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मेरी बात अपूर्व जोशी
 
फैसला इतिहास करेगा
  • अपूर्व जोशी

संपादक] दि संडे पोस्ट 

अपने पुराने लिखे को पढ़ता हूं तो अपनी ही समझ पर गहरा पछतावा होता है। तारीफों के कसीदे लिखे] उम्मीदों का पहाड़ अपने इन मित्रों से मैंने और मुझ सरीखे लाखों ने लगा लिया था। मात्र पांच बरस में सब कुछ बदल गया। अरविंद केजरीवाल] स्वराज को धरातल में उतारने की क्षमता रखने वाला हमारा हीरो] आज सत्ता के लिए हर प्रकार के समझौते करने को तैयार एक ऐसे राजनेता में बदल गया है] जो पहले से ही ढेर सारी तादाद में हमारे मुल्क में मौजूद हैं। केजरीवाल सरकार ने दिल्ली के गरीब&गुरबा को राहत पहुंचाने की नीयत से कई स्वागतयोग्य कदम उठाए हैं] स्वास्थ्य और शिक्षा में सुधार के लिए जमीनी स्तर पर काम करने का प्रयास भी किया है। इन कार्यों को देखता हूं तो सरकार की पीठ थपथपाने का मन करता है। फिर नजर इनके विचलनों पर जा टिकती है] इतने गहरे दाग इनकी उज्ज्वल छवि में लग चुके हैं कि जो कुछ अच्छा किया वह शून्य प्रतीत होता है। इसलिए अपने मित्रों पर यह आलेख बहुत दुख] आक्रोश के साथ लिख रहा हूं। इतना अवश्य कह सकता हूं जो कहने जा रहा हूं उसमें लाखों आप समर्थकों का चीत्कार समावित है] जो आप और अन्ना आंदोलन के हश्र से हतोत्साहित हैं] आक्रोशित हैं जिसके चलते रामलीला मैदान में पुनः अनशन पर जा बैठे अन्ना हजारे इनके लिए अप्रसांगिक हो चुके हैं

अन्ना आंदोलन के दौरान आम आदमी पार्टी के वर्तमान नेतृत्व संग मुलाकात हुई जो बाद में मित्रता में परिवर्तित हो गई। बड़ा भरोसा] बड़ी उम्मीदें अन्ना आंदोलन से तो थी हीं] ^आप^ गठन बाद इन उम्मीदों का विस्तार भी हुआ। ऐसा लगने लगा था कि अब स्थापित राजनीतिक ताकतों से मायूस हो चले मुल्क को एक मजबूत] ईमानदार और जनसरोकारों से लबरेज विकल्प मिल गया है। पांच बरस पुरानी इस पार्टी के कामकाज का लेखा& जोखा करने बैठा तो निराशा मन&मस्तिष्क में हावी है। ठगे जाने] छले जाने का एहसास कहीं गहरे भीतर पसर चुका है। अपने पुराने लिखे को पढ़ता हूं तो अपनी ही समझ पर गहरा पछतावा होता है। तारीफों के कसीदे लिखे] उम्मीदों का पहाड़] अपने इन मित्रों से मैंने और मुझ सरीखे लाखों ने लगा लिया था। मात्र पांच बरस में सब कुछ बदल गया। अरविंद केजरीवाल] स्वराज को धरातल में उतारने की क्षमता रखने वाला हमारा हीरो] आज सत्ता के लिए हर प्रकार के समझौते करने को तैयार एक ऐसे राजनेता में बदल गया है] जो पहले से ही ढेर सारी तादात में हमारे मुल्क में मौजूद हैं। केजरीवाल सरकार ने दिल्ली के गरीब&गुरबा को राहत पहुंचाने की नीयत से कई स्वागतयोग्य कदम उठाए हैं] स्वास्थ्य और शिक्षा में सुधार के लिए जमीनी स्तर पर काम करने का प्रयास भी किया है। इन कार्यों को देखता हूं तो सरकार की पीठ थपथपाने का मन करता है। फिर नजर इनके विचलनों पर जा टिकती है] इतने गहरे दाग इनकी उज्ज्वल छवि में लग चुके हैं कि जो कुछ अच्छा किया वह शून्य प्रतीत होता है। इसलिए अपने मित्रों पर यह आलेख बहुत दुख] आक्रोश के साथ लिख रहा हूं। इतना अवश्य कह सकता हूं जो कहने जा रहा हूं उसमें लाखों आप समर्थकों का चीत्कार समावित है] जो आप और अन्ना आंदोलन के हश्र से हतोत्साहित हैं] आक्रोशित हैं जिसके चलते रामलीला मैदान में पुनः अनशन पर जा बैठे अन्ना हजारे इनके लिए अप्रसांगिक हो चुके हैं।

