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vad 36 24-02-2018
 
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प्रदेश से
 
पॉलिटिकल इंटॉलरेंस की सरकार

  • संजय स्वार

जीरो टॉलरेंस की बात करने वाली त्रिवेंद्र रावत सरकार पॉलिटिकल इंटॉलरेंस की तरफ बढ़ रही है। इस बीच सरकार ने कई ऐसे निर्णय लिए हैं जिनमें राजनीतिक द्वेष की भावना स्पष्ट नजर आ रही है

 

उत्तराखण्ड की त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार अपनी सुविधानुसार ^जीरो टॉलरेंस^ की नित नई परिभाषाएं गढ़ रही है। इसमें जीरो टॉलरेंस कम ^पॉलिटिकल इंटॉलरेंस^ की बू ज्यादा आ रही है। जीरो टॉलरेंस का दावा करने वाली सरकार के गिरधारी लाल साहू] रेखा आर्या प्रकरण] दमयंती रावत का शिक्षा विभाग से अनापत्ति लिए बिना दूसरे विभाग में ज्वाइन कर लेना] हल्द्वानी में पानी के ओवर हेड टैंकों में भ्रष्टाचार] शिक्षकों द्वारा फर्जी प्रमाण पत्र लेकर शिक्षा विभाग में नियुक्ति पा लेना जैसे प्रकरणों पर कदम ठिठक जाते हैं। दूसरी तरफ ^पॉलिटिकल इंटॉलरेंस^ की भावना से सरकार के निर्णय त्वरित हो रहे हैं। जिसमें हल्द्वानी के अंतरराज्यीय बस अड्डे को रद्द करना  और अब ताजातरीन उदाहरण उच्च शिक्षा विभाग में उच्च शिक्षा निदेशक सहित दो प्राचार्य] एक सहायक प्रोफेसर एवं एक लिपिक का निलंबन है। हल्द्वानी के एमबीपीजी कॉलेज में एनएसयूआई की छात्र la?k चुनावों में अध्यक्ष पद की प्रत्याशी रही मीमांसा आर्या को कथित फर्जी प्रवेश देने को निलंबन का आधार बनाया गया है। इस निर्णय के पीछे उच्च शिक्षा में गुणवत्ता सुधार की मंशा कम राजनीतिक अहं की पूर्ति न हो पाने की मंशा ज्यादा लगती है।

उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद से ही उच्च शिक्षा किसी राजनीतिक दल की प्राथमिकता में नहीं रही। उच्च शिक्षा का जितना क्षरण उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद पिछले १७ वर्षों में हुआ है] उतना पहले कभी नहीं हुआ। फिर चाहे वह भाजपा की सरकार रही हो या कांग्रेस की। पिछले दिनों उच्च शिक्षा राज्यमंत्री द्वारा विभाग के शिक्षा निदेशक] दो प्राचार्य एक सहायक प्राध्यापक एवं एक लिपिक के निलंबन को मीमांसा आर्या प्रकरण से जोड़ कर देखा जाता रहा है। यह कार्रवाई उत्तराखण्ड के इतिहास में पहला प्रकरण है] जिसमें न तो भ्रष्टाचार के आरोप हैं और न ही किसी प्रकार के वित्तीय अनियमितता का आरोप सिर्फ मीमांसा आर्या का कथित फर्जी प्रवेश का है। जो २०१७ के छात्र la?k चुनावों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रत्याशी के विरुद्ध कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई की प्रत्याशी थी। हालांकि वे इस चुनाव में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रत्याशी कुलदीप कुल्याल के पराजित हो गई थीं।

में मीमांसा आर्या ने २०१४-१५ बीएससी में अनुत्तीर्ण होने के बाद बीएससी में ही पुनः प्रवेश लिया था। विज्ञान विषय में प्रयोगात्मक विषय होने के कारण अनुत्तीर्ण छात्र को भूतपूर्व के रूप में प्रवेश देने की प्रथा कुमाऊं विश्वविद्यालय में पहले से रही है। उसके पश्चात मीमांसा आर्या ने बीएससी प्रथम] द्वितीय एवं तृतीय वर्ष की परीक्षा पास कर बीएससी की डिग्री भी हासिल कर ली। इस बीएससी की डिग्री के आधार पर ही उसने स्नातकोत्तर प्रथम वर्ष में प्रवेश लिया। तीन वर्षों तक उसके प्रवेश लेने और डिग्री हासिल कर लेने तक आखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को कुछ फर्जी नजर नहीं आया पर मीमांसा आर्या का छात्र la?k अध्यक्ष प्रत्याशी बनते ही एबीवीपी को उसका प्रवेश निरस्त कराने की याद आ गई। इस पर कॉलेज प्रशासन ने निर्णय दिया कि क्योंकि कुमाऊं विश्वविद्यालय द्वारा उसे डिग्री प्रदान कर दी गई है। अतः महाविद्यालय स्तर पर उसका प्रवेश निरस्त नहीं किया जा सकता। पहले विश्वविद्यालय उसकी डिग्री निरस्त करे] उसके बाद महाविद्यालय उसका प्रवेश निरस्त करेगा। इस प्रवेश को निरस्त करवाने के लिए उच्च शिक्षा मंत्री की रुचि इतनी अधिक थी कि उन्होंने एक बैठक में ही एमबीपीजी कॉलेज के प्राचार्य डॉ जगदीश प्रसाद पर मीमांसा आर्या का प्रवेश निरस्त करने का दबाव भी डाला था। तब प्राचार्य ने नियमों का हवाला देते हुए प्रवेश को निरस्त करने से इंकार कर दिया था। उस वक्त प्राचार्य पर मंत्री के दबाव डालने का वीडियो भी वायरल हुआ था जिसमें डॉ धन सिंह रावत को अप्रिय स्थति का सामना करना पड़ा था।

