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vad 45 28-04-2018
 
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प्रस्थान 4
 
निर्णायक होती है आंदोलनों की भूमिका

  • आदित्य निगम

समाजशास्त्री] सीएसडएस से संबंद्ध

इंटरनेट की मौजूदगी ने अलग&अलग विचारधाराओं के लोगों के बीच संवाद की गुंजाइशें खोली हैं। अलग& अलग पार्टियों या विचारों के समर्थक आज आपस में संवादरत हैं। दूसरे] वैश्वीकरण ने नौजवानों के सामने रूढ़िवादी और दकियानूसी विचारों और जीवन शैलियों को छोड़कर आगे देखने के रास्ते खोल दिए हैं। इन नौजवानों में संद्घवादी विचारतंत्र के बारे में कोई मुगालता नहीं है। उनके सामने सवाल सीधा हैः वे क्या खाएंगे] क्या पीएंगे] कैसे मुहब्बत करेंगे] किससे मुहब्बत करेंगे] समलैंगिक प्यार करेंगे कि नहीं] लड़़कियां होटलों में जाएंगी या नहीं & ये तमाम बातें वे खुद तय करेंगे किसी और को यह हक नहीं कि वह देश संस्कृति के नाम पर उनकी जिंदगियां नियंत्रित करे। लिहाजा] आज कई आंदोलन स्वतःस्फूर्त ढंग से उभर कर सामने आते हैं जिनकी मंशा राजनीति करने की नहीं है & वे अपनी जिंदगियां अपनी शर्तों पर जीने की ख्वाहिश से पैदा होने वाले आंदोलन हैं। मौजूदा राजनीतिक दल इस पीढ़ी से कोसों दूर हैं

 

आजादी से अब तक का दौर तो बहुत लम्बा है और इसके बारे में मुख्तसर में कुछ कह पाना मुश्किल है। राजनीति के नजरिए से मोटे तौर पर तीन बातों की ओर ध्यान दिलाना चाहूंगा। पहली यह कि जिसे हम ^नेहरूवादी राष्ट्र^ कह सकते हैं] वह जिस कन्सेंसस पर खड़ा था] वह १९९० के दशक से लगातार टूटता चला गया है। राजनीतिक तौर पर इस कन्सेंसस का आधार ^सेकुलर राष्ट्रवाद^ था जिसमें कई तत्व शामिल थे मगर जिसकी मूल प्रस्थापना मुल्क की गंगा&जमुनी सामाजिक&सांस्कूतिक बनावट को भारतीयता या हिंदुस्तानियत का आधार मानती थी। सेकुलर राष्ट्रवाद आज के हिंदुस्तान को एक ऐसे समंदर के रूप में देखता था जिमसें कई नदियां आ कर शामिल हो चुकी हैं और जिस पर किसी एक समुदाय का एकाधिकार नहीं है। इस सेकुलर राष्ट्रवाद का ^जन^ दरअसल एक शामिलती तसव्वुर के आधार पर वजूद में आया ^जन^ था जिस पर] यह माना जाता था] भारतीयता के अलावा किसी और पहचान के निशान बाकी नहीं रहने चाहिए और वक्त के साथ मिटा दिए जाने चाहिए। अंततः सब एक राष्ट्र के नागरिक होंगे] फिरकों में बंटे लोग नहीं। इस विचार के इरादे कितने भी नेक रहे हों मगर इसके साथ एक बहुत बड़ी दिक्कत भी थी जो समय के साथ लगातार ज्यादा समस्यापूर्ण बन के उभरने लगी। बेनिशान नागरिक की उसकी तलाश ने जाति जैसे पुराने सामाजिक उत्पीड़नों के खिलाफ उठने वाले आंदोलनों को सिरे से अवैध बना दिया। जो बात खालिस आधुनिक शब्दावली में व्यक्त न हो सके उसे गोया व्यक्त होने का अधिकार ही नहीं था। उसकी ^जन^ की कल्पना में राष्ट्रीय जन या वर्ग जैसी अवधारणा की जगह तो थी मगर पहचान के सवालों की नहीं। इस सेकुलर राष्ट्रवाद की एक परेशानी और यह भी थी कि यह अपने शुरुआती दौर में एक अपेक्षाकूत छोटे अंग्रेजीदां तबके का विचार बन कर आहिस्ता&आहिस्ता स्कूली शिक्षा के जरिए आम लोगों के बीच पहुंचा जरूर मगर] कुल मिलाकर सांस्थानिक तौर पर उसी तबके के आधिपत्य का निशान बन गया। एक तरफ दलित और पिछड़ी जातियों के आंदोलनों के उभार ने उसे सीधे&सीधे चुनौती देनी शुरू की तो दूसरी तरफ हिंदुत्व के झंडे तले लामबंद होते कस्बाई मध्य वर्ग ने। इन्हीं दोनों ताकतों के चलते आखिरकार १९९० के दशक में इस सेकुलर राष्ट्रवाद की पराजय हुई। इनमें से दूसरी ताकत&यानी हिंदुत्व & के हिंदू राष्ट्रवाद के तसव्वुर में भी ^जन^ एक समरस चीज ही थी & बस फर्क यह है कि वह सांस्कूतिक रूप से हिंदू होना चाहिए & हिंदू ही नहीं उत्तर भारतीय सवर्ण हिंदू के अक्स में ढला होना चाहिए। १९९२ में बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने को लेकर चले आंदोलन के दौर में यह हिंदू राष्ट्रवाद उफान पर था और १९९८ से २००४ तक राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के शासनकाल में सत्ता पर भी काबिज था। २००४&१४ तक सत्ता के बाहर रहने के बाद अब वह फिर एक बार सत्ता में है। राजग शासन के इन दोनों दौरों में] खास कर इस बार] इस विचारतंत्र का सबसे खूंखार और बेलगाम रूप देखने में आया है। शायद पहले कभी किसी ने इस देश के ८० फीसदी लोगों को ही देशद्रोही करार देने की जुर्रत नहीं की। जाहिर है la?kokn का यह चरम और नंगा चेहरा एक ही ^जन^ को पहचानता है & और वह है आर्यावर्त का सवर्ण हिंदू। जो भी उस अक्स में ढलने को तैयार हैं] वे उस जात का हिस्सा हो सकते हैं & बाकी सब राष्ट्रविरोधी हैं। 

