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vad 45 28-04-2018
 
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नजरिया 1
 
यह बहुवचन का दौर है
  • देवी प्रसाद त्रिपाठी

पूर्व राज्यसभा सदस्य

भारतीय राजनीति में समय& समय पर हुए बदलाव और मोदी लहर के बाद देश में पुनः एक दल को पूर्ण बहुमत आने में तमाम अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों की भी अहम भूमिका रही है जैसे आतंकवाद का आना और उभरना] वैश्वीकरण] सोवियत यूनियन का fo?kVu] चीन का एक बड़ी आर्थिक शक्ति के रूप में उभरना। इन सब ने भारतीय राजनीति को भी प्रभावित किया। देश में हिंदूवादी शक्तियों के उभार का एक कारण जहां वीपी सिंह का मंडल कमीशन लाना था] वहीं उसके एक दशक बाद आतंकवाद का विस्तार] इसमें पाकिस्तान का शामिल होना जैसी बातें दूसरा कारण है

 

जिन नीलम संजीव रेड्डी का इंदिरा गांधी राष्ट्रपति उम्मीदवार के तौर पर नौमीनेशन फाइल कराती हैं] उन्हीं का अंतर्रात्मा की आवाज पर वोट देने की बात कह विरोध भी करती हैं। जिसके कारण कांग्रेस में विरोध होता है। वह पार्टी सिस्टम पर बहुत ही गहरी चोट है। जिसका असर विपक्ष पर भी धीरे&धीरे पड़ता है। इसका प्रभाव तत्काल तो नहीं] लेकिन धीरे&धीरे दिखाई पड़ता है। जब तक राम मनोहर लोहिया और जय प्रकाश नारायण थे तब तक तो नहीं पड़ा] लेकिन उसके बाद पड़ा। यहीं से राजनीति में नैतिकता में प्रतिकूल प्रभाव की शुरुआत होती है। नैतिकता और विचारधारा दोनों अलग&अलग हैं। यहीं से भारतीय राजनीति का पतन शुरू होता है। १९७१ में इंदिरा गांधी ^गरीबी हटाओ^ का नारा देती हैं। इसका असर भी भारतीय जनमानस पर या कहें भारतीय मतदाता पर बहुत ज्यादा पड़ा जिस कारण इंदिरा गांधी भारी बहुमत से सत्ता में आईं। लेकिन तब तक मास मूवमेंट देश में शुरू हो गए और १९७३ आते&आते देश में इन्हीं इंदिरा गांधी के खिलाफ आंदोलन प्रबल हो गया। गुजरात का नवनिर्माण आंदोलन] उसके बाद जय प्रकाश नारायण का आंदोलन एक व्यापक रूप लेता है। देश में आपातकाल लगा दिया जाता है और एक तरह से पारिवारिक तानाशाही की राजनीति स्थापित हो जाती है। आपातकाल के समय संजय गांधी के हाथ में सत्ता की बागडोर आ जाती है। उसके बाद जय प्रकाश नारायण] कूपलानी जैसे बड़े व्यक्तित्वों के कारण आपातकाल और पारिवारिक तानाशाही के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन होता है। यह आखिरी राष्ट्रीय आंदोलन था। इसके बाद राष्ट्रीय उभार तो हुआ] लेकिन कोई आंदोलन नहीं हुआ। जो आंदोलन हुए भी वह दक्षिणपंथी आंदोलन रहे। आपातकाल के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर एक व्यापक गठबंधन हुआ। यह गठबंधन जेपी आंदोलन के साथ& साथ किया गया जिसको बाहर से सीपीएम व अन्य वामपंथी पार्टियों ने भी समर्थन दिया। यह भारतीय राजनीति की बहुत बड़ी ?kVuk और बदलाव था। जनता पार्टी की सरकार आपसी महत्वाकांक्षा के कारण कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई। जिसके बाद एक बार पुनः कांग्रेस पार्टी की सरकार बनीं। फिर से एक परिवार के हाथ में देश की सत्ता आ गई थी। संजय गांधी की मृत्यु के बाद राजीव गांधी आए। इंदिरा गांधी की सत्ता वापसी होने के बाद से ही उनका विरोध शुरू हो गया था। उस दौरान देश में कई ऐसी ?kVukएं द्घटीं जिन्होंने भारतीय राजनीति को बड़े स्तर पर प्रभावित किया। इंदिरा गांधी की हत्या उन्हीं ?kVukओं के कारण हुई ऐसा कई लोग मानते हैं। इस हत्या के बाद फिर से सहानुभूति लहर ने कांग्रेस पार्टी को भारी विजय दिलाई। लेकिन १९८७ के बाद बोफोर्स कांड जैसे मामले उजागर होते हैं जिसके चलते देश में एक नई लहर आती है। इसे वीपी सिंह ने फैलाने की कोशिश की। हालांकि इसमें उन्हें व्यापक समर्थन नहीं मिला। वीपी सिंह की सरकार बनती है जिसे दक्षिणपंथी और वामपंथियों का समर्थन भी मिलता है। इसी दौरान मंडल कमीशन आता है। उससे भी भारतीय राजनीति में एक नया परिवर्तन आया] लेकिन एक तरह से सामाजिक नफरत भी बढ़ी। इस मंडल कमीशन के बाद देश में जो सामाजिक उबाल आया था उसे अपनी ओर मोड़ने के लिए दक्षिणपंथी लालकूष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक की रथ यात्रा निकाली। मंडल बनाम कमंडल छा गया। मंडल के विरोध में यह मंदिर आंदोलन था। एक दक्षिणपंथी विचारधारा के अनुसार धर्म और सम्प्रदाय के प्रयोग से एक संकीर्ण राष्ट्रवादी चेतना के जरिए सामाजिक एकता बनाने की कोशिश थी। मंदिर आंदोलन ने भी बहुत बड़ा रुख अख्तियार कर लिया था। इसके बाद वीपी सिंह की सरकार गिरती है। चंद्रशेखर की सरकार बनती है। कुछ समय बाद ही चंद्रशेखर की सरकार भी गिर जाती है। इसके बाद राजीव गांधी की हत्या से भी देश में एक नया परिवर्तन आता है। १९६९ के बाद तीसरी बार देश में एक अल्पमत की सरकार बनती है। पीवी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने। राव के कार्यकाल के बाद से २०१४ तक छोटी&छोटी राजनीतिक पार्टियों का गठबंधन हुआ जिनकी सरकार बनती और बिगड़ती रही। इसमें भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली एनडीए और उसके बाद कांग्रेस पार्टी की नेतृत्व वाली यूपीए गठबंधन की सरकार बनी। यूपीए सरकार का नेतृत्व डॉ मनमोहन सिंह ने १० सालों तक किया। यूपीए २ के समय भ्रष्टाचार] द्घोटाले जैसी बड़ी ?kVukएं होती हैं। यूपीए के द्घटक दलों में किसी प्रकार का आपसी सामंजस्य नहीं रहता है। कांग्रेस पार्टी इस गठबंधन में भी अपनी प्रधानता चलाना चाहती थी जिस कारण यूपीए २ में शामिल राजनीतिक दलों में विश्वास की कमी हुई। जबकि कांग्रेस के नेताओं को पता है कि १९८९ के बाद से देश में सिंगल पार्टी डोमिनेंट सिस्टम खत्म हो गया। फिर भी कांग्रेस चलाना चाहती थी। इन सबका नतीजा २०१४ में देखने को मिला। यूपीए गठबंधन की बुरी तरह हार हुई और १९८९ के बाद पहली बार देश में एक पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला।

