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खास खबर 
 
धांधलियों का आयुर्वेद

दिकदर्शन रावत

आयुष प्रदेश के नाम पर उत्तराखण्ड में न सिर्फ भ्रष्टाचार होता आ रहा है] बल्कि यहां आयुर्वेदिक दवाइयों के प्रति जनता का भरोसा भी टूटा है। आयुर्वेद एवं यूनानी चिकित्सा के कार्यवाहक निदेशक अरुण कुमार त्रिपाठी की कार्यशैली कटद्घरे में है। स्थिति यह है कि पूर्व में जिन कपंनियों के नमूने फेल हो गए थे उन पर कार्रवाई करने के बजाए फिर से उन्हीं की दवाइयां विभाग में मंगा दी गई। वाहनों की आवाजाही के नाम पर भी धन को ठिकाने लगाया गया। विभागीय नियुक्तियों में धांधली का आलम यह है कि खुद कार्यवाहक निदेशक की नियुक्ति को लेकर सवाल उठ रहे हैं] जबकि कार्यवाहक निदेशक इस सबसे बेफिक्र बड़े मजे में हैं। वह कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत के खास बताए जाते हैं

 

आयुर्वेदिक एवं यूनानी चिकित्सा पद्धतियों के विकास एवं इन पद्धतियों के माध्यम से जनता को चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के दावे प्रदेश में निरंतर होते रहे हैं। इसी कड़ी में प्रदेश में आुयर्वेदिक एवं यूनानी निदेशालय स्थापित किया गया। जिला स्तर पर भी इसके कार्यालय बनाये गए। तमाम समाचार माध्यमों में विज्ञापनों के जरिये आयुष प्रदेश का इतना प्रचार किया गया कि सचमुच में लोग उत्तराखण्ड प्रदेश को आयुष प्रदेश के नाम से जानने लगे। लेकिन आयुष प्रदेश की अंदरूनी सेहत बेहद खराब है। प्रदेश में सरकार भले ही किसी भी पार्टी की रही हो] आयुष विभाग भ्रष्टाचार का अड्डा बना रहा। विभाग में उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं।  पौराणिक काल से ही उत्तराखण्ड में आयुर्वेद का बोल बाला रहा है। दूर&दराज के गांवों में आज भी उपचार जड़ी&बूटियों से होता आ रहा है। करोड़ों रुपए आयुर्वेदिक विभाग इनके विकास पर खर्च करते आ रहा है] लेकिन फिर भी रिजल्ट शून्य है।

 जानकारों की मानें तो देहरादून के सहस्त्रधारा स्थित आयुष विभाग सिर्फ भ्रष्टाचार का अड्डा बना हुआ है। जिला स्तर पर दवाइयों की मांग रही हो या ट्रांसर्फर] विभाग में सदैव गलत गतिविधियो होती रही हैं। जो भी अधिकारी अपने स्तर से विभाग को लाभ पहुंचाने की कोशिश करता है उसे उच्च स्तर से चुप करा दिया जाता है। आयुर्वेद एवं यूनानी चिकित्सा के वर्तमान कार्यवाहक निदेशक अरुण कुमार त्रिपाठी पर लगातार भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं। त्रिपाठी पर ताजा आरोप उन कंपनियों की दवाइयां खरीदने का है जिनके नमूने ¼सैंप्लस½ पूर्व में फेल हो गए थे।

कार्यवाहक निदेशक अरुण कुमार त्रिपाठी की पोस्टिंग भी कटद्घरे में है। बताया जाता है कि आयुर्वेद विभाग का जब शिक्षा और स्वास्थ्य संवर्ग एक साथ था उस समय ऋषिकुल आयुर्वेदिक कॉलेज के प्राचार्य को आयुर्वेदिक निदेशक का कार्यवाहक चार्ज दिया गया था। लेकिन बाद में आयुर्वेद विभाग और आयुर्वेद विश्वविद्यालय की पृथक व्यवस्था होने के चलते अरुण कुमार त्रिपाठी आयुष विभाग के निदेशक बनने में सफल रहे। आयुर्वेद विभाग में इस पर असंतोष है। खासकर इस बात के लिए कि एक अराजपत्रित अधिकारी लगभग २०० राजपत्रित अधिकारियों का बॉस ही नहीं] बल्कि हैड ऑफ डिपार्टमेंट भी है। २०१५ में तत्कालीन प्रमुख सचिव  आयुष एवं आयुष शिक्षा ओम प्रकाश ने आयुर्वेद विभाग और उत्तराखण्ड आयुर्वेद विश्वविद्यालय पृथक &पृथक होने के बाद उत्तराखण्ड शासन के एक शासनादेश के आधार पर दिनांक ३ अक्टूबर में स्पष्ट आदेश दिया कि ऐसे पदधारक जिनकी नियुक्ति ऋषिकुल या गुरुकुल महाविद्यालयों के लिए स्वीकृत पदों के विरूद्ध की गयी है] उनसे विकल्प प्राप्त नहीं किया जाएगा। फिर भी डॉ त्रिपाठी ने कार्यवाहक निदेशक के पद का दुरुपयोग कर शासनादेश के विरुद्ध अपना विकल्प भी दिया। बताया जाता है कि उन्होंने शासन को अंधेरे में रखकर अपने विकल्प को स्वीकृत कराने की जुगत भी भिड़ा दी।

