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न्याय का la?k
  • प्रसन्न कुमार चौधरी

चिंतक एवं लेखक

मूल बात है यथार्थ जीवन के इन सारे सत्यों को साझा मंच पर लाने की कोशिश करना एक ऐसे साझा कार्यक्रम को आधार बनाना जिसमें सभी पक्षों की न्यायपूर्ण मांगों को समुचित स्थान प्राप्त हो। जाहिर है] यह कोशिश समुदायों] वर्गों के बीच आंतरिक la?k"kZZ को भी जन्म देगी। यह समाज के जनवादीकरण के विस्तार और उसे गहराई में ले जाने की जरूरी सचेत प्रक्रिया है। यह न्याय के लिए la?k"kZZरत सभी पक्षों के बीच पारस्परिक संवाद और सहमति विकसित करने की भी प्रक्रिया है

 

तिहास में इन सभी अन्यायों के खिलाफ la?k"kZZ की एक लंबी परंपरा रही है। इन la?k"kZks± की अपनी&अपनी वैचारिकी] अपना&अपना जीवन&मूल्य] साहित्य और अपने &अपने नायक रहे हैं। उनकी अपनी&अपनी युग&सापेक्ष उपलब्धियां भी रही हैं। प्रचलित इतिहास में इन la?k"kZks± को] उनकी वैचारिकी] उनके साहित्य] उनके नायकों और उनकी उपलब्धियों को समुचित सम्मानजनक स्थान दिलाने की जद्दोजहद आज भी जारी है।

इन सभी अन्यायों के खिलाफ la?k"kZZ समाज में समानांतर रूप से हर समय चलता रहता है। आज अपने देश और दुनिया में समानांतर रूप से चल रहे इन तमाम la?k"kZks± का हम सहज ही साक्षात्‌ कर सकते हैं & सवाल यह नहीं है कि पहले यह la?k"kZZ हो फिर वह। विभिन्न क्षेत्रों में] अपने&अपने विशिष्ट मुद्दों पर एक ही साथ और एक ही समय में महिलाओं के] आदिवासियों के] दलित&पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदायों के] मजदूर&किसान वर्गों के] भिन्न यौन रुझान वाले समूहों के] राष्ट्रीयताओं के और पर्यावरण& क्षरण तथा प्रदूषण से प्रभावित समुदायों के आंदोलन चलते देखे जा सकते हैं। अनेक अवसरों पर इनमें से कुछेक आंदोलनों को एक मंच साझा करते हुए भी देखा जा सकता है और कभी&कभी एक&दूसरे से उलझते हुए भी।

कहने की जरूरत नहीं कि अन्याय के इन अलग&अलग आयामों के खिलाफ la?k"kZZरत शक्तियों की वैचारिकी] प्रचार&सामग्री] कार्यनीति] उनके संगठन के स्वरूप और उनके आंदोलन के तरीकों] उनके नायक और उनकी विरासत] आदि में भिन्नता होगी। इन शक्तियों की किसी भी संभावित एकता के लिए इस भिन्नता की स्वीकूति तथा उसके प्रति सम्मान एक जरूरी शर्त होगी।

न्याय के लिए la?k"kZZरत इन तमाम समूहों की एकजुटता में ही ¼खंडित समूहों की जगह½ एक जाति&मूल के रूप में हम मानवजाति की वास्तविक दावेदारी का भ्रूण रूप देख सकते हैं। लेकिन क्या यह एकजुटता व्यावहारिक तौर पर मूर्त रूप ग्रहण कर पाएगी

इस एकजुटता के व्यावहारिक तौर पर मूर्त रूप ग्रहण करने की राह में जो रुकावटें हैं] उन पर थोड़ी चर्चा यहां बेमानी नहीं होगी।

¼क½ अव्वल तो प्रत्येक आंदोलन में अपने संबंधित आयाम से जुड़ी संकीर्णता का पहलू कुछ हद तक अंतहीन होता है। यह संकीर्णता अपने आंदोलन को अन्य आंदोलनों की तुलना में अधिक वरीयता देती है। वरीयता अथवा महत्ता की यह होड़ आंदोलनकारी संगठनों के बीच समानता और परस्पर सम्मान पर आधारित संबंधों के विकास में बाधा उपस्थित करती है। प्रत्येक आंदोलन का प्रायः यह दावा होता है कि एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना में उसके आंदोलन की निर्णायक भूमिका है और उसकी सफलता न्याय के लिए चलने वाले अन्य आंदोलनों की विजय की पूर्व शर्त है।

¼ख½ चूंकि ये सारे आंदोलन अपनी&अपनी विशिष्टताओं के साथ समाज में एक साथ चलते आ रहे हैं] इसलिए इन सारे आंदोलनों के पास अपना इतिहास] अपनी विरासत] अपने नायक& खलनायक होते हैं] उनके la?k"kZZ का रूप अलग& अलग होता है] उनके हिस्से सफलताओं और असफलताओं का अलग&अलग खाता होता है। इतिहास में इन आंदोलनों के आपस में टकराव के क्षण भी होते हैं"एक के नायक दूसरे के लिए महत्वहीन या यहां तक कि खलनायक भी हो सकते हैं"और उनके अपने&अपने अनेक पूर्वग्रह भी होते हैं।

