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सामयिक
 
सिमटते गांव] फैलते शहर

  • गुंजन कुमार

पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश और हिमाचल के मुकाबले उत्तराखण्ड की बहुत बड़ी आबादी शहरों में रहती है। उत्तर प्रदेश की २२ फीसदी और हिमाचल की १० फीसदी आबादी ही शहरों में है जबकि उत्तराखण्ड के ३० प्रतिशत लोग शहरों में रह रहे हैं। २०१७ के बाद का आंकड़ा तो इससे भी कहीं अधिक हो सकता है। शहरों पर बोझ बढ़ रहा है। इसके बावजूद राज्य सरकार नगर निकायों का विस्तार कर शहरीकरण को बढ़ावा दे रही है

 

नगर निकायों के विस्तार का विरोध पूरे प्रदेश में हुआ। लेकिन इसका असर वैसा नहीं रहा जैसा होना चाहिए था। यही वजह है कि सरकार बिना किसी संशोधन के इस विस्तार को अमलीजामा पहनाने में सफल रही है। इस विस्तार के बाद पहाड़ी राज्य उत्तराखण्ड का न केवल शहरी क्षेत्र बढ़ गया] बल्कि नगरीय आबादी में भी अचानक वृद्धि हो गई। इस वृद्धि के बाद प्रदेश सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती शहरी क्षेत्र में बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराना रहेगा। सरकार के लिए यह चुनौती इसलिए भी है कि राज्य की आर्थिक स्थिति खराब है। प्रदेश के खजाने में सरकारी कर्मचारियों को वेतन और पेंशन देने तक का पैसा नहीं है। ऐसे में विकास कार्यों के लिए धन की कमी आम बात है। विपक्षी कांग्रेस से लेकर पंचायत प्रतिनिधियों का भी यही आरोप है कि सरकार शहरी क्षेत्र का विस्तार तो कर रही है] लेकिन वहां बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए धन कहां से लाएगी। जबकि वर्तमान में भी कई नगर निकाय बजट की कमी का रोना रोते रहते हैं। 

प्रदेश में २०११ की जनगणना के मुताबिक करीब ३० फीसदी आबादी शहरी क्षेत्र में निवास करती है। करीब एक करोड़ की कुल आबादी वाले इस राज्य की ७० लाख से कुछ ज्यादा की आबादी गांवों में रहती है] जबकि ३० लाख ४९ हजार ३३८ लोग शहरों में रहते हैं। पर्वतीय इलाकों से पलायन के कारण वर्ष २०११ से अब तक इसमें और वृद्धि हुई होगी। वर्ष २०१४ में केदारद्घाटी आपदा के बाद कई सर्वे रिपोर्ट में कहा गया था कि पहाड़ से पलायन में बहुत ज्यादा तेजी आई है। इसका सीधा अर्थ है कि वर्ष २०१७ से पहले प्रदेश की शहरी आबादी ३० फीसदी से कहीं और ज्यादा बढ़ी है। इसकी आधिकारिक जानकारी तो चार साल बाद २०२१ की जनगणना में ही पता चलेगी। इन सबसे इतर सरकार के नगर निकाय को विस्तार करने के फैसले से शहरी आबादी अचानक एक झटके में ही करीब दस फीसदी बढ़ गई। 

शहरी आबादी के मामले में यह पर्वतीय राज्य अन्य हिमालयी राज्यों से बहुत आगे है। यही नहीं जनसंख्या की दृष्टि से सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की कुल शहरी आबादी अनुपातिक तौर पर उत्तराखण्ड से कम यानी २२ प्रतिशत ही है। २०११ की जनगणना के मुताबिक उत्तराखण्ड के पड़ोसी राज्य हिमाचल की कुल आबादी ६८]६४]६०२ है। इसी जनगणना में यह आंकड़े भी स्पष्ट रूप से आए कि हिमाचल में करीब ९० फीसदी जनसंख्या गांव में निवास करती है। हिमाचल के लोग पर्यटन से बहुत गहरे जुड़े हुए हैं। पर्यटन और बागवानी ने हिमाचल से लोगों का पलायन नहीं होने दिया। केवल १० फीसदी आबादी ही यहां शहरों में रहती है। हिमाचल में केवल ६]८८]५५२ लोग ही शहरों में रह रही हैं। शहरी आबादी कम होने के कारण ही प्रदेश की राजधानी और दुनिया भर के टूरिस्टों के सबसे हॉट टूरिस्ट स्पॉट शिमला में भीड़&भाड़ होने के बावजूद बुनियादी सुविधाएं अन्तरर्राष्ट्रीय स्तर की है। यहां गंदगी न के बराबर रहती। जबकि उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून हो या फिर पहाड़ों की रानी मसूरी या फिर नैनीताल] सभी जगह बुनियादी सुविधाएं नाम मात्र की हैं। पर्यटकों को तो दूर यहां स्थानीय लोगों को भी बिजली पानी जैसी सुविधाएं नहीं मिल पाती।

