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vad 50 04-06-2017
 
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देश-दुनिया 
 
भेड़िया समाज में गुड़िया

 

अभी दामिनी कांड का जख्म भरा भी नहीं कि पांच साल की मासूम गुड़िया के साथ हुए वहशीपन के खिलाफ दिल्ली फिर सड़कों पर है। प्रधानमंत्री आवास सोनिया गांधी का घर आईटीओ पुलिस हेडक्वार्टर और इंडिया गेट जैसी जगहों पर प्रदर्शन जारी हैं। प्रधानमंत्री राष्ट्रपति परेशान हैं सोनिया दुःखी हैंसुषमा स्वराज दोषियों के लिए फांसी मांग रही हैं और महिला आयोग की अध्यक्ष ममता शर्मा शायद रामनवमी की छुट्टी से अभी वापस नहीं आई हैं। आपकी दिल्ली पुलिस लड़कियों पर थप्पड़ बरसा रही है कहीं ऊपर से आये आदेशों के चलते पूरे शहर को छावनी में तब्दील किया जा चुका है। एक तरफ दिल्ली पुलिस आईपीएल मैच की सुरक्षा को लेकर चौकन्नी है तो डबल ड्यूटी में प्रदर्शनकारियों से दिल्ली की सुरक्षा भी कर रही है।

 

१५ अप्रैल को गुड़िया के साथ दो आरोपी मनोज और प्रदीप ने वहशियत की हदें पार कीं। उसका गला भी दबाकर आश्वस्त हुए कि वह मर गई है या नहीं। उसे लहूलुहान छोड़कर बिहार चले गए। गुड़िया के घरवालों ने पुलिस में बेटी के गायब होने की शिकायत की। पुलिस आई और टहल कर चली गई। इसके बाद १७ अप्रैल की शाम को गुड़िया के मां-बाप को ग्राउंड फ्लोर से किसी बच्ची के रोने की आवाज आई। पुलिस को बुलाया गया और वहां से गुड़िया द्घायल अवस्था में मिली। यहीं से पुलिस ने मामले को दबाने की पुरजोर कोशिशें शुरू कर दीं। पहले तो गुड़िया की खराब हालत के बावजूद उसे शाहदरा के स्वामी दयानंद अस्पताल में भर्ती करा दिया गया। उसके बाद गांधीनगर थाने के एसएचओ धर्मपाल सिंह और सब इंस्पेक्टर महावीर सिंह ने केस को दबाने के लिए गुड़िया के माता-पिता को दो हजार रुपए लेने का दबाव बनाया। इधर जैसे ही लोगों को पता चला तो अस्पताल के बाहर भीड़ जमा होने लगी। दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री एके वालिया और सांसद संदीप दीक्षित को लोगों के गुस्से का शिकार होना पड़ा। अस्पताल में ही जब एक प्रदर्शनकारी युवती ने वालिया से बात करने की कोशिश की तो दिल्ली पुलिस के शूरवीर एसीपी बेनी सिंह अहलावत ने युवती पर मीडिया के सामने ही थप्पड़ों की बरसात कर दी। गुड़िया की हालत बिगड़ती देख उसे एम्स शिफ्ट कर दिया गया। सर्जरी के दौरान गुड़िया के शरीर से एक मोमबत्ती और बोतल भी बरामद हुई। इसके अगले दिन विभिन्न महिला और छात्र संगठनों और आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने एम्स का द्घेराव किया। मामला बिगड़ता देख राजनीतिक पार्टियों प्रधानमंत्री कार्यालय और गृह मंत्रालय ने घड़ियाली आंसू बहाते हुए कड़ी कार्रवाई करने का जाप करना शुरू कर दिया। गांधीनगर के एसएचओ सब इंस्पेक्टर और खजूरी खास के एसीपी को सस्पेंड कर दिया गया। फिलहाल दोनों आरोपियों मनोज और प्रदीप को गिरफ्तार कर लिया गया है। बजट सत्र के दूसरे सेशन का पहला दिन भी इसी हंगामे की भेंट चढ़ गया। पूरे मामले में दिल्ली पुलिस की भूमिका की खासतौर पर आलोचना हो रही है। इसे देखते हुए पुलिस कमिश्नर नीरज कुमार पर भी तलवार लटकी हुई है। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित पहले ही महिलाओं से जुड़े मामलों में पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठा चुकी हैं। इसके अलावा गृह मंत्रालय ने भी दिल्ली पुलिस को मामले से संबधित कई सवालों का जवाब मांगा है और साथ ही दिल्ली से गायब हुईं बच्चियों पर एक विस्तृत रिपोर्ट भी तलब की है। लेकिन कई ऐसे सवाल अभी भी हैं जिनसे सरकार की यह गंभीरता शक के दायरे में आ जाती है। 

