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आवरण कथा
 
नेतृत्व परिवर्तन की सुगबुगाहट

  • कृष्ण कुमार

उत्तराखण्ड में नेतृत्व परिवर्तन की संभावनाएं हैं। ऐसा इसलिए कि मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की कार्यशैली से भाजपा विधायक और सरकार के मंत्री बेहद खफा हैं। ऊपर से मुख्यमंत्री के चहेते नौकरशाह और सलाहकारों की फौज आग में द्घी डालने का काम कर रही है। ये नौकरशाह और सलाहकार विधायकों और मंत्रियों को कुछ नहीं समझते। हालत यह है कि मुख्यमंत्री के ओएसडी जनता दरबार तक लगा रहे हैं। सलाहकार मीडिया में अपनी ब्रांडिंग कर रहे हैं। जो अधिकारी ईमानदारी से काम करना चाहते हैं] उन्हें सलाहकार और नौकरशाह हतोत्साहित कर रहे हैं

 

छोटे राज्य विकास के लिए बेहतर माने गए थे। लेकिन इस बात को वर्ष २००० में बने झारखण्ड और उत्तराखण्ड ने झुठला दिया। दोनों राज्यों में शुरू से ही राजनीतिक अस्थिरता बदस्तूर जारी है। उत्तराखण्ड में १८ वर्ष में ८ नेता मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल चुके हैं। एनडी तिवारी को छोड़ कोई भी पांच साल तक मुख्यमंत्री पद पर नहीं रह सका। पहली बार दो-तिहाई से भी ज्यादा बहुमत के साथ बनी त्रिवेंद्र सरकार के दस माह के कार्यकाल में ही एक बार फिर नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाएं शुरू हो गई हैं।

पृथक उत्तराखण्ड बनते ही राजनीति में नेतृत्व परिवर्तन के बीज पड़ गए थे। १८ वर्ष के कालखण्ड में हर सरकार (एनडी तिवारी सरकार अपवाद) के समय इन बीजों को खाद-पानी देकर इस कदर इनका पोषण किया गया कि उन्होंने मजबूत वृक्षों का आकार ले लिया। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में फिर से नेतृत्व परिवर्तन की आशंका मंडराने लगा है। तीन चौथाई से अधिक बहुमत पाने के बावजूद भाजपा सरकार के भीतर मुख्यमंत्री को बदलने की चर्चाएं शुरू हो गई हैं] जबकि सरकार अभी अपना एक वर्ष का कार्यकाल तक पूरा नहीं कर पाई है। इस तरह की चर्चाओं का राजनीतिक गलियारों में गूंजना साफ करता है कि भाजपा संगठन और सरकार के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।

 सूत्रों की मानें तो इसके पीछे असल वजह मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत की कार्यशैली को बताया जा रहा है। चर्चा है कि भाजपा के  विधायक और स्वयं सरकार के कई मंत्री तक मुