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सपने] आंदोलन और सपनों का मर जाना
  • विनोद अग्निहोत्री

२०१३ की आशा से अधिक सफलता और सत्ता के अल्पकालीन स्वाद ने आम आदमी पार्टी में नेतृत्व स्तर प नेताओं के बीच परस्पर अविश्वास और गुटबाजी को जन्म दिया। अरविंद केजरीवाल पार्टी के शिखर पुरुष और सर्वोच्च लोकप्रिय नेता के रूप में स्थापित हो चुके थे] लेकिन उनके la?kर्ष के साथी उन्हें अब भी अण्णा हजारे के पहले धरने के आयोजकों में एक अरविंद से ज्यादा नहीं मान पा रहे थे। प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव स्वयं को किसी मायने में अरविंद से कमतर नहीं मानते थे। जबकि कुमार विश्वास के लिए केजरीवाल अभी भी अरविंद ही थे। जबकि मनीष सिसोदिया] संजय सिंह] आशुतोष] आशीष खेतान जैसे नेता अरविंद को उसी तरह अपना सर्वेसर्वा मानने लगे थे जैसे भाजपाई नरेंद्र मोदी को और कांग्रेसी सोनिया या राहुल गांधी को। नेतृत्व में भीतर ही भीतर गुटबाजी पनपने लगी और उसकी पहली झलक २०१४ के लोकसभा चुनावों में मिली जब अरविंद ने खुद को बनारस में मोदी के खिलाफ और कुमार विश्वास को अमेठी में राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव मैदान में उतार दिया। पार्टी के दूसरे शीर्ष नेता योगेंद्र यादव] आनंद कुमार] आशुतोष] शाजिया इल्मी] आशीष खेतान] आदि भी मैदान में थे। लेकिन पार्टी की पूरी ताकत और संसाधन में बनारस में अरविंद केजरीवाल के लिए झोंक दिए गए] जिसकी शिकायत चुनाव के दौरान ही कुमार विश्वास ने सोशल मीडिया पर अपने काव्यात्मक अंदाज में की। लेकिन चुनाव नतीजों ने सभी महारथियों को खेत कर दिया और अस्तित्व के la?kर्ष में गिले शिकवे भुला दिए गए। फिर आप और कांग्रेस विधायकों में तोड़&फोड़ करके दिल्ली में सरकार बनाने भाजपा के दांव पेंच ने आप नेताओं को फिर एकजुट कर दिया। 

फिर विधानसभा भंग होने और फरवरी २०१५ के चुनावों के दौरान नेतृत्व la?kर्ष शुरू हो गया। टिकटों के बंटवारे में अपने वफादारों को टिकट दिलाने को लेकर योगेंद्र यादव] प्रशांत भूषण और आनंद कुमार एक तरफ हो गए तो अरविंद केजरीवाल] मनीष सिसोदिया] संजय सिंह] आशुतोष दूसरी तरफ लामबंद थे। चतुर सुजान कुमार विश्वास ने भी पलड़ा केजरीवाल की तरफ ही झुका दिया। यहीं से आप नेतृत्व सीधी तौर पर दो खेमों में बंट गया और पार्टी पर कब्जे की लड़ाई तेज हो गई। प्रकट तौर पर तो आप ने एकजुट होकर भाजपा की मोदी आंधी के खिलाफ चट्टान की तरह खड़े होकर चुनाव लड़ा और ७० में से ६७ विधानसभा सीटें जीतीं। आप की इस आंधी ने न सिर्फ विधानसभा में भाजपा को तीन और कांग्रेस को शून्य के आंकड़े पर पहुंचा दिया] बल्कि साथ ही अरविंद केजरीवाल को वह ताकत दे दी कि पार्टी के उन दिग्गजों को निबटा सकें] जो उनके लिए भविष्य में सियासी खतरा हो सकते थे। नतीजा प्रशांत भूषण] योगेंद्र यादव] आनंद कुमार और उनके समर्थकों की पार्टी से बेदखली के रूप में सामने आया। इसके साथ ही आम आदमी पार्टी जो अपने सामूहिक नेतृत्व के जरिए भारतीय राजनीति में नेतृत्व की एक नई मिसाल बना रही थी] पूरी तरह व्यक्ति केंद्रित पार्टी में बदल गई। जिस दिन प्रशांत योगेंद्र और आनंद के खिलाफ अरविंद केजरीवाल के साथ मनीष सिसोदिया] कुमार विश्वास] संजय सिंह] आशुतोष] आशीष खेतान] दिलीप पाँडे] कपिल मिश्र] सौरभ भारद्वाज आदि तमाम नेता एकजुट हुए] उन्होंने अपने हाथों पार्टी के सामूहिक नेतृत्व की बलि चढ़ा दी। यही वो दिन था जिस दिन भविष्य में कपिल मिश्रा] कुमार विश्वास जैसे नेताओं को किनारे लगाने और राज्यसभा के लिए गुप्ता द्वय के चयन का बीज पड़ा। जाने& अनजाने इन सबने अरविंद केजरीवाल को आम आदमी पार्टी का सर्वशक्तिमान नेता बना दिया और उनके फैसले या इच्छा के खिलाफ जाने बोलने या असहमति दर्ज करने के अपने अधिकार को अरविंद के पास गिरवी रख दिया। लेकिन तब अरविंद के साथ जुटे पार्टी के कुछ बड़े नेता इसलिए खुश थे कि प्रशांत भूषण] योगेंद्र यादव और आनंद कुमार के निकल जाने के बाद २०१८ में राज्यसभा में जाने का उनका रास्ता साफ हो जाएगा। लेकिन केजरीवाल ने वही किया जो पार्टी नेतृत्व के सारे सूत्र हाथ में आने के बाद कोई भी चतुर सुजान नेता करता है।