ईमान से समझौता करने वालों का हश्र बेहद कष्टकारी होता है। स्वयं उनके लिए भी और उन पर विश्वास करने वालों के लिए भी। आम आदमी पार्टी] विशेषकर उसके शीर्ष नेतृत्व का] अपने द्घोषित सरोकारों से भारी विचलन उनको भले ही तात्कालिक तौर पर सत्ता का सुख दे रहा हो] जनआंदोलनों के भविष्य पर उसने बड़ा dqBkjk?kkr किया है। डॉ ऱाममनोहर लोहिया कहा करते थे ^सत्य की अवधारणा एक ऐसी रेखा है जिसके एक सिरे पर हां है तो दूसरे सिरे पर ना और दोनों के बीच हां&ना के अलग& अलग रंग हैं।^ आम आदमी पार्टी के चाल& चरित्र और चेहरे को इस कथन के बरक्स परखा जाए तो सत्य कहीं नजर नहीं आता। अन्ना आंदोलन दरअसल सही अर्थों में जनआंदोलन ना होकर सोशल मीडिया आंदोलन था जिसे नाना प्रकार की व्याधियों से पीड़ित देश को एक बेहद सोची& समझी राजनीति के तहत परोसा गया। भ्रष्टाचार को हरेक व्याधि के मूल में छिपा संक्रामक कीटाणु समझ जनमानस लोकपाल को इसका इलाज मानने की भूल कर बैठा। अन्ना हजारे को इस आंदोलन का चेहरा बनाया जाना भी एक रणनीति का हिस्सा था। टीम केजरीवाल] विशेषकर केजरीवाल छटपटा रहे थे कि कैसे सेलीब्रेटी बन सकें। केजरीवाल ने भारतीय राजस्व सेवा के अफसर रहते अपनी संस्था ^परिवर्तन^ की नींव रखी थी। दिल्ली के सुंदर नगर स्लम में वे जनसेवा करते थे। इन्कम टैक्स विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ भी वे मुखर रहते थे। उनके सहयोगी इन्कम टैक्स के कार्यालयों में धरना& प्रदर्शन करते] अपने टैक्स रिफंड को लेकर परेशान लोगों को भ्रष्ट आईटी अफसरों से निजात दिलाने का यह तरीका अरविंद के एक्टिविस्ट चेहरे को सामने लाने में कामयाब रहा। केजरीवाल अरुणा रॉय के संगठन ^नेशनल कम्पैन फॉर पीपुल्स राइट् टू इंफॉरमेशन^ से भी उसी दौरान जुड़ गए थे। आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्याओं के दौर में अरुणा रॉय के संगठन ने तय किया कि एक कानून की रूप&रेखा बनाई जाए जो ना केवल भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड़ रहे योद्धाओं की पहचान सुरक्षित रख सके] बल्कि भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में भी सक्षम हो। इस उद्देश्य के लिए पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण] उनके वकील पुत्र प्रशांत भूषण] उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश संतोष हेगड़े और केजरीवाल का चयन किया गया। इन लोगों ने मिलकर जनलोकपाल बिल का पहला मसौदा तैयार किया। आज जिन शांति भूषण के नाम पर ही केजरीवाल बिदक जाते हैं] जनलोकपाल बिल को पहली बार संसद में पेश करने वाले यही शांति भूषण थे। प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के कहने पर इस प्रकार की संस्था के निर्माण का काम प्रसिद्ध कानूनविद् डॉ ़ एमएम fla?koh ने १९६० के दशक में शुरू किया था। वर्तमान कांग्रेस नेता अभिषेक मनु fla?koh के पिता डॉ ़ fla?koh ने ही लोकपाल शब्द को ईजाद किया। चौथी संसद में शांति भूषण ने जनलोकपाल बिल को पेश किया जो राज्यसभा से पारित नहीं हो सका था। आज लोकपाल की परिकल्पना का श्रेय केजरीवाल भले ही लूट लें लेकिन वे स्वयं सत्ता में आने के बाद ऐसी किसी भी व्यवस्था के पक्ष में खड़े नहीं हैं। उनकी पार्टी तक में आंतरिक लोकपाल का ना होना] उनकी कथनी और करनी पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है। बहरहाल इस पर चर्चा  बाद में। पहले समझा जाए कि आखिर कैसे जन विश्वास को छलने की राणनीति बनी और क्योंकर कामयाब हुई। केजरीवाल इस शताब्दी के पहले दशक में अपने को एक एक्टिविस्ट के तौर पर स्थापित कर पाने में सफल रहे थे। अब वे कुछ ऐसा बड़ा करना चाहते थे जो उनकी महत्वाकांक्षा को अंजाम तक पहुंचाने का सही माध्यम बन सके। यह कह पाना कठिन है कि केजरीवाल की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का बीज उनके एक्टिविस्ट होने के दिनों से ही पड़ चुका था अथवा जनलोकपाल आंदोलन को मिली अप्रत्याशित सफलता ने केजरीवाल की महत्वाकांक्षाओं को