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vad 45 28-04-2018
 
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प्रस्थान 2
 
न्याय का la?k"kZ

^सत्य^ का ^एकमात्र^ अधिकारी होने के अहंकारपूर्ण दावों ने न्याय के आंदोलनों को समय&समय पर काफी क्षति पहुंचाई है। इस क्षुद्र अहंकार के विपरीत विनम्रता के महत्व को समझने के लिए किसी किताबी ज्ञान की जरूरत नहीं & सिर्फ अपने शरीर और मन पर ही नजर दौड़ाना काफी है। हम अपने रोजमर्रे के जीवन में चलते&फिरते&काम करते विरासत में प्राप्त न मालूम कितने ज्ञान ढोते होते हैं & जो कपड़ा हम पहने होते हैं] उसके पीछे हजारों वर्षों पुरानी ज्ञान परंपरा है; हम नहीं जानते कब किसने कपास उगाया] किसने उसे ओटा] किसने सूत काता] कपड़ा बुना। यही बात हमारे जूतों] कलमों] चश्मों] ?kड़ियों] मोबाइल] आदि पर भी लागू होती है। हम हमेशा न मालूम कितना ज्ञान&कोष अपने साथ लिए चलते हैं। हमें उनके आविष्कारकों&कारीगरों का पता नहीं होता] न हमें उन आविष्कारकों&कारीगरों की वैचारिक& राजनीतिक&सामाजिक प्रतिबद्धताओं का पता होता है। यह लिखते वक्त भी हमें याद रखना चाहिए कि लिपियों के विकास में हजारों वर्षों के काल&क्रम में अनेक समाजों और व्यक्तियों का योगदान रहा है। किसी ने वर्णमाला की पोथियां लिखीं] किसी ने व्याकरण की & इन रचनाओं के अभाव में न धर्मग्रंथ लिखे जाते] न महाकाव्य] न ^वेल्थ ऑफ नेशन्स^] न  ^विडिकेशन ऑफ द राइट्स ऑफ वूमेन^] न ^केपिटल^] न ^चीफ सिएटल का मेमोरेंडम^] और न ^एनिहिलेशन ऑफ कास्ट^। आज भी इस तरह के कार्यों के महत्व को कम करके नहीं आंकना चाहिए। हमारी मानसिक दुनिया भी विरासत में प्राप्त अनेक विचारों] साहित्यिक कूतियों] आदि से आच्छादित रहती है और हमारे अपने निष्कर्षों&निर्णयों को न मालूम कितने रूपों में प्रभावित करती रहती है।

ज्ञान की इस दुनिया में विचरते हुए हमें यह अहसास होना चाहिए कि इस दुनिया में हमारा अपना योगदान लगभग शून्य है ¼और अगर हम विरासत में प्राप्त ज्ञान को भी संभाल पाने में असमर्थ हैं] तो हमारा योगदान नकारात्मक ही माना जाएगा½। फिर कैसा अहंकार\ विनम्रता और इस विनम्रता पर आधारित स्वस्थ] सार्थक संवाद अनेक समुदायों] वर्गों] तबकों] आदि में विभक्त मानवजाति को न्याय के आधार पर एकजुट करने की प्रारंभिक शर्त है। न्याय यदि एक जाति के रूप में हमारी दावेदारी का आधार है तो विनम्रता इस दावेदारी के क्रियान्वयन की पूर्व शर्त।

¼ग½अनेक जन&विद्रोहों] जन&आंदोलनों तथा जन& क्रांतियों के जरिए न्याय से वंचित समुदायों] वर्गों तथा राष्ट्रों ने कई अधिकार हासिल किए हैं] इन अधिकारों को संवैधानिक& कानूनी मान्यता प्राप्त हुई है और उनके संरक्षण] क्रियान्वयन तथा विस्तार के लिए कई संस्थाएं भी अस्तित्त्व में आई हैं। प्रत्येक अधिकार विद्रोह का संवैधानिक अवतार है और इसलिए इन अधिकारों को निरस्त करने अथवा उसमें कटौती करने का मतलब है विद्रोह की स्थिति में वापसी। इस प्रकार प्रत्येक अधिकार में ही विद्रोह का अधिकार भी अंतर्निहित है।

अनेक विद्रोहों तथा आंदोलनों के जरिए ही आदिवासी समुदायों वाले क्षेत्रों में पृथक काश्तकारी कानून बने] और आगे चलकर उन क्षेत्रों को विभिन्न स्तर की स्वायत्तता प्रदान करने के लिए हमारे संविधान में पांचवीं] छठी तथा सातवीं अनुसूची का प्रावधान किया गया। जनजातीय भाषाओं को मान्यता मिली] शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में विशेष अवसर प्रदान करने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई और पृथक वित्तीय निगमों] प्रशिक्षण संस्थानों] सलाहकार बोर्डों तथा परिषदों की स्थापना की गई।