उपरोक्त बातों से यह साफ हो जाना चाहिए कि मेरे हिसाब से भारतीय जनतंत्र का ^जन^ कौन हो सकता है। हिंदुस्तान जैसा कोई भी मुल्क एक अथाह सागर है जिसमें तरह&तरह के जीव रहते हैं। मगर हर समंदर कई नदियों से मिलकर बनता है] कई जगहों का पानी उसमें शामिल होता है। उसका पानी कभी गंगोत्री या यमुनोत्री के पानी की तरह शुद्ध नहीं होता & उस स्रोत में कोई जिंदगी नहीं पलती] क्योंकि जिंदगी के फलने&फूलने के लिए पानी में जो कुछ होना चाहिए वह सब उसमें नहीं होता। जो लोग हिंदुस्तान को ३००० साल पहले का हिंदुस्तान बनाना चाहते हैं] जाहिर है कुछ ऐसी ही मंशा रखते हैं। उसी जड़ समाज को बौद्ध] जैन या अन्य श्रमण मतों ने चुनौती दी थी & और उसके बाद से जो व्यवस्था वजूद में आई थी जिसे हम वर्णाश्रम धर्म के नाम से जानते हैं] वह दुनिया के सबसे f?kukSus उत्पीड़न की व्यवस्था थी। इस व्यवस्था से आंशिक निजात पाकर ही आज का हिंदुस्तान बना है। भारतीय जनतंत्र का जन उन तमाम लोगों से मिलकर ही बनता है जो आज उसमें रहते हैं & चाहे वे किसी भी मत] धर्म] मजहब] जाति के हों। 

हमारे जनतंत्र में मुसलमान का सवाल ^राष्ट्र^ के लिए हमेशा ही समस्यापूर्ण सवाल रहा है। ऐसा इसलिए नहीं कि मुसलमान ही इस समस्या की जड़ हैं] बल्कि इसलिए कि राष्ट्र और राष्ट्रवाद के आदर्श ही एकरूपता की बुनियाद पर रखे होते हैं। राष्ट्र और राष्ट्रवाद तमाम दुनिया में ^अल्पसंख्यक^ नाम की शै पैदा करते हैं] जिसे वे किसी भी सूरत पर राष्ट्र में या तो विलीन कर लेना चाहते हैं या फिर उन्हें ^एथनिक सफाई^ के जरिए समाज से बाहर करने को तत्पर रहते हैं। जो लोग समझते हैं कि राष्ट्रवाद कोई देसी खयाल है] वे दरअसल जानते नहीं कि ^राष्ट्र^ की अवधारणा १९वीं सदी के यूरोप की ईजाद है जिसे वे यहां नकल करना चाहते हैं। मार्के की बात यह है कि हर जगह उसका यही इतिहास रहा है। इसी कारण हमारे यहां रवींद्रनाथ टैगोर और महात्मा गांधी इस विचार के बड़े विरोधी रहे हैं। रही बात आदिवासियों की] तो यह साफ होना चाहिए कि आज की जो आधुनिक अर्थव्यवस्था है वह बुनियादी तौर पर ^सामाजिक प्रगति^ के एक ऐसे तसव्वुर की बिना पर खड़ी है जो आदिवासी समाजों के लोप को ही प्रगति का पर्याय मानती है। उस पर ज्यादा से ज्यादा मुनाफे की तलाश में पूंजीवाद की जमीन] जंगल] पानी] हवा सब निगल जाने की हवस भी सुनिश्चित करती हैं कि ^प्रगति^ होती रहेगी। यह मान लिया जाता है कि पूंजी ही इस प्रगति का वाहक हो सकती है। 