यहां कुछ प्रचलित उदाहरणों का जिक्र किया जा सकता है। अभिव्यक्ति की आजादी के लिए होनेवाले la?k"kZks± में ऐसे लोग और समूह भी शामिल हो सकते हैं ¼अथवा होते हैं½ जो न्याय के लिए होने वाले अन्य आंदोलनों तथा उनकी मांगों के विरोधी हों ¼जैसे आरक्षण की मांग] या फिर मजदूर&किसानों की वर्गीय मांग] आदि½। अब अभिव्यक्ति का जनवादी अधिकार व्यक्तियों तथा सभी समुदायों के लिए जरूरी है और इसे हासिल करने के लिए देश&दुनिया में अनेक जनla?k"kZZ हुए हैं और आज भी जब&जब उस पर खतरा उपस्थित होता है] तब&तब होता रहता है। लेकिन उसमें विभिन्न विचारों तथा प्रतिबद्धताओं वाले लोग शामिल होते हैं।

उपनिवेशों में राजनीतिक स्वतंत्रता की मांग एक जनवादी मांग है] लेकिन इस स्वतंत्रता के la?k"kZZ में ऐसे लोग भी शामिल होते हैं जो इन देशों में पहले से चली आ रही अन्यायपूर्ण सामाजिक&आर्थिक व्यवस्था के हिमायती होते हैं। अपने देश में ही स्वतंत्रता आंदोलन के आरंभ से ही स्वतंत्रता आंदोलन] सामाजिक आंदोलन] दलित&आदिवासी समुदायों के आंदोलन] अल्पसंख्यक समुदायों के आंदोलन] मजदूर&किसानों के आंदोलन के बीच टकराव होते रहे। स्वतंत्रता आंदोलन के अनेक नायक इन आंदोलनों की नजर में खलनायक की भूमिका में खड़े दिखाई देते हैं। इन आंदोलनों को साझा मंच प्रदान करने की कोशिशें भी होतीं] साथ ही उनके बीच समय&समय पर तीखे la?k"kZZ भी होते रहते। स्वतंत्रता के बाद ये la?k"kZZ और खुलकर सामने आए] क्योंकि तब सामाजिक पुनर्रचना का प्रश्न केंद्रीय प्रश्न बन गया।

स्वतंत्रता] समानता और पारस्परिक सम्मान एक संक्रमणशील विचार है & जब राष्ट्रों के बीच स्वतंत्रता] समानता और पारस्परिक सम्मान की बात उठती है तो] जाहिर है इस स्वतंत्रता] समानता और सम्मान से वंचित समुदाय भी अपने&अपने समुदायों के लिए यही दावा पेश करेंगे। इस प्रकार एक राष्ट्रीय आंदोलन अन्य अनेक आंदोलनों की जमीन तैयार करता है। स्वतंत्रता आंदोलन एक दुहरी प्रक्रिया को जन्म देता है ें& एक ओर विदेशी शासन से मुक्ति की प्रक्रिया और दूसरी ओर खुद  देश के अंदर सामाजिक पुनर्रचना की प्रक्रिया। दोनों प्रक्रियाएं एक दूसरे के साथ अंतःक्रिया के जरिए एक दूसरे को बल प्रदान करती हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद समाज वही नहीं रहता जो उपनिवेश बनने के पहले था।

इसी तरह सामाजिक आंदोलनों और वर्गीय आंदोलनों के बीच टकराव की स्थिति पैदा होती रहती है। सामाजिक आंदोलनों के संचालकों को लगता है कि वर्ग&आधारित आंदोलन के संचालक सामाजिक भेदभाव तथा उत्पीड़न को उचित महत्व नहीं देते और उनके आंदोलनों में फूट डालने और उसे कमजोर करने का प्रयास करते हैं] तो वर्ग आंदोलनों के संचालकों को लगता है कि विभिन्न समुदायों के वर्चस्वशाली तबके समुदायगत एकता के नाम पर दरअसल अपने& अपने समुदायों के शोषित& उत्पीड़ित वर्गों के न्यायपूर्ण अधिकारों का हनन करते हैं] और जाति के आधार पर मजदूर &किसानों की वर्गीय एकता में बाधा डालते हैं। अपने देश में स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों से ही सामाजिक आंदोलन और वर्ग आंदोलन के बीच एक टिकाऊ आवयविक संबंध विकसित करने की समस्या बनी रही है।

इसी तरह अन्य आंदोलनों के बारे में भी कई उदाहरण दिए जा सकते हैं। बहरहाल मूल बात है यथार्थ जीवन के इन सारे सत्यों को साझा मंच पर लाने की कोशिश करना & एक ऐसे साझा कार्यक्रम को आधार बनाना जिसमें सभी पक्षों की न्यायपूर्ण मांगों को समुचित स्थान प्राप्त हो। जाहिर है] यह कोशिश समुदायों] वर्गों के बीच आंतरिक la?k"kZZ को भी जन्म देगी। यह समाज के जनवादीकरण के विस्तार और उसे गहराई में ले जाने की जरूरी सचेत प्रक्रिया है। यह न्याय के लिए la?k"kZZरत सभी पक्षों के बीच पारस्परिक संवाद और सहमति विकसित करने की भी प्रक्रिया है।