देश&दुनिया में अनेक जुझारू सं?kर्षों और क्रांतियों के बाद मजदूर वर्ग को संगठन] आठ ?kटे काम के दिन तथा हड़ताल का अधिकार हासिल हुआ। संप्रभुता का अधिकार राष्ट्रीय आंदोलन का परिणाम है] तो अभिव्यक्ति की आजादी] सार्विक वयस्क मताधिकार] आदि व्यापक जनवादी आंदोलनों का। स्त्रियों को मताधिकार] बाल&विवाह पर रोक] संपत्ति में हिस्सेदारी] यौन&हिंसा तथा उत्पीड़न के खिलाफ कानून] ?kरेलू हिंसा के खिलाफ कानून] आदि नारी आंदोलन की देन है।

इसी तरह सामाजिक न्याय के लिए चलाए गए व्यापक जन&आंदोलनों के जरिए ही इस आंदोलन की कुछ प्राथमिक मांगों ने संवैधानिक रूप ग्रहण किया & दलित तथा पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी रोजगार और शिक्षा के क्षेत्र में आरक्षण का प्रावधान किया गया] इन वर्गों के अधिकारों के संरक्षण तथा अनुपालन के लिए आयोगों का गठन किया गया और कुछ अन्य सकारात्मक कदम उठाए गए। पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण से मुक्ति के लिए चलने वाले आंदोलनों के फलस्वरूप पर्यावरण संरक्षण तथा प्रदूषण नियंत्रण से संबंधित कानून तथा ग्रीन ट्रिब्यूनल बने। ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों के विकास को गति मिली।

यहां हम जन&आंदोलनों और इन आंदोलनों के संवैधानिक&कानूनी अधिकारों में रूपांतरण का कोई विवरण नहीं दे रहे हैं। सिर्फ यह दिखाने का प्रयास कर रहे हैं कि कैसे प्रत्येक अधिकार विद्रोहों तथा जन&आंदोलनों का ही संवैधानिक&कानूनी अवतार है और इन अधिकारों की वापसी का मतलब है विद्रोह तथा आंदोलनों की स्थिति की बहाली।

उपर्युक्त अधिकारों पर एक नजर डालने से ही यह स्पष्ट हो जाएगा कि ये अधिकार न्याय के आंदोलन के नजरिए से बस प्राथमिक अधिकार ही हैं और यह कि इन प्राथमिक अधिकारों के क्रियान्वयन की स्थिति तो और भी दयनीय है। उनका ¼अधिकांश मामलों में½पालन कम और उल्लं?kन ही ज्यादा होता रहा है। इन अधिकारों के संरक्षण] अनुपालन और विस्तार के लिए जो संस्थाएं बनाई गईं] उनकी स्थिति प्रायः खस्ताहाल ही रही है।

यह स्थिति दो जरूरी चीजों की ओर इशारा करती है & एक तो अधिकारों को मान्यता मिलने के बाद भी जन& आंदोलनों का दबाव बनाए रखना जरूरी है; दूसरा] इन अधिकारों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए सत्ता के संगठनों में ¼विधायिका] कार्यपालिका और न्यायपालिका में½इन आंदोलनों से जुड़ी शक्तियों की प्रभावकारी उपस्थिति जरूरी है ¼हमारे संविधान में अगर इस प्रकार के कुछ बुनियादी अधिकारों को मान्यता मिली तो इसकी एक बड़ी वजह यह थी कि इन अधिकारों के पक्ष में खड़ा होने वाला और न्याय के आंदोलन से जुड़ा एक प्रभावकारी समूह संविधान सभा का सदस्य था] और खुद बाबासाहेब अंबेडकर की संविधान तैयार करने में अहम्‌ भूमिका थी½। इसके अलावा] जनमत का दबाव बनाए रखने के लिए बौद्धिक मंडलियों] मीडिया] आदि में भी असरदार ढंग से हस्तक्षेप आवश्यक है। ¼इस तरह के आंदोलनों से जुड़े जो लोग सत्ता में भागीदार रहे] उनकी भूमिका भी इस लिहाज से अत्यंत असंतोषजनक ही रही। इस का एक प्रमुख कारण यह है कि एक बार सत्ता हासिल कर लेने के बाद उनकी प्राथमिकता सत्ता में किसी तरह बने रहना हो जाता है और इसके लिए वे अनेक अवसरवादी समझौतों में लिप्त हो जाते हैं। जिन आंदोलनों और कार्यक्रमों की बदौलत वे सत्ता में पहुंचे] उन्हें आगे बढ़ाना उनकी कार्य सूची में पीछे चला जाता है½।

