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सपने] आंदोलन और सपनों का मर जाना
  • विनोद अग्निहोत्री

वरिष्ठ पत्रकार] दैनिक ^अमर उजाला^ के सलाहकार संपादक

शहर&शहर गांव&गांव ये नारा गूंजने लगा कि ^जय प्रकाश का बिगुल बजा है जाग उठी तरुणाई है] चलो साथियों तिलक लगाने क्रांति द्वार पर आई है।^ पटना के गांधी मैदान में जय प्रकाश नारायण की रैली] सड़कों पर प्रदर्शन और जेपी समेत सभी विपक्षी नेताओं पर बर्बर लाठीचार्ज ने पूरे देश को आक्रोशित कर दिया। बड़े पैमाने पर जगह&जगह कांग्रेस और केंद्र सरकार के खिलाफ धरने&प्रदर्शन होने लगे। इसी बीच इंदिरा गांधी के चुनाव के खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले ने आग में द्घी का काम किया। इंदिरा के इस्तीफे की मांग पूरे देश में उठने लगी। इंदिरा गांधी ने इसके पीछे विदेशी हाथ की साजिश का आरोप लगाते हुए २६ जून १९७५ को देश में आपातकाल लगा दिया और देश भर में विपक्षी नेताओं&कार्यकर्ताओं की बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुईं। प्रेस पर सेंसरशिप लागू कर दी गई। पूरे १९ महीने देश में आपातकाल लागू रहा। इस आंदोलन की सफल परिणति १९७७ के आम चुनावों में कांग्रेस की पराजय और कई दलों के विलय से बनी जनता पार्टी की जीत के रूप में हुई। जेपी के भरोसेमंद मोरारजी भाई देसाई प्रधानमंत्री बने और सबसे ज्यादा सांसदों वाले लोकदल नेता चरण सिंह गृह मंत्री। कांग्रेस छोड़कर आए जगजीवन राम] हेमवती नंदन बहुगुणा और तत्कालीन जनla?k के नेता अटल बिहारी वाजपेयी] लालेंष्ण आडवाणी आदि भी मंत्रिमंडल में शामिल हुए। उत्तर प्रदेश] मध्य प्रदेश] बिहार] राजस्थान] गुजरात] पंजाब] दिल्ली] प. बंगाल] उड़ीसा] पूर्वोत्तर] महाराष्ट्र सब जगह विपक्ष का परचम लहराने लगा। सिर्फ दक्षिण भारत के तत्कालीन चारों राज्य कांग्रेस के साथ खड़े रहे। लेकिन जल्दी ही जनता पार्टी के नेता सत्ता की बंदरबांट के ऐसे झगड़े में फंसे कि जेपी आंदोलन के गर्भ से निकला यह राजनीतिक प्रयोग महज ढाई साल में भरभराकर गिर गया

 

जब मैं आम आदमी पार्टी के राजनीतिक और नैतिक उत्थान और पतन का विश्लेषण कर रहा हूं तब मुझे इसके पहले के कुछ राजनीतिक प्रयोग भी याद आ रहे हैं] जिन्हें भारतीय राजनीति में बड़ी उम्मीद से देखा गया और जनता ने उन्हें अगाध विश्वास दिया। लेकिन आखिर में जनता छली गई। आजादी के आंदोलन में बनी कांग्रेस पार्टी विचार से परिवार की पार्टी में बदल गई। जय प्रकाश आंदोलन के गर्भ से निकली जनता पार्टी और उसका प्रयोग महज ढाई साल में ही तब दम तोड़ गया जब उसके जनक लोकनायक जयप्रकाश नारायण डाइलिसिस पर अस्पताल में पड़े अपनी लाचारी पर अंतिम सांसें ले रहे थे। १९८९ में फिर जनता ने एक बार भ्रष्टाचार के मुद्दे पर विश्वनाथ प्रताप सिंह के प्रयोग पर भरोसा किया] लेकिन वह प्रयोग मंडल और कमंडल की राजनीति की भेंट चढ़ गया। इसके बाद करीब दो दशकों के अंतराल के बाद अन्ना आंदोलन के ज्वार से पैदा हुई आम आदमी पार्टी के प्रयोग ने फिर उम्मीद जगाई] लेकिन अब उस पर भी किंतु परंतु लग गए हैं।

आखिर इसकी क्या वजह हो सकती है। शायद राजनीति शास्त्र के विचारक लार्ड एक्टन का वो मशहूर कथन कि ^सत्ता व्यक्ति को भ्रष्ट करती है और पूर्ण सत्ता पूर्ण रूप से भ्रष्ट कर देती है^] इन सारे राजनीतिक प्रयोगों पर अक्षरश! लागू होता है। कांग्रेस के पतन में दशकों का वक्त लगा क्योंकि उसकी वैचारिक नींव लंबे स्वतंत्रता आंदोलन में पड़ी थी। जनता पार्टी इसलिए सत्ता la?kर्ष में सिर्फ ढाई साल में भरभरा गई कि उसे गढ़ने वाला जयप्रकाश आंदोलन भी महज ढाई से तीन साल तक ही चला था। जिसमें १९ महीने आपातकाल के भी शामिल हैं। विश्वनाथ प्रताप सिंह के प्रयोग की नींव किसी आंदोलन में नहीं] बल्कि चुनावी गठजोड़ में बनी] इसलिए दस महीने में ही वह चुनावी राजनीति का शिकार हो गया। कुछ इसी तरह आम आदमी पार्टी को जन्म देने वाला अण्णा आंदोलन भी महज दो साल तक ही प्रभावी रहा] इसलिए शायद आप का प्रयोग भी इतनी जल्दी रास्ता भटक गया।