नई उड़ान दी। इतना तय है कि महात्मा गांधी के स्वराज को अपनाने वाले अरविंद गांधी के ^साध्य और साधन^ की नीति पर यकीन पहले से ही नहीं करते थे। उनके लिए लक्ष्य तक पहुंचना अंतिम ध्येय था और है जिसे पाने के लिए वे किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं। जनलोकपाल आंदोलन के शुरुआती दौर में बाबा रामदेव] श्रीश्री रविशंकर] स्वामी अग्निवेश को साथ लेना उनकी इसी रणनीति का हिस्सा था। ^आप^ के संस्थापक सदस्य मयंक गांधी ने अपनी पुस्तक ^ऑफ एण्ड डाउन&इन्साइड स्टोरी ऑफ इंडियाज मोस्ट कंट्रोवर्सियल  पार्टी^ में केजरीवाल की यूज एण्ड थ्रो नीति का उल्लेख करते हुए लिखा है कि ^जब मैंने भगवा रंग&धारियों के आंदोलन से जुड़ने पर अल्पसंख्यक समाज के आशंकित होने की बात कही तो केजरीवाल का उत्तर था यह उचित आशंका है लेकिन इन लोगों के पास बड़ा जनसमूह है जिसकी हमें अभी आवश्यकता है। बाद में तय करेंगे कि इस भगवा बिग्रेड से कैसे निपटा जाए।^ केजरीवाल के अत्यंत करीबी साथी रहे मयंक लिखते हैं  'As I Later Learnt, this was typical Arvind’s style  of functioning-use some one for the short time and start working on his exit parallelly'A  केजरीवाल ने कुछ बड़ा करने की अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए जनलोपाल और अन्ना हजारे को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया। आठ अक्टूबर] १९७८ को जेपी ने जब अंतिम सांस ली] तब दिल्ली की सत्ता पर उनके चेलों का कब्जा था। जिस संपूर्ण क्रांति की उन्होंने बात कही] वह उनके चेलों ने होने नहीं दी। जनता शासन में भ्रष्टाचार तेजी से परवान चढ़ा। बाद के वर्षों में इसी जनता परिवार के कई सदस्यों ने अपने संगठन खड़े किए। कई राज्यों में इनकी सरकारें बनी लेकिन स्थितियों में रत्ती भर भी सुधार नहीं हुआ। इसमें कोई संदेह नहीं कि विकल्पहीनता के दंश से छटपटाते समाज ने अन्ना आंदोलन को सत्तर के दशक में हुए जयप्रकाश आंदोलन की भांति लपक लिया। जेपी ने संपूर्ण क्रांति का आह्वान किया था। जनमानस उनके इस आह्वान पर सड़कों पर उतर आया। इंदिरा गांधी सत्ततर के आम चुनाव में सत्ता से तो बाहर हो गई लेकिन व्यवस्था में कोई परिवर्तन दूर&दूर तक देखने को नहीं मिला। जनता परिवार अपने नेताओं की संकुचित सोच और महत्वाकांक्षा के चलते मात्र ढाई बरस में ही टूट गया। जेपी स्वयं अपने इस प्रयोग की असफलता से पूरी तरह टूट गए थे। उनका अंतिम समय बेहद अवसाद में बीता। अन्ना आंदोलन के दौरान अपने एक लेख में मैंने स्वामी रामदेव सरीखों के इस आंदोलन में शामिल होने पर जो लिखा था] वह बाद में सही साबित हुआ& ^इंडिया अगेंस्ट करप्शन^ की सबसे बड़ी कमजोरी उसके सांगठनिक ढांचे का न होना है। इसलिए झक मार कर उसे रामदेव की शरण में जाना पड़ा है। उनके इस कदम को मैं हताशा के चलते उठाया हुआ कदम मानता हूं। चूंकि इस कदम से यह आंदोलन अंततः कमजोर होगा इसके चलते ही मैं खिन्नता का अनुभव कर रहा हूं। डॉ ़ राममनोहर लोहिया ने संगठन के बाबत कहा है कि ^चाहे हमें असफलता बहुत अरसे तक मिलती रहे] पर ज्यादा अच्छा यही होगा कि हम लोग अपने समाजवाद को अनपढ़] असहाय] गरीब और मूक लोगों के आधार पर बनाएं। मैं समझता हूं हिन्दुस्तान में उसी से क्रांति आ सकती है।^ अन्ना को भी चाहिए कि वे अपने आंदोलन को व्यापकता देने और उसकी जड़ों को मजबूत करने के लिए सीधे जनता से संवाद स्थापित करें। भले ही मीडिया और राजनेता कितना भी विरोध क्यों न करें] आज भी आम जनता के बीच अन्ना हजारे का जादू बरकरार है। आज भी अपने तारणहार के तौर पर देश की एक बड़ी आबादी अन्ना को ताक रही है। यदि अन्ना ऐसा करने के बजाय रामदेव और उनके जैसे अन्य स्वनामधन्य महापुरुषों का सहारा ले अपने आंदोलन को चलाने] उसे सिरे चढ़ाने का स्वप्न देख रहे हैं तो फिर इस आंदोलन को और अन्ना को इतिहास के डस्टबिन में डालने का समय नजदीक आ गया है। रामदेव की संगत इस आंदोलन को और आंदोलन से जगी आस को गर्त में धकेलने का कारण बनेगी। 