¼ग½ न्याय की इन विभिन्न धाराओं में कोई एक धारा न्याय का एकमात्र सच्चा प्रतिनिधि होने] न्यायपूर्ण समाज की स्थापना की कुंजी होने का दावा नहीं कर सकती। कोई एक धारा अन्य सभी धाराओं का नेतृत्व करने की आत्म&मुग्ध प्रवंचना में दरअसल इन सभी धाराओं के बीच संवाद कायम करने और उनका साझा मंच बनाने की कोशिश में रुकावट ही डालेगी। इस तरह का कोई मंच पारस्परिक सम्मान] समानता और संवाद के जरिए ही साकार हो सकता है & श्रेष्ठ&निम्न का सोपानमूलक नेतृत्वकारी ढांचा इस दिशा में बाधक ही होगा। अपनी वैचारिकी] अपनी विरासत] अपने प्रतीकों और अपनी सांगठनिक विशिष्टताओं के साथ इन सभी धाराओं की स्वायत्तता के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता ऐसी किसी भी वृहत्तर एकता की शर्त है और इस एकता का आधार सभी धाराओं की मूल मांगों को समाहित करने वाला एक साझा कार्यक्रम ही हो सकता है।

आधुनिक काल में कम्युनिस्ट धारा एक ऐसी धारा रही है जो अपने पास एकमात्र वैज्ञानिक रूप से निरूपित सत्य का] सामाजिक क्रान्ति के सबसे विकसित और कमोबेश परिपूर्ण सिद्धांत होने का दावा करती रही है & यह दावा कि कम्युनिस्टों के नेतृत्व में होने वाली क्रांतियां और उनके नेतृत्व में स्थापित समाजवादी समाज अन्य सभी अन्यायों & वर्ग अन्याय के साथ& साथ लैंगिक] सामाजिक] राष्ट्रीय] आदि अन्यायों का अंत कर देगी। इसलिए प्राथमिक काम] उनकी नजर में] कम्युनिस्टों के नेतृत्व में समाजवादी समाज की स्थापना है। जब ऐसे दावे किए गए थे] तब लोगों ने काफी हद तक उन पर विश्वास भी जताया था। लेकिन बात आज सिर्फ इन दावों की नहीं है & बीसवीं सदी में अनेक बड़े और छोटे देश ऐसे समाजवादी प्रयोगों के गवाह बन चुके हैं] और ये प्रयोग इन दावों की पुष्टि नहीं करते हैं।

सत्ता और नीति&निर्माण से जुड़ी विभिन्न सामाजिक&राजनीतिक&आर्थिक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व की मांग न्याय के लिए चलने वाले आंदोलनों की सबसे प्राथमिक मांग रही है। अब अन्य धाराओं की बात छोड़ भी दें और सिर्फ नारी तथा दलित आंदोलन को ही लें] तो इन आंदोलनों के प्रतिनिधि यह वाजिब सवाल तो कर ही सकते हैं कि सात& आठ&नौ दशकों के बाद भी कम्युनिस्ट पार्टियों] ¼तथा जहां उनका शासन रहा] वहां½ समाजवादी देशों तथा प्रादेशिक सरकारों में इस प्रतिनिधित्व की क्या स्थिति रही पार्टी और सरकार की संस्थाओं में महिलाओं] दलित&आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदायों का प्रतिनिधित्व इतने लंबे काल के बाद भी नगण्य क्यों रहा जाहिर है] यह कोई छोटी& मोटी भूल नहीं] बल्कि गहरी सामाजिक समस्या की ओर इशारा करती है] और न्याय की विभिन्न धाराओं की स्वायत्तता की जरूरत को बल प्रदान करती है। इन देशों में न्याय की विभिन्न धाराओं के काम&काज की गुंजाइश भी नहीं छोड़ी गई & सब कुछ कम्युनिस्ट पार्टी के हवाले कर दिया गया और पार्टी का विरोध समाजवाद के विरोध और प्रतिक्रियावादी ताकतों के षड्यंत्र के बराबर करार दिया गया। 

इसी तरह का प्रश्न नारी] दलित] आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदायों के प्रतिनिधि पिछड़े वर्गों के सामाजिक न्याय के प्रतिनिधि दलों तथा नेतृत्व से भी कर सकते हैं। सामाजिक न्याय की धारा भी इन समुदायों की प्रतिनिधित्व की प्राथमिक मांग तक पूरा करने में न सिर्फ विफल रही है] बल्कि प्रायः इन समुदायों के प्रति अपनी ब्राह्मणवादी मानसिकता तथा व्यवहार का परिचय देती रही है। आजादी के बाद पिछड़े वर्गों से उभरे दबंग तबके दलितों] आदिवासियों और महिलाओं पर] और अनेक अवसरों पर अल्पसंख्यक समुदायों पर जुल्म ढाते रहे हैं] हत्याएं और जनसंहार तक करते रहे हैं] तथापि इन वर्गों से सामाजिक न्याय के आंदोलन के जरिए सामने आए राजनीतिक दल और नेता ऐसी ?kटनाओं की न सिर्फ अनदेखी करते हैं] बल्कि ऐसी वारदातों को अंजाम देने वालों का बचाव करते और उनके साथ संश्रय करते देखे जा सकते हैं।