१९४७ में जब देश आजाद हुआ तो स्वतंत्रता आंदोलन के क्रांति यज्ञ में तपे हुए नेताओं के हाथ देश की बागडोर आई। कुछ सपने आजादी के la?kर्ष के दौरान जनता ने देखे थे और कुछ नेताओं ने दिखाए थे। महात्मा गांधी की हत्या देश की आत्मा पर पहला आद्घात था] लेकिन नेहरू पटेल मौलाना आजाद अंबेडकर आदि ने देश को उस रास्ते पर डाला जहां से जनता की आकांक्षाओं और सपनों के भारत का निर्माण किया जा सके। एक ऐसे देश और समाज का निर्माण जो समता बंधुत्व और लोकतंत्र को जमीन पर उतार सके। हालांकि कभी कांग्रेस में नेहरू के साथ रहे राम मनोहर लोहिया और जय प्रकाश नारायण] आचार्य नरेंद्र देव आदि ने नेहरू की नीतियों को लेकर जनता के बीच अपना सशक्त विरोध दर्ज कराना शुरु कर दिया था। लेकिन करीब दो दशक तक जनता ने पहले जवाहर लाल नेहरू और फिर लाल बहादुर शास्त्री की अगुआई वाली कांग्रेस पर अपना भरोसा जताया। लेकिन १९६७ तक आते आते जनता विशेषकर उत्तर भारत में लोगों का मोह भंग होना शुरू हो गया। जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करती] का लोहिया का नारा रंग लाया और उत्तर भारत में कांग्रेस का वर्चस्व टूटा। उत्तर प्रदेश] मध्य प्रदेश] बिहार] राजस्थान आदि उत्तरी राज्यों में पहली बार गैर कांग्रेसी विपक्षी दलों की गठबंधन सरकारें बनीं जिन्हें संविद सरकारों के नाम से जाना जाता है। कांग्रेस की यह चुनावी पराजय लोहिया की अगुआई वाले उस तमाम la?kर्ष और आंदोलन से उपजे जन आक्रोश का नतीजा थी] जिसे कांग्रेस से अलग होने के बाद से ही समाजवादी नेता देश के अलग अलग हिस्सों में चला रहे थे। हालांकि इसके पहले केरल में भी देश की पहली गैरकांग्रेसी सरकार समाजवादियों के नेतृत्व में बन चुकी थी] लेकिन वह अपना कार्यकाल इसलिए पूरा नहीं कर सकी क्योंकि उस सरकार की पुलिस ने अपनी ही प्रदर्शनकारी जनता पर लाठीचार्ज किया था] जिससे आहत लोहिया ने उसे इस्तीफा देने का निर्देश दे दिया था। यह उस दौर की राजनीतिक और सैद्धांतिक नैतिकता का अनूठा प्रमाण था। लेकिन १९६७ की यह विपक्षी आंधी ज्यादा दिन नहीं टिक सकी और अपने अंतर्विरोधों और कांग्रेस में इंदिरा गांधी के उदय ने उसे कमजोर कर दिया। इंदिरा गांधी ने अपने गरीबी हटाओ के नारे और प्रिवी पर्स के खात्मे] बैंकों और कोयला खदानों के राष्ट्रीय करण जैसे साहसिक फैसलों से जनता में फिर बदवाल और नए भारत के निर्माण के सपने जगा दिए। १९७१ के बांग्लादेश युद्ध के बाद १९७२ में हुए लोकसभा चुनावों में इंदिरा गांधी का जादू चला और विपक्ष फिर हाशिए पर चला गया। लेकिन तीन साल के भीतर ही लोगों की आशाओं और आकांक्षाओं पर पानी फिरता सा नजर आने लगा क्योंकि कांग्रेस में इंदिरा शाही और संजय गांधी के उद्भभव ने पार्टी की लोकप्रियता को गिरा दिया। गुजरात से शुरू हुए छात्रों के नवनिर्माण आंदोलन की आग जल्दी ही पटना तक फैल गई और भ्रष्टाचार एक प्रमुख मुद्दा बन गया। राजनीति से संन्यास ले चुके और समाजवादी से सर्वोदयी हो चुके जय प्रकाश नारायण के मैदान में आ जाने से यह छात्र आंदोलन न सिर्फ पूरे उत्तर भारत में फैल गया] बल्कि तरुणाई की यह अंगड़ाई तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ एक बड़े राजनीतिक आंदोलन में बदल गई। लोहिया की सप्तक्रांति की तर्ज पर जेपी ने संपूर्ण क्रांति का नारा दिया। शहर शहर गांव गांव ये नारा गूंजने लगा कि ^जय प्रकाश का बिगुल बजा है जाग उठी तरुणाई है] चलो साथियों तिलक लगाने क्रांति द्वार पर आई है।^