 

१६ दिसंबर की वीभत्स घटना के बाद गठित वर्मा समिति की रिपोर्ट में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में सम्मिलित सुरक्षा बलों को लेकर कई कड़ी सिफरिशें की गईं थीं। सरकार ने संसद में इन सिफारिशों को हटा दिया और रिपोर्ट की अपेक्षाकृत कमजोर क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट बिल-२०१२ लेकर आई। रिपोर्ट के तमाम शुद्धिकरण के बावजूद भी इस कानून की धारा १६६-ए कहती है कि अगर बलात्कार संबंधी मामलों में पुलिसवाला एफआईआर दर्ज करने से मना करता है या समझौता के लिए उकसाता है तो वह दोषी है और उसे दो साल की जेल और जुर्माना की सजा हो सकती है। 

 

अब गौर करने लायक बात यह है कि कानून के बावजूद इन पुलिसवालों को सिर्फ सस्पेंड क्यों किया गया है? इसके अलावा कई राजनीतिक हस्तियों ने यह कहकर पल्ला झाड़ने की कोशिश भी की कि यह सब समाज में बहुत अंदर तक व्याप्त है और इससे ऐसे नहीं निपटा जा सकता। यह ठीक भी हो सकता है कि समाज से ही ऐसी बुराइयां पोषण पाती हैं लेकिन अगर सब समाज सुधार से ही संभव है तो पुलिस और प्रशासन की क्या भूमिका है? जब सरकार भी कठोर कानून/सजा और पुलिस सुधार जैसे मामलों पर तैयार है तो वही मांग कर रहे प्रदर्शनकारियों से बात करने की जगह दिल्ली को छावनी में क्यों तब्दील कर रही है? 

 

बहरहाल तमाम वादों और प्रदर्शनों के बीच मामला गुड़िया से होता हुआ समयपुर बादली और भलस्वा डेरी इलाके तक भी पहुंच गया है। और सिर्फ दिल्ली की ही बात क्यों की जाए बिहार की मासूम दलितं बुलंदशहर अलीगढ़ मध्य प्रदेश कश्मीर और उत्तर पूर्व की शोषित तमाम बच्चियों और औरतों की तरफ से भी आवाज उठानी ही है जिनकी आवाज दिल्ली की सत्ता और मीडिया को वोट और टीआरपी के गणित में कोई फायदा नहीं पहुंचाती और वे अनसुनी फरियाद बनकर रह जाती हैं।

 

अभेद सुरक्षा में सेंध

अमेरिका के जिस बॉस्टन शहर में टी पार्टी की वजह से १६ दिसंबर १७७३ को स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई छिड़ी थी वही शहर १५ अप्रैल को ऐतिहासिक दिन पर आतंकवाद का शिकार हो गया। इसमें ३ व्यक्तियों की मृत्यु हो गई और १८० से ज्यादा लोग द्घायल हो गए। घटना के संदिग्ध पकड़े गए। इन दोनों संदिग्धों के पकड़े जाने पर राष्ट्रपति बराक ओबामा तो अपनी सफलता की मुनादी कर रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि इन शिक्षित युवाओं को आतंकी गतिविधि में शामिल होने के लिए क्यों मजबूर होना पड़ा। सबसे बड़ी बात कि यह धमाका अभेद मानी जाने वाली सुरक्षा व्यवस्था का सच बयां करता है।

 

बॉस्टन मैराथन १८९७ से ही हर साल होता आ रहा है। इसमें शामिल होने प्रत्येक साल २० हजार से ज्यादा धावक आते हैं जिनकी दौड़ देखने के लिए पांच लाख से ज्यादा दर्शकों का जमावड़ा लगता है। बीते १५ अप्रैल को भी परम्परानुसार यह दौड़ अपने समय पर शुरू हो गई थी और दौड़ में भाग लेने वाले सबसे तेज धावकों ने इसे करीब-करीब दो घण्टे के भीतर पूरा भी कर लिया था। दौड़ में भाग लेने वाले सभी धावक पांच घण्टे के भीतर यह दौड़ पूरी कर लेतेलेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। दौड़ की फिनिश लाईन के पास एक भयानक विस्फोट हुआ। इसके बारह सेकण्ड बाद ही एक और विस्फोट हुआ। चूंकि मैराथन दौड़ का सीधा प्रसारण हो रहा था इसलिए दुनिया भर में लोगों ने इसे अपने-अपने टेलीविजन पर देखा। उसमें चारों तरफ खून ही खून दिखाई दे रहा था। बैरिकेड टूटे पड़े थे। लोगों का निजी सामान कपड़े जूते और दूसरी चीजें बिखरी पड़ी थीं और कोहराम मचा हुआ था।