¼?k½ न्याय की इन विभिन्न धाराओं के la?k"kZZ का स्तर भिन्न&भिन्न होता है। कहीं किसी प्रश्न पर la?k"kZZ काफी जुझारू स्तर पर हो सकता है] तो किसी दूसरे प्रश्न पर काफी प्राथमिक स्तर पर ¼बुनियादी स्तर की सामान्य गोलबंदी] मांग पत्र तैयार करने तथा सत्ता के समक्ष प्रतिनिधि मंडल भेजने के स्तर पर½। अपनी मांगों को संवैधानिक&कानूनी स्वरूप प्रदान करने के लिए न्याय की कोई धारा व्यापक आंदोलनों की पृष्ठभूमि में आंचलिक] प्रादेशिक अथवा केंद्रीय सत्ता में भागीदार भी हो सकती है] तो कोई दूसरी धारा अपने la?k"kZZ के क्रम में सत्ता के व्यापक दमन का शिकार भी। अपने देश में दलितों] पिछड़े वर्गों] आदि के आरक्षण का आंदोलन हो] या फिर अलग प्रान्त के लिए आंदोलन] भूमि सुधार के लिए किसानों के जुझारू आंदोलन हों] या फिर श्रम अधिकारों के लिए मजदूरों के आंदोलन & न्याय के लिए होने वाले विभिन्न la?k"kZks± की अवस्था में भिन्नता] उतार& चढ़ाव तथा सत्ता में प्रतिनिधित्व के मामले में अंतर हम प्रायः देखते रहे हैं। यह स्थिति भी न्याय की सभी धाराओं की एकजुटता में बाधा खड़ी करती है।

कुल मिलाकर] न्याय की विभिन्न धाराओं का सम्मिलित राजनीतिक मंच अथवा दल आंचलिक से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर कभी सत्तासीन नहीं हुआ है & हालांकि अलग&अलग धाराएं विभिन्न स्तरों पर सत्तासीन हुई हैं और अपनी कुछ बुनियादी और तात्कालिक मांगों को कानूनी और संवैधानिक स्वरूप प्रदान करने में सक्षम भी हुई हैं। जनतंत्र में प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच सत्ता के लिए होने वाली तीखी प्रतिद्वंद्विता की स्थिति में] छोटे दलों का महत्व भी बढ़ जाता है और ऐसे दल भी प्रायः अपनी कुछ मांगे मनवाने में सफल हो जाते हैं। अस्थिर] संविद सरकारों के दौर में कई महत्वपूर्ण संवैधानिक कदम उठाए गए और विधेयक पारित हुए।

बहरहाल] न्याय की विभिन्न धाराओं की तुलनात्मक स्थिति में यह भिन्नता शासक वर्गों को भी उनमें फूट डालने और उन्हें एक&दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने का अवसर प्रदान करती है।

¼ङ½ अंत में] हर धारा में] हर आंदोलन में ऐसे अवसरवादी तत्व भी होते हैं जो अपने निजी] संकीर्ण स्वार्थ में हर तरह के गैर&उसूली समझौतों के लिए तत्पर रहते हैं। 

उपर्युक्त स्थितियों को देखते हुए] न्याय की विभिन्न धाराओं की एकजुटता लगभग असंभव कार्य लग सकती है] फिर भी न्याय के लिए प्रतिबद्ध व्यक्तियों तथा समूहों के लिए इस एकजुटता के लिए प्रयत्नशील होना] तमाम अवरोधों तथा असफलताओं के बावजूद] एक निरंतर क्रिया है। यह दूरदृष्टि संपन्न अत्यंत कुशल नेतृत्व की मांग करता है। इसकी वैचारिक&सैद्धांतिक पृष्ठभूमि के निर्माण में तथा इस एकजुटता के लिए दबाव बनाने में बौद्धिक समुदाय की एक बड़ी भूमिका है। इस एकजुटता के बिना न्याय की शक्तियों का राजनीतिक सशक्तीकरण अधूरा] इकहरा रहेगा और अन्याय की ताकतों के लिए समाज का खतरनाक विभाजन करना अपेक्षाकूत आसान होगा।

डिजिटल युग

इन सारे परिवर्तनों के बीच दुनिया सूचना& संचार क्रांति के एक नए युग में प्रवेश कर गई है और यह डिजिटल युग हमारी दिनचर्या से लेकर उत्पादन] व्यवसाय] शिक्षा] मनोरंजन] मीडिया] आदि सभी क्षेत्रों में तेजी से दाखिल होता जा रहा है। इस क्रांति से सभी वर्ग और तबके अपने &अपने ढंग से प्रभावित हो रहे हैं] जनतांत्रिक राजनीतिक ढांचा भी इस परिवर्तन से गहरे रूप में आक्रांत है] जन आंदोलनों के संचालन और उनके तौर&तरीकों में आने वाला बदलाव तो हाल के वर्षों में देश और दुनिया में हुए बड़े&बड़े जन&उभारों पर नजर डालने से ही साफ हो जाएगा।