केवल हिमाचल ही नहीं बल्कि एक और हिमालयी राज्य जम्मू&कश्मीर में भी शहरी आबादी उत्तराखण्ड से कम है। २०११ की जनगणना के मुताबिक जम्मू और कश्मीर में शहरी आबादी करीब २७ फीसदी है। यहां ७३ फीसदी लोग गांवों में रहते हैं। यह तब है जब हजारों किलोमीटर लंबी पाकिस्तानी सीमा पर रोजाना गोलीबारी होती है। वर्ष १९९० से यह राज्य आतंकवाद से ग्रस्त है। उस दौरान हजारों&हजार कश्मीरी पंडित मजबूरी में द्घाटी छोड़कर जम्मू शहर और अन्य शहरों में बस गए हैं। उत्तराखण्ड के पड़ोसी एवं मैदानी राज्य उत्तर प्रदेश में भी केवल २२ फीसदी आबादी ही शहरों में रहती है। यहां भी ७८ फीसदी आबादी गांवों में निवास करती है। जबकि उत्तर प्रदेश में नोएडा] गाजियाबाद] लखनऊ] कानपुर जैसे दर्जनों बड़े&बड़े शहर हैं। फिर भी यहां की तीन&चौथाई से ज्यादा आबादी गांवों में रहती है। मगर छोटे से राज्य उत्तराखण्ड ने शहरी आबादी में इन सबको पीछे छोड़ दिया है। इस पर प्रदेश सरकार की नगर निकाय के विस्तारीकरण का फैसला शहरी आबादी को बढ़ाने वाला ही है।  

पहले ही प्रदेश के शहर आबादी के भार से पस्त है। इस पर उत्तराखण्ड सरकार ने पिछले साल प्रदेश की आठ प्रतिशत से अधिक ग्रामीण आबादी को शहरी जनसंख्या में बदल दिया। सरकार के इस फैसले से ३८५ गांवों का वजूद खत्म हो गया। ये सभी गांव अब शहरों में शामिल हो गए हैं] क्योंकि इनकी पंचायती को खत्म कर सरकार ने इसे नगर निकाय में शामिल कर लिया है। इन गांवों के शहरों में शामिल होते ही एक और बड़ा परिवर्तन आ गया है। वह परिवर्तन है इनकी जमीन की खरीद& फरोख्त में बदलाव। शहरों में शामिल होने के बाद इन ३८५ गांवों की ५०]१०४ हेक्टेयर भूमि को अब प्रदेश के बाहर के लोग खरीद सकेंगे] क्योंकि उत्तराखंड में बाहरी लोगों के भूमि खरीदने पर प्रतिबंध वाला भूमि कानून अब इन पर लागू नहीं होगा। यह जानकारी सूचना अधिकार कार्यकर्ता नदीमुद्दीन को उत्तराखण्ड के शहरी विकास विभाग ने उपलब्ध कराई गई है।

काशीपुर निवासी सूचना अधिकार कार्यकर्ता नदीमुद्दीन ने उत्तराखंड शासन के शहरी विकास विभाग से नगर निगम] नगर पालिकाओं तथा नगर पंचायतों में शामिल क्षेत्रों और नए नगर निकाय बनाने के सम्बन्ध में सूचना मांगी। इसके उत्तर में विभाग की लोक सूचना अधिकारी ने जो सूचना उपलब्ध कराई उससे इसका खुलासा हुआ है। इस सूचना के मुताबिक ३८५ ग्रामों की भूमि को शहरी क्षेत्र में शामिल किया गया है।

सूचना के अनुसार कुल ४५ नगर निकायों में ग्रामीण क्षेत्रों को शामिल किया गया है। इसमें से एक मात्र नगर निकाय नगर निगम रुड़की में जहां ८० .६८१ हेक्टेयर क्षेत्र शामिल किया गया है] वहीं ग्रामीण क्षेत्रों पाडली गुर्जर तथा रायपुर के ५०३  .९४१ हेक्टेयर क्षेत्र को निगम से अलग किया गया है। अर्थात रुड़की नगर निगम में जितना क्षेत्र शामिल किया गया उससे छह गुना ज्यादा क्षेत्र को निगम से अलग किया गया है। इसके अलावा अन्य ४४ नगर निकायों में ३८५ ग्रामों के ५०१०४ .१३ हेक्टेयर क्षेत्र को शामिल किया गया है। शहरी क्षेत्र में शामिल भूमि पर भूमि अधिनियम के प्रावधान लागू नहीं होते हैं। इसलिए इस भूमि से उत्तराखंड के बाहर के निवासियों पर भूमि खरीद का प्रतिबंध भी समाप्त हो गया है। सूचना के अनुसार उत्तराखंड के १३ जिलों में से १२ जिलों में ग्रामीण क्षेत्रों को शहरी क्षेत्रों में शामिल किया गया है। अल्मोड़ा जिले को छोड़कर अन्य सभी जिलों के ग्रामीण क्षेत्र शहरी निकायों के भाग बनाए गए हैं। गढ़वाल मण्डल में देहरादून जिले में सर्वाधिक ८५ ग्रामों के २०२२१ .२९४ हेक्टेयर ग्रामीण क्षेत्र को नगर निगम के अतिरिक्त हरबर्टपुर] विकास नगर] ऋषिकेश] डोईवाला नगर पालिका में शामिल किया गया है। पौड़ी गढ़वाल जिले के ८० ग्रामों के ४६३१ .२३६ हेक्टेयर ग्रामीण क्षेत्र को श्रीनगर और कोटद्वार नगर निकायों में शामिल किया गया है। 

