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देश
 
दरकता गठबंधन
  • प्रेम भारद्वाज

अभी साल भर बाकी है। लेकिन भाजपा ने लोकसभा चुनाव की तैयारी को तेज कर दिया है। पिछले लोकसभा चुनाव के नतीजों के आधार पर भाजपा का एक बड़ा तबका यह मान कर चल रहा है कि उसका अब किसी के साथ गठबंधन की कोई दरकार नहीं है। चार साल किस तरह से गठबंधन में शामिल दलों के साथ उपेक्षापूर्ण व्यवहार किया है] वह उनके लिए अपमानजनक है। इसलिए चुनाव की आहट आते ही गठबंधन में शामिल कुछ दलों ने अपनी नाराजगी जाहिर की है। कुछ उहापोह की स्थिति में हैं कि आखिरकार क्या निर्णय लें।

चुनाव के तैयारी के तहत भाजपा समेत राजनीतिक पार्टियों ने सरगोशियां तेज कर दी हैं। भाजपा गठबंधन की अहम द्घटक जाने वाली तेलगूदशम पार्टी ने भाजपा के साथ अपनी नाखुशी जाताई। शिवसेना के बाद तेलगू देशम दूसरी बड़ी  पार्टी है जिसने ऐलान कर दिया है कि भाजपा सत्ता चलाने के लिए चाल समझ गयी है। तेलगू देशम के चंद्रबाबू नायडू ने केंद्र सरकार पर आंध्र प्रदेश की अनदेखी का भी आरोप लगाया है। यह भी बात है कि तेलगू देशम ने साफ किया है] वह अभी गठटबंधन से तुरंत अलग नहीं होगी। मगर वह विभिन्न मुद्दों पर भाजपा के प्रति अपनी नाराजगी जाहिर करती रहेगी। संसद में बजट सत्र के दौरान तेलगू देशम के सांसदों ने ऐसा कर के दिखाया भी। यह अलग बात है भाजपा को इसकी कितनी परवाह है] या इसे वह कितनी गंभीरता से लेती है।

भाजपा के साथ आरंभिक दिनों के साथ शिरोमणि अकाली दल ने भी भाजपा के प्रति अपनी नाराजगी प्रकट की है। अकाली दल के राज्यसभा के सांसद सुखविंदर सिंह ढ़ीढसा की शिकायत है कि गठबंधन का हिस्सा होते हुए भी उनकी पार्टी से किसी को भी राज्यपाल नहीं बनाया। जम्मू&कश्मीर में पीडीपी के साथ भी भाजपा की तानातानी चल रही है। यहां दोनों के रिश्ते को 'सास&बहू' के रिश्ते का नाम दिया जा रहा है।

जहां तक शिवसेना की बात है तो वह भी भाजपा के आंतरिक दिनों का साथी रहा है] उन दिनों का जब भाजपा को एक अन्य राजनीतिक पार्टियां एक तरह से अछूतों जैसा व्यवहार करती थी। इसे द्घोषित रूप से कट्टर और साम्प्रदायिक पार्टी मान लिया गया था। लेकिन पुराना रिश्ता अब खत्म होने के कगार पर है। यह कहना ज्यादा मुनासिब होगा कि खत्म हो गया है। शिव सेना ने बहुत पहले ही यह ऐलान कर दिया है कि वह अगला लोकसभा चुनाव अकेले लड़ेगी। गठबंधन के आम दलों की तरह उसने भी भाजपा पर अनदेखी का आरोप लगाया है। महाराष्ट्र में शिवसेना की अच्छी खासी पकड़ है। गठबंधन से अलग होने के कारण भाजपा को कुछ नुकसान उठाना पड़ सकता है।

उधर बिहार की कहानी अलग है। वहां मामला उल्टा है। अब यह देखना होगा कि राजद का साथ छोड़कर भाजपा की गोद में गिरने के बाद नीतीश कुमार के प्रति जनता का रवैया कैसा रहता है। अभी तक इस बात का अंदाजा नहीं लग पा रहा है कि बिहार में बदले हुए रिश्ते को जनता की तरफ से क्या प्रतिक्रिया है? और यह प्रतिक्रिया अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में वोट के रूप में किस तरह अभिव्यक्ति होगी। वहां नीतीश कुमार और भाजपा दोनों ही इस बात को लेकर थोड़ा चिंतित है कि कहीं जनता नीतीश कुमार को अवसरवादी न समझ ले। नीतीश की छवि खराब होने का खामियाजा भाजपा को भी भुगतना पड़ेगा।