भारतीय राजनीति में समय& समय पर हुए बदलाव और मोदी लहर के बाद देश में पुनः एक दल को पूर्ण बहुमत आने में तमाम अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों की भी अहम भूमिका रही है जैसे आतंकवाद का आना और उभरना] वैश्वीकरण] सोवियत यूनियन का fo?kVu] चीन का एक बड़ी आर्थिक शक्ति के रूप में उभरना। इन सब ने भारतीय राजनीति को भी प्रभावित किया। देश में हिंदूवादी शक्तियों के उभार का एक कारण जहां वीपी सिंह का मंडल कमीशन लाना था वहीं उसके एक दशक बाद आतंकवाद का विस्तार] इसमें पाकिस्तान का शामिल होना जैसी बातें दूसरा कारण हैं।

सरकारी तंत्र ने अर्थव्यवस्था को जिस तरह नष्ट कर दिया था उसका असर भी भारतीय राजनीति पर पड़ा] लेकिन जैसे&जैसे भारतीय अर्थव्यवस्था पर निजीकरण का प्रभाव बढ़ा उससे देश की आर्थिक स्थिति में वृद्धि बेशक हुई है] इसने भारत की विदेश नीति को भी प्रभावित किया है। उदारीकरण के पहले तक जहां भारत की विदेश नीति सोवियत यूनियन के साथ खड़ी दिखती थी वहीं उदारीकरण के बाद यह अमेरिका के साथ खड़ी है। इसका एक और बदलाव भारतीय राजनीति पर यह पड़ा कि यहां विचारधारा कमजोर हो गई। जिस तरह भाजपा का कांग्रेसीकरण होना है। कई अलग&अलग पार्टियों में परिवारवाद का हावी होना भी इसी का एक असर है।