धीरे&धीरे आम आदमी पार्टी में सत्ता की राजनीति के सारे गुण दुर्गुण आते गए और पार्टी का आंतरिक लोकतंत्र अन्य दलों की तरह ही महज दिखावे का रह गया। भ्रष्टाचार के खिलाफ हुए आंदोलन के गर्भ से निकली आम आदमी पार्टी के कुछ नेताओं] विधायकों पर फर्जी डिग्री] भ्रष्टाचार के आरोप लगे। कांग्रेस और भाजपा के अलावा कपिल मिश्रा जैसे द्घर के भेदियों ने भी सीधे अरविंद केजरीवाल तक पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए। पंजाब विधानसभा चुनावों में शुरू में जबर्दस्त लहर बनाने वाली आप आखिर तक आते आते इसलिए पिछड़ गई कि अरविंद केजरीवाल दिल्ली और चंडीगढ़ की कुर्सी को लेकर न सिर्फ खुद दुविधा में रहे] बल्कि उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं और समथर्कों के साथ साथ पंजाब की जनता को भी भ्रम में बनाए रखा। पंजाब चुनावों के दौरान भी पार्टी नेताओं पर गंभीर आरोपों ने भी विवादों को जन्म दिया।

हालांकि विधानसभा चुनावों की करारी हार से बौखलाई भाजपा और उसकी केंद्र सरकार ने आप की दिल्ली सरकार के कामकाज में हर तरह के रोड़े अटकाए और पूरे देश में माहौल यह बनाया गया कि आम आदमी पार्टी को सरकार चलाना ही नहीं आता। बावजूद इसके कुछ क्षेत्रों में शिक्षा] स्वास्थ्य] गरीब और कमजोर वर्गों के हितों को लेकर आम आदमी पार्टी की सरकार ने उल्लेखनीय काम किए हैं] जिससे उसका कमजोर वर्गों में जनाधार मजबूत हुआ है। लेकिन साथ ही दिल्ली के झगड़ों] पार्टी की फूट और पंजाब की विफलता ने आप के राष्ट्रीय चरित्र और आकांक्षाओं पर गहरी चोट की। २०१३ व २०१५ के दिल्ली विधानसभा चुनावों की जबर्दस्त सफलता से आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल की जो राष्ट्रीय चमक बनी थी और लोग उनमें नई वैकल्पिक राजनीति देखने लगे थे] वह चमक अब फीकी पड़ चुकी है और आप को भी अन्य दलों की तरह ही माना जाने लगा है। वित्तमंत्री अरुण जेटली] कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल] केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और पंजाब के पूर्व मंत्री मजीठिया के खिलाफ लगाए गए आरोपों के लिए मानहानि के मुकदमे झेल रहे केजरीवाल और अन्य आप नेताओं के माफीनामों से भी पार्टी की धार कुंद हुई और साख को धक्का लगा। इससे यह तो पता चल गया कि वह सत्ता की राजनीति में तो पारंगत हो गई है] लेकिन la?kर्ष और विकल्प की राजनीति का रास्ता उससे दूर हो गया है। इसके बावजूद आम आदमी पार्टी को खारिज करना जल्दबाजी और भूल होगी। आप के लगभग सभी नेता युवा और मध्यम आयु वर्ग के हैं और उनका राजनीतिक जीवन अभी कम से कम २० से २५ साल है। इसलिए देश की राजनीति में भाजपा अपने चरम पर है और भविष्य में उसकी क्या स्थिति होगी और कांग्रेस क्या अपने पुराने स्वरूप और प्रभाव को वापस पा सकेगी] इन सवालों के जवाब भविष्य के गर्भ में हैं। जबकि समाजवादी] किसान और सामाजिक न्याय की राजनीति से निकले सभी दल व्यक्ति और परिवार केंद्रित सियासी कारोबार में बदल चुके हैं। एसे में आम आदमी पार्टी की संभावनाएं खत्म नहीं होती हैं] बशर्ते कि वह अपने पुराने सामूहिक नेतृत्व के दौर में वापस आए और व्यक्ति केंद्रित राजनीति को उतार फेंके। लेकिन क्या अरविंद केंजरीवाल अपने हाथों से पार्टी के सत्ता सूत्रों को जाने देंगे और मनीष सिसोदिया] संजय सिंह] आशुतोष] आशीष खेतान आदि यह साहस दिखा पाएंगे कि वह अरविंद केजरीवाल को पार्टी का मालिक नहीं] बल्कि सामूहिक नेतृत्व का प्रतिनिधि नेता मानें। इसका उत्तर समय ही दे सकेगा। लेकिन सवाल किसी व्यक्ति दल या संगठन का नहीं है] बल्कि बड़ा सवाल है कि आखिर कब तक सपनों के नाम पर देश के लोग इसी तरह छले जाते रहेंगे या कभी कोई शंकर गुहा नियोगी जैसा ईमानदार la?kर्षशील और न झुकने न बिकने और न डरने वाला नेता राष्ट्रीय स्तर उभरेगा जो देश और समाज को उसकी सही मंजिल तक पहुंचाएगा।


 
         
 
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