संपूर्ण क्रांति के नाम पर हुए आंदोलन की इस परिणति के लगभग चार दशक बाद यानी दो से तीन पीढ़ियों बाद ही जनमानस में आंदोलनों के प्रति जबरदस्त उत्साह अन्ना आंदोलन के दौर में देखने को मिला। हालांकि केवल एक जनलोकपाल बना देने से भ्रष्टाचार समाप्त हो जाने की व्यर्थता तब भी एक बड़ा वर्ग समझ रहा था लेकिन कम से कम देश की राजनीति में एक विकल्प के उभरने की आस के चलते हर वर्ग ने इस आंदोलन को अपना समर्थन दिया। आम आदमी पार्टी का जन्म भले ही अन्ना हजारे के विरोध बावजूद हुआ हो] केजरीवाल के इस निर्णय को माइनस अन्ना भी जनता ने यदि स्वीकारा तो उसके मूल में भी वर्तमान राजनीतिक दलों से उपजी गहरी निराशा और नौजवानों का वह जज्बा था जिस पर भरोसा कर जनमानस ने इनके अंतर्विरोध और विचलन को नजरअंदाज कर दिल्ली में इन्हें दो बार सरकार बनाने का मौका दे डाला।  

२०१३ के दिल्ली विधानसभा चुनाव में केजरीवाल का राजनीतिक दल बना मैदान में उतरना] मुझ सरीखे उनके कई समर्थकों को अखरा था। तब मैंने लिखा था& अब प्रश्न यह उठता है कि क्या अरविंद केजरीवाल राजनीति के अखाड़े में अपनी धमाकेदार इंट्री के बाद कुछ प्रभाव भी छोड़ पाएंगे हालांकि अभी चुनावी नतीजे सामने नहीं आए हैं। दिल्ली की जनता का आप के प्रति उमड़ा प्रेम कितना विधानसभा की सीटों में तब्दील होता है] यह आठ दिसंबर को ही पता चलेगा। लेकिन केजरीवाल राजनीति की मुख्यधारा में प्रवेश ले चुके हैं और उनको हल्के में लेने वाले राजनेता भविष्य में कभी ऐसी भूल नहीं करेंगे यह तय है। इसलिए इस पर चर्चा होनी आवश्यक हो जाती है कि केजरीवाल कैसे सिस्टम के भीतर ?kqldj उसका हिस्सा बनकर उसकी खामियों को दूर करेंगे कैसे वे पूरी तरह सड़&गल चुकी व्यवस्था को पुनर्जीवन दे पाएंगे भ्रष्टाचार से मुक्ति आम आदमी पार्टी के चुनावी एजेंडे का एक बड़ा मुद्दा है। संकट यह है कि केवल राजनेता या नौकरशाह ही अकेले भ्रष्ट नहीं हैं। राजतंत्र के साथ&साथ हमारा समाज भी बुरी तरह इस बीमारी के चंगुल में है। चपरासी से लेकर मंत्री तक] संतरी से लेकर कमिश्नर तक] धनाढ़य वर्ग से लेकर हाशिए पर पड़े कतार के अंतिम आदमी तक को इस बीमारी ने अपने प्रभाव में ले लिया है। केजरीवाल कैसे इससे निजात दिला पाएंगे यह यक्ष प्रश्न है। उनकी पार्टी ने बहुत जांच&परख कर अपने उम्मीदवार खड़े किए लेकिन गंभीर आरोपों के चलते कइयों को अंतिम समय में बदलना पड़ा। अभी भी कई ऐसे नाम हैं जिन्होंने आप के टिकट पर चुनाव लड़ा लेकिन जिन पर भ्रष्टाचार में लिप्त होने के आरोप जनता लगा रही है। मैं यह नहीं कह रहा कि आरोप सही ही हैं लेकिन आरोप झूठे हैं ऐसा भी कह पाना संभव नहीं। तब कैसे केजरीवाल अपने ही विधायकों के आचरण की गारंटी दे सकते हैं मयंक गांधी ने गलत प्रत्याशियों के चयन पर पार्टी भीतर सवाल किया तो मनीष सिसौदिया का कथन था& ‘Mayank bhai, principles  sound good on paper. What we are now in the middle of is a war. We will have to let go certain things. Once we win the Delhi elections, we will get back on track’ मयंक भाई सिद्धांत कागज में ही अच्छे नजर आते है। अभी हम युद्ध के मैदान में हैं] जहां कई चीजों को नजर अंदाज करना पड़ता है। दिल्ली से चुनाव जीतने के बाद हम वापस अपने मार्ग को पकड़ लेंगे।½