इतिहास में वैज्ञानिक&तकनीकी क्रांतियों ने सामाजिक परिवर्तन को कितना प्रभावित किया है] इसका ब्यौरा देना यहां जरूरी नहीं। सिर्फ गुटेनबर्ग और उनके छापाखाने तथा यूरोप के आधुनिक इतिहास में उसकी भूमिका को याद किया जा सकता है। बहरहाल] आज की तकनीकी क्रांति की अतुलनीय रफ्तार और उसके सामाजिक प्रभाव की बात ही कुछ और है।

भारत में इंटरनेट पर उपस्थिति आबादी के लिहाज से अभी बहुत ज्यादा नहीं है] फिर भी संख्या के लिहाज से महत्वपूर्ण अवश्य है। स्मार्टफोन के तेजी से बढ़ते बाजार के साथ और सूचना] व्यवसाय] शिक्षा] शासन] मनोरंजन] आदि के लिए विभिन्न एप्लिकेशनों के ऊपर बढ़ती निर्भरता के कारण उनकी संख्या में तेजी से विस्तार हो रहा है। जन&आंदोलनों के संगठन &संचालन] प्रचार&प्रसार में सोशल मीडिया बड़ी भूमिका अदा कर रहा है। बहरहाल] हर तकनीक की तरह इस तकनीकी क्रांति की भी दोहरी भूमिका है। यह जहां न्याय की शक्तियों के लिए उपयोगी है] तो वहीं अन्याय की शक्तियां भी इसका अपने हित में तरह&तरह से उपयोग कर रही हैं। संपत्ति के अप्रत्याशित 

संकेंद्री] प्रतिगामी विचारों के प्रचार&प्रसार] ?k`.kk के प्रचार] निजता के अधिकारों के हनन] जालसाजी] दमनात्मक कार्रवाइयों] हर समस्या के सतहीकरण@सरलीकरण] चेतना को चंचल क्षणों में भटकाने] आत्म&मुग्धता@आत्म&भ्रम की वायवीय दुनिया रचने] आदि में भी इसका धड़ल्ले से प्रयोग किया जा रहा है। कुल मिलाकर] वर्चुअल दुनिया खुद अन्याय और न्याय की ताकतों के बीच तीखे la?k"kZks± की दुनिया बन गई है और यह la?k"kZZ वास्तविक दुनिया में चलने वाले la?k"kZks± का न सिर्फ प्रतिबिंब है] बल्कि उसे बड़े रूप में प्रभावित भी कर रहा है।

इस तकनीकी क्रांति के फलस्वरूप सॉफ्टवेयर क्षेत्र में काम करने वालों की भारी तादाद सामने आई है। निजी क्षेत्र के सिर्फ बीपीओ@केपीओ सेक्टर में कर्मचारियों की संख्या करीब बारह लाख है जिसमें अच्छी& खासी संख्या महिला कर्मचारियों की है ¼टीसीएस में महिला कर्मचारियों की संख्या करीब चालीस फीसदी है½। इन कर्मचारियों की कार्यस्थितियां काफी दयनीय हैं] काम के ?kटे काफी ज्यादा हैं ¼यहां तक कि खाली समय का एक हिस्सा भी उनके काम के ?kटे में बेमोल शामिल कर लिया जाता है½। ये कार्यस्थितियां ¼लंबे समय तक रात के समय कंप्यूटरों पर काम करना] आदि½ अनेक नई पेशागत मानसिक तथा शारीरिक बीमारियों का कारण बन रही हैं। इन कर्मचारियों का कोई संगठन भी नहीं है और उन्हें अपने मालिकों की मनमानियों का प्रायः शिकार होना पड़ता है। नए डिजिटल युग के इन नए कर्मचारियों का &जिनकी भारी तादाद नवजवान हैं & संगठन और उनके बुनियादी अधिकारों का संरक्षण आज एक आवश्यक कार्यभार बन गया है। इसके साथ] सरकारी क्षेत्र में तथा संचार&सेवाओं के क्षेत्र में ऐसे कर्मचारियों ¼प्रोग्रामरों] सिस्टम एनेलिस्टों] डेटा साइंटिस्टों] आदि½ की संख्या जोड़ दें तो यह तादाद और बड़ी हो जाएगी। दरअसल] शासन] व्यवसाय और जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों में इन कर्मचारियों ने निर्णायक स्थान ग्रहण कर लिया है] लेकिन वे असंगठित हैं और सामान्य श्रम& अधिकारों से वंचित हैं। किसी ट्रेड यूनियन ने भी इस क्षेत्र में अभी पहलकदमी नहीं ली है।

जाहिर है] भविष्य के किसी श्रमिक आंदोलन और जन&la?k"kZZ में इन कर्मचारियों की काफी महत्वपूर्ण भूमिका होगी। इसका एक प्रमुख कारण व्यवसाय] शासन और जीवन के सभी क्षेत्रों की कंप्यूटर तथा इंटरनेट पर बढ़ती निर्भरता है। इन्हीं कर्मचारियों के बीच हैकर एक्टिविस्टों ¼हैक्टिविस्टों½ की कारगर टीम विकसित की जा सकती है जो जन&la?k"kZks± को प्रभावकारी धार प्रदान करेगी।