कई बड़ी शिकायतों पर कुंडली मारकर बैठे रहने वाला शासन इस प्रकरण पर इतना सक्रिय रहा कि शासन स्तर तक इस प्रवेश को रद्द करने की जांच पहुंच गई। शासन] उच्च शिक्षा निदेशक] विश्वविद्यालय स्तर तक हुई जांच पड़ताल के बाद अंततोगत्वा महाविद्यालय प्रशासन का ही निर्णय प्रभावी रहा। हालांकि छात्र la?k चुनावों में एबीवीपी के कुलदीप कुल्याल अध्यक्ष पद पर विजयी हो गए थे] लेकिन उक्त प्रकरण को गाहे-बगाहे कोई न कोई उछालता रहा। मंत्री ने भी इसे अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया था। उस वक्त उच्च शिक्षा मंत्री रहीं एवं वर्तमान में नेता प्रतिपक्ष डॉ इंदिरा हृदयेश ने मीमांसा आर्या का पक्ष लेते हुए डॉ धन सिंह रावत पर अनुचित दबाव बनाने का आरोप लगाते हुए उनकी आलोचना की थी। निलंबन को डॉ ़ इंदिरा हृदयेश ने गलत माना। इस प्रकरण पर वर्तमान एवं पूर्व उच्च शिक्षा मंत्री आमने-सामने हैं। धन सिंह रावत ने तो सीधे डॉ इंदिरा हृदयेश पर आरोप लगाते हुए कहा कि एनएसयूआई को चुनाव लड़वाने के लिए उन्होंने कई फर्जी प्रवेशों के लिए दबाव बनवाया।

उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (एनएसयूआई) और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के बीच छात्र संद्घों में कब्जा करने की होड़ बढ़ी है। जिसने शैक्षिक माहौल को सुधारने के बजाए प्रदूषित करने का काम ज्यादा किया है। इस राजनीतिक वर्चस्व की जंग  ने शैक्षणिक संस्थाओं का माहौल तो खराब किया ही है साथ ही गुरु-शिष्य परंपरा का क्षरण भी किया है। अनुशसित मानी जाने वाली अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के लोग अगर शिक्षकों के निलंबन पर मिठाई बांटने लगें तो इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि गुरु-शिष्य परंपरा का पावन भाव किस दिशा की ओर जा रहा है। उच्च शिक्षा मंत्री के इस निर्णय पर कर्मचारी एवं शिक्षक लामबंद हो चुके हैं। हालांकि कार्यवाहक उच्च शिक्षा निदेशक डॉ सविता मोहन के आश्वासन पर एक हफ्ते के लिए अपनी अनिश्चतकालीन हड़ताल कर्मचारी संगठनों ने स्थगित कर दी है। विश्वविद्यालयों में डिग्री एवं स्नातक स्तर पर सेमेस्टर प्रणाली लागू होने के बाद इन कक्षाओं में एक या दो विषयों में अनुत्तीर्ण छात्र-छात्राओं को बैक पेपर के नाम पर अगली सेमेस्टर के लिए प्रवेश दे दिया जाता है। अब प्रश्न है कि इन कक्षाओं में प्रवेश को किस दृष्टि से देखा जाए] क्या ये छात्र चुनाव लड़ने के योग्य माने जाएंगे या नहीं या इनका प्रवेश स्थाई माना जाएगा या अस्थाई। इन सब सवालों का जवाब महाविद्यालय प्रशासन को ढूंढना होगा वरना निलंबन की तलवार फिर लटकती ही रहेगी।

उच्च शिक्षा विभाग के इन अधिकारियों एवं गुरुजनों के निलंबन से ये बात स्पष्ट है कि राजनीतिक नेतृत्व स्वयं के अहं की तुष्टि के लिए किस हद तक जा सकता है। शैक्षणिक संस्थाओं में राजनीतिक दबाव कोई नई बात नहीं है। राजनीतिक नेतृत्व या सरकार चला रहे नुमाईंदों को शैक्षणिक व्यवस्था एवं शिक्षा की गुणवत्ता से कितना सरोकार है ये तो वे स्वयं जाने] परंतु सिर्फ शौर्य दीवार] सबसे ऊंचा तिरंगा स्थापित करने जैसे प्रतीकात्मक निर्णय भावनात्मक प्रतीक हैं। उच्च शिक्षा में गुणात्मक सुधार के लिए ठोस निर्णय लिए जाने की ओर भी उच्च शिक्षा मंत्री का ध्यान अवश्य जाना चाहिए। फिर वो महाविद्यालयों की मूलभूत सुविधाओं में सुधार] शिक्षकों की कमी हो या फिर लंबे समय से वेतन न मिल पा रहे कर्मचारी शिक्षकों की समस्या।

 

भारत गुरु-शिष्य परंपरा का देश है। गुुरुजनों को एक कलम की नोक पर निलंबित किया जाना शर्मनाक है। मैंने मुख्यमंत्री एवं कई वरिष्ठ मंत्रियों से बात कर तत्काल इनके निलंबन को रद्द करने की मांग की है। गुरुजनों को यूं अपमानित करने की प्रवृत्ति बंद करने को कहा है। गुरुजन सरकारी नौकर नहीं हैं। वे हमारे मार्गदर्शक भी हैं।डॉ. इंदिरा हृदयेश] नेता प्रतिपक्ष उच्च शिक्षा के अधिकारियों का निलंबन सही है। कांग्रेस के समय महाविद्यालयों में कई फर्जी प्रवेश हुए हैं। मीमांसा आर्या का प्रवेश फर्जी था इसलिए कार्रवाई हुई। अगर उन्हें लगता है कि उनके साथ गलत हुआ है तो वे अपना पक्ष रख सकती हैं।

डॉ. धन सिंह रावत] उच्च शिक्षा राज्यमंत्री


कमलेश का कमाल

  • दीपक जोशी

भारतीय क्रिकेट टीम में जगह बनाना कोई आसान काम नहीं है। बागेश्वर के भीड़ी गांव के मनीष पांडे के बाद जुजराली भरसाली तोक के निवासी कमलेश नगरकोटी ने भारत को अंडर १९ का विश्वकप दिलाकर अपने गांव का नाम रोशन किया है। साथ ही पूरे बागेश्वर का नाम भी रोशन कर दिया है। गांव में नगरकोटी की बूढ़ी मां] चाचा-चाची और बचपन में खेलने वाले भाई-बहनें हैं। कमलेश को ?kj में सब बिट्टू कहकर बुलाते हैं। क्रिकेट की दुनिया में उभरते खिलाड़ी कमलेश नगरकोटी उर्फ बिट्टू का गांव जिला मुख्यालय से ४१ किमी की दूरी पर है। कुलारंग चैड़ा गांव के जजराली भरसाली तोक के रहने वाले हैं। कमलेश के पिता लक्ष्मण सिंह सेना में ऑरनेरी कैप्टन रहे हैं और कुछ समय पहले ही रिटायर हुए हैं। 

कमलेश की शिक्षा जयपुर के सेना स्कूल में हुई है। कमलेश राजस्थान की टीम से खेलते थे। क्रिकेट कोच सुरेंद्र राठौर ने कमलेश को क्रिकेट खेलने के लिए प्रेरित किया जुजराली में रह रही उनकी ८५ वर्षीय दाद रमुली देवी को अपने पोते बिटटू का इंतजार है। जब उन्हें अपने पोते के प्रदर्शन के बारे में पता चला तो उन्होंने कहा] उन्हें मालूम था कि एक दिन बिट्टू जरूर देश का नाम रोशन करेगा। दस साल पहले अपने माता-पिता के साथ कमलेश गांव में पूजा पाठ करने आए थे। अपने गांव में भी कमलेश लकड़ी के बल्ले से खेलने की कोशिश करता था। चाचा पूरन सिंह के साथ खेलने की जिद किया करता था। वो काफी खुश मिजाज बेटा है। सबको हंसाता रहता है। 

कमलेश की शानदार गैंदबाजी की बदौलत भारत अंडर १९ विश्व कप जीतने में सफल रहा। इस जीत के बाद शहर से लेकर गांव तक खेल प्रेमियों ने जश्न मनाया। जुजराली के उबड़-खाबड़ मैदानों में खेलने वाला बिट्टू के पुराने साथी कमलेश के इस मुकाम से काफी खुश हैं।

 कमलेश के चाचा पूरन सिंह का कहना है कि जब भी यहां बच्चे खेलते हैं तो उन्हें कमलेश की याद आ जाती है। अगर मौका मिले तो गांव से और भी कमलेश निकलकर देश की सेवा कर सकते हैं। 

 

 

 
         
 
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