बहरहाल अल्प समय के la?k"kZ का ऐसा शानदार नतीजा इनके आदर्शवाद पर भारी पड़ गया। केजरीवाल इस जनभरोसे को सहेज कर ना रख पाए तो इसके पीछे सबसे बड़ा कारण उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का होना रहा है। जिसकी पूर्ति के लिए आज वे हर प्रकार का समझौता करते नजर आ रहे हैं। जिस व्यक्ति ने लोकपाल कानून ना बना पाने की अपनी विवशता से खिन्न हो दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से मात्र सैंतालिस दिन में इस्तीफा दे दिया हो] वही व्यक्ति सत्ता के लिए इस कदर लालायित हो उठा कि जिस कांग्रेस को भ्रष्टतम बता सत्ता में बने रहने के लिए उनका बेशर्त समर्थन तक ठुकरा दिया] उसी कांग्रेस के समर्थन से दोबारा सरकार बनाने के लिए तमाम प्रकार की जोड़&तोड़ शुरू कर दी। यह २०१४ के आम चुनावों में मिली करारी हार से उपजी निराशा के चलते एक हताश व्यक्ति के पतन की शुरुआत थी। आम आदमी पार्टी की शीर्ष आंतरिक संस्था पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी ने केजरीवाल के इस प्रस्ताव को बहुमत से ठुकरा दिया था लेकिन सत्ता लोलुपता आदर्श पर भारी पड़ गई। केजरीवाल ने पीएसी के निर्णय को अनसुना कर कांग्रेस को मनाने का भरपूर प्रयास किया। यह दीगर बात है कि वे कांग्रेस नेतृत्व को राजी ना कर सके और दिल्ली में दोबारा चुनाव हुए। केजरीवाल के तानाशाह बनने की प्रक्रिया अब अपने चरम पर पहुंच चुकी थी। दिल्ली की जनता ने उन्हें अभूतपूर्व जनादेश दे दोबारा सत्ता पर जो बैठाया] उसका एक बड़ा असर ^स्वराज^ के इस Lo?kksf"kr पैरोकार का निर्मम तानाशाह बन उभरना है। पार्टी के संस्थापक सदस्य प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव को बेइज्जत कर बाहर किया जाना] आंतरिक लोकपाल एडमिरल ¼सेनि½ रामदास को हटाना] २०१५ में हुए दिल्ली विधानसभा चुनावों में पार्टी टिकटों का वितरण जितेंद्र तोमर सरीखे लोगों को मंत्री बनाना और पार्टी भीतर अपने खिलाफ उठने वाली हर आवाज को कुचलना] आज के केजरीवाल का सच है। भले ही समाजवादी पृष्ठभूमि से आए संजय सिंह] अपने नेता का कितना भी बचाव कर लें] इस सत्य को वे झुठला नहीं सकते कि उनकी पार्टी और उसका नेतृत्व भारी विचलन का शिकार हो चला है। राज्यसभा की तीन सीटों में से दो पर जिन महानुभावों को चयनित किया गया] उनकी योग्यता और जनसरोकारिता की बाबत केजरीवाल के अलावा शायद ही कोई कुछ जानता हो। जाहिर है पारदर्शिता और सार्वजनिक जीवन में शुचिता के नाम पर सत्ता तक पहुंचे इन नौजवानों] विशेषकर अरविंद केजरीवाल] मनीष सिसौदिया] संजय सिंह] गोपाल रॉय] आशुतोष द्वारा जनता जनार्दन और उन सैकड़ों समर्थकों संग किया गया ऐसा धोखा है] जिसकी क्षतिपूर्ति ये शायद ही कर पाएं। रामधारी सिंह दिनकर की कविता है& ^समर शेष है] नहीं पाप का भागी केवल व्याध] जो तटस्थ हैं] समय लिखेगा उनका भी अपराध।^ आज नहीं तो कल संजय सिंह जैसे खांटी जनसरोकारियों को जवाब तो देना ही होगा कि क्योंकर वे ऐसे हर विचलन पर खामोश रहे जिसके चलते ना केवल अन्ना आंदोलन] आम आदमी पार्टी] बल्कि भविष्य में हो सकने वाले आंदोलनों पर भी प्रश्नचिह्न लग चुका है। यहां यह समझाया जाना भी महत्वपूर्ण है कि आप सरकार जिन बातों पर इतरा रही है] चाहे वह मौहल्ला क्लीनिक हों या फिर शिक्षा] बिजली और पानी के क्षेत्र में उनके द्वारा कराए गए काम हों] निश्चित ही बदलाव स्वागत योग्य है लेकिन इन्हें केवल सुधारों की श्रेणी में ही रखा जा सकता है। कांग्रेस ने लंबे अर्से तक देश में राज किया है। 