कुल मिलाकर] न्याय के आंदोलनों को सचेत रूप से डिजिटल युग की इन नई वास्तविकताओं के साथ तालमेल बिठाना होगा। आंदोलनों के पुराने रूप अब ज्यादा कारगर साबित नहीं होंगे और शासक वर्गों को उनसे निपटने में ज्यादा कठिनाई नहीं आएगी। आंदोलन के संगठन तथा जहरीले विचारों और अफवाहों के प्रचार] असली मुद्दों से ध्यान भटकाने के प्रयासों का पुरजोर जवाब देने के लिए जिस तरह सोशल मीडिया में एक कारगर टीम का होना जरूरी है] उसी तरह जन&la?k"kZks± के दौरान हैक्टिविस्टों की छापामार कार्रवाई भी जो शासन की विभिन्न दमनात्मक इकाइयों को पंगु बनाने तथा भटकाने का काम कर सकती है। अतीत में भी ऐसी टीमें जन&आंदोलनों का हिस्सा होती ही थीं & आज उनका डिजिटल कायांतरण जरूरी हो गया है।

कहने की जरूरत नहीं कि इन मामलों में शासक वर्ग पहले से ही काफी आगे हैं। सूचना& संचार के माध्यमों पर अपने प्रभुत्व के कारण] वे सार्वजनिक बहस के मुद्दे तय करते रहे हैं] वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाने के अनेक नापाक हथकंडे अपनाते रहे हैं] अफवाहों और डिजिटल जालसाजियों के जरिए समाज में जहरीला वातावरण बनाते रहते हैं। हालांकि हाल के दिनों में सोशल माडिया में सक्रिय न्याय की पक्षधर शक्तियां इसका कुछ हद तक प्रतिकार करने में सफल हुई हैं] फिर भी न्याय को समर्पित एक प्रतिबद्ध टीम का अब भी अभाव है।

व्यक्तियों] संगठनों तथा संस्थाओं का मूल्यांकन

व्यक्तियों] संगठनों और संस्थाओं का मूल्यांकन प्रायः न्याय की विभिन्न धाराओं के बीच तीखे विवाद का कारण बनता रहा है। इसलिए इस प्रश्न पर भी स्पष्ट दृष्टि अपेक्षित है।

¼क½ प्रत्येक पीढ़ी विरासत में अनेक विचार] संस्थाएं] संगठन और जीवन&मूल्य प्राप्त करती है और उन्हीं के बीच उनका लालन&पालन तथा प्रारंभिक विकास होता है। इन विचारों&संस्थाओं &मूल्यों में दोनों तरह की चीजें होती हैं & कुछ विचार] संस्थाएं तथा मूल्य न्याय के लिए समाज में चले आ रहे la?k"kZks± की उपज होते हैं और इस प्रकार न्याय के लिए होने वाले la?k"kZks± की आधार&भूमि का काम करते हैं] तो वहीं बहुत सारे विचार अन्याय को औचित्य प्रदान करते हैं] बहुत सारी संस्थाएं अन्याय को संस्थाबद्ध रूप प्रदान करती हैं] और बहुत सारे मूल्य अन्याय का पक्षपोषण करते हैं। वास्तविक जीवन में ये सारी स्थितियां इतने स्पष्ट खांचों में बंटी नहीं होतीं] बल्कि अनेक रूढ़ियों और पूर्वाग्रहों के साथ आपस में ?kqyh&मिली होती हैं।

किसी भी देश में प्रचलित विचार&शाखाओं] संस्थाओं तथा जीवन&मूल्यों की ¼कुलमिलाकर] समाज में प्रचलित सामाजिक&आर्थिक& सांस्कूतिक जीवन की½ समालोचना के जरिए ही आज के दौर के लिए प्रासंगिक तथा व्यावहारिक न्याय का विचार] कार्यक्रम और कार्यभार आकार ग्रहण करता है। यह एक श्रमसाध्य वैचारिक और व्यावहारिक अनुशीलन की मांग करता है। आज के जमाने के ऐसे सभी नायकों तथा प्रतीक पुरुषों को इस श्रमसाध्य बौद्धिक और व्यावहारिक प्रक्रिया से गुजरना पड़ा है।

प्रायः ऐसा देखा जाता है कि हमारे मन& मस्तिष्क में व्यक्तियों] संस्थाओं तथा मूल्यों की एक आदर्श] अमूर्त छवि होती है और उसी छवि के आधार पर हम व्यक्तियों तथा संस्थाओं का मूल्यांकन करने लगते हैं और निराश हो जाते हैं। यथार्थ जीवन में कहीं भी ऐसे आदर्श व्यक्तियों तथा संस्थाओं का अस्तित्व नहीं होता जो न्याय की सभी कसौटियों पर खड़ा उतरे ¼कुछेक अपवादों को छोड़कर½। किसी भी व्यक्ति अथवा संस्था द्वारा अपने चुने गए कार्यक्षेत्र और उस क्षेत्र में उनके अवदान के आधार पर ही उनका मूल्यांकन उचित है। जाहिर है] अन्य क्षेत्र में उनका विचार और व्यवहार नकारात्मक हो सकता है] और इस लिहाज से उस क्षेत्र में काम करने वालों द्वारा उनकी आलोचना भी न्यायोचित होगी। अक्सर हम व्यक्तियों तथा संस्थाओं के मूल्यांकन में इस द्वैत स्थिति को मानने के लिए तैयार नहीं होते और एक&आयामी] इकहरे विश्लेषण के शिकार हो जाते हैं।