जानकारों की मानें तो अब विभागीय डी ़मी ़सी ़निदेशक पद के लिए होने वाली है जिसमें चिकित्सा संवर्ग के चिकित्सकों के अलावा वर्तमान निदेशक को भी शामिल किया जा रहा है। राजकीय आयुर्वेद एवं यूनानी चिकित्सा संद्घ इसका विरोध कर रहा है। संद्घ इस मामले में चाहता है कि विभागीय निदेशक के पद पर यदि डीपी सी की जाती है] तो वर्तमान निदेशक को सर्वप्रथम उनके मूल विभाग उत्तराखण्ड आयुर्वेद विश्वविद्यालय के लिए कार्यमुक्त कर दिया जाए। डीपीसी में केवल और केवल चिकित्सा संवर्गों के चिकित्सको ही शामिल हों। वर्तमान निदेशक डॉ त्रिपाठी को डीपीसी में शामिल किया जाना नियम विरुद्ध है। वर्तमान निदेशक शिक्षा से हैं। उन्हें मूल विभाग उत्तराखण्ड आयुर्वेद विश्वविद्यालय में भेज दिया जाए। 

कार्यवाहक निदेशक डॉ ़ त्रिपाठी पर उन कंपनियों पर मेहरबानी करने का भी गंभीर आरोप लग रहा है] जिनके सैंपल पूर्व में फेल हो चुके हैं। बताया जाता है कि कायदे से जिन कंपनियों के सैंपल फेल हुए उनके विरूद्ध कार्रवाई की जानी चाहिए थी। लेकिन विभाग की ओर से न सिर्फ उनका पेमेंट कर दिया गया] बल्कि दुबारा भी उन कंपनियों को ही टेंडर दे दिया गया। खास बात यह है कि कंपनियों की सैंपल प्रदेश की टेस्टिंग लैब ने फेल किए थे।

गौरतलब है कि जिन दवाईयों की विभाग को जरूरत होती है] वैध कंपनियों से मंगाई जाती हैं। सभी दवाओं में लगने वाला चूर्ण] सामग्री एक ही होती है। उनका रंग और साईज चेंज कर दिया जाता है। इन दवाईयों में आपसी लेन&देन हो जाने के बाद इन्हें जनता में पहुंचाया जाता है।  

राजकीय विश्लेषक डॉ पिंकी खाती के पत्र २२/९/२०१७ के अनुसार वर्ष २०१४&१५ एवं २०१५&१६ के औषधि नमूनों की गुणवत्ता परीक्षण रिपोर्ट में उत्तराखण्ड विद्यापीठ रुद्रप्रयाग से १८ नमूने मिले जिनमें से ७ फेल हो गए। लाइसेंस अधिकारी वीके शर्मा की ५ सितंबर २०१७ की रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखण्ड विद्यापीठ फार्मेसी रुद्रप्रयाग द्वारा निर्मित औषधि मानकों के अनुरूप नहीं है। द फर्मास्युटिकल्स कार्पोरेशन केरल] कोऑपरेटिव अंडरटेकिंग यूनिट भोपाल के सैंपल भी फेल पाए गए। इन तीनों कंपनियों के सैम्पल फेल हो जाने के बाद भी इन्हें भुगतान कर दिया गया था। अभी तक इन कंपनियों से वसूली नहीं की गई] न ही इन कंपनियों पर कोई कार्यवाही की गई है। उल्टा दुबारा उन्हीं से दवाइयां मंगा दी गई।