आईआईटी] आईआईएम] बीएचयू] जेएनयू] अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी] इसरो] एम्स] हरित क्रांति] श्वेत क्रांति] सभी तो कांग्रेस की ही देन हैं। लेकिन इन उपलब्धियों के चलते कांग्रेस के अपराध अक्षम्य नहीं हो जाते। आपातकाल] न्यायपालिका में हस्तक्षेप] भ्रष्टाचार] १९८४ के दंगे आदि भी कांग्रेस ने ही इस देश] समाज पर थोपे। अटल बिहारी के प्रधान मंत्रित्व में इंफ्रास्ट्रक्चर पर बड़ा काम हुआ] सर्व शिक्षा अभियान] कठिन दौर में भारत का परमाणु परीक्षण] दूरसंचार के क्षेत्र में क्रांति] विदेशी मुल्कों संग संबंधों में बेहतरी आदि कई उल्लेखनीय कार्य अटल जी के खाते में दर्ज हैं। लेकिन गोधरा कांड के बाद गुजरात में हुए दंगे] १९९० के बाद लगातार भारतीय समाज में बढ़ी असहिष्णुता से लेकर रक्षा सौदे में दलाली तक के आरोप भी उनके खाते के ही हैं। ऐसे में अपनी जिन उपलब्धियों पर आम आदमी पार्टी शोर मचाती है] वह जनमानस की अपेक्षा पर खड़े नहीं उतरते। वादा व्यवस्था परिवर्तन का था। वादा सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता लाने का था। वादा किया था ^स्वराज^ का] भरोसा दिलाया था व्यवस्था में आमूल&चूल परिवर्तन का। इनमें से एक पर भी खरा ना उतरना जन विश्वास संग धोखा नहीं बड़ा विश्वासद्घात है जिसके चलते भले ही केजरीवाल और उनके संगी साथी सत्ता का आनंद लूटने में सफल हो गए हों] उनके इस छल ने वर्तमान के साथ&साथ भविष्य संग भी बड़ा dqBkjk?kkr किया है। इतिहास निर्मम होता है] उन्हें इतिहास सजा अवश्य देगा। लोहिया जी का एक कथन आप के संदर्भ में बड़ा प्रासंगिक है& ^राष्ट्र की राजनीति के दलदल में कोई चीज टिकती नहीं] कोई अच्छी चीज कायम और मजबूत नहीं रहती। संकुचित स्वार्थ ही सबसे बड़ा हो जाता है। व्यक्ति केवल अपने या अपने छोटे समूह के हितों को देखता है। नैतिक उपदेशों या संकीर्ण हितों के लिए जनता के साथ कोई धोखा छिपा रहता है। जब राष्ट्र की हालत ऐसी है तो झूठ के इस सर्वग्राही दलदल में पक्की जमीन बनाना किसी नरम या व्यापक सद्इच्छा वाले कार्यक्रम से संभव नहीं। दलदल में सिद्धांत और नीति के मजबूत खंभे गाड़ने होंगे।^ काश अरविंद केजरीवाल ने बजाए अपने और अपनों के हितों को ना देख राजनीति के दलदल में सिद्धांत और नीति के मजबूत खंभे गाड़े होते तो देश की राजनीति एक बड़े परिवर्तन के मुहाने पर खड़ी होती।

