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vad 41 02-04-2017
 
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आवरण कथा
 
पराजय की पटकथा

 

  • गुंजन कुमार

 

निकाय चुनावों में औंधे मुंह गिरी कांग्रेस के भीतर अब भयंकर गुटबाजी उभरने का खतरा है। पार्टी आलाकमान इस करारी हार की क्या समीक्षा करता हैइसके लिए अभी इंतजार करना होगा। लेकिन फिलहाल इतना अवश्य कहा जा सकता है कि जनता प्रदेश में भ्रष्टाचार मुक्त शासन और जमीनी विकास चाहती है। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा लोगों को यह अहसास कराने में असफल रहे। विकास के उनके वादे खोखले साबित हो रहे हैं। सिडकुल की जमीनों को कौड़ियों के भाव बेचे जाने का मुद्दा चुनावों में छाया रहा। उनके बड़े बेटे साकेत पर टिहरी विस्थापितों की जमीनों की खरीद-फरोख्त के धंधे में लिप्त होने के आरोप लगे तो छोटे बेटे सौरभ सरकारी मशीनरी के अनावश्यक दुरुपयोग को लेकर सुर्खियों में रहे। जनता इससे बेहद खफा थी और उसने निकाय चुनावों में कांग्रेस संगठन एवं प्रदेश सरकार को इसका अहसास भी करा दिया

 

आगामी लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल माने जा रहे निकाय चुनावों के स्पष्ट संकेत हैं कि जनता राज्य में भ्रष्टाचार मुक्त शासन और जमीनी विकास चाहती है। सत्ताधारी कांग्रेस ने इन चुनावों को जीतने के लिए पूरा दमखम लगा दिया था। प्रदेश के मंत्री नेताओं से लेकर विधायक और सांसद मैदान में कूद पड़े। लेकिन प्रदेश में विकास के लिए छटपटा रहे लोग मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की विकास की हवाई घोषणाओं से बेहद खफा थे। सत्ता और सियासत में उनके बेटों की अनावश्यक दखलंदाजी को जनता पचा नहीं पाई। टिहरी लोकसभा क्षेत्र से उप चुनाव हारे उनके बड़े बेटे साकेत बहुगुणा पर अपने पिता की राजनीतिक हैसियत का इस्तेमाल कर टिहरी के विस्थापितों की जमीनों की खरीद-फरोख्त में शामिल होने के आरोप लगे तो मुख्यमंत्री के छोटे बेटे सौरभ बहुगुणा द्वारा सरकारी मशीनरी का अनावश्यक दुरुपयोग किया जाना कांग्रेस के लिए निकाय चुनावों में बेहद घाटे का सौदा साबित हुआ। रही-सही कसर मुख्यमंत्री ने अपने चहेतों को टिकट के तौर पर रेवड़ियां बांटने के लालच से पूरी कर दी। हालांकि करनपुर गोलीकांड में सूर्यकांत धस्माना को अदालत ने बरी कर दिया है लेकिन राज्य की आंदोलनकारी जनता आज भी उन्हें माफ नहीं कर पाई है।

 

सूर्यकांत धस्माना को टिकट देने की बहुगुणा की जिद का नतीजा यह है कि कांग्रेस को देहरादून नगर निगम के अध्यक्ष पद पर २२ हजार मतों से करारी हार का सामना करना पड़ा। शेष पांच निगमों में भी उसका कोई प्रत्याशी अध्यक्ष की कुर्सी तक नहीं पहुंच पाया। नगर पालिकाओं में भी अध्यक्ष पद की कुर्सियों पर बैठने में भाजपा और निर्दलीय प्रत्याशियों ने उससे बाजी मार ली।

 

राजनीतिक पंडित कांग्रेस की इस करारी हार का अपने-अपने हिसाब से विश्लेषण कर रहे हैं। कांग्रेस के दिग्गज एक-दूसरे के सिर पर ठीकरा फोड़ सकते हैं। मुख्यमंत्री पल्लू झाड़ सकते हैं कि हार की जिम्मेदारी प्रदेश के सभी बड़े नेताओं पर है। लेकिन वे इस सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ सकते कि उनके सत्ता में रहते कांग्रेस जनता का विश्वास खो चुकी है। प्रदेश में भाजपा और निर्दलीय प्रत्याशियों ने इस चुनाव में प्रदेश में भ्रष्टाचार को मुख्य मुद्दा बनाया था। सिडकुल की जमीनों को कौड़ियों के भाव बेचे जाने को लेकर सरकार कटघरे में थी। विपक्षी भाजपा ने इस पर विधानसभा में जो जोरदार हंगामा मचाया था उसका असर गांव में भी दिखाई दिया। टिहरी विस्थापितों की जमीन के सौदे में मुख्यमंत्री के पुत्र साकेत बहुगुणा पर भी आरोप लगे। 