पटना के गांधी मैदान में जय प्रकाश नारायण की रैली] सड़कों पर प्रदर्शन और जेपी समेत सभी विपक्षी नेताओं पर बर्बर लाठीचार्ज ने पूरे देश को आक्रोशित कर दिया। बड़े पैमाने पर जगह जगह कांग्रेस और केंद्र सरकार के खिलाफ धरने&प्रदर्शन होने लगे। इसी बीच इंदिरा गांधी के चुनाव के खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले ने आग में द्घी का काम किया। इंदिरा के इस्तीफे की मांग पूरे देश में उठने लगी। इंदिरा गांधी ने इसके पीछे विदेशी हाथ की साजिश का आरोप लगाते हुए २६ जून १९७५ को देश में आपातकाल लगा दिया और देश भर में विपक्षी नेताओं कार्यकर्ताओं की बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुईं। प्रेस पर सेंसरशिप लागू कर दी गई। पूरे १९ महीने देश में आपातकाल लागू रहा। इस आंदोलन की सफल परिणति १९७७ के आम चुनावों में कांग्रेस की पराजय और कई दलों के विलय से बनी जनता पार्टी की जीत के रूप में हुई। जेपी के भरोसेमंद मोरारजी भाई देसाई प्रधानमंत्री बने और सबसे ज्यादा सांसदों वाले लोकदल नेता चरण सिंह गृह मंत्री।कांग्रेस छोड़कर आए जगजीवन राम] हेमवती नंदन बहुगुणा और तत्कालीन जनla?k के नेता अटल बिहारी वाजपेयी] लालकूष्ण आडवाणी आदि भी मंत्रिमंडल में शामिल हुए। उत्तर प्रदेश] मध्य प्रदेश] बिहार] राजस्थान] गुजरात] पंजाब] दिल्ली] पश्चिम बंगाल] उड़ीसा] पूर्वोत्तर] महाराष्ट्र सब जगह विपक्ष का परचम लहराने लगा। सिर्फ दक्षिण भारत के तत्कालीन चारों राज्य कांग्रेस के साथ खड़े रहे। लेकिन जल्दी ही जनता पार्टी के नेता सत्ता की बंदरबांट के ऐसे झगड़े में फंसे कि जेपी आंदोलन के गर्भ से निकला यह राजनीतिक प्रयोग महज ढाई साल में भरभराकर गिर गया। गैर कांग्रेसी नेताओं से नाराज और निराश जनता ने १९८० में फिर इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पर भरोसा जताया और उसकी सत्ता वापसी हुई।

१९८० के बाद पहले इंदिरा और फिर उनकी हत्या के बाद सत्तारूढ़ हुए राजीव गांधी के करिश्मे पर देश ने भरोसा जताया और राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक और सामाजिक सवालों पर कोई आंदोलन नहीं उभरा। लेकिन इसी दौर में १९६७ और १९७७ में  लोहिया और जेपी के गैर कांग्रेसी राजनीतिक प्रयोग से सामाजिक और राजनीतिक स्वीकूत पा चुके राष्ट्रीय स्वयंसेवक la?k और उसके अनुषांगिक संगठन भारतीय जनता पार्टी ने अपने विस्तार का अभियान शुरु किया। १९८४ के लोकसभा चुनावों में भाजपा के महज दो सीटों पर सिमट जाने के बाद la?k ने हिंदुत्व के अपने एजेंडे को धार देने के लिए विश्व हिंदू परिषद बजरंग दल आदि के जरिए अयोध्या में बाबरी मस्जिद को राम जन्मभूमि ?kksf"kr करने वाले पुराने कानूनी विवाद को जन आंदोलन में बदल दिया। राजीव गांधी के करिश्मे की उतरने] शाहबानो मामले में उनकी मुस्लिम कट्टरपंथियों के आगे ?kqVuk टेक नीति और फिर अयोध्या में बाबरी मस्जिद के ताला खुलने से लेकर राम मंदिर के शिलान्यास की द्घटनाओं ने la?k के मंदिर आंदोलन को हिंदुत्व की आंधी में बदल दिया। कांग्रेस के भीतर ही विश्वनाथ प्रताप सिंह ने बोफोर्स तोप सौदे में राजीव गांधी और उनकी सरकार पर दलाली का आरोप मढ़ते हुए भ्रष्टाचार के मुद्दे को फिर केंद्रीय मुद्दा बना दिया। विपक्षी एकता और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर विश्वनाथ प्रताप सिंह की ईमानदारी की चमक ने १९८९ में फिर केंद्र और कई राज्यों से कांग्रेस को बेदखल किया। लोगों के सपनों को फिर पंख लगे। लेकिन जनता पार्टी की ही तरह १९८९ का जनता दल प्रयोग भी सत्ता की बंदरबांट] अंहकार के झगड़ों और सियासी पैंतरेबाजी की भेंट चढ़ गया। देवीलाल को कमजोर करने के इरादे से खेले गए मंडल आयोग के कार्ड और उसके जवाब में भाजपा के कमंडल दांव ने राष्ट्रीय राजनीति से गैर कांग्रेस और गैर भाजपा दलों की राजनीति की पतन गाथा की इबारत लिख दी।

