fnYyh uks,Mk nsgjknwu ls izdkf'kr
चौदह o"kksZa ls izdkf'kr jk"Vªh; lkIrkfgd lekpkj i=
vad 45 28-04-2018
 
rktk [kcj  
 
नजरिया 2
 
सपने तो अपने होते हैं

 

  • अनिल चमड़िया

 

वरिष्ठ पत्रकार@संपादक जन मीडिया

    किसी भी समाज के भीतर परिवर्तन की बनती तस्वीर से ही ये तय किया जा सकता है कि यथास्थिति के खिलाफ परिवर्तन का क्या नामकरण किया जाए। अपने मुल्क में यह सत्ता के हस्तांतरण के रूप में ही जाना जाता है। हमने यह महसूस भी किया इसीलिए १९४७ में सत्ता हस्तांतरण के बाद से यह हिसाब किताब सामने रखना शुरू कर दिया कि इस बदलाव से किसे क्या हासिल हो रहा है। हमारी भाषा में ब्रिटिश राज व्यवस्था और भारतीय राज्य व्यवस्था के बीच फर्क नहीं है। यह जाहिर करने के लिए स्वतः ही विकसित होती चली गई। देश में जो आमदनी होती है वह किसके पास जाती है और सबसे गरीब आदमी के हिस्से में जो रोटियां थीं वह कितनी पतली होती चली गई हैं

 

किसी भी देश या दुनिया में क्रांति के सपने के सच जैसे विषय पर बातचीत आयोजित होती है तो उसके दो उद्देश्य होते हैं। पहला तो क्रांति का अन्वेषण किया जाए। लेकिन इसके साथ एक शर्त जुड़ी होती है कि जिस समय इस तरह के अन्वेषण की जरूरत महसूस की जा रही है उस समय क्रांति की जरूरत शिद्दत से महसूस की जा रही है। हालात क्रांति की तरफ लौटने जैसे हो गए हैं। दूसरा उद्देश्य क्रांति की आहट को अपने सामाजिक] आर्थिक] राजनीतिक उद्देश्यों के अनुरूप आकार देने की कोशिश करनी होती है। 

दूसरी बात कि हम इस विषय पर बातचीत केवल अपने देश के संदर्भ में कर रहे हैं। जबकि दुनिया भर में सबसे ज्यादा बातचीत इस वक्त इसी विषय पर की जा रही है। मैं अमेरिकी पत्रकार क्रिस हेजेज से एलियास एस्क्विथ से बातचीत पढ़ रहा था। यह बातचीत  दिल्ली की पत्रिका ^समकालीन तीसरी दुनिया^ में प्रकाशित हुई है और उसका अनुवाद पत्रकार पीयूष पंत ने किया है। पत्रकार क्रिस हेजेज से पूछा गया कि क्या आपको लगता है कि अब हम क्रांति के दौर में हैं क्षितिज पर इससे भी अधिक कुछ नजर आ रहा है उनका जवाब है कि हम पहले ही से इस दौर से गुजर रहे हैं। लेकिन एक प्रतिवाद है] ग्रामशी ने इसे संधिकाल कहा है। यह वह समय है जब सत्तारूढ़ वर्ग के पुराने विचारों का आधार खिसक चुका है] लेकिन उसकी जगह लेने के लिए हम नया आधार विकसित नहीं कर पाए हैं। यही बात अलेक्जेंडर बर्कमैन अपने निबंध ^अदृश्य क्रांति^ में करता है। उसने वर्तमान हालात की तुलना ऐसे बर्तन से की है जिसके भीतर का पानी खौलना शुरू हो गया है। इसीलिए क्रांति पहले से ही जारी है। हालांकि यह खुलकर सामने नहीं आई है] भीतर ही भीतर खौल रही है। सत्ता का बाहरी स्वरूप] वस्तुगत और मनोगत] दोनों ही यथावत नजर आ रहे हैं। फिर भी साख लगातार द्घट रही है। अपने देश में तो क्रांति का अनुभव ही नहीं है। हम परिवर्तन के जन बदलावों से गुजरे हैं] उनका एक अनुभव है। इसमें हाल का सबसे बड़ा अनुभव १९४७ में सत्ता परिवर्तन का है। हम उसी के संदर्भ को आधार बनाकर बातचीत करते हैं। हम बदलाव की उस पूरी प्रक्रिया को एक नाम देते हैं वह आजादी है। यह बात इस मायने में सही है कि हमने सत्ता के उस नेतृत्व से आजादी हासिल कर ली जिसे हम विदेशी कहते हैं और ज्यादा व्यापक फलक पर ब्रिटिश साम्राज्य भी पुकार लेते हैं। लेकिन निरपेक्ष होकर सोचें तो हमने केवल सात समुद्र पार बैठे ब्रिटिश राजद्घराने से ही मुक्ति पाई। दरअसल] वह एक समय था जब न केवल हम] बल्कि पूरी दुनिया में यह हवा चली कि विदेशी नेतृत्व से मुक्ति चाहिए और अस्सी देशों ने यह मुक्ति हासिल की। इसीलिए हम यह दावा नहीं कर सकते हैं कि बदलाव की यह जो प्रक्रिया पूरी हुई वह केवल अपने देश में ही द्घटित हुई। देश के भीतर हुए बदलाव का रिश्ता पूरी दुनिया में चल रहे बदलाव से जुड़ा था। यानी एक देश के लोग दूसरे देशों में चल रही बदलाव की उस प्रक्रिया में हिस्सेदार थे। सबके बीच एक सहमति बनी थी कि हमें प्रत्यक्ष उपनिवेश से मुक्ति चाहिए। यानी ऊपर के स्तर पर जो बदलाव द्घटित हुए वह प्रक्रिया पूरी हुई। जिस तरह से ब्रिटिश राज के सीधे नेतृत्व से हमें मुक्ति मिली ठीक उसी तरह से हमें अपने देश के भीतर भी राजद्घरानों से उसी तर्ज पर मुक्ति मिली। राजद्घरानों की जगह पर एक नई तरह की प्रतिनिधि संस्था की सत्ता का ढांचा विकिसत हुआ।

