन में भी सर्वोच्च पदों पर पहुंच गई हैं किंतु वे दलितों के लिए कुछ नहीं कर सके। उनकी चौखट पर नंगे&भूखे गरीब दलितों की भीड़ आज भी खूब लगती है। उनकी फरियाद भी सुनी जाती है] परंतु उनकी समस्याएं ज्यों&की&त्यों बनी हुई हैं] सिवाय लाभार्थी के रूप में एकाध लाभ पा जाने के।

इसके दो कारण हैं] पहला] आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र में केवल दलित वोट के बल पर दलित उम्मीदवार की जीत निश्चित नहीं है। जीत के लिए उसे अन्य वर्गों के वोट पर निर्भर रहना पड़ता है। अन्य वर्गों से पैसा और अन्य सहायता भी मिलती है] जो दलितों से नहीं मिलती। इसलिए जीतने के बाद दलित विधायक या सांसद का सर्वाधिक ध्यान गैर&दलितों पर ज्यादा रहता है] वह इसलिए भी कि वे धन देना भी जानते हैं तो धन निकालना भी जानते हैं। पर दलित के पास एक तो धन नहीं है और दूसरे] वह स्वयं भी योजनाओं के लाभ तक ही सीमित रहना चाहता है। पढ़े& लिखे दलितों को नौकरियां चाहिए] जो बिना द्घूस के मिलती नहीं। यह द्घूस भी हजारों में नहीं] लाखों में होती है। कुछ दलित परिवार कर्ज लेकर] या जमीन&जेवर बेचकर द्घूस का प्रबंध कर लेते हैं] पर जो नहीं कर पाते हैं] उनमें से अधिकांश युवा अपने ही लाभार्थी वर्गों के दलाल बन जाते हैं।

दूसरा कारण&राजनीतिक दलों के लिए दलित की राजनीतिक योग्यता केवल वफादारी है] उनके लिए शिक्षा मायने नहीं रखती है। इसलिए] अगर हम शुरुआती दौर को छोड़ भी दें] क्योंकि तब दलितों में शिक्षा की दर न्यूनतम स्तर पर थी] तो आज भी] राजनीतिक दल आरक्षित क्षेत्रों से दलितों को अपना उम्मीदवार बनाते समय उनकी शिक्षा के बजाय उनकी 'चमचा' बनने की योग्यता को ज्यादा महत्व देते हैं] जबकि दलितों में उच्च शिक्षित और रेडिकल सोच के लोगों की काफी संख्या है। मैं अपने जनपद के एक ऐसे दलित विधायक को जानता हूं] जो पढ़ा&लिखा भी काम चलाऊ है] और चमचा प्रथम श्रेणी का है। उसमें गैर&दलित समुदाय के अपने आका मन्त्री के हुक्म के खिलाफ जाने की हिम्मत तक नहीं है। ऐसे ९० प्रतिशत दलित राजनीतिकों के बल पर ही आजादी के इतने वर्षों के बाद भी दलित समुदाय सिर्फ एक लाभार्थी वर्ग बना हुआ है।

अस्पृश्यता और अत्याचार

अस्पृश्यता और अत्याचार की खबरें तो आए दिन मीडिया में आती ही रहती हैं। संविधान लागू होने के बाद भी भारत में दलित जातियों के साथ न अस्पृश्यता का व्यवहार खत्म हुआ है और न उन पर होने वाले अत्याचार बंद हुए हैं। सरकारी स्कूलों में दलित रसोइए की नियुक्ति का विरोध और जहां वे कार्यरत हैं वहां उनके हाथों से बना खाना खाने से सवर्ण बच्चों का इनकार करना] यह दर्शाता है कि दलित जातियां आज भी अछूतपन के कलंक से ग्रस्त हैं। बिहार में रणवीर सेना के द्वारा दलित मजदूरों का किया जाने वाला कत्लेआम और हरियाणा आदि कई राज्यों में दलित महिलाओं के साथ बलात्कार की शर्मनाक द्घटनाएं] इस बात का स्पष्ट संकेत है कि दलित जातियां आज भी अधिकांश सवर्णों की दृष्टि में मनुष्य नहीं हैं। इसका मुख्य कारण क्या है\ क्या अस्पृश्यता और अत्याचार की द्घटनाएं इसलिए होती हैं कि सवर्ण क्रूर और हैवान हैं\ बिल्कुल नहीं! सवर्ण न क्रूर हैं और न हैवान हैं] अगर ऐसा होता] तो वे अपने समुदाय के प्रति भी क्रूर और हैवान होते] जबकि वे नहीं हैं। फिर वे दलितों के प्रति क्रूर और हैवान क्यों हैं\ इसका कारण है] वह धार्मिक शिक्षा] जो उन्हें जन्म से मिली है और जो उनके रक्त में रच&बस गई है कि दलित जातियां उनकी सेवा के लिए बनाई गई हैं। उन्हें सवर्णों की तरह समान अधिकारों को उपभोग करने का हक नहीं है। वे गुलाम वर्ग हैं और गुलाम के रूप में उनकी सेवा में रहना ही उनका एकमात्र धर्म है। इसलिए] रणवीर सेना जैसे जमीदार संगठन और सवर्ण जातियों के लोगों को दलितों की शिक्षा और उनके मानवीय अधिकार पसंद नहीं हैं। उनके यही संस्कार उन्हें दलितों के प्रति क्रूर और हैवान बनाते हैं। इसी आधार पर वे उन पर अत्याचार करते हैं] डॉ आंबेडकर तथा संविधान तक का अपमान करते हैं। 

इस सबके बावजूद यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत के कोने&कोने में दलित आंदोलन का विस्तार हुआ है] जिसने दलितों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक और लड़ना सिखाया है। दलित साहित्य का भी विकास लगभग सभी भारतीय भाषाओं में तेजी से हुआ] जिसने मुख्यधारा के चिंतन में एक नया विमर्श पैदा किया है। यह उस दौर की पीढ़ी का परिणाम है] जिसे आरक्षण के कारण आगे बढ़ने का अवसर मिला। अगर यह अवसर उसे नहीं मिला होता] तो शायद अभी भी दलितों में कोई मध्यवर्ग बनने की प्रक्रिया पैदा नहीं होती। इसमें संदेह नहीं कि मध्यवर्ग अवसरवादी होता है] फिर चाहे वह किसी भी समाज का हो। पर यह भी सच है कि नेतृत्व की नई सम्भावनाएं भी इसी मध्यवर्ग से पैदा होती हैं। अफसोस इस बात का है कि आरक्षण की राजनीति ने इस दलित मध्यवर्ग को जातिवादी बना दिया है। उसके कारण ही आजादी के बाद का दलित परिदृश्य भी जातिवादी ही बना हुआ है। काश] वह समाजवादी होता! काश] भारत के राजनीतिक चिंतन ने समाजवाद को अपनाया होता! तो] आज भारत का सामाजिक परिदृश्य जातियों के विनाशकारी दलदल में न धंसा होता।


 
         
 
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