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द्वंद्व के दोराहे पर खड़ा वक्त

  • रामशरण जोशी

वरिष्ठ पत्रकार

व्यक्ति रहे या राजनीतिक दल] दोनों की स्वप्न] आकांक्षाएं &महत्वाकांक्षाएं और संकल्प] इन सभी का आधार शून्य नहीं हैं बल्कि वे ठोस भौतिक परिस्थितियां हैं जो इन दोनों सामाजिक ईकाइयों को प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से प्रभावित करती हैं और इनका एक निश्चित आकार भी गढ़ती हैं। इस संदर्भ में एक बात और है जिसे यहां रेखांकित करना ठीक रहेगा। सामान्यतः व्यक्ति का स्वप्न स्वयं के संपर्क दायरे से सम्पृक्त होता है लेकिन जब एक नागरिक राष्ट्र का रूप ले लेता है क्योंकि कई प्रकार की सामाजिक] सांस्कूतिक] राजनीतिक] आर्थिक प्रक्रियाएं इस वृहत वृत में सक्रिय हो उठती हैं] नए संदर्भ में जन्म लेते हैं और नागरिक के समक्ष एक नया प्ररिप्रेक्ष्य होता है। नागरिक सोचने लगता है कि जिस राष्ट्र राज्य में उसने जन्म लिया है] जिसने उसे संवैधानिक अधिकार प्रदान किए हैं] जिसके अस्तित्व संरचना में उसने कम अधिक भूमिका निभाई है] वह उसकी आकांक्षाओं& महत्वाकांक्षाओं का किस सीमा तक प्रतिनिधित्व करता है या फिर राष्ट्र&राज्य के क्रिया&कलापों में उसका अस्तित्व किस ढंग से प्रतिबिंबित होता है। राजनीतिक दल या दलों का राष्ट्र राज्य के संबंध में अपने& अपने राजनीतिक&आर्थिक स्वप्न होते हैं यानी ये संस्थाएं अपनी विचारधाराओं के परिप्रेक्ष्य में राज्य के आधारभूत अंगों का संचालन करने की महत्त्वाकांक्षाएं रखती हैं। इस प्रकार सत्ता का विमर्श शुरू हो जाता है। राज&सत्ता की गति नागरिकों और संस्थाओं को प्रभावित करती रहती है। इस दृष्टि से १५ अगस्त १९४७ को स्वतंत्र हुआ भारतीय राष्ट्र राज्य को भी अपवाद नहीं कहा जा सकता है। ये गतिकी इसे भी संचालित करती है।