बहरहाल] तुलनाएं हम अतीत से करते हैं] लेकिन योजना हम अपने लक्ष्य को सामने रखकर बनाते हैं। अतीत से तुलना करने पर हमें न्याय के लिए होने वाले आंदोलनों की उपलब्धियों का आभास होता है] जबकि लक्ष्य को सामने रखकर योजना बनाते समय हम पाते हैं कि ये उपलब्धियां तो बस शुरुआत भर हैं कि अभी कितना कुछ करना बाकी है।

उपलब्धियां हैं। इन समुदायों] वर्गों] आदि की आज जवान हो रही पीढ़ी को यह जानकर कुछ हैरत तो होती ही है कि आज से सौ साल पहले उनके पूर्वजों को ऐसे कुछ प्राथमिक अधिकार भी प्राप्त नहीं थे] कि बोलने] सम्मान के साथ जीने के अधिकार के लिए उन्हें कितना la?k"kZ करना पड़ा] कितनी यातनाएं सहनी पड़ीं और कितनी कुर्बानियां देनी पड़ीं] कि उनके समुदाय में शायद ही कोई साक्षर था] और कि सत्ता के संगठनों में उनके समुदायों का कोई प्रतिनिधित्व नहीं था।

लक्ष्य को सामने रखकर देखें तो पाएंगे कि इतने लंबे la?k"kZ और कुर्बानियों के बावजूद] सामाजिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में] खासकर उच्च शिक्षा] मीडिया] न्यायपालिका] आदि में उनकी उपस्थिति कुछ खास नहीं है। विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में तो उनकी भागीदारी नगण्य ही है] उद्यम&व्यवसाय] कला&संस्कूति के क्षेत्र में भी यही हाल है। सार्विक वयस्क मताधिकार पर आधारित राजनीतिक जनतंत्र तथा सरकारी नौकरियों में आरक्षण के कारण राजनीतिक सत्ता में उन्होंने अपनी महत्वपूर्ण भागीदारी तो हासिल की है] लेकिन शिक्षा और सम्पत्ति से ऐतिहासिक रूप से वंचित रहने के कारण सामाजिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में समानता और सम्मान का स्थान ग्रहण करने में अब भी काफी लंबा सफर तय करना बाकी है। सामाजिक जीवन में ¼खासकर दलितों] आदिवासियों और स्त्रियों के साथ½भेदभाव] उत्पीड़न और हिंसा की ?kVukएं आज भी बदस्तूर जारी हैं।

इसके साथ] अगर हम न्याय के आंदोलनों के सामाजिक &सांस्कूतिक प्रतीकों को समाज में प्रतिष्ठित करने] इतिहास के पुनर्लेखन] पाठ्य& पुस्तकों में न्याय के आंदोलनों] उनके नायकों को स्थान दिलाने] समाज में विभिन्न रूपों में जड़ जमा चुकी अन्यायपूर्ण प्रथाओं] रूढ़ियों] कर्मकांडों] विचारों के खिलाफ वैचारिक& सांस्कूतिक अभियान चलाने की महती चुनौती को जोड़ दें तो आज न्याय के आंदोलन के समक्ष जो गंभीर कार्यभार उपस्थित हुआ है] उसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।

इस संदर्भ में यह ध्यान देना जरूरी है कि समुदाय&आधारित आंदोलनों में कभी पूरे&के& पूरे समुदाय की एक रूढ़ छवि बनाने] पूरे समुदाय को शत्रु के रूप में चिह्नित करने] उसके खिलाफ द्घृणा फैलाने] हर समस्या के लिए उसे दोषी ठहराने] जैसी प्रवृत्तियों का हमेशा पुरजोर विरोध करना चाहिए। हर समुदाय में कमोबेश हर तरह के लोग होते हैं। किसी खास मामले में] खास मौकों पर अगर कुछ विध्वंसक शक्तियां अपने समुदाय की गोलबंदी में सफल भी हो जाती हैं] तब भी आम लोगों और ऐसी विध्वंसक शक्तियों के बीच फर्क को कभी भूलना नहीं चाहिए। यह प्रवृत्ति अंततः समुदाय&आधारित हिंसा&प्रतिहिंसा और जनसंहार के बर्बर कूत्य की ओर ले जाती है। जनसंहार के प्रतिकार में जनसंहार की प्रवृत्ति न्याय के वृहत्तर आंदोलन को भारी क्षति पहुंचाती है।