देश में क्षेत्रीय पार्टियों के उदय के मुख्य तीन कारण मान सकते हैं। जिसमें पहला है] कांग्रेस का कमजोर होना। दूसरा है विचारधारा का लोप होना और तीसरा है व्यक्तिगत एवं भ्रष्ट राजनीति। इस कारण जगह&जगह नए नेता का जन्म हुआ। इसने भारतीय राजनीति में परिवारवाद को और ज्यादा मजबूत किया है। अधिकतर क्षेत्रीय पार्टियों एक परिवार के इर्द&गिर्द ही चल रही हैं। इसमें नीतीश कुमार अपवाद हो सकते हैं हालांकि इसके बावजूद मैं भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों के उदय को सकारात्मक दृष्टि से देखता हूं। अगर उसकी कुछ खामियां और कमजोरियों को छोड़ दें तो क्योंकि विकास में पिछड़े राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों के मजबूत होने से वहां विकास का पहिया तेजी से ?kweus लगा है। सभी क्षेत्रीय पार्टियों की राजनीति एक तरह से भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली के समन्वय और इंटीग्रेशन को प्रकट करती है। जैसे तमिलनाडु में डीएमके का जन्म अलग तमिल राज्य के नाम पर हुआ था। वह डीएमके अब राष्ट्रीय सरकार में भी शामिल होती है। हालांकि क्षेत्रीय पार्टियों की विचारधारा में भी गिरावट आई है। इन्हें अपने क्षेत्र के विकास के लिए केंद्र सरकार के साथ रहना मजबूरी होती है। जिस कारण इनकी विचारधारा पीछे छूट जाती हैं। सबसे ताजा उदाहरण जम्मू&कश्मीर में देख सकते हैं। वहां पीडीपी और भाजपा नदी के दो छोर की तरह हैं। नदी के दो छोर आपस में कभी मिल नहीं सकते। लेकिन राजनीति में इस असंभव कार्य का संभव होना] कोई नई या बड़ी ?kVuk नहीं होती। आंध्रा में चन्द्र बाबू नायडू ने जिस तरह संचार क्रांति की थी उससे यह समझा जा सकता है कि क्षेत्रीय दल क्षेत्र का विकास करते हैं। आंध्रा के अलावा केरल में विकास का एक अलग ही मॉडल अपनाया गया।

देश के प्रमुख अल्पसंख्यक समुदाय मुस्लिम ने भी भारतीय राजनीति को कम प्रभावित नहीं किया है। हालांकि मुस्लिम राजनीति देश में लंबे समय से सक्रिय है। कई क्षेत्रीय दल मुसलमानों की राजनीति करते हैं] लेकिन इनकी स्थिति में कोई ज्यादा सुधार नहीं हुआ। जब तक इनकी शिक्षा स्तर में सुधार नहीं होगा] तब तक इनकी दिशा और दशा में भी सुधार असंभव है। सच्चर कमेटी ने भी अपनी रिपोर्ट में शिक्षा और निर्धनता समाप्त करने को कहा है। तब वह राष्ट्रीय राजनीति में अपनी असरदार भूमिका नहीं निभा पाएगी। दोनों प्रमुख पार्टियों ¼कांग्रेस&भाजपा½ ने इस तरफ काम भी नहीं किया। मुस्लिम धार्मिक सांप्रदायिक नेतृत्व भी एक बहुत बड़ा कारण है। ये अपने समाज को मदरसों से बाहर निकलने नहीं देते हैं। ये लोग धार्मिक उन्माद में इसका इस्तेमाल करते हैं। भारतीय जनता पार्टी को यदि देश की सत्ता लंबे समय तक अपने पास रखनी है तो उन्हें अपनी कार्यशैली में बदलाव तो करना ही पड़ेगा। देश की राजनीति अंतरराष्ट्रीय ?kVuk से भी प्रभावित होती है। यदि भाजपा अपनी कार्यप्रणाली में या दंगों को नहीं रोकेगी तो ओपेक देश जिसमें अधिकतर मुस्लिम देश हैं] वहां से पेट्रोलियम पदार्थ कहां से मिलेगा। इसके बिना देश चल नहीं सकता।

कांग्रेस पार्टी गांधी परिवार से बाहर नहीं निकल सकती] लेकिन गांधी परिवार को तो बदलना पड़ेगा। देश की राजनीति बदल गई है] लेकिन गांधी परिवार का पूरा तौर&तरीका सामंतवादी है। अभी भी दरबार और महल में जो मिले सो मिले। यह नहीं चलेगा। भारत दुनिया का सबसे युवा देश। ३५ साल से नीचे की आबादी ७० फीसदी के करीब है। इस ताकत को अब समझने की जरूरत है।

राजनीतिक परिवर्तन जो आया है] वह है] एक वचन की राजनीति समाप्त हो गई है। यह बहुवचन का दौर है। जो इस बहुवचन को समझेगा वही इस देश पर राज करेगा और भारत को आगे बढ़ाएगा। भाजपा को अभी समझ में नहीं आया है। अब जब उनको बहुमत आया तो अब और नहीं समझ में आ रहा है।

¼गुंजन कुमार से बातचीत पर आधारित½

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  • कंवल भारती

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