यह बहुत बड़ा सवाल है कि आंदोलनों ने सामाजिक और राजनीतिक बदलावों में किस तरह भूमिका निभाई  है। इसे कई तरह से समझा जा सकता है & खास कर इसलिए भी कि कोई एक किस्म का आंदोलन नहीं होता। मसलन नारीवादी आंदोलन हमेशा जलसे जुलूस करके लड़ाई नहीं करता] बल्कि nh?kZdkfyd स्तर पर सोच बदलने पर ज्यादा जोर देता है। मजदूर आंदोलनों और ट्रेड यूनियनों की लड़ाई कहीं ज्यादा खूंखार रूप ले लेती है क्योंकि उसे सीधे&सीधे पूंजी और उसकी चाकरी में खड़ी पुलिस आदि से टकराना पड़ता है। सामाजिक आंदोलनों के असर भी] कभी बांध और विस्थापन के खिलाफ] कभी परमाणु संयंत्रों के खिलाफ] हमेशा आशाजनक नहीं होते क्योंकि वहां भी राज्य की मशीनरी से टकराने के साथ&साथ उन पर अक्सर राष्ट्रविरोधी होने का तमगा भी लगा दिया जाता है और जबरदस्त दमन का सामना करना पड़ता है। दूसरी तरफ पिछले दौर के दलित आंदोलन को देखें  कि उसका जोर कानूनी व चुनावी प्रक्रिया के जरिए हस्तक्षेप करने पर रहा है। सारी दिक्कतों के बावजूद यह कहा जा सकता है कि आंदोलनों की भूमिका अक्सर निर्णायक होती है। देखने में बेशक यह लगता रहे कि सत्ता पर कोई फर्क नहीं पड़ता मगर असलियत यह है कि  तमाम आंदोलनों ने हमारी राजनीति और समाज पर गहरी छाप छोड़ी है और अनगिनत बदलावों के लिए रास्ता बनाया है। कई मसलों पर nh?kZdkfyd स्तर पर सोच बदलने से लेकर फौरी स्तर पर कानून बनवाने तक इन सब आंदोलनों ने एक&से&एक अहम भूमिका निभाई है। 

दुनिया भर के इतिहास में फासिज्म का उदय पारम्परिक राजनीति के दिवालियापन के दौर में ही हुआ है। वैसे हमें याद रखना चाहिए कि फासिज्म का भारतीय संस्करण महज यूरोपीय फासीवाद की पुनरावृत्ति नहीं है। हमारे यहां के हालत बिल्कुल अलग हैं] फिर भी जिस हद तक वह फासीवाद है] इनमें कुछ आपसी समानताएं भी हैं। एक समानता उसके संदर्भ में देखी जा सकती है जो पारंपरिक राजनीति और पार्टियों के दिवालियापन से पैदा राजनीतिक व्यवस्था के संकट से जुड़ी है। यह संकट और दिवालियापन अक्सर प्रतिनिधित्व के संकट से जुड़ा होता है जब यह स्थिति पैदा हो जाती है जहां आम मतदाताओं का विश्वास पारंपरिक पार्टियों से उठ चुका होता है। विकल्पों के अभाव में लोग फिर भी उन पार्टियों को वोट बेशक डालते रहें] मगर यह जरूर मानने लगते हैं कि वे सब चोर हैं और बड़े या अमीर लोगों की चाकरी भर करते हैं। ऐसा ही कुछ हमारे यहां पिछले दशकों से रहा है और नवउदारवाद के दौर में दाएं से बाएं तक सब पार्टियां पूंजी की खिदमत में बिछी पड़ी दिखाई दी हैं। दिलचस्प बात यह है कि खुद भाजपा और नरेंद्र मोदी देश के सबसे अमीर और कॉरपोरेट&परस्त ताकत होने के बावजूद इस जगह को भर पाए। इसकी वजह यह थी कि २०१३ से मोदी को पूरे सरमायेदार हलके से एक ^मामूली चाय बेचने^ वाले के रूप में बड़ी कामयाबी के साथ पेश किया जा सका। जो माहौल भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान बना था] उससे राजनीति में जो जगह बनी उसे बड़ी चालाकी से] कॉरपोरेट मीडिया की मदद से मोदी ने अपने कब्जे में कर लिया। उनके सत्ता में आने के बाद से तो लगातार फासीवाद\ la?kokn खुला तांडव शुरू हो ही गया है और इसने अलग&अलग संस्थाओं को पैरों तले रौंदना शुरू कर दिया है। 