¼?k½ जनतांत्रिक राजनीतिक प्रणाली ऐतिहासिक रूप से एक नई प्रणाली है। मानवजाति ने जिन राजनीतिक प्रणालियों के अंतर्गत अपना लंबा वक्त बिताया है] वे जनतंत्र के आगमन के साथ एकबारगी खत्म नहीं हो गईं। वे हमारे राजनीतिक जीवन में गहरे रूप से समाई हुई हैं & हमारे अधिकांश दल तथा संगठन सरदारी& प्रथा] वंशानुगत नेतृत्वकारी तंत्र] संप्रदायों/मठों/डेरों वाली सर्वसत्तावादी संरचनाओं द्वारा ही संचालित हैं। हां] राजनीतिक सत्ता हासिल करने के लिए उन्हें सार्विक वयस्क मताधिकार पर आधारित जनतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। जनता के बीच विरासत में प्राप्त अनेक संप्रदायों] विचार& परंपराओं] मठों] आदि का प्रभाव बड़े पैमाने पर मौजूद है] और उनकी गोलबंदी के दौरान इन प्रभावों का भी भरपूर प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा] उत्पादन तथा सूचना के साधनों पर मुट्ठी भर धनकुबेरों की इजारेदारी] धन&बल तथा सत्ता&बल का आक्रामक सम्मिलित उपयोग न्याय के पक्ष में जनसमुदाय की व्यापक 

गोलबंदी को काफी चुनौतीपूर्ण बना देता है। इन बाधाओं के बावजूद] अनेक महत्वपूर्ण मोड़ों पर न्याय की शक्तियों की सामान्य] तात्कालिक एकजुटता के सामने अन्याय की शक्तियों को शिकस्त खानी पड़ी है।

उपर्युक्त यथार्थ स्थितियां हमें किसी आदर्श] अमूर्त स्थिति से चीजों] ?kVukओं] आदि को समझने] उनका मूल्यांकन करने से बचाती हैं] और सामाजिक रूप से उपयोगी] व्यावहारिक कार्यक्रमों तथा कार्यभारों के निर्धारण में मदद पहुंचाती हैं।

¼ङ½समाज में राजनीतिक क्रांतियों का काल अपेक्षाकूत संक्षिप्त ही होता है। विचार और व्यवहार के स्तर पर हर समय गैर&क्रांतिकाल में अनेक उपयोगी] परिवर्तनमूलक काम होते रहते हैं। लंबे समय तक चलने वाले ऐसे कार्य ही ?kनीभूत होकर क्रांति&काल में विस्फोट का रूप धारण करते हैं और समाज एक नए युग में प्रवेश कर जाता है। इसीलिए ^क्रांतिकारी कार्य^ करने के अहं में समाज में निरंतर किए जा रहे परिवर्तनमूलक] उपयोगी तथा न्याय को विस्तार देने वाले कार्यों को न तो तुच्छ दृष्टि से देखना चाहिए] न ही उन्हें अनदेखा करना अथवा उसके महत्व को कम करके आंकना चाहिए। दरअसल] ^क्रांतिकारी कार्य^ करने का दावा करने वाले प्रायः अपने आसपास होने वाले अनेक उपयोगी कार्यों को देख नहीं पाते] और जो किया जा सकता है] उसकी भी उपेक्षा कर खोखली लफ्फाजी के शिकार हो जाते हैं।

¼च½लंबे काल तक चलने वाला बड़ा जन आंदोलन जिसमें अनेक समुदायों के लोग शामिल होते हैं] ऐसे नेतृत्व की मांग करता है जो समुदायों की संकीर्ण दुनिया से ऊपर उठा हो और जो निष्पक्षता के साथ प्रत्येक समुदाय के वाजिब हितों की रक्षा कर सके तथा उनके बीच मध्यस्थ की भूमिका अदा कर सके। यथार्थ जगत में ऐसा अमूर्त नेतृत्व मौजूद नहीं होता। हर नेता किसी&न&किसी समुदाय/वर्ग/तबके से अथवा किसी&न&किसी विशिष्ट क्षेत्र या हित से संबद्ध होता है। ऐसे समुदाय&विशेष के नेता के प्रति दूसरे समुदायों के नेताओं या खुद उसके अपने समुदाय के विभिन्न लोगों के अपने पूर्वाग्रह या फिर मतभेद हो सकते हैं जिसके कारण उसकी सर्वस्वीकार्यता बाधित हो सकती है। इसीलिए ऐसा आंदोलन अपने विकास&क्रम में अपने किसी मूर्त] समुदाय&विशेष के नेतृत्व में अमूर्तता का आरोप न कर उसे भगवान] महात्मा] स्वामी] संत या करिश्माई रूप में प्रस्तुत कर इस जरूरत को पूरा करता है। फिर उस नेतृत्व के इर्दगिर्द अनेक मिथक गढ़े जाने लगते हैं और संबंधित नेतृत्व भी अमूर्तता के मानकों पर खरा उतरने की कोशिश करता है। यह प्रक्रिया आंदोलन के पूरे क्रम में चलती रहती है & नेताओं के समूह में कौन इस अमूर्तता से महिमामंडित होता है] यह बहुत हद तक संबंधित व्यक्ति के निजी रुझानों] उसके इतिहास तथा यथार्थ आंदोलनों में मध्यस्थ के रूप में उसकी योग्यता पर निर्भर करता है।