लेकिन इसी दौर में देश में अलग अलग हिस्सों में कुछ बड़े जन आंदोलन उभरे। इनमें उत्तर प्रदेश में महेंद्र सिंह टिकैत की अगुआई में भारतीय किसान यूनियन] कर्नाटक में नंजदुम्मा स्वामी] महाराष्ट्र में शरद जोशी] पंजाब में भूपेंद्र सिंह मान] अजमेर सिंह लाखोंवाल] हरियाणा में द्घासीराम नैन और प्रेम सिंह दहिया] गुजरात में विपिन भाई देसाई जैसे किसान नेताओं की अगुआई में बड़े किसान आंदोलनों ने राज्य और केंद्र की सत्ता को जबर्दस्त चुनौती दी। शामली] मेरठ] दिल्ली] मुजफ्फरनगर के भोपा में टिकैत के एतिहासिक धरनों में लाखों किसानों की शिरकत] विदर्भ में शरद जोशी के शेतकारी संगठन के विशाल धरने और कर्नाटक में नंजदुम्मा स्वामी के कर्नाटक रैयत la?k के प्रदर्शनों ने किसान को भारतीय राजनीति के एजेंडे पर ला दिया। लेकिन बिना किसी राजनीतिक दिशा और विचार के ये आंदोलन आगे चलकर राजनीतिक दलों के समर्थन और विरोध की सियासत में उलझ गए। किसान नेताओं के अपने अहम और वर्चस्व के झगड़ों ने इन किसान संगठनों को एकजुट नहीं होने दिया और देशभर के किसानों की रैली में दिल्ली के बोट क्लब पर टिकैत और शरद जोशी की शर्मनाक हाथापाई ने देश के किसानों के इस ज्वार को सैलाब बनने के पहले ही भाटे में बदल दिया। इसके बाद हर किसान नेता और सगंठन अपनी अपनी राजनीति में उलझ गया। शरद जोशी को राज्यसभा सांसद की मंजिल मिल गई। टिकैत ने किसान यूनियन में उन सभी किसान नेताओं को ठिकाने लगा दिया जो आंदोलन की बुनियाद थे या जिनके भीतर आंदोलन को आगे दूर तक ले जाने की ताकत थी। भूपेंद्र सिंह मान और अजमेर लाखोंवाल पंजाब की अकाली राजनीति में उलझ कर गुमनामी में चले गए। यही हाल हरियाणा में नैन और दहिया का हुआ] उन्हें देवीलाल की जाट राजनीति ने निगल लिया। नजदुम्मा स्वामी आखिर तक किसान आंदोलन के प्रति ईमानदार रहे लेकिन उनके असामयिक निधन ने कर्नाटक के किसान आंदोलन को बिखेर दिया।

सत्तर और अस्सी के दशक में ही तत्कालीन मध्य प्रदेश के छत्तीसगढ़ अंचल में राजनीतिक और सामाजिक विकल्प देने का एक नया अनूठा प्रयोग पूर्व नक्सली नेता शंकर गुहा नियोगी के नेतृत्व में हुआ। १९६९ में पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी के नक्सलबाड़ी गांव से चारू मजूमदार और कानू सान्याल के नेतृत्व में शुरू हुआ किसानों का सशस्त्र विद्रोह जल्दी ही पश्चिम बंगाल] बिहार] आंध्र प्रदेश] उड़ीसा] केरल] मध्य प्रदेश के छत्तीसगढ़ समेत देश के कई हिस्सों में फैल गया। चीन का रास्ता हमारा रास्ता और चीन का चेयरमैन हमारा चेयरमैन के माओवादी नारे से शुरू हुए इस विद्रोह ने एक दौर में गावों से ज्यादा शहरी नौजवानों को अपनी ओर खींचा] जो लोकतांत्रिक व्यवस्था को पूंजीवादी और शोषणकारी मानते हुए रूस चीन की तर्ज पर सशस्त्र क्रांति के जरिए व्यवस्था बदलने का सपना लेकर अपने द्घर बार पढ़ाई कैरियर छोड़कर इसमें कूदे। लेकिन हिंसक होने की वजह से केंद्र और राज्य की सरकारों ने इससे कड़ाई से निबटना शुरू कर दिया। चारु मजूमदार की मौत और कानू सान्याल की गिरफ्तारी के बाद नक्सली आंदोलन कई नेताओं और गुटों में बंट गया। कानू सन्याल] सत्यनारायण सिंह] चंद्रपुला रेड्डी] नागभूषण पटनायक कोंडापल्ली सीतारमैया] कन्हाई चटर्जी] जगदीश महतो] विनोद मिश्रा जैसे कई नक्सली नेताओं ने अपने अपने नाम से अलग अलग संगठन बना लिए। उनमें इस बात पर झगड़े शुरू हो गए कि कौन ज्यादा शुद्ध मार्क्सवादी लेनिनवादी और माओवादी विचारधारा वाला है। एक दूसरे को संशोधनवादी और समझौतावादी होने का आरोप लगाते हुए नक्सली गुटों ने सिर्फ भाकपाऔर माकपा जैसी राजनीतिक पार्टियों पर हमले किए] बल्कि कभी अपने हमसफर रहे दूसरे गुटों को भी नहीं बख्शा। लेकिन धीरे धीरे १९९० के बाद कई नक्सली गुट अपने नेताओं के निधन के बाद विलीन हो गए। बिहार और उत्तर भारत में सबसे बड़े नक्सली गुट भाकपा (माले विनोद मिश्र) ने पहले इंडियन पीपुल्स फ्रंट बना कर खुद को लोकतांत्रिक राजनीति में जोड़ने की शुरुआत की और बाद में संसदीय राजनीति का रास्ता अख्तियार कर लिया। वहां छत्तीसगढ़] झारखंड] आंध्र प्रदेश] उड़ीसा] पश्चिम बंगाल और बिहार के जंगलों में सशस्त्र विद्रोह को जारी रखने वाले दो बड़े नक्सली संगठनों पीपुल्स वार और माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर ने २००४ में परस्पर विलय करके एक बड़ी ताकत बना ली और अभी भी भारतीय राज्य व्यवस्था को सशस्त्र चुनौती देने की अपनी नीति जारी रखी हुई है।

नक्सली आंदोलन के परस्पर झगड़ों और गुटबाजी और सशस्त्र विद्रोह के रास्ते अपनी राह अलग बनाते हुए १९६९ में माकपा माले की केंद्रीय समिति के सदस्य शंकर गुहा नियोगी ने छत्तीसगढ़ के दल्ली राजहरा की लोहा खदानों के आदिवासी मजदूरों के बीच में अपने लिए नया रास्ता तलाशा। मार्क्सवादी नियोगी पर गांधी का भी प्रभाव खासा पड़ा और उन्होंने तय किया कि वह भारतीय लोकतंत्र के भीतर एक वैकल्पिक राजनीति तैयार करेंगे जिसमें मजदूरों किसानों आदिवासियों और नौजवानों की एकता पर बल होगा। नियोगी ने दल्ली के खदान मजदूरों की बस्ती में ही अपनी झोपड़ी बनाई और एक स्थानीय आदिवासी लड़की आशा से शादी करके खुद को उन मजदूरों का अपना बना लिया। भिलाई इस्पात संयंत्र के लिए लौह अयस्क आपूर्ति करने वाली दल्ली राजहरा की खदानों के मजदूरों को वह सुविधाएं और हक भी हासिल नहीं थे जो भारतीय संविधान और संसद द्वारा पारित श्रम कानूनों ने उन्हें दिए थे। इन्हीं सवालों पर नियोगी ने मजूदरों को संगठित किया। ट्रेड यूनियन बनाई। मजदूरों के विरोध को पहले गोलियों और लाठियों से कुचलने की कोशिश हुई। कई मजदूर शहीद हुए। लेकिन आंदोलन जारी रहा। समर्थन में आदिवासी किसान भी खड़े हो गए। आखिर कार भारतीय इस्पात प्राधिकरण (सेल) प्रबंधन को झुकना पड़ा। मजदूरों की पगार भी बढ़ी। वर्दी भत्ते और सुविधाएं भी मिलीं। बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित छत्तीसगढ़ के इस अति पिछड़े इलाके में मजदूरों ने अपने बढ़े वेतन से पैसे जुटाकर अपने शहीद साथियों की याद में शहीद अस्पताल का निर्माण किया। जिसमें दिल्ली और कोलकता तक से समर्पित डॉक्टरों ने जाकर काम करना शुरू कर दिया। नियोगी यहीं नहीं रुके। आदिवासियों और मजदूरों में लगी शराब की लत को खत्म करने के लिए छत्तीसगढ़ के इस इलाके में शराबबंदी आंदोलन चलाया गया। सैकड़ों  की तादाद में मजदूर यूनियन के कार्यकर्ता जिनमें ज्यादातर महिलाएं होती थीं शराब की भट्ठियों को तोड़ा गया और ठेके बंद कराए गए। आंदोलन इस कदर प्रभावी हुआ कि महिलाओं ने अपने शराबी पतियों को भी झाड़ू से पीटकर न सिर्फ उनकी शराब की लत छुड़वाई] बल्कि उनकी पगार भी अपने हाथों में लेना शुरु कर दिया। इसके साथ ही मजदूरों के बच्चों के शिक्षण के लिए यूनियन ने मजदूर बस्तियों में स्कूल भी खोले। खदान मजदूरों के लिए उनका साप्तहिक अखबार ^मितान^ शुरू हुआ। जीप पर लाउड स्पीकर लगाकर देश दुनिया की मजदूरों और आदिवासी किसानों से जुड़ी उनके लिए उपयोगी खबरों के टेप रिकार्ड गांव गांव बजाकर सामुदायिक रेडियो का प्रयोग शुरू हुआ। शहीद मजदूरों की याद में दल्ली में मनाए जाने वाले हर साल शहीद दिवस पर दिल्ली मुंबई कोलकाता] आदि शहरों से अनेक प्रोफेसरों] डॉक्टरों] पत्रकारों आदि को बुलाकर मजदूरों के बीच उनके संवाद कराकर उनके अधिकार और वैचारिक मुद्दों की जानकारी दी जाती थी। १८५७ के स्वाधीनता संग्राम में अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हुए स्थानीय जमींदार वीर नारायण सिंह को एक बड़े नायक के रूप में स्थापित किया गया और उनकी मूर्ति स्थापना के साथ ही हर साल उनकी जन्म और पुण्य तिथि पर वीर नारायण सिंह के जीवन और शहादत को याद किया जाता था। नियोगी के इस अनोखे आंदोलन जिसे खुद नियोगी ने la?kर्ष और निर्माण की राजनीति का नाम दिया] की ख्याति देश&विदेश फैल गई। नियोगी का प्रभाव दल्ली राजहरा से निकलकर दुर्ग] भिलाई] राजनांदगांव आदि जिलों में फैल गया। दूर से मजदूर और आदिवासी आकर उनसे अपने अपने इलाके में आकर संगठन बनाने और उनकी लड़ाई की अगुआई करने का अनुरोध करने लगे। लेकिन नियोगी की लोकप्रियता से न सिर्फ कांग्रेस भाजपा जैसे बड़े राजनीतिक दल और उनके नेता परेशान हुए] बल्कि दंडकारण्य में सक्रिय हथियारबंद नक्सलियों को भी नियोगी की वैकल्पिक राजनीति अपने सशस्त्र विद्रोह के नारे के लिए खतरा लगने लगी। नियोगी के खिलाफ शराब माफिया] पुलिस] ठेकेदारों और स्थानीय नेताओं ने गोलबंदी की। उन्हें जान से मारने की धमकियों से लेकर पैसे लेकर बिकने तक के प्रलोभन दिए गए। लेकिन शंकर गुहा नियोगी न झुके] न डरे और न बिके। लोकतांत्रिक राजनीति के प्रयोग के तहत नियोगी ने अपने सहयोगी झनकलाल ठाकुर को विधायक का चुनाव लड़वाया और जितवाया। अपने इस प्रयोग को देशव्यापी विस्तार देने के लिए नियोगी दिल्ली और अन्य शहरों में भी जाने लगे। स्वामी अग्निवेश] कैलाश सत्यार्थी उनके खास मित्र थे। नियोगी ने झारखंड के आदिवासी नेता शिबू सोरेन] धनबाद के वामपंथी मजदूर नेता एके राय] किसान नेता शरद जोशी] नंजदुम्मा स्वामी] विपिन देसाई] महेंद्र  सिंह टिकैत] नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर] आदि से भी संपर्क साधा। राजनीतिक दलों में भी समाजवादी जनवादी रुझान वाले नेताओं से उनकी दोस्ती थी। छत्तीसगढ़ राज्य की मांग को बल देने के लिए ही उन्होंने छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चे का गठन किया। नियोगी अब राष्ट्रीय स्तर पर आना चाहते थे। लेकिन इसी बीच वह भिलाई के निजी उद्योगों के मजदूरों के शोषण के खिलाफ la?kर्ष में कूद पड़े। ये la?kर्ष कड़े प्रतिरोध का था और लंबा खिंच गया। नियोगी को दल्ली छोड़कर भिलाई आकर रहना पड़ा। नियोगी की जान के दुश्मन बढ़ रहे थे। लेकिन उन्होंने न कभी सरकारी सुरक्षा ली और न ही कभी निजी सुरक्षाकर्मी रखे। वह बेफिक्र थे और इसी बेफिक्री में एक रात तड़के चार बजे भिलाई में सोते हुए उनके द्घर में उन्हें गोली मार दी गई। इस हत्या की साजिश के पीछे स्थानीय उद्योगपतियों का हाथ था और उन्हें तत्कालीन सरकार के ताकतवर नेता की शह थी। नियोगी की मौत के बाद उनका आंदोलन और संगठन भी बिखर गया और वैकल्पिक राजनीति का यह मॉडल एक बड़ा सपना बनने से पहले ही टूट गया।

१९९० से २०१२ तक देश की राजनीति सिर्फ चुनावी गठजोड़ और गठबंधन की सत्ता राजनीति में फंसी रही। जब अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अपना आंदोलन शुरू किया तब तक देश में संचार क्रांति फलीभूत हो चुकी थी। इसलिए यह आंदोलन देखते&देखते ही देश भर में एक लहर बन गया। जन लोकपाल के गठन के मुद्दे पर शुरू हुए इस आंदोलन को इसलिए भी तेज गति मिली कि यूपीए की तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ लगातार भ्रष्टाचार के नित नए आरोप लग रहे थे। सरकार भी अपने अंतविर्रोधों के कारण कामकाज में लाचार दिख रही थी। पिछले दो दशक से देश में कोई बड़ा आंदोलन न होने से १९९० के बाद जन्मी पीढ़ी की युवा आकांक्षाएं हिलोरे ले रहीं थी। कांग्रेस नेतृत्व के नौसिखिएपन] आंदोलन के प्रति सरकार के अड़ियल रवैए] अपने सियासी अस्तित्व के लिए मौका तलाश रहे आरएसएस और भाजपा की मदद और मीडिया के एकतरफा समर्थन ने रातोंरात आंदोलन को तूफान में बदल दिया। इसी आंदोलन के गर्भ से आम आदमी पार्टी का जन्म हुआ। जो आज तूफानी बहुमत के साथ दिल्ली की सत्ता पर काबिज है। लेकिन आंदोलन के सपनों का क्या हुआ यह एक बड़ा सवाल है] जिसका जवाब अरविंद केजरीवाल से लेकर अन्ना हजारे और उस आंदोलन के हर नेता को देना है।

अन्ना के सपनों का जन लोकपाल तो छोड़िए देश की संसद ने जिस लोकपाल कानून को २०१३ में पारित किया था और स्वयं अन्ना हजारे ने भी जिसे मान लिया था] वो अभी तक अस्तित्व में नहीं आ पाया। जबकि अन्ना आंदोलन के सेनापति अरविंद केजरीवाल दिल्ली के सेनापति हैं। दूसरी सेनानी किरण बेदी बरास्ता भाजपा पुड्डूचेरी की उपराज्यपाल की महामहिम कुर्सी पर काबिज हैं। अपनी ही सरकार के खिलाफ किसी सेवारत सेनाध्यक्ष के सुप्रीम कोर्ट में जाने का रिकार्ड बनाने के बाद सेना से रिटायर होकर अन्ना के सिपाही बने जनरल (रि) वी के सिंह मोदी सरकार में विदेश राज्यमंत्री हैं। आंदोलन के बाकी रण बांकुरों पर आम आदमी पार्टी के विश्लेषण में अपने आप होगी। सवाल फिर वही है कि इसके बावजूद माहौल में ठंडापन क्यों है। क्यों लोगों के जत्थे रामलीला मैदान नहीं पहुंच रहे हैं। क्योंकि देश के दूसरे शहरों में अन्ना के समर्थन में अनशन और धरने नहीं हो रहे हैं। जुलूस नहीं निकल रहे हैं। इंडिया गेट पर मोमबत्तियां नहीं जलाई जा रही हैं। जवाब एक ही है कि अन्ना हजारे के आंदोलन ने जिन्हें रातोंरात जनता का नायक बनाया था वो आज उसी राजनीति के चालाक खिलाड़ी बन गए हैं] जिसके खिलाफ बोलते&बोलते उनके गले बैठ गए थे और खांसी ने स्थाई जगह बना ली थी।

आम आदमी पार्टी के जन्म से पहले ही टीम अन्ना के पहली पांत के सिपहसालारों अरविंद केजरीवाल] प्रशांत भूषण] मनीष सिसोदिया] संजय सिंह] कुमार विश्वास] शाजिया इल्मी और किरण बेदी की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं जोर मारने लगी थीं। आंदोलन की आशा से अधिक सफलता से ये सब रातोंरात देश के सियासी आसमान के जगमगाते सितारे बन गए थे] जिनके आगे पुराने राजनेताओं की चमक फीकी थी। मीडया और जनता के बीच मिले अपार जनसमर्थन ने अन्ना आंदोलन से देश में विचारहीन और आचारहीन होती राजनीति के खिलाफ एक वैकल्पिक राजनीति की उम्मीद जगा दी थी। हालांकि अन्ना हजारे खुद किसी भी नए राजनीतिक दल के गठन के पक्ष में नहीं थे] लेकिन उनके पंच प्यारे अरविंद केजरीवाल] प्रशांत भूषण] मनीष सिसोदिया] संजय सिंह और कुमार विश्वास राजनीतिक पार्टी बनाने का निश्चय कर चुके थे। इसे लेकर अन्ना के गांव रालेगण सिद्धी में आंदोलन के शीर्ष नेताओं में खासी बहस हुई और न अण्णा माने न टीम अरविंद झुकी। यहीं से अन्ना और अरविंद के रास्ते अलग अलग हो गए। टीम अरविंद ने दिल्ली आकर राजनीतिक पार्टी बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी और दिल्ली की बिजली पानी के दामों और अन्य बुनियादी सुविधाओं को लेकर तत्कालीन कांग्रेस सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरकर आंदोलन शुरू कर दिए। अरविंद केजरीवाल ने आमरण&अनशन से लेकर बिजली के खंभों तक पर चढ़कर तार काटने] मीटर उखाड़ने जैसे अपने रोमांचक कामों से जल्दी ही खासी लोकप्रियता हासिल कर ली और इसके साथ ही देश की राजनीति में आम आदमी पार्टी यानी आप का जन्म हुआ। चुनाव आयोग ने इस नवजात पार्टी को चुनाव निशान झाड़ू दिया जिसका स्थापित राजनीतिक दलों ने मजाक उड़ाया लेकिन राजनीति के कुरुक्षेत्र के इन नवजात योद्धाओं ने उसका जवाब यह कहकर दिया कि यही झाड़ू देश की राजनीति की गंदगी को साफ करके नए भारत का निर्माण करेगी। 