 

चुनावी लाभ के लिए मुख्यमंत्री ने प्रदेश में विकास के जो लुभावने वादे किये उन्हें भी जनता पचा नहीं पाई। गैरसैंण में कैबिनेट की बैठक और वहां विधान भवन के शिलान्यास को लोगों ने महज ड्रामा करार दिया है। पहाड़ के लोग वहां स्थाई राजधानी देखने को इतने बेताब हैं कि यहां स्थानीय निकाय में अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ रहे कांग्रेस प्रत्याशी अपनी जमानत भी नहीं बचा पाए और उनके साथ ही पूरी सरकार को जनता ने चौथे पायदान पर लुढ़का दिया। विभिन्न निकायों के ८९० वार्डों में से कांग्रेस को महज १२० सीटें मिलीं। विपक्षी भाजपा को १५५ सीटें मिलीं जबकि ३६८ सीटों पर निर्दलीय विजयी रहे। 

 

मुख्यमंत्री बहुगुणा के परिजन विश्वस्त और कैबिनेट के सदस्य निकाय चुनावों में पार्टी प्रत्याशियों को जितवाने के लिए पूरे दमखम से जुटे हुए थे। चहेतों और परिजनों पर मुख्यमंत्री का अत्यधिक भरोसा पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं का उत्साह घटाने वाला रहा। लेकिन जनता ने सबको नकार दिया।

 

मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा पर सरकार तो प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष यशपाल आर्या पर संगठन का मुखिया होने के नाते पूरे प्रदेश का जिम्मा था। लेकिन तराई जहां कि इन दोनों के निर्वाचन क्षेत्र हैं वहां काशीपुर और रुद्रपुर नगर निगम में कांग्रेस को करारी हार मिली। यहां कांग्रेस के हाथ निगम के अध्यक्ष की कुर्सी हथियाने में निराशा ही हाथ लगी। अब चारों सांसदों की बात करें तो केंद्रीय मंत्री व हरिद्वार के सांसद हरीश रावत अपने लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र के दोनों नगर निगमों हरिद्वार व रुड़की में कोई कमाल नहीं दिखा पाए। पौड़ी गढ़वाल में सांसद सतपाल महाराज कुछ नहीं कर पाए। और तो और गैरसैंण नगर पंचायत में पार्टी प्रत्याशी को मुकाबले में भी नहीं पहुंचा सके। जबकि वे यहां विधानभवन के शिलान्यास के बूते लोकसभा चुनाव जीतने के मंसूबे बांध रहे थे। नैनीताल में केसी बाबा भी कुछ नहीं कर पाए। यहां अध्यक्ष पद पर उक्रांद प्रत्याशी विजयी हुए।

 

अल्मोड़ा के सांसद प्रदीप टम्टा जरूर कुछ बेहतर दिखे लेकिन यहां भी पार्टी का प्रदर्शन अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा। वित्त व संसदीय कार्य मंत्री डॉ ़ इंदिरा हृदयेश के घर के नगर निगम हल्द्वानी में भाजपा ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की। स्वास्थ्य मंत्री सुरेन्द्र सिंह नेगी अपने प्रभाव वाली प्रतिष्ठित कोटद्वार नगर पालिका को अप्रत्याशित रूप से बसपा के हाथों गंवा बैठे। एक अन्य वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री डॉ ़ हरक सिंह रावत अपने निर्वाचन क्षेत्र रुद्रप्रयाग की नगर पालिका में कोई चमत्कार नहीं दिखा पाए।

 