उत्तरकाशी जिले के ३५ ग्रामों के २०६७ .४११ हेक्टेयर ग्रामीण क्षेत्र को बड़कोट तथा बाड़ाहाट में शामिल किया गया है। इसके अतिरिक्त चमोली जिले के ७ ग्रामों के ६०७ .९८८ हेक्टेयर ग्रामीण क्षेत्र को औली] कर्णप्रयाग] नन्द प्रयाग निकायों में शामिल किया गया है। हरिद्वार जिले के ११ ग्रामों के ९७६  .१२०७ हेक्टेयर ग्रामीण क्षेत्र को शिवालिक नगर] झखेडा] लण्ढ़ौरा तथा हरिद्वार नगर निकाय में शामिल किया गया है। टिहरी जिले के ९ ग्रामों के ४१५ .०११ हेक्टेयर ग्रामीण क्षेत्र को देवप्रयाग] नरेन्द्र नगर] कीर्ति नगर तथा छपियावाला नगर निकायों में शामिल किया गया है। रुद्रप्रयाग जिले के ८ ग्रामों के ४७८ .६०३ हेक्टेयर क्षेत्र को ऊखीमठ] अगस्तमुनि और तिलवाड़ा नगर निकाय में शामिल किया गया है। 

कुमाऊं मण्डल के छह में से पांच जिलों में ग्रामीण क्षेत्रों को शहरी निकायों में शामिल किया गया है। इसमें सर्वाधिक ६३ ग्रामों के १४५५७ .१८७५ हेक्टेयर ग्रामीण क्षेत्र को उधमसिंह नगर जिले के ११ नगर निकायों में शामिल किया गया है। इसमें काशीपुर] रुद्रपुर नगर निगम के अतिरिक्त सितारगंज] गदरपुर] किच्छा] खटीमा] बाजपुर] सुल्तानपुर] दिनेशपुर] गूलरभोज] शक्तिगढ़ नगर निकाय शामिल है। नैनीताल जिले के ५२ ग्रामों के ४५७६ .७५३ हेक्टेयर ग्रामीण क्षेत्र को हल्द्वानी] भवाली] भीमताल नगर निकाय में शामिल किया गया है। 

बागेश्वर जिले के २० ग्रामों के ७३२ .३०८ हेक्टेयर ग्रामीण क्षेत्र को बागेश्वर नगर पालिका में शामिल किया गया है। चंपावत जिले के ४ ग्रामों के ६७ .९१३ हेक्टेयर क्षेत्र को टनकपुर नगर पालिका क्षेत्र में शामिल किया गया है। पिथौरागढ़ जिले के ११ ग्रामों के ७७२ .४९२ हेक्टेयर क्षेत्र को पिथौरागढ़ एवं डीडीहाट नगर निकाय में शामिल किया गया है। उत्तराखंड में २०१७ में शहरी निकायों के सीमा विस्तार से साढ़े आठ लाख से अधिक ग्रामीण जनता शहरी क्षेत्रों की निवासी बन गयी है। इसमें सर्वाधिक करीब तीन लाख लाख देहरादून जिले तथा दो लाख से कुछ ज्यादा ऊधमसिंह नगर जिले की जनता शामिल है। उत्तराखंड में कृषि भूमि खरीदने पर प्रदेश के बाहर के लोगों पर रोक लगाने वाला भ्ाूमि कानून शहरी क्षेत्रों पर लागू न होने के कारण शहरी क्षेत्र में शामिल ५० हजार हैक्टेयर से अधिक भूमि पर यह प्रतिबंध स्वतः हट गया है। अब इन क्षेत्रों की भूमि को कोई भी व्यक्ति खरीद सकता है। इन सबसे अलग बड़ा सवाल यह भी है कि क्या प्रदेश सरकार इन शहरी इलाकों में सुविधाएं उपलब्ध करा पाएगी? बिजली] पानी के अलावा सड़कें] सीवर] स्ट्रीट लाइटें] सामुदायिक केंद्र आदि शहरों में अनिवार्य रूप से चाहिए।

 

यह धारणा बेबुनियाद है कि शहरी क्षेत्र के जमीन को बाहरी खरीद लेंगे। हम प्रदेश के शहरों को स्मार्ट सिटी बना रहे हैं। नगर निकाय में शमिल सभी लोगों को सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएगी।

मदन कौशिक] शहरी विकास मंत्री

gunjan@thesundaypost.in

 

 

 
         
 
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