कोई व्यक्ति या संस्था न्याय के किसी एक क्षेत्र में नायक के रूप में उभरता है तो हम यह अपेक्षा करते हैं कि वह न्याय की सभी कसौटियों पर खरा उतरे। यह अपेक्षा करना गलत नहीं है] बल्कि वैसा हो] यह हमारा लक्ष्य है। लेकिन यथार्थ जीवन में ऐसे आदर्श व्यक्तियों तथा संस्थाओं का हम सामना नहीं करते। संतुलित मूल्यांकन की यह मांग है कि हम किसी व्यक्ति या संस्था के अपने चुने गए कार्य&क्षेत्र में योगदान को स्वीकार करें और उसे यथोचित सम्मान दें तथा अन्य मामलों में उनकी आलोचनाओं को भी स्थान दें। ऐसा नहीं होने पर ¼चूंकि कोई भी व्यक्ति या संस्था पूर्ण या आदर्श नहीं है½ हम किसी को भी उसकी कमियों] अपूर्णताओं और गलतियों का हवाला देकर उसकी लानत& मलामत कर सकते हैं] उसे मटियामेट कर सकते हैं & सार्विक निंदक की भूमिका से किया गया ऐसा मूल्यांकन हमें कहीं नहीं ले जाएगा। बेवजह आरोप&प्रत्यारोप के अंतहीन सिलसिले में फंस कर हम खुद अकेले रह जाएंगे] निष्क्रिय निंदक की भूमिका में। आखिर उस भूमिका में भी हम टिक नहीं पाएंगे क्योंकि हम खुद भी आदर्श और पूर्ण नहीं हैं।

न्याय तथा सामाजिक बेहतरी के लिए चलने वाले लगभग सभी आंदोलनों] उनके नायकों और उन्हें संचालित करने वाले संगठनों को खासकर नारी तथा दलित&आदिवासी समुदायों की गंभीर आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है] और ये आलोचनाएं वाजिब भी हैं] क्योंकि नारियों और दलित&आदिवासी समुदायों को समानता और सम्मान के आधार पर ऐसे आंदोलनों में भी प्रायः वाजिब स्थान तथा प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं हुआ है। इन आंदोलनों में अपनी पर्याप्त सक्रिय भागीदारी के बावजूद] इन आंदोलनों के नेतृत्व तथा नीति&निर्माण की संस्थाओं में पुरुष और पुरुष ही दिखाई देंगे और वह भी ज्यादातर सवर्ण समुदायों से आए हुए पुरुष & प्रायः अपने नारी&विरोधी] दलित& आदिवासी& विरोधी पूर्वाग्रहों तथा रूढ़िवादी धारणाओं के साथ। किसी भी आधार पर इस स्थिति को औचित्य प्रदान नहीं किया जा सकता।

¼ख½ कुल मिलाकर] इतिहास में अब तक मनुष्य के रूप में पहचान के ऊपर जन] जाति] वर्ग&तबका] धन] आदि के रूप में पहचान हावी रहा है और इन पहचानों के बीच ^श्रेष्ठ&निम्न^ की श्रेणियां रही हैं। मनुष्य खुद कोई ^आदर्श^ प्राणी नहीं रहा है"उसके जनों] जातियों] पंथों] वर्गों] राष्ट्रों] आदि के बीच रक्तपात] युद्ध] जनसंहार] झूठ&फरेब] जालसाजी] विश्वासद्घात] अनेक ज?kन्य विकूत आचरणों का अनवरत्‌ सिलसिला आज तक चलता आ रहा है & आज दुनिया के मानचित्र पर नजर डालने भर से इस वीभत्स सिलसिले का अंदाजा लगाया जा सकता है।

बहरहाल] इसी रक्तपात और विकूतियों के बीच उसने आश्चर्यजनक आविष्कार भी किए हैं"उद्यमिता के हैरतअंगेज कारनामों को भी अंजाम दिया है"विचार और व्यवहार में मानवता] न्याय] प्रेम] सत्य] अहिंसा] त्याग आदि के अप्रतिम उदाहरण भी पेश किए हैं"और कला&संस्कूति के क्षेत्र में एक&से&एक प्रतिमान कायम किए हैं। मनुष्य का यह द्वैत चरित्र खुद उसके मिथकों] उसकी अनेक कलाकूतियों और रचनाओं में भी प्रभावी रूप से अभिव्यक्त हुआ है। आज भी हम व्यक्ति और समाज के रूप में विरासत में प्राप्त इस द्वैत को] ¼एक ही साथ और एक ही समय में½ अपनी विकूत क्षुद्रताओं तथा उत्कूष्ट उदात्त भावों को जी रहे हैं।