दवाइयों का ऑर्डर फरवरी २०१५ में दिया गया और मार्च के महीने में भुगतान कर दिया गया। अप्रैल माह में जिला आयुर्वेदिक अधिकारी को दवाइयां भेज दी गयी। जब इन दवाइयों के सैम्पल चैक किये गये तो सैम्पल फेल हो गये। सवाल ये है कि सैम्पल फेल होने के बाद भुगतान तो कर दिया] लेकिन इन कंपनियों से रिकवरी क्यों नहीं की गयी? इसी माह नवंबर और दिसंबर में पुनः रुद्रप्रयाग की कंपनी उत्तराखण्ड विद्यापीठ फार्मेसी को १ ़५ करोड़ का ऑर्डर दिया गया। जानकारों की मानें तो दवाइयों में ६० प्रतिशत तक का कमीशन मिलता है।

एक और खास बात यह है कि विभागीय धन को ठिकाने लगाने के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान तक वाहनों की अनावश्यक आवाजाही दिखाई गई। ]दि संडे पोस्ट] ने जब इस मामले में जांच की तो पता चला कि देहरादून से हरिद्वार की दूरी २६० किमी तक दिखाई गई है। नौ दिसंबर २०१५ को देहरादून से हरिद्वार की दूरी २०० किमी दिखायी गयी है] जबकि वास्तविक दूरी लगभग ६०&६२ किमी है। जिन दिनों राजपत्रित अवकाश रहा उन दिनों भी वाहनों की आवाजाही दिखाई गई है। राजपत्रित अवकाश छह मार्च २०१६ को २१० किमी] राजपत्रित अवकाश सात मार्च २०१६ को २२० किमी की यात्रा अंकित की गयी है। यह सिलसिला पिछले चार&पांच वर्षों से निरंतर चल रहा है। विभागीय भर्तियां भी खास चर्चा का विषय रही हैं। बताया जाता है कुछ समय पूर्व १८० फार्मेसिस्टों की भर्ती  बिना संस्तुति के करा दी गयी थी। बाद में शासन स्तर पर अनुमति से ली गयी। सूत्रों की मानें तो इन भर्तियों में खूब लूट&खसोट हुई। लोग बताते हैं] ]उनका अधिकांश समय तो शासन&प्रशासन को खुश करने में ही लग जाता है।] उनके निदेशक बनने पर आयुर्वेद संद्घ आंदोलन करने की बात कर रहा है। आयुर्वेद संद्घ इस बारे में आयुष मंत्री हरक सिंह रावत एवं मुख्यमंत्री से भी मिल चुका है।

समाजसेवियों के द्वारा प्रधानमंत्री कार्यालय को भी उस बारे में अवगत कराया गया है।  चर्चा है कि डॉ ़ त्रिपाठी कैबिनेट मंत्री डॉ हरक सिंह रावत के बेहद करीबी एवं पसंदीदा हैं। इसलिए जांच में रूकावट हो रही है। बताया जाता है कि पहले ओम प्रकाश भी डॉ ़ त्रिपाठी के पद पर बने रहने को लेकर सवाल उठा चुके हैं। लेकिन आज मुख्यमंत्री का सचिव होने के बाद भी वे उन्हें इस पद से हटा नहीं पा रहे हैं। 

 

बात अपनी&अपनी

मामले को देखना पड़ेगा। जरूरत पड़ी तो जांच बैठा देंगे। किसी भी कंपनी के सैंपल फेल हो सकते हैं। आज की तिथि में योग्य डायरेक्टर भी नहीं हैं। ये एडॉक में हैं। जनता के साथ खिलवाड़ नहीं होने देंगे।

हरक सिंह रावत] आयुष मंत्री

तीन साल पहले की स्थिति है। मुझे याद नहीं है। फाइल देख के ही बता पाऊंगा कि अब क्या स्थिति है।

ओमप्रकाश] अपर मुख्य सचिव

मामला मेरे संज्ञान में नहीं है। पीएमओ से जांच का पता नहीं है।

हरवंश सिंह चुद्घ] सचिव आयुष

मैं फोन पर कुछ नहीं कह पाऊंगा। मैं मिलकर ही जवाब दे पाऊंगा।

डॉ अरुण त्रिपाठी] कार्यवाहक निदेशक आयुर्वेद एवं यूनानी चिकित्सा

हम इस बारे में माननीय मंत्री हरक सिंह को अवगत करा चुके हैं। डीपीसी में वर्तमान निदेशक को शामिल किया जाएगा तो इसका प्रांतीय संगठन विरोध करेगा। ८०० चिकित्सकों का हित प्रभावित हो रहा है। आयुर्वेद एवं चिकित्सा शिक्षा संवर्ग दोनों अलग&अलग हैं। उन्हें नियम विरुद्ध निदेशक बैठाया गया है।डॉ. हरदेव सिंह रावत] महासचिव राजकीय आयुर्वेद एवं यूनानी शिक्षा सेवा संघ 

 

 

 
         
 
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