ऐसे नेतृत्व का जीवन मूर्त जरूरतों और अमूर्त अपेक्षाओं के विरोधाभास के बीच गुजरता है & उसके आलोचक अथवा विरोधी उसके मूर्त क्रियाकलापों का हवाला देकर उसके ^अमूर्त मध्यस्थ^ होने के दावों का भंडाफोड़ करते हैं] उसे ढोंगी या पाखंडी करार देते हैं] जबकि उसके अनुयायी उसकी ^अमूर्तता^ को आंदोलन की धरोहर और उसकी कामयाबी की गारंटी मानते हैं। उसकी अमूर्त छवि में लोग ^मानवता का कमोबेश आदर्श रूप^ ढूंढ़ लेते हैं।

¼छ½इसी तरह] लंबे समय तक चलने वाले राजनीतिक आंदोलनों में कार्यकर्ताओं के बीच श्रम&विभाजन भी जड़ जमा लेता है। यह श्रम&विभाजन आंदोलन के आरंभिक दिनों में जहां आंदोलनकारी संगठन की कार्यकुशलता तथा नवाचारिता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है] वहीं बाद के दौर में ¼खासकर जब वह आंदोलन अपना राजनीतिक लक्ष्य हासिल करने में नाकामयाब हो½इस श्रम&विभाजन का नकारात्मक परिणाम प्रभावी हो जाता है। एक ही तरह के काम को साल&दर&साल दिनचर्या के रूप में करते रहना सम्मोहक जड़ता तथा मानसिक शिथिलता का सबब बन जाता है। इस जड़ता के बंदीगृह में आत्म&मूल्यांकन में असमर्थ] आत्ममुग्ध सार्विक निंदक की स्थिति उसकी नवाचारिता की क्षमता को सदा के लिए कुंद कर देती है।

वर्तमान चुनौतियां

पिछले दो वर्षों से केंद्र में जो आरएसएस&भाजपा की सरकार सत्तारूढ़ है] उसका लक्ष्य भारत को सवर्ण जातियों के वर्चस्व वाला हिंदू राष्ट्र बनाना है & इस दिशा में वह सत्ता में आने के साथ ही अपने अनुषंगी संगठनों के साथ पूरे जोर&शोर से लगी हुई है। वह भाजपा को २०१४ के आम चुनावों में मिले पूर्ण बहुमत का पूरा फायदा उठाना चाहती है। अनेक प्रदेशों में पहले से ही उसकी सरकारें बनी हुई हैं। स्वतंत्रता के बाद यह भारतीय राजनीति का एक नया दौर है। यह पार्टी भारतीय समाज की ब्राह्मणवादी] पुरातनपंथी] अल्पसंख्यक खासकर मुस्लिम& विरोधी] विज्ञान&विरोधी] अनुदारवादी विचार& प्रथाओं और परंपरा की हिमायती है & न्याय के आंदोलनों की परंपरा से] राष्ट्रीय आंदोलन] सामाजिक आंदोलन] नारी आंदोलन] आदिवासी आंदोलन] मजदूर&किसानों के आंदोलन आदि से उसका कोई रिश्ता&नाता नहीं रहा है] बल्कि वह ऐसे आंदोलनों के विरोध में ही हमेशा खड़ी रही है। जनतांत्रिक संस्थाओं में उसकी आस्था नहीं है और अपने राजनीतिक लक्ष्यों की पूर्णता के लिए तथा अपने पक्ष में ध्रुवीकरण को ¼खासकर चुनावों के वक्त½मूर्त रूप देने के लिए वह अफवाहों] दुष्प्रचारों] झूठ और द्घृणा के प्रचार] हिंसा] जनसंहार आदि का सहारा लेने को तत्पर रहती है। इन कार्यों को अंजाम देने के लिए उसके पास अपने प्रशिक्षित स्वयंसेवक तथा पंचमांगी दस्ते हैं। अपने करीब ९१ साल के सफर में आरएसएस ने देशव्यापी पैमाने पर स्वयंसेवकों की अपनी फौज खड़ी की है और इसकी राजनीतिक शाखा ^जनसं?k और भाजपा^  ने गैर& कांग्रेसवाद के दौर में विभिन्न राजनीतिक गठबंधनों का हिस्सा बनकर उसका भरपूर लाभ उठाया है तथा विभिन्न दलों] संगठनों] संस्थाओं आदि में महत्वपूर्ण संपर्क विकसित कर लिए हैं। समय&समय पर कांग्रेस के सांप्रदायिक कदमों को भी आरएसएस का भरपूर समर्थन हासिल हुआ। न्याय की शक्तियों के बिखराव और अवसरवादिता की अवस्था में कांग्रेस के पतन का सबसे बड़ा राजनीतिक फायदा उठाने में इसे ही कामयाबी मिली है। बहरहाल] यहां हमारा इरादा इसके इतिहास में जाने का नहीं है। हम यहां इसके दो सालों के कामकाज का भी लेखा&जोखा नहीं रखने जा रहे।

