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प्रदेश 
 
लाखों का चाय&पानी

  • आकाश नागर

प्रदेश पर कर्ज लगातार बढ़ रहा है। लेकिन सरकार आय बढ़ाने के बजाए खर्च बढ़ा रही है। मुख्यमंत्री कार्यालय आने वाले अतिथियों को रोजाना करीब २३ हजार का चाय&पानी पिला दिया जाता है। यह खर्च पुराने मुख्यमंत्री के कार्यकाल में काफी कम था

^^मैंने आरटीआई के तहत मुख्यमंत्री के दस महीने का चाय पानी का ब्योरा मांग कर कोई गलती नहीं की थी। मीडिया ने मेरी तथ्यपरक खबर को निकालना तक उचित नहीं समझा। यहां तक कि जब मैंने प्रतिष्ठित अखबार के पत्रकारों से पूछा कि खबर न निकलने के पीछे क्या कारण थे तो बहाना बनाया गया कि आपने यह खबर एक इंवनिंग अखबार को दे दी थी। जिस अखबार की खबर निकालने की बात कहकर मेरी खबर प्रकाशित नहीं की गई उसी के साथ मैंने सभी प्रमुख दैनिक समाचार पत्रों को आरटीआई में मिले जवाब की फोटो प्रति दी थी। लेकिन शायद मीडिया सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत के मोह में पड़ गया है। जिसके चलते मेरी यह जानकारी जनता के सामने नहीं रखी। जिसमें मुख्यमंत्री कार्यालय में दस माह का जलपान का आंकड़ा पेश किया गया था। इसमें जलपान के खर्च में अब तक के मुख्यमंत्रियों के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं।^^

यह कहना है आरटीआई कार्यकर्ता हेमंत सिंह गोनिया का। गोनिया ने सूचना अधिकार अधिनियम (२०००) के तहत इस उद्देश्य से जानकारी एकत्र की  थी कि इसको प्रदेश की आर्थिक विषमताओं से जूझती जनता के सामने रखा जाएगा। यह जानकारी पिछले दस महीनों के मुख्यमंत्री कार्यालय के जलपान के खर्च से संबंधित थी। गोनिया को जो जानकारी मिली उसके तहत त्रिवेंद्र सिंह रावत के कार्यालय में प्रत्येक दिन २२ हजार की चाय वहां आने वाले अतिथि पी जाते हैं। लेकिन आरटीआई कार्यकर्ता हेमंत सिंह गोनिया इस मामले पर मीडिया के रवैये से बेहद आहत हुए हैं। उन्होंने कहा कि  वह इस जानकारी को जनता के समक्ष प्रस्तुत करे जिससे प्रदेश के सत्तासीन नेताओं के साथ ही अफसरों की सूचनाएं प्राप्त की गई हैं। आरटीआई कार्यकर्ता गोनिया को मुख्यमंत्री कार्यालय से जलपान पर खर्चे का जो ब्योरा मिला है वह चिंता में डालने वाला है। खासकर ऐसे राज्य के लिए जिसकी स्थापना हुए अभी दो दशक भी नहीं हुए हैं। यह नवोदित राज्य अरबों रुपये के कर्ज के बोझ तले दब गया है। यहां तक कि सरकार के पास अपने कर्मचारियों को वेतन और पेंशन आदि देने के पैसे नहीं हैं।गोनिया को सूचना अधिकार (२००५) के तहत मिली जानकारी के अनुसार प्रदेश के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के कार्यालय में पिछले दस माह के दौरान ६८ लाख ५९ हजार ८६५ रुपए की चाय पानी आदि पर खर्च किए जा चुके हैं। एक तरफ मेहमान नवाजी में अव्वल प्रदेश सरकार दूसरी तरफ योजनाओं के लिए केंद्र का मुंह ताकती रहती है।

पिछले दो मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल में  चाय पानी का आंकड़ा वर्तमान मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत से बहुत कम है। अगर पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की ही बात करें तो उनके कार्यकाल में भाजपा नेता अजेंद्र अजय ने सूचना अधिकार अधिनियम के तहत ऐसी ही एक जानकारी मांगी थी। जिसमें अजेंद्र अजय ने पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के फरवरी २०१४ से लेकर जुलाई २०१६ तक चाय नाश्ते का खर्चा का ब्योरा मांगा था।  करीब ढाई साल के कार्यकाल के दौरान ६७ लाख का खर्च सामने आया था। तब भाजपा नेताओं ने इस मुद्दे पर खूब हंगामा किया था। तब अधिकतर मीडिया ने भी इसे पहले पेज की खबर बनाया था। हरीश रावत का यह मामला काफी सुर्खियों में रहा था। जबकि इससे पूर्व के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के कार्यालय से संबंधित एक सूचना मांगी गई थी। विजय बहुगुणा के मुख्यमंत्रित्व कार्यकाल १३ मार्च २०१२ से लेकर अगस्त २०१३ तक जलपान की सूचना सामने आई। बहुगुणा के १७ माह यानी ५३७ दिनों के जलपान का खर्च ५६ लाख ७४ हजार ७२८ रूपए था। इस मामले पर भी भाजपा ने कांग्रेस की जमकर ?ksjscanh की थी। इस तरह देखा जाए तो बहुगुणा सरकार में चाय पानी आदि पर १० हजार रुपए रोज का खर्च होता था। लेकिन वर्तमान मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का एक दिन का ही खर्च २२ हजार रूपए का होता है।  

गौरतलब है कि चालू वित्तीय वर्ष २०१७&१८ में राज्य पर कर्ज का बोझ ४५ हजार करोड़ से ज्यादा होने का अनुमान है। पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में यह कर्ज तकरीबन पांच हजार करोड़ बढ़ सकता है। बीते वित्तीय वर्ष २०१६&१७ में राज्य पर कर्जे का बोझ बढ़कर ४०७९३ ़६९ करोड़ हो गए था। कर्ज के मामले में राज्य सरकार के गठन के वक्त ही करारा झटका लगा था। राज्य गठन के वक्त राज्य के हिस्से में ४४३० ़०४ करोड़ कर्ज आया था। राज्य के जन्म के साथ मिला यह कर्ज लगातार बढ़ता ही जा रहा है। कम आमदनी और खर्च में बढ़ते अंतर को पाटने में लिए राज्य की ऋण पर निर्भरता लगातार बढ़ती जा रही है। हालत ये हैं कि नए वित्तीय वर्ष में राज्य पर कुल कर्ज राज्य के सालाना बजट से ज्यादा है। जाहिर है ऐसे हालात में राज्य पर अपने आर्थिक संसाधनों को बढ़ाने का दबाव भी बढ़ गया है। फिर भी सरकार अपना खर्च कम करने के बजाए इस प्रकार की फिजूल खर्ची कर रही है। 

akash@thesundaypost.in

 

 

 
         
 
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