फिर आया नवंबर २०१३ का दिल्ली विधानसभा चुनाव। सत्ता और तीन दशक के राजमद में डूबी कांग्रेस और अपने संगठन la?k शक्ति और नरेंद्र मोदी की गुजराती चमक को अपनी जीत की गारंटी मान चुकी भाजपा ने राजनीति के इन किशोरों की जरा भी परवाह नहीं की। लेकिन अन्ना आंदोलन के तेज से आम आदमी पार्टी एक एसा सियासी चुंबक बन गई थी कि हर वर्ग हर क्षेत्र और हर उम्र के लोग इसकी ओर खिंचे चले आ रहे थे। यही दौर था जब सामाजिक कार्यकर्ता और मशहूर चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव] टीवी पत्रकारिता में शिखर पर बैठे आशुतोष] जय प्रकाश आंदोलन के दिनों से ही बदलाव की राजनीति के जुझारु चेहरा रहे शिक्षाविद आनंद कुमार जैसे न जाने कितने नाम और चेहरे आम आदमी पार्टी से आ जुड़े। तमाम सामाजिक संगठनों और जन आंदोलनों के वो कार्यकर्ता जो स्थापित राजनीतिक दलों के तौर तरीकों और भ्रष्ट आचरण के खिलाफ लगातार la?kर्षरत थे] इस उम्मीद से आप से जुड़ गए कि शायद व्यवस्था परिवर्तन के लिए उन्हें जिस राजनीतिक मंच की तलाश थी] वह यही है। अपने अपने दलों में किन्हीं भी कारणों से सही जगह न पा सकने वाले भाजपा] कांग्रेस] जद (यू)] बसपा] सपा आदि दलों के भी अनेक नेता कार्यकर्ता आप में आ जुटे। 

वर्ष २०१३ के दिल्ली विधानसभा के चुनाव में तमाम राजनीतिक विश्लेषकों और चुनाव पंडितों ने आप को सिर्फ कांग्रेस के वोट कटवा पार्टी के रूप में ही देखा और भाजपा की जीत की भविष्यवाणियां की गईं] लेकिन नतीजों ने सबको चौंका दिया। विधानसभा की ७० में से २८ सीटें जीतकर आप न सिर्फ भाजपा के बाद दूसरे नंबर की पार्टी बन गई] बल्कि उसने भाजपा को बहुमत के ३६ के आंकड़े से पहले ३३ सीटों पर रोक दिया और कांग्रेस को महज छह सीटों पर पहुंचाकर बहुत पीछे छोड़ दिया। त्रिशंकु विधानसभा में थोड़ी बहुत न नुकर के बाद कांग्रेस से बाहरी समर्थन लेकर आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में सरकार बनाई और अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री बने। और यही से वह आम आदमी पार्टी के रुपांतरण का बीज पड़ा और वैकल्पिक राजनीति देने के लिए अस्तित्व में आया यह दल भारतीय राजनीति के f?kls पिटे रास्ते पर चल पड़ा।

सत्ता की राजनीति और la?kर्ष के रास्ते का फर्क तब पता चलता है जब व्यक्ति सत्ता के खेल का खिलाड़ी खुद बनता है। la?kर्ष के दौर में आदर्शवादिता अगर शक्ति है तो सत्ता में वह अड़ंगा बन जाती है। बावजूद इसके कि सत्ता की सियासत में सारे समझौते और सौदे सिद्धांत और आदर्श के नाम पर ही किए जाते हैं] लेकिन सिद्धांत और आदर्श से उनका दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं होता है। आजादी के बाद कांग्रेस के भीतर चले नेतृत्व la?kर्ष में जिद अगर अपने विचारों के मुताबिक नीतियां और कार्यक्रम बनाने की थी] तो १९७७ में जनता पार्टी में दोहरी सदस्यता के नाम पर शुरू हुए नेतृत्व la?kर्ष की बुनियाद में नीतियों से ज्यादा प्रधानमंत्री पद पाने की महत्वाकांक्षा थी। जबकि १९८९&९० में जनता दल में विश्वनाथ प्रताप सिंह बनाम चंद्रशेखर की लड़ाई विशुद्ध रूप से कुर्सी की लड़ाई थी] जिसकी आग में द्घी डालने वाली मंडल और कमंडल की राजनीति भी भविष्य में सत्ता पर काबिज होने वाले la?kर्ष का नया सामाजिक रूप थी जो जातीय और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के रूप में सामने आया।

कांग्रेस के बाहरी समर्थन से मात्र कुछ महीने ही सही सत्ता का स्वाद चखने के वाले आप नेतृत्व में वह सारी प्रवृतियां पनपने लगीं जो येन&केन&प्रकारेण सत्ता की राजनीति का अनिवार्य अंग होती हैं। हालांकि तब तक नेताओं की छवि पर अन्ना आंदोलन की प्रखरता और कार्यकर्ताओं में वैकल्पिक राजनीति का जुनून इस कदर हावी था कि पार्टी नेतृत्व में पनप रही सत्ता प्रवृतियों की तरफ किसी ने ध्यान नहीं दिया या यूं कहें कि जिन्हें ध्यान देना चाहिए था] वही इस सत्ता दोष के शिकार होते जा रहे थे और सत्ता चक्र से बाहर एसा कोई व्यक्ति या संस्थागत केंद्र नहीं था जो इसे नियंत्रित करता। व्यक्ति के रूप में महात्मा गांधी जिंदा रहते तो शायद कांग्रेस या उसके विसर्जन के बाद बनने वाले किसी भी दल के लिए यह भूमिका निभाते और अगर जेपी की सेहत साथ देती तो शायद जनता पार्टी के लिए वह यही करते। संस्था के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक la?k यही भूमिका भारतीय जनता पार्टी के रूप में निभाता है। हालांकि दोष उसमें भी हैं] लेकिन उन पर चर्चा फिर कभी वरना विषयांतर हो जाएगा।           जारी+ + +

 

 
         
 
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