आर्थिक क्षेत्र में यह कॉरपोरेट तथा विदेशी पूंजी को मुख्य चालक शक्ति मानती है और इस कॉरपोरेट&विदेशी पूंजी&आधारित विकास की राह में भारत की बहुसंख्यक अवाम & मजदूर] किसान] आदिवासी] और अन्य वंचित] अल्पसंख्यक समुदायों को प्रमुख बाधा के रूप देखती है। इस कॉरपोरेट&विदेशी पूंजी&आधारित ^राष्ट्र&निर्माण^ के लिए वह इन समुदायों के अर्जित अधिकारों की बलि चाहती है। इस पूंजी&निवेश का मार्ग प्रशस्त करने के लिए पर्यावरण&संरक्षण तथा प्रदूषण&नियंत्रण कानूनों में ढील दी जा रही है।

नव&उदारवादी आर्थिक सुधारों का यह दूसरा दौर है। पहला दौर जहां उपभोक्ता क्षेत्र से संबंधित था] वहीं दूसरा दौर उत्पादन के कारकों ¼फैक्टर्स & भूमि] श्रम तथा पूंजी½के क्षेत्रों से संबंधित है। यह दौर किसानों और आदिवासियों से कॉरपोरेट ?kरानों के हाथों में जमीन के हस्तांतरण का] तथाकथित श्रम ^सुधारों^ के नाम पर मजदूरों के अधिकारों में कटौती करने तथा उन्हें कॉरपोरेट ?kरानों की मनमर्जी पर छोड़ देने का] सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों] बैंक] बीमा कंपनियों] आदि को विदेशी पूंजी के लिए खोलने] पूंजी बाजार के नियमन को ढीला करने तथा विदेशी पूंजी&निवेश को सुगम बनाने का दौर है। यह सब करने के लिए वह मजदूरों& किसानों&आदिवासी समुदायों को उनके बुनियादी अधिकारों से वंचित करने की दिशा में कदम बढ़ा चुकी है। ¼यहां याद रखना चाहिए कि अनेक आर्थिक&सामाजिक मामलों में उसकी तथा कांग्रेस की नीतियों में कोई खास फर्क नहीं है। इनमें से कई कदम कांग्रेस की सरकारों द्वारा उठाए गए कदमों का ही और भी आक्रामक रूप हैं।½

अभिव्यक्ति की आजादी समेत आम जनवादी अधिकारों के प्रति इसका रवैया नकारात्मक है और इन अधिकारों पर लगातार हमले जारी हैं। सार्विक वयस्क मताधिकार के मामले में भी इसकी प्रतिगामी स्थिति इसके राज्य सरकारों द्वारा उठाए गए कदमों से समझी जा सकती है। एक ओर शिक्षा की अर्हता को जोड़ना और दूसरी ओर ¼मतदान को अनिवार्य कर½मतदान नहीं करने को दंडनीय अपराध ?ksf"kr करना & दोनों सार्विक वयस्क मताधिकार की मूल भावना का उल्लं?kन है। गैर&जनतांत्रिक] गैर&संवैधानिक मार्ग अपनाने के उसके उतावलेपन की सूची इतनी लंबी है कि उसका संक्षिप्त विवरण देना भी यहां संभव नहीं & पूर्ण बहुमत के बावजूद भूमि&अधिग्रहण के लिए बार&बार अध्यादेश का सहारा लेना] राष्ट्रपति शासन लगाने की तत्परता] विपक्षी प्रदेश सरकारों की राह में तरह&तरह से अड़चनें खड़ी करना] उसके मंत्रियों तथा नेताओं द्वारा भड़काऊ भाषण देकर अपने सहयोगी संगठनों को हिंसक कार्रवाइयों के लिए उकसाना] शिक्षण&संस्थाओं में पुलिस कार्रवाई और उनकी स्वायत्तता का हनन] छात्रों के आंदोलनों को ^राष्ट्र&विरोधी^ ?ksf"kr कर उनका दमन] विरोधियों से अपने पंचमांगी दस्तों के जरिए निपटना आदि की यह सूची ही उसकी गैर&जनतांत्रिक मानसिकता का परिचय देने के लिए काफी है। स्त्री&अधिकारों के प्रति इस दल का नजरिया ब्राह्मणवादी&पुरातनपंथी है। वह स्त्री& शरीर और स्त्री&मन के पितृसत्ताक नियमन की हिमायती है & यह नियमन इसके पंचमांगी दस्तों को स्त्रियों के खिलाफ शारीरिक हिंसा के लिए उकसाता है।

सामाजिक आंदोलनों के जरिए वंचित समुदायों ने जो अधिकार हासिल किए हैं ¼खासकर आरक्षण का अधिकार½] उसे कमजोर करने तथा आर्थिक आधार पर सवर्ण समुदायों को आरक्षण के दायरे में लाने पर यह शासक दल आमादा है। न्याय के आन्दोलनों में जहां कहीं भी छोटी&मोटी दरारें हैं] उन्हें चौड़ा करने में] इन आंदोलनों के इतिहास में या वर्तमान में जो भी नायक उपेक्षित रह गए हैं या जो भी ?kVuk हाशिए पर रह गई है या भुला दी गई है] उसे उभारने और उसका लाभ लेने में वह कोई कोर&कसर नहीं छोड़ रहा है। अपने आक्रामक बहुसंख्यकवाद के हित में खासकर दलितों तथा अतिपिछड़ों के कुछ हिस्सों को अपने पक्ष में करने की उसने मुहिम छेड़ रखी है & मुस्लिम& विरोधी ध्रुवीकरण में वह इन समुदायों को गोलबंद कर अपने बहुसंख्यकवादी एजेंडे को आगे बढ़ाना चाहता है। कुछ ऐतिहासिक दलित& पिछड़े नायकों का वह दलित&पिछड़े नायक के रूप में नहीं] बल्कि ^मुस्लिम&विरोधी^ नायक के रूप में उनका ^पुनराविष्कार^ कर रहा है।

भिन्न यौन रुझानों वाले समुदायों के प्रति वह समानता और सम्मान से पेश आना तो दूर] ¼ऐसे रुझानों को विकूति या बीमारी के रूप में चिह्नित कर½ उन्हें दंडित करने या उनका ^इलाज^ करने की हिमायत करता है।

स्वच्छता अभियान में भी इसके निशाने पर पर्यावरण&संरक्षण तथा प्रदूषण&नियंत्रण कानूनों का उल्लं?kन करने वाले कॉरपोरेट ?kराने और नगर&प्रशासन की अक्षमता नहीं] बल्कि आम मेहनतकश समुदाय है। पर्यावरण&संरक्षण तथा प्रदूषण&नियंत्रण कानूनों को सख्त बनाना और उनका सख्ती से पालन सुनिश्चित करना] नगर& निकायों की वित्तीय हालत सुधारना] नगर& निकाय के कर्मचारियों ¼जिनमें से अधिकांश मानदेय पर काम करते हैं] और इस मामूली मानदेय का भुगतान भी कई&कई महीनों बाद किया जाता है½के वेतनमान] सेवा शर्तों तथा जीवन&स्थितियों में सुधार] सफाई के कार्य में आधुनिक मशीनों का प्रयोग] कचरा& प्रबंधन की आधुनिक प्रविधि का इस्तेमाल आदि ¼जिन्हें केंद्र या राज्य सरकारें ही कर सकती हैं] कोई व्यक्ति या संगठन नहीं½की जगह आम मेहनतकश लोगों] खासकर मेहनतकश महिलाओं को गंदगी के लिए जिम्मेवार ठहराना दरअसल उनका ?kksj अपमान है और मेहनतकशों के प्रति ब्राह्मणवादी नजरिए का ही प्रमाण है।

विदेश नीति के क्षेत्र में यह शासक वर्ग अमेरिका के साथ सामरिक गठबंधन में बंधने की ओर निर्णायक कदम बढ़ा चुका है। बहरहाल] इसका सबसे खतरनाक कार्यक्रम अल्पसंख्यक समुदायों ¼खासकर मुसलमानों½ को लेकर है। इस समुदाय के प्रति इसका रवैया शत्रुतापूर्ण है। यह दल मुस्लिम समुदाय के खिलाफ निरंतर दुष्प्रचार करने] अफवाह फैलाने तथा विभिन्न उपायों से उसके खिलाफ हिंसा भड़काने की जुगत में रहता है। अपने आक्रामक बहुसंख्यकवाद के तहत वह इस समुदाय के खिलाफ ¼खासकर चुनाव के समय और आम तौर पर हमेशा½ध्रुवीकरण की कोशिश में लगा रहता है।

सेक्युलर जनतांत्रिक देशों में भी बहुसंख्यक समुदाय का सदस्य होना उसकी नागरिकता में अतिरिक्त मूल्य जोड़ देता है & इस मूल्य& संवर्धित नागरिकता के अपने फायदे तो हैं ही। सत्ता और सामाजिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में] इस समुदाय की उपस्थिति और भागीदारी वैसे ही काफी कम रही है। इस शासक दल का उद्देश्य तो उसे इस भागीदारी से वंचित कर उसे दोयम दर्जे के नागरिक की स्थिति में धकेल देना है।

इस समुदाय के खिलाफ चलाए जा रहे दुष्प्रचार और आक्रामक बहुसंख्यकवाद का इस दल को फायदा भी हुआ है & हिंदू मन ¼खासकर हिंदू युवा मन½के संप्रदायीकरण में उसे कुछ हद तक कामयाबी मिली है] समय& समय पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण में भी वह विभिन्न क्षेत्रों में सफल हुआ है। उसके आक्रामक बहुसंख्यकवाद के सामने अन्य प्रमुख दलों ने भी कमोबेश रक्षात्मक रवैया अपना लिया है और ध्रुवीकरण की संभावना से आशंकित होकर इस समुदाय को उनके वाजिब हक देने और उनके पक्ष में सकारात्मक कदम उठाने से वे या तो परहेज करते हैं या आनाकानी करते हैं। ऐसी स्थिति में इस सरकार ने मुस्लिम समुदाय की जिस तरह द्घेराबंदी की है] उससे इस समुदाय के] खासकर उसके युवाओं के खुद अपने ही देश में पराया अनुभव करने के मनोभाव ¼एलिएनेशन½को समझा जा सकता है। भारतीय समाज के इस महत्वपूर्ण ?kटक का यह परायापन इस समाज को दूरगामी तौर पर न सिर्फ कमजोर करेगा] बल्कि उसे एक खतरनाक वि?kटन की ओर ले जाएगा। जाहिर है] यह समस्या आज नहीं पैदा हुई है] लेकिन इसने आज गंभीर रूप धारण कर लिया है। आतंक के खिलाफ युद्ध के नाम पर विश्वव्यापी पैमाने पर मुस्लिम समुदाय के खिलाफ जो माहौल बनाया जा रहा है] उस पृष्ठभूमि में यह और भी गंभीर हो गया है। अमेरिका] फ्रांस] जर्मनी] ऑस्ट्रिया] ब्रिटेन] आदि अनेक देशों में अपनी सहोदर शक्तियों के आक्रामक उत्थान से इस दल को काफी बल मिला है।

बहरहाल] इस बहुसंख्यकवाद की काट न्याय की शक्तियों की एकजुटता में है & जहां ये शक्तियां सामान्य रूप में भी एकजुट रहीं] वहां इन fo?kVudkjh शक्तियों को मुंह की खानी पड़ी है। आक्रामक बहुसंख्यकवाद के जरिए जहां संभव हो] वहां जनतांत्रिक रास्ते से ही लाभ उठाना] और जहां संभव न हो वहां गैर&जनतांत्रिक] गैर&संवैधानिक तरीकों का सहारा लेना & यह इस दल की नीति रही है। बहरहाल] भारतीय समाज की विविधता] समाज में न्याय की प्रचलित परंपरा] आदि इन शक्तियों का क्या भविष्य तय करती है] यह हम नहीं जानते। लेकिन इन शक्तियों के पराभव को स्वतःस्फूर्तता पर नहीं छोड़ा जा सकता।

कुल मिलाकर] ऊपर हमने अन्याय के जिन प्रमुख रूपों का जिक्र किया है] वर्तमान शासक दल उन सभी रूपों की हिमायती है और इसने वंचित समुदायों] वर्गों] आदि के अर्जित अधिकारों को कमजोर करने और उसे खत्म करने की दिशा में कदम उठाना शुरू कर दिया है। यह स्थिति न्याय की सभी शक्तियों की एकजुटता का वस्तुगत आधार प्रदान करती है। न्याय की सम्मिलित ताकत के जरिए ही इस विभाजनकारी] कॉरपोरेट&विदेशी पूंजी&परस्त] सवर्ण ब्राह्मणवादी हिंदुत्व की शक्तियों को शिकस्त दी जा सकती है। अधिकारों की वापसी अथवा उन्हें कमजोर किया जाना आंदोलनों की स्थिति की बहाली है। सवाल इन आंदोलनों का एक साझा नेतृत्व&केंद्र विकसित करने का है।

¼^न्याय का la?k"kZ^ नामक विस्तृत लेख का एक अंश½

 
         
 
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  • राकेश सिन्हा

la?k विचारक

वामपंथ में उग्रता और la?kर्ष की अद्भुत क्षमता है। लेकिन भारतीय वामपंथ के तो जैसे मायने ही अलग हैं। यहां वामपंथ

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