भाजपा का अपने सहयोगी दलों के साथ बढ़ती नाराजगी आने वाले दिनों में किस करवट लेगी] यह एक पक्ष प्रश्न है। कुछ जानकार लोग सहयोगी दलों की तात्कालिक नाराजगी को बहुत तरजीह नहीं दे रहे हैं। यह दलील दी जा रही है कि अक्सर राजनीतिक दल गठबंधन में रहते हुए भी एक&दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ते हैं। यह सब चलता है। एक ऐसा भी तबका है जो मानता है कि बड़े राष्ट्रीय दलों की रणनीति का हिस्सा ही होता है क्षेत्रीय दलों को कमजोर कर उन्हें एक तरह से खत्म करना। भाजपा को इस खेल में कि विशेषज्ञता हासिल हो गई। यह भी अजीब बात है कि नागालैंड में होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने एक स्थानीय दल के साथ गठबंधन किया है। वह कुछ अन्य राज्यों में जहां उसकी स्थिति कमजोर है] सहयोगी की तलाश में है।

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चौदह मार्च को सुनवाई

राम मंदिर को लेकर उच्चतम न्यायालय में चल रही अगली सुनवाई अब चौदह मार्च को होगी। राजनीतिक रूप से संवेदनशील राम जन्मभूमि&बाबरी मस्जिद जमीन का मालिकाना विवाद मामले से जुड़ी कई याचिकाओं पर महत्वपूर्ण सुनवाई ८ फरवरी को शुरू की] लेकिन पहले ही दिन इस मामले की सुनवाई टाल दी। यह सुनवाई महत्वपूर्ण मानी जा रही थी क्योंकि प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली विशेष पीठ ने सुन्नी वक्फ बोर्ड तथा अन्य की इस दलील को खारिज किया था कि याचिकाओं पर अगले आम चुनावों के बाद सुनवाई हो। इस पीठ ने पिछले साल पांच दिसंबर को स्पष्ट किया था कि वह आठ फरवरी से इन याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई शुरू करेगी और उसने पक्षों से इस बीच जरूरी संबंधित कानूनी कागजात सौंपने को कहा था। वरिष्ठ वकीलों कपिल सिब्बल और राजीव धवन ने कहा था कि दीवानी अपीलों को या तो पांच या सात न्यायाधीशों की पीठ को सौंपा जाए या इसे इसकी संवेदनशील प्रकृति तथा देश के धर्मनिरपेक्ष ताने बाने और राजतंत्र पर इसके प्रभाव को ध्यान में रखते हुए २०१९ के लिए रखा जाए। शीर्ष अदालत ने भूमि विवाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के २०१० के फैसले के खिलाफ १४ दीवानी अपीलों से जुड़े एडवोकेट ऑन रिकार्ड से यह सुनिश्चित करने को कहा कि सभी जरूरी दस्तावेजों को शीर्ष अदालत की रजिस्ट्री को सौंपा जाए।


बसपा&जेडीएस साथ&साथ

कर्नाटक में बीजेपी और कांग्रेस के बीच ?keklku मचा है। इस ?keklku में अपना जनाधार बचाने को देवगौड़ा की पार्टी जनता दल सेक्युलर छटपटा रही है। बसपा के साथ गठबंधन के बाद इनके नेताओं में उम्मीद बढ़ी है] क्योंकि कर्नाटक में २४ फीसदी दलित हैं यानी आबादी का एक चौथाई हिस्सा। बता दें कि बसपा और जद(से) ने कर्नाटक विधानसभा चुनाव साथ मिल कर लड़ने के लिए एक गठबंधन करने की अधिकारिक ?kks"k.kk की। बहुजन समाज पार्टी के सतीश चंद्र मिश्रा और जनता दल (सेक्युलर) के दानिश अली ने कहा कि यह गठबंधन २०१९ के लोकसभा चुनाव में भी जारी रहेगा। दोनों नेताओं ने ?kks"k.kk की कि बसपा राज्य के १४ जिलों में विधानसभा की आठ सुरक्षित सीटों और १२ सामान्य सीटों पर चुनाव लड़ेगी। वहीं] जद (एस) शेष २०४ सीटों पर चुनाव लड़ेगा। दोनों ही पार्टियों के राष्ट्रीय अध्यक्ष] एचडी देवगौड़ा और मायावती विधानसभा चुनाव के लिए बेंगलुरू से १७ फरवरी को एक संयुक्त चुनाव प्रचार शुरू करेंगे। 

 
         
 
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आम आदमी पार्टी के विधायक एवं पूर्व मंत्री कपिल मिश्रा पार्टी के भीतर मुख्यमंत्री केजरीवाल के खिलाफ मोर्चा खोलने पर सुर्खियों में हैं। उनसे रोविंग एसोसिएट एडिटर गुंजन कुमार

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