कुल मिलाकर कांग्रेस संगठन और प्रदेश सरकार के लिए निकाय चुनाव बेहद कष्टकारी साबित हुए हैं। इन चुनावों में न सिर्फ पार्टी की दुर्गति हुई बल्कि आने वाले दिनों में संगठन के भीतर गुटबाजी तेजी से उभरने के संकेत हैं। बहुगुणा और उनके बेटे साकेत का यह कहकर बचाव करना शुरू हो चुका है कि टिहरी लोकसभा क्षेत्र में कांग्रेस को पांच वार्डों में विजय मिली। हरिद्वार में भी पार्टी की हार पर बहुगुणा लॉबी सक्रिय हो चुकी है। लेकिन देहरादून जैसे सबसे बड़े नगर निगम की हार के सवाल पर बहुगुणा बच नहीं सकते।

 

भाजपा इस चुनाव में मिली सफलता पर उत्साहित जरूर है लेकिन नतीजे उसके लिए भी इसलिए ज्यादा संतोषजनक नहीं कहे जा सकते हैं कि टिकट वितरण में पार्टी ने जो गलतियां कीं उसका नुकसान उसे रुड़की और रुद्रपुर में झेलना पड़ा। इन दोनों निगमों में भाजपा के बागी प्रत्याशी चेयरमैन बने। मसूरी भी पार्टी के हाथ से चला गया। निर्दलीय प्रत्याशियों ने भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों को जिस प्रकार कड़ी चुनौती देकर सफलताएं हासिल कीं उससे साफ है कि जनता स्थानीय निकायों को मजबूत देखना चाहती है। अब यह अलग बात है कि दोनों पार्टियां निकट भविष्य में जन भावनाओं का कितना सम्मान करती हैं लेकिन उन्हें यह नहीं भूलना होगा कि पौड़ी नगर पालिका में जनता ने पूरी तरह निर्दलीय प्रत्याशियों पर ही भरोसा जताया है। काशीपुर किच्छा रुद्रपुर नैनीताल उत्तरकाशी गोपेश्वर टिहरी श्रीनगर मंगलौर शक्तिगढ़ लोहा घाट लालकुआं बड़कोट चिन्यालीसौड़ पोखरी चंबा देवप्रयाग लंढौरा रुड़की ऋषिकेश आदि जगहों पर भी निर्दलीय प्रत्याशियों ने बेहतर प्रदर्शन किया। ऋषिकेश से प्रदेश काग्रेस कमेटी के महामंत्री और पूर्व दरजाधारी मंत्री विजय सारस्वत ने तमाम विरोधियों को पटखनी देकर अपने छोटे भाई और वर्षों से नगर कांग्रेस कमेटी ऋषिकेश के अध्यक्ष के पद पर काबिज विनय सारस्वत को टिकट दिलवाया लेकिन जनता ने सारस्वत बंधुओं के सपनों को चकनाचूर कर दिया और चुनाव में इनकी जमानत तक जब्त करवा दी। इसी तरह नगर पंचायत में भी कांग्रेस के कई उम्मीदवारों की जमानतें जब्त हुई हैं। इनमें द्वाराहाट दिनेशपुर महुआडबरा सुल्तानपुर कर्णप्रयाग गैरसैंण गंगोलीहाट पोखरी हरबर्टपुर स्वर्गाश्रम जौंक झबरेड़ा लक्सर व लण्ढौरा नगर पंचायतों के चुनावों में जमानतें जब्त हुई हैं। जबकि कर्णप्रयाग में कांग्रेस प्रत्याशी के लिए विधायक और विधानसभा उप सभापति अनुसूया प्रसाद मैखुरी ने सभी दमदार उम्मीदवारों को दरकिनार करके अपने रिश्तेदार ईश्वरी मैखुरी को टिकट दिलवाया साथ ही गैरसैंण में भी कांग्रेस के प्रत्याशी को जीत दिलवाने का पत्र तक मुख्यमंत्री को भेजा लेकिन दोनों ही कांग्रेसी उम्मीदवार अपनी जमानत तक नहीं बचा पाये। राज्य में तीसरी ताकत के तौर पर उभरी रही बसपा और क्षेत्रीय दलों का प्रदर्शन भी फीका रहा। पूरे प्रदेश में बसपा को सिर्फ तीन वार्डों में विजय मिली। उक्रांद नैनीताल में अध्यक्ष पद जीतने में सफल रहा। अगर बसपा व क्षेत्रीय दल विकल्प देने में सक्षम होते तो जाहिर है कि जनता निर्दलीय प्रत्याशियों के बजाए उन पर भरोसा करती।

 

 
         
 
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