इक्कीसवीं सदी के फरवरी २०१५ के कालखंड में खड़े होकर जब बीसवीं सदी के १५ अगस्त १९४७ के कालखंड की पुनर्वलोकन किया जाए तो स्वाभाविक है कि इन कालखंडों के मध्य कई प्रकार की समानताएं&असमानताएं] विकूतियां] सफलताएं] असफलताएं पसरी हुई दिखाई देंगी। कई क्षेत्रों में दोनों कालखंड नितांत परस्पर अजनबी मिलेंगे। १९४७ के स्वतंत्र भारत के नागरिक का स्वप्न और २०१५ के नागरिक का स्वप्न] दोनों में कतिपय आधारभूत संदर्शताएं तो हो सकती हैं लेकिन राष्ट्र से उनकी अपेक्षाओं में भिन्नता न हो] ये संभव नहीं है। यही बात तब के राजनीतिक दलों और आज के राजनीतिक दलों पर भी लागू होती है। यद्यपि इन छह& सात दशकों में निरंतरता एवं परिवर्तन भी समानांतर चलते रहे हैं] नेहरूकाल से नरेंद्र मोदी काल तक कई सरकारें आईं और गईं] १८८५ में जन्मी कांग्रेस की वर्चस्ववादी राज&सत्ता का उत्थान&पतन होता रहा है और भारतीय जनता पार्टी जैसी चरम दक्षिणपंथी दल सत्तारूढ़ हुई] गठबंधन राजनीति और क्षेत्रीय दलों की अस्मिता उभार का दौर भी चला। राजनीतिक &आर्थिकी में भी क्रांतिकारी परिवर्तन हुए] मिश्रित अर्थव्यवस्था से शुरू हुई यात्रा आज वैश्विक पूंजीवाद से जुड़ गई है। भारत में आज 'स्मार्ट सिटी' और 'मेक इन इंडिया' की गूंजें सुनाई दे रही हैं। जहां बीसवीं सदी के मध्य में भारतीय राष्ट्र राज्य की यात्रा कृषि युगीन और मंथर गति वाली तकनीक पर सवार होकर शुरू की थी] आज यह राष्ट्र मंगल ग्रह और चांद की सतहों पर अपनी थाप भी दे रहा है। आधुनिक तकनीक के क्रांतिकारी विस्फोट ने भारत को कहीं से कहीं पहुंचा दिया है। अभी भारत विश्व की द्वितीय महान आर्थिक शक्ति के विराट स्वप्न को अपने साथ लेकर चल रहा है। तब इस पुनरावलोकन यात्रा में ये कहना अस्वाभाविक नहीं होगा कि हर कालखण्ड के अपने&अपने स्वप्न होते हैं। उनमें नए&नए रंग भरते रहते हैं। दोनों की तुलना करना अटपटा रहेगा। पर बेशक इस बात को भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता कि १९४७ के नागरिकों का जो स्वप्न था उसे नव जन्मे राष्ट्र में कितनी ईमानदारी के साथ पूरा किया है। 

निःसंदेह कांग्रेस] भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और इसके शिखर नेता जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में आरंभ हुई स्वाधीन भारत की यात्रा के समय इस राष्ट्र राज्य का चरित्र मूलतः 'कल्याणकारी राज्य' था] नेहरूवादी समाजवाद की धारा वह रही थी] स्वतंत्रता आंदोलन के मूल्यों के विरासत की ऊष्मा महसूस हो रही थी। इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि जमींदारी उन्मूलन] भू&सुधार] अस्पृश्यता उन्मूलन] पंचवर्षीय योजना] पंचायती राज] आधारभूत उद्योगों की स्थापनाएं जैसी ?kVukएं स्वाधीनता आंदोलन के प्रोजेक्ट के ही परिणाम थे। आजादी के समय शिक्षा का प्रतिशत बेहद निराशाजनक था। द्घोर निर्धनता] भूखमरी] अकाल और विभाजन की त्रासदी जैसे vk\kkrksa ने भारत के उत्तर औपनिवेशिक काल की यात्रा में अवरोधक खड़े किए थे। इतना ही नहीं १९४७] १९६२ और १९६५ में भारी युद्धों का सामना भी इस नवराष्ट्र को करना पड़ा। वेस्टर्न चर्चिल जैसे कतिपय नेताओं ने द्घोषणा कर दी थी कि भारत की स्वतंत्रता nh\kZthoh नहीं होगी। भारतीयों में शासन कौशल का अभाव है। लेकिन नेहरू और उनके बाशिंदों के नेतृत्व ने ऐसी भविष्यवाणियों को झुठला दिया। ये ऐतिहासिक उपलब्धि से कम नहीं है। जरा सोचिए] आजादी के समय भारत की जनसंख्या ४० करोड़ थी] आज यह सवा अरब का देश बन चुका है। इस समय जनसंख्या के कितने बेशुमार सपने होंगे] सपनों को साकार करने की चुनौती नेहरूकालीन नेतृत्व के समक्ष निरंतर रही होगी] इसे वस्तुनिष्ठ दृष्टि से सोचने की आवश्यकता है।

ये सच है कि १९४७ से लेकर अब तक भारत की शासन यात्रा का बड़ा भाग कांग्रेस के नेतृत्व में ही तय हुआ है। क्षेपक या पड़ाव के रूप में मोरारजी देसाई] चौधरी चरण सिंह] विश्वनाथ प्रताप सिंह] चंद्रशेखर] एचडी देवगौड़ा] इंद्र कुमार गुजराल] अटल बिहारी वाजपेयी आते रहे हैं] और आज भारतीय जनता पार्टी के नरेंद्र मोदी के नेतृत्व का उदय (मई २०१४) हुआ है। लेकिन इस ऐतिहासिक तथ्य को भी नकारा नहीं जा सकता कि कांग्रेस का भारत पर पांच दशकों से अधिक का एकछत्र शासन रहा। यहां वह इस यात्रा की उपलब्धियों की वह अपने को दावेदार मानती है] वहीं वह इसकी दुर्द्घ?kVukओं यानी असफलताओं को भी अस्वीकार नहीं कर सकती] क्योंकि किसी भी राष्ट्र राज्य को आधी सदी तक चलना निःसंदेह इतिहास को जन्म देने के समान है। यही प्रश्न उठता है कि क्या कांग्रेस भारतीय नागरिकों की आकांक्षाओं पर खरी उतरी है\ क्या यह राष्ट्रीय स्तर का दल विषमता मुक्त भारत का निर्माण कर सका\ क्या भूख] गरीबी का उन्मूलन किया जा सका\ क्या सबको समान आवास] रोजगार] शिक्षा उपलब्ध कराए जा सके\ क्या पूंजी के केंद्रीयकरण और मोनोपोली को रोका गया] क्या विधायिकाओं में भिनभिनाती अरबपतियों की भीड़ को रोका जा सका\ आखिर 

राजनीति के अपराधीकरण को शह किसने दी\ किसने धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिकता का राजनीतिक सुविधा& असुविधा को सामने रखकर इस्तेमाल किया\ किसने जातिमुक्त समाज&व्यवस्था तथा राजनीतिक के जन्म लेने में रूकावटें पैदा कीं\ देश में क्यों नहीं 'साइटेफिक टेंपर' का निर्माण किया गया\ दलित और आदिवासी आज भी क्यों हाशिए पर हैं\ क्यों कांग्रेस को भ्रष्टाचार की गंगोत्री या फंवारा कहा जाने लगा\ क्यों आज भी आदिवासी अंचलों में माओवादी शक्तियों राष्ट्र राज्य के लिए चुनौती बनी हुई है\ सवाल तो ये भी है कि देश की राजनीति में वंशवाद को क्यों पनपाया गया\ क्या इससे इंकार किया जा सकता है कि लोकतंत्र के चोले में सामंती व औपनिवेशक संस्कार जीवित है\ वंशवादी राजनीति ऐसे ही संस्कारों का विस्तार मात्र है। कांग्रेस से आरंभ होने वाली राजनीति के अमर बेल आज क्षेत्रीय दलों में भी फैल चुकी है। क्या ये वंशवादी राजनीति लोकतंत्र को स्वस्थ व जीवंत रख सकती है\ इन सवालों की पृष्ठभूमि में अगस्त १९४७ के नागरिक के सपनों को समझना होगा। निःसंदेह तत्कालीन औसत नागरिक का स्वप्न रहा होगा कि उसे वह व्याधि मुक्त लोकतांत्रिक राष्ट्र में अपनी नवीनतम स्वप्न यात्रा की शुरुआत करें। बेशक इस बात से इंकार करना भी गलत होगा कि तब के नागरिक का स्वप्न&भंग नहीं हुआ है] उसकी बुनियादी आकांक्षाएं साकार हुई हैं और वह ईमानदारी के साथ राष्ट्र पर गर्व कर सकता है। ये सच है कि १९४७ से लेकर आज तक भारतीय नागरिकों की कई पीढ़ियों ने जन्म लिया है] कुछ विलुप्त भी हुई है लेकिन ऐसी निरंतरता इन सभी के बीच है और वह है लोकतांत्रिक&गणतांत्रिक राष्ट्र राज्य को जीवंत रखने की आधारभूत शर्त&चुनाव।

मैं समझता हूं कि नेहरू के नेतृत्व में स्वाधीन भारत  की कांग्रेस सरकार से सबसे बड़ी गलती ये हुई कि इसमें भारतीय को संवैधानिक दृष्टि से तो नागरिक बनाया लेकिन सामाजिक सांस्कृतिक] राजनीतिक दृष्टि से भारतीय जेनुइन नागरिक नहीं बन सके। भारतीयों में वांछित 'समतलीय' नागरिक चेतना विकसित नहीं हो सकी बल्कि 'उच्चकीय चेतना' या एकलरेखीय चेतना से ही उन्हें निर्देशित करती रही। दूसरे शब्दों में भारतीय नागरिकों की जीवन&शैली में लोकतंत्र सभी अंगों में समरसी दृष्टि से रच&बस नहीं सका। परिणामतः औसत भारतीय धर्म] जाति] भाषा] विशेषाधिकार आदि में तब्दील होकर रह गया। उसने संविधान को सामंती&औपनिवेशिक 'हेग ओवर' के चश्मे से देखा। नेहरू के नेतृत्व में इन चश्मों को नष्ट करने का या वैकल्पिक चश्मे देने का जैसा प्रयास करना चाहिए था] वैसा नहीं किया जा सका] अल्पसंख्यकों का सामंती नेतृत्व ही नवराष्ट्र राज्य की भावना को समझ सका] शेष निचला&पिछड़ा विशाल अल्पसंख्यक तबका इससे कटा रहा] जातिगत व वर्गगत विशेषाधिकार वर्चस्वादी संस्कूति प्रबल रही। जब बीती सदी में भारत आजाद हुआ था] तब देश में ऐसे भी राजनीतिक विश्लेषक थे] जिन्होंने १५ अगस्त १९४७ के दिवस को स्वाधीनता के स्थान पर 'सत्ता का हस्तानांतरण' के रूप में निरूपति किया था। अर्थात भारत वास्तविक अर्थों में स्वतंत्र नहीं हुआ है] बल्कि अंग्रेजों ने केवल सत्ता का हस्तांतरण अपने ही श्यामवर्गीय शासक बंधुओं को सौंप दी है। १९३१ से पहले भगत सिंह और उनके साथी कहा भी करते थे कि हमें भारत में गोरे शासकों के स्थान पर काले शासक नहीं चाहिए। ये सर्वविदित हैं कि शासक वर्ग का चरित्र लगभग समान रहता है] भौगोलिक सीमाएं इसमें अवरोधक नहीं होती हैं। बुनियादी सवाल यह है कि भारतीय राष्ट्र राज्य के चरित्र में आधारभूत परिवर्तन आया था नहीं। बेशक] भारतीय प्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक स्वतंत्रता के मालिक जरूर बने] संप्रभुता संपन्न राष्ट्र के स्वामी बने। लेकिन क्या वे आर्थिक रूप से भी स्वतंत्र हो सके। सामाजिक संदर्भों में बाबा साहब अंबेडकर का यह मत शत&प्रतिशत सही है कि राजनीतिक स्वतंत्रता ही सब कुछ नहीं है] बल्कि सामाजिक] सांस्कूतिक] आर्थिक स्वतंत्रता और अनिवार्य है। सामाजिक व आर्थिक दृष्टि से उत्तर नेहरूकालीन भारत में विषमतामुक्त परिवेश की रचना नहीं की जा सकी। यहां तक कि नेहरूकालीन में जिस सार्वजनिक क्षेत्र का निर्माण किया गया था उसके दम पर निजी क्षेत्र को पनपाया गया। यहां ये याद करना प्रासंगिक होगा कि आजादी से पहले बिरला&टाटा जैसे उद्योगपतियों द्वारा प्रतिपादित 'बॉम्बे प्लान' में सरकार से मांग की गई थी कि चूंकि निजी पूंजी पर्याप्त नहीं है इसलिए सार्वजनिक क्षेत्र का निर्माण किया जाए अर्थात स्वतंत्र भारत की सामान्य जनता की पूंजी के दम पर निजी पूंजी के निर्माण की जमीन संवैधानिक अखरण में तैयार की गई। इस काल को नेहरू का समाजवादी या मित्रत अर्थव्यवस्था का काल कहा जाता है। क्या यह विडंबनापूर्ण नहीं है कि आम अनता की गाढ़े पसीने की कमाई (सार्वजनिक क्षेत्र) पर निजी क्षेत्र के बिड़ला द्वारा सिंद्घानिया] गोयनका जैसे इजारेदारों का आर्थिक साम्राज्य स्थापित किया जाए। आज अंबानी& अडानी जैसे नव उदित इजारेदारों ने नेहरूकालीन इजारेदारां को बुरी तरह से पछाड़ दिया है।

आज भारत भूमंडलीकरण के तीसरे चरण में लगभग प्रवेश कर चुका है। जुलाई १९९१ से शुरू हुआ भूमंडलीकरण का अभियान आज २०१६ में अपने उत्कर्ष पर है। राष्ट्रीयकूत बैंकों द्वारा इन इजारेदारों के लाखों&करोड़ रुपयों के कर्ज को बट्टे खाते में डालना या कर्जमुक्ति देना इस उत्कर्ष का ही प्रतिबिंब है। आखिर इन बैंकों में पैसा किसका है\ निःसंदेह ये पैसा भारत के सामान्य नागरिकों का ही है। क्या यह विडंबनामय नहीं कि जब किसानों की ऋणग्रस्तता तथा कर्ज माफी को बढ़ा&चढ़ा पेश किया जाता है लेकिन इन इजारेदारों द्वारा जनता के लाखों करोड़ों रुपयों को डकराने को मामूली ?kVuk या वित्तीय प्रबंधन की विसंगति के रूप में चित्रित किया जाता है। यह कैसे आर्थिक स्वाधीनता है] इसमें कोई शक नहीं है कि देश के राजनीतिक वर्ग की इजाजत के बगैर इन इजारेदारों में इतनी विशाल राशि को हड़पने की दुस्साहसिकता पैदा नहीं हो सकती है। इस दृष्टि से यूपीए और एनडीए के वर्गीय आर्थिक चरित्र में गुणात्मक अंतर नहीं है। दोनों का काम अधिक समान आर्थिक व्यापार है। दोनों ही समरूपी राजनीतिक आर्थिकी की पालकी के कहार बने हुए हैं। भविष्य में इसके दुष्परिणामों के प्रति सावधान रहने की आवश्यकता है।

इक्कसीवीं सदी कॉरपोरेट पूंजी] सुपर ताकतों& टेक्नोलॉजी] हिंसक उपभोक्तावाद] कट्टरवाद] अस्मितावाद] हिंसक जातीयता की सदी है। जहां उत्तर&आधुनिकता] उत्तर औद्योगिक सभ्यता सभ्यताओं के टकराव] इतिहास का अंत विचारधाओं का अति जैसी सिद्धांतिकियां को उछाला जा रहा रहा है] वहीं जनता को धर्म संस्कूति के नाम पर अतीत के कंदराओं में भी धकेला जा रहा है। मानव सभ्यता को वापस उसी छोर पर खड़ा करने की कोशिश की जा रही है जहां से उसने कभी अपनी यात्रा शुरू की थी। यह बहुत ही त्रासद द्वंद्व है। इस द्वंद्व का समाधान कैसे किया जाए आज भी यह प्रश्न इस सदी के चिंतकों में समक्ष है। वे इससे टकराएं और द्वंद्व का वैज्ञानिक समाधान करें। सदी के वैश्वीकरण नागरिक का किंचत स्वप्न है।

 
         
 
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