आज के दौर में आंदोलनों का चेहरा काफी बदला है & और उसकी भी एक वजह पार्टियों के दिवालियापन और पार्टी व्यवस्था के संकट से जुड़ी है। वैसे तो १९८० से ही सामाजिक आंदोलनों के उभार के समय से ही कई सिद्धांतकारों ने राजनीतिक व्यवस्था के संकट के साथ&साथ ^गैर पार्टी राजनीति^ की बात करनी शुरू कर दी थी और उस तरफ ध्यान दिलाया था कि अब बहार से उठ रहे इन आंदोलनों के जरिए कई नए सवाल उठने लगे हैं जिनमें पार्टियों की दिलचस्पी नहीं है। एक अर्थ खुद राजनीति की परिभाषा ही बदल रही थी। आज यह प्रक्रिया बिलकुल नया रूप ले चुकी है। आज] पार्टियों का संकट पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा गंभीर है और वैश्वीकरण ने कई संभावनाएं भी पैदा कर दी हैं। मसलन इंटरनेट की मौजूदगी ने अलग&अलग विचारधाराओं के लोगों के बीच संवाद की गुंजाइशें खोली हैं। अलग&अलग पार्टियों या विचारों के समर्थक आज आपस में संवादरत हैं। दूसरे] वैश्वीकरण ने नौजवानों के सामने रूढ़िवादी और दकियानूसी विचारों और जीवन शैलियों को छोड़ कर आगे देखने के रास्ते खोल दिए हैं। इन नौजवानों में संद्घवादी विचारतंत्र के बारे में कोई मुगालता नहीं है। उनके सामने सवाल सीधा हैः वे क्या खाएंगे] क्या पीएंगे] कैसे मुहब्बत करेंगे] किससे मुहब्बत करेंगे] समलैंगिक प्यार करेंगे कि नहीं] लड़़कियां होटलों में जाएंगी या नहीं & ये तमाम बातें वे खुद तय करेंगे किसी और को यह हक नहीं कि वह देश संस्कूति के नाम पर उनकी जिंदगियां नियंत्रित करे। लिहाजा] आज कई आंदोलन स्वतःस्फूर्त ढंग से उभर कर सामने आते हैं जिनकी मंशा राजनीति करने की नहीं है & वे अपनी जिंदगियां अपनी शर्तों पर जीने की ख्वाहिश से पैदा होने वाले आंदोलन हैं। मौजूदा राजनीतिक दल इस पीढ़ी से कोसों दूर हैं। इसके अलावा एक बात और कह देनी चाहिए। २१वीं सदी के जिस मुहाने पर हम हैं वहां आज ^कॉमन्स^ यानि सामूहिक संपत्ति की लड़ाई केंद्रीय बन चुकी है। पानी] हवा] शामिलती जमीन] खनिज] तेल आदि के निजीकरण के खिलाफ आज लड़ाई तेज हो रही है। हमारे यहां सियासत के दायरे में इन सवालों को लाने का श्रेय आम आदमी पार्टी को जाता है जिसने औपचारिक राजनीति के दायरे के बाहर से आते हुए इन्हें अपने आंदोलन के केंद्र में रखा था। अगले कई दशकों तक यही सवाल हमारी राजनीति के मुख्य सवाल बने रहेंगे। राष्ट्रवाद के बारे में मैंने ऊपर चंद बातें कही हैं। राष्ट्रवाद पर दावा हमेशा बहुसंख्यक समुदाय के प्रभावशाली हिस्सों का ही रहा है। बाकी सब हमेशा ही राष्ट्र&विरोधी करार दिए जाने के कगार पर रहते हैं। हमारे देश में मुसलमानों और ईसाइयों के आलावा उत्तर पूर्व और कश्मीर के बाशिंदों पर तो यह तोहमत लगी ही है] तमिलनाडु के बाशिंदों] सिखों] कम्युनिस्टों] सेकुलरिस्टों] बांधों और विकास प्रकल्पों से होने वाले विस्थापन के खिलाफ चल रहे आंदोलनों] आदिवासियों] दलितों वगैरह & सब को किसी&न&किसी मुकाम पर राष्ट्रविरोधी कहा गया है। मोदी और la?kokn के सत्तारोहण के बाद जो नई बात है वह यह कि अब सबको ^राजद्रोह^ के औपनिवेशिककाल के पुराने  कानून के जरिए दबाया जा रहा है। इनके हिसाब से la?kokn विरोध राजद्रोह का पर्याय है।


 
         
 
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