इस तरह हम देखें तो बदलाव की दो प्रक्रियाएं साथ- साथ चलती दिख रही थीं। एक तो ऊपर के ढांचे के स्तर पर बदलाव है तो दूसरे स्तर पर उसी के साथ भीतर के ढांचे में बदलाव की शर्तें जुड़ी हुई थीं। यानी अपने देश के लोगों के नेतृत्व में शासन व्यवस्था चलेगी तो अपने लोगों के बीच जो विभिन्न स्तरों पर सत्ताएं बनी हुई हैं उन्हें भी समाप्त किया जाएगा। हम १९४७ के बाद सबसे ज्यादा नारे क्या लगाते रहे हैं] वह कि यह आजादी झूठी है। हम जब उसे झूठी कहते हैं तो इसका अर्थ ये होता है कि ऊपरी ढांचे में जो बदलाव हुए उससे अंदरूनी सत्ता की समाप्ति की शर्तें पूरी नहीं हुईं। हम ये कभी नहीं कहते हैं कि अंग्रेजों का जाना अच्छा नहीं था। यदि ये कहते हैं कि अंग्रेज ही अच्छे थे तो वह शर्तों के पूरा नहीं किए जाने की नाराजगी की अभिव्यक्ति होती है। गुस्से का इजहार होता है। उससे ज्यादा 

आजादी की आड़ में विकसित हुई बदतर स्थिति का वह बयां होता है। हालांकि १९४७ के बाद ही इस बदलाव को अधूरा या झूठा कहने की शुरुआत नहीं हुई थी। भगत सिंह सरीखे लोगों ने १९४७ के पहले ही यह कहा था। डॉ अंबेडकर ने भी कहा था कि हमने भले राजनीतिक स्तर पर समानता की स्थिति ला दी हो] लेकिन सामाजिक और आर्थिक स्तर पर देश के भीतर लोगों के बीच बहुत गहरी खाई है। यानी यहां वास्तविक आजादी का एक अर्थ स्पष्ट होते देख रहे हैं। वास्तविक आजादी का अर्थ प्रत्येक मनुष्य की आजादी से जुड़ा है। इसीलिए ब्रिटिश राज से ही नहीं] बल्कि साम्राज्य से मुक्ति की भी आवाज बदलाव की उस प्रक्रिया में बार बार सुनाई पड़ती है। 

किसी भी समाज के भीतर परिवर्तन की बनती तस्वीर से ही ये तय किया जा सकता है कि यथास्थिति के खिलाफ परिवर्तन का क्या नामकरण किया जाए। अपने मुल्क में यह सत्ता के हस्तांतरण के रूप में ही जाना जाता है। हमने यह महसूस भी किया इसीलिए १९४७ में सत्ता हस्तांतरण के बाद से यह हिसाब किताब सामने रखना शुरू कर दिया कि इस बदलाव से किसे क्या हासिल हो रहा है। हमारी भाषा में ब्रिटिश राज व्यवस्था और भारतीय राज्य व्यवस्था के बीच फर्क नहीं है। यह जाहिर करने के लिए स्वतः ही विकसित होती चली गई। देश में जो आमदनी होती है वह किसके पास जाती है और सबसे गरीब आदमी के हिस्से में जो रोटियां थीं वह कितनी पतली होती चली गई हैं। यानी पहले से चली आ रही आर्थिक सत्ता के निरंकुश होने और सामाजिक सत्ता के और बर्बर होने की तस्वीर हम पेश करते रहे हैं। हम पैंसठ वर्षों से लगातार साल-दर-साल एक ही तरह का हिसाब किताब दिखाते आ रहे हैं।