इस पृष्ठभूमि में हम पाते हैं कि किसी एक क्षेत्र में अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करने वाला व्यक्ति किसी दूसरे क्षेत्र में अत्यंत निंदनीय@ अमानवीय भूमिका में खड़ा होता है। विज्ञान के क्षेत्र में अपने आविष्कार से मानवजाति को समृद्ध करने वाला कोई वैज्ञानिक नस्लवादी भी हो सकता है। कला की दुनिया में अपनी कूतियों से चकित करने वाला कलाकार स्त्रियों को प्रताड़ित करने वाला मर्दवादी भी हो सकता है। भाषा&साहित्य में अपने अतुलनीय योगदान के लिए जाना जाने वाला व्यक्ति जातीय भेदभाव और उत्पीड़न पर आधारित ब्राह्मणवादी समाज& व्यवस्था का समर्थक हो सकता है। अपनी उद्यमिता से शानदार कारनामों को अंजाम देने वाला व्यक्ति दास&प्रथा अथवा श्रमिकों के शोषण का हिमायती भी हो सकता है। आदि] आदि। अपने भीतर तथा अपने आसपास नजर दौड़ाकर ही हम इस सत्य का सहज साक्षात्कार कर सकते हैं।

ऐसी स्थिति में] एक ¼असंभव½ आदर्श नायक की तलाश में लगे रहने] अथवा एक ¼निष्क्रिय½ सार्विक निंदक की भूमिका अपनाने के बजाय हमें जीवन के किसी भी क्षेत्र में सकारात्मक योगदान करने वाले को समुचित सम्मान देने तथा अन्य क्षेत्रों में] प्रसंगानुसार] उसके नकारात्मक विचारों और आचरणों की आलोचना करने की संतुलित दृष्टि अपनानी चाहिए। यह दृष्टि मानवजाति की समस्त सकारात्मक विरासत से हमें जोड़ती है] न्याय के पक्ष में प्रत्येक संभावित समूहों को एकजुट करने में सहायता प्रदान करती है और सर्वोपरि] ज्ञान और व्यवहार के क्षेत्र में खुद को ^आदर्श^ समझने अथवा^न्यायाधीश^ की भूमिका अपनाने के भ्रमजाल से मुक्त कर विनम्र बनाती है। यह विनम्रता न्याय की स्वाभाविक सहचर है] जिसके बिना न्याय का कोई साझा मंच या la?k"kZZ व्यावहारिक रूप से सफल नहीं हो सकता।

इसलिए] मिथकों] इतिहास] नायकों] आदि के प्रश्नों से आगे जाकर हमें न्याय के साझा कार्यक्रमों और कार्यभारों के आधार पर साझा मंच और साझा la?k"kZZ विकसित करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और उन्हीं आधारों पर एकजुट होना चाहिए। अन्य प्रश्नों पर हमें एक दूसरे को समझने] विभिन्न परिप्रेक्ष्यों और दृष्टियों को यथोचित स्थान देने तथा असहमति के बिंदुओं पर स्वस्थ संवाद चलाते रहने का प्रयास करना चाहिए। यह पद्धति हमें निरर्थक विवादों और गुटबंदियों में अपनी ऊर्जा बर्बाद करने के बजाए] न्याय के प्रश्न पर बनी व्यापक सहमति को धरातल पर उतारने के वैचारिक तथा व्यावहारिक प्रयासों पर ध्यान केंद्रित करने की ओर प्रोत्साहित करती है।

^सत्य^ का ^एकमात्र^ अधिकारी होने के अहंकारपूर्ण दावों ने न्याय के आंदोलनों को समय&समय पर काफी क्षति पहुंचाई है। इस क्षुद्र अहंकार के विपरीत विनम्रता के महत्व को समझने के लिए किसी किताबी ज्ञान की जरूरत नहीं & सिर्फ अपने शरीर और मन पर ही नजर दौड़ाना काफी है। हम अपने रोजमर्रे के जीवन में चलते&फिरते&काम करते विरासत में प्राप्त न मालूम कितने ज्ञान ढोते होते हैं & जो कपड़ा हम पहने होते हैं] उसके पीछे हजारों वर्षों पुरानी ज्ञान परंपरा है"हम नहीं जानते कब किसने कपास उगाया] किसने उसे ओटा] किसने सूत काता] कपड़ा बुना। यही बात हमारे जूतों] कलमों] चश्मों] ?kड़ियों] मोबाइल] आदि पर भी लागू होती है। हम हमेशा न मालूम कितना ज्ञान&कोष अपने साथ लिए चलते हैं। हमें उनके आविष्कारकों&कारीगरों का पता नहीं होता] न हमें उन आविष्कारकों&कारीगरों की वैचारिक& राजनीतिक&सामाजिक प्रतिबद्धताओं का पता होता है। यह लिखते वक्त भी हमें याद रखना चाहिए कि लिपियों के विकास में हजारों वर्षों के काल&क्रम में अनेक समाजों और व्यक्तियों का योगदान रहा है। जारी+ + +

 
         
 
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  • देवी प्रसाद त्रिपाठी

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