 

शुरू में तो पुलिस तरह-तरह के अनुमान लगाती रही। लेकिन बाद में संदिग्धों की पहचान कर ली गई और दो व्यक्तियों को ढूंढ़ा जाने लगा। पुलिस तेजी से इन दोनों आदमियों की तलाश करने लगी। अचानक १९ अप्रैल की रात में परिस्थिति पूरी तरह से बदल गई। मैसाचूसेट्स इंस्टीट्यूट के पास गश्त कर रही पुलिस-टुकड़ी ने दोनों संदिग्ध आतंकवादियों को देख लिया। दोनों तरफ से गोली चलने लगी। इस गोलीबारी में एक आतंकवादी मारा गया। उसके पास से मिले पहचान-पत्र से पता लगा कि वह तैमूरलंग सरनाएव है। लेकिन उसका साथी और उसका सगा छोटा भाई दूसरा आतंकवादी जोखर सरनाएव भाग गया था। ये दोनों उत्तरी कोहकाफ के रहने वाले हैं।

 

फिर जोखर की खोज शुरू हो गई और २४ घटे के अंदर- अंदर पुलिस ने उसे भी ढूंढ़ निकाला। उसे पकड़ने के लिए पूरे बॉस्टन में अद्घोषित कर्फ्यू लगा दिया गया था। सड़कें सूनी पड़ी हुई थीं। सभी स्कूलों में पढ़ाई रोक दी गई थी। लोगों से कहा गया कि वे अपने-अपने घरों में बन्द रहें और बाहर नहीं निकलें। और जोहार सरनाएव को शाम को बॉस्टन के एक उपनगर में पकड़ लिया गया। 

 

जोखर शायद अब कभी पुलिस के सवालों का जवाब नहीं दे पाएगा। पुलिस मुठभेड़ में उसके गले में गोली लगने के साथ जीभ भी जख्मी हो गई है। फिलहाल वह गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती है। इसीलिए अब उससे कब पूछताछ होगी अभी यह बताना मुश्किल है। लेकिन इतना तो निश्चित है कि उसे मौत की सजा हो जाएगी। अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी इस घटना के बाद तुरन्त ही राष्ट्र के नाम सन्देश जारी किया। बराक ओबामा ने कहा कि पछले कुछ दिनों में पुलिस ने बड़ी तत्परता से शानदार काम किया और आखिर इस त्रासदी का पूरी तरह से पता लगा लिया। लेकिन अभी भी बहुत से ऐसे सवाल बाकी हैं जिनका जवाब पाने की जरूरत है। सबसे जरूरी सवाल यह है कि ऐसा क्या कारण था कि ये युवक जो अमेरिका में पढ़ रहे थे और यहीं बड़े हुए थे जो समाज का ही एक हिस्सा थे इस तरह का भयानक अपराध करने के लिए बाध्य हुए? जो लोग जोखर सारनाएव को जानते हैं वे बॉस्टन धमाके से पहले और उसके बाद की पूरी घटना को समझने की कोशिश कर रहे हैं। लोग ये जानना चाहते हैं कि इतने उज्जवल भविष्य वाला एक नौजवान आखिर किस तरह इतना बदल सकता है।

 

जांच का काम आगे जारी रहेगा। जांच से ही इस सवाल का और इस मामले से जुड़े दूसरे सभी सवालों का जवाब मिलेगा। लेकिन बॉस्टन शहर के धमाकों ने यह भ्रम तोड़ दिया है कि सर्वशक्तिमान अमेरिका ने दहशतगर्दी पर जीत हासिल कर ली है और बाकी दुनिया चाहे अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद की छाया में सहमी रहने काे मजबूर होलेकिन कोई उसका बाल बांका नहीं कर सकता। अलकायदा प्रमुख लादेन को उसके घर में घुसकर मारने वाला अमेरिका अपने ही घर में होने वाला बम विस्फोट नहीं रोक पाया। बॉस्टन बम विस्फोट कांड साफ इशारा करता है कि खुद को दुनिया में सबसे अच्छा बताने वाली अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियां फेल हो चुकी हैं। 

 

 

 
         
 
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  • सिराज माही

पड़ोसी देश होने के बावजूद चीन अक्सर भारत को आंख दिखाता रहता है। दोनों के बीच किसी न किसी मुद्दे पर विवाद बना रहता है। नया विवाद ^वन बेल्ट वन

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