वास्तव में क्या हुआ है हमने शासन का नेतृत्व बदलने पर जिस तरह से १९४७ से पहले जोर दिया था वही  दोहराते आ रहे हैं। प्रतिनिधि संस्था के भीतर जो प्रतिस्पर्द्धा विकसित की गई वह शासन व्यवस्था को बदलने के लिए नहीं] बल्कि शासन का नेतृत्व बदलने के लिए ही किया जाता रहा है। स्थिति यह विकसित होते दिखती है कि ब्रिटिश राज जिस तरह से अपने शासन व्यवस्था के बूते हमारी वास्तविक आजादी को बाधित करता रहा ठीक उसी तरह से नए नेतृत्वों ने भी शासन व्यवस्था का इस्तेमाल अपनी सत्ता को मजबूत करने और उसकी संस्कूति विकसित करने के लिए किया। हम गौर करें कि आज के दौर में हम केवल शासन के एक नेतृत्व से मुक्ति की अपील करते और एक नए नेतृत्व की बहाली की अपील ही सुनते हैं। मजे कि बात कि दोनों नेतृत्व दाएं बाएं के सारे जुमले इसके लिए इस्तेमाल करते हैं] लेकिन शासन व्यवस्था के परिवर्तन की बात नहीं करते हैं। ले-देकर यथास्थितियां बनी रहती हैं। एक क्षोभ को दूर करने के लिए दूसरे क्षोभ की तरफ बढ़ने का काम ही मतदान द्घरों की तरफ जाने में दिखने लगता है। राजनीतिक व्यवस्था को हमने सामाजिक और आर्थिक सत्ताओं को खत्म करने के लिए इस्तेमाल करने का भरोसा दिया था] लेकिन राजनीतिक व्यवस्था ही केवल प्रशासनिक मशीनरी में तब्दील कर दी गई। बड़ा से बड़ा आंदोलन आज की तारीख में इस दावे को पूरा करने के लिए हो रहा है कि अधिकारियों और राज के नेताओं (प्रतिनिधियों) के भ्रष्टाचार पहले के मुकाबले कम होंगे। पहले के मुकाबले हत्याएं कम होंगी। पहले के मुकाबले महंगाई कम होगी। पहले के मुकबले धर्म के नाम लोगों की हत्याएं कम होंगी। बलात्कार के खिलाफ उम्र कैद के बजाय फांसी की सजा का प्रावधान होगा। बेराजगारी पहले के मुकाबले नहीं बढ़ेगी। प्रशासनिक भाषा में राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति कैसे की जा सकती है