आम आदमी पार्टी का प्रयोग निश्चित तौर पर विफलता की दिशा में बढ़ रहा है। पूरी तरह विफल हो गया कहना शायद जल्दबाजी होगी लेकिन ^पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं^ की तर्ज पर इतना कहना पूर्वग्रसित ना होगा कि केजरीवाल भले ही सत्ता पा गए] उन पर विश्वास करने वाले ठगा& छला महसूस कर रहे हैं। ऐसे हालात में केवल उम्मीद ही की जा सकती है] विश्वास जमाए रखने के लिए कि कभी ना कभी तो व्यवस्था परिवर्तन के लिए असल आंदोलन होगा और अपने मुकाम तक पहुंचेगा। धर्मवीर भारती की कविता फिलहाल] निराशा से उबरने के लिए बांची जा सकती है&

क्योंकि सपना है अभी तक

इसलिए तलवार टूटी] अश्व ?kk;y

कोहरे में डूबी दिशाएं

कौन दुश्मन] कौन अपने लोग] सब कुछ धुंध धूमिल

किंतु कायम युद्ध का संकल्प] अपना अभी भी

क्योंकि सपना है अभी भी।

editor@thesundaypost.in

 

 

 
         
 
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समाजवादी चिंतक j?kq ठाकुर से रोविंग एसोसिएट एडिटर गुंजन कुमार की बातचीत

समाजवाद विफल नहीं हुआ है। दुनिया के किसी भी देश में अभी तक समाजवाद का प्रयोग सत्ता

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