किसी भी समाज में बुनियादी तौर पर बदलाव आश्वासन और किसी नेतृत्व के भरोसे के बूते पूरा नहीं किया जा सकता है। बदलाव अपने आप में एक सतत प्रक्रिया है। जब बदलाव के लिए आंदोलन हो रहे होते हैं तो उसमें नए ढांचे का सृजन भी विकसित होते दिखना चाहिए। ऐसा कभी नहीं होता है कि एक कोना साफ कर लिया जाए और फिर वहां खड़े होकर द्घर बनाने की तैयारी की जाएगी। यह किसी धर्मांध समाज में ही हो सकता है। या उस समाज में हो सकता है जहां एक देवता के भरोसे हर वक्त किसी भी तरह के चमत्कार की उम्मीद पालने की एक संस्कूति जड़ जमाए हो। अपने मुल्क में लोगों को सत्ता हस्तांतरण के बाद भरोसा दिया गया और आश्वस्त किया गया कि आर्थिक] सामाजिक सत्ताओं का किला ढाह दिया जाएगा। लेकिन पूरी दुनिया में बदलाव के हर रास्तों पर ये महसूस किया गया कि जो आर्थिक] सामाजिक और राजनीतिक सत्ताएं होती हैं वह बदलाव के रास्तों में ?kqliSB कर लेती हैं। सत्ताओं से मुक्ति के नाम पर जितने भी धार्मिक मत विकसित हुए उन्हें भी हम देखें तो सामाजिक] आर्थिक और राजनीतिक सत्ताओं के ही वह गिरफ्त में चले गए। राजनीतिक विचारधाराओं के नेतृत्व का विकास भी सत्ताओं की इस ?kqliSB की संस्कूति को ध्वस्त नहीं कर सका। आज हम कहते भी हैं कि किसी भी संसदीय पार्टी में कोई बुनियादी तौर पर भेद नहीं दिखता है। सभी एक ही थैले के चट्टे बट्टे हैं। यही एक नए बदलाव की आहट का नाम है। लेकिन अब यह किस रास्ते जाएगा] इस पर क्रिस हेजेज भी दूसरों की तरफ स्पष्ट नहीं हैं। इसका अर्थ यह लगता है कि इस आहट की स्थिति में तमाम राजनीतिक] सामाजिक और आर्थिक शक्तियां अपने अच्छे-बुरे अनुभवों का अवलोकन कर रही हैं और सहमति के लिए एक केंद्रीय बिंदु की तलाश में सक्रिय हैं। जैसे इन दिनों लाल और नीले रंग की तस्वीर का एक राजनीतिक सौंदर्य विकसित किया जा रहा है। यह बात केवल समझने के लिए बतौर उदाहरण पेश किया गया है। यानी मुक्ति के प्रश्नों का प्रतिनिधित्व करने वाले विचारों व संगठनों के बीच एक सहमति की संभावना तलाशी जा रही है। पूरी दुनिया में ही इसी तरह की एक प्रक्रिया के सक्रिय होने के संकेत मिल रहे हैं। हमारे मुल्क में सपना दिखाया गया। इसीलिए उस सपने को पूरा करने का लोग इंतजार करते रहे हैं। लेकिन सपना खुद देखा जाना और उसमें जीना ही स्वाभाविक प्रक्रिया है। यह वास्तव में बदलाव का एक ढांचा विकसित करने की प्रक्रिया होती है। राजाओं ने सपने दिखाए इसीलिए वे सपने नहीं थे। सपने तो अपने होते हैं। 

इन तमाम बातों के बावजूद ये मानना चाहिए कि क्रांति या बदलाव एक सतत्‌ प्रक्रिया है। किसी भी क्रांति या बदलाव की प्रक्रिया को अंतिम नहीं माना जा सकता है। इसमें समाज की गति निहित है। इतिहासकार लाल बहादुर वर्मा की एक पुस्तक है- ^अधूरी क्रांतियों की इतिहास बोध।^ बदलाव और क्रांति के सपने के सच को समझने के लिए जरूरी है कि इस पुस्तक की कुछ पंक्तियों को दोहरा लिया जाए।

क्रांति पूर्ण परिवर्तन की धारणा और प्रक्रिया है- इतिहास -दर्शन यही कहता है। कोई भी क्रांति अब तक पूरी तरह चरितार्थ नहीं हुई है- इतिहास तो यही कहता है।

तो क्या क्रांति का अधूरा रह जाना उसकी नियति है

तो क्या अब किसी क्रांति की लालसा] महत्वकांक्षा और प्रयास बेमानी हैं] क्योंकि उसे पूरा तो होना ही नहीं है

नहीं] नहीं- पूर्ण परिवर्तन की आकांक्षा ही] क्रांति का कोई विजन हो न हो] क्रांति के सपने तो संजोती ही रहेगी और इस क्रम में रिवोल्यूशनरी विजन का भी अविर्भाव होगा ही। इसीलिए हर क्रांति का पिछली से बेहतर - पूर्णतर] होते जाना इसकी सफलता का मानक और पूर्व शर्त बना रहेगा। इतिहास अपने को कभी नहीं दोहराता] दोहरा ही नहीं सकता] पर अपने को बेहतर तो करता ही रह सकता है।

 
         
 
ges tkus | vkids lq>ko | lEidZ djsa | foKkiu
 
fn laMs iksLV fo'ks"k
 
 
fiNyk vad pquss
o"kZ  
 
 
 
vkidk er

क्या मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और और वित्त मंत्री प्रकाश पंत के बीच शीतयुद्ध चल रहा है?

gkW uk
 
 
vc rd er ifj.kke
gkW & 9%
uk & 0%
fiNyk vad

 

  • अनिल चमड़िया

 

वरिष्ठ पत्रकार@संपादक जन मीडिया

    किसी भी समाज के भीतर परिवर्तन की बनती तस्वीर से ही ये तय किया जा सकता

foLrkkj ls
 
 
vkidh jkf'k
foLrkkj ls
 
 
U;wtysVj
Enter your Email Address
 
 
osclkbV ns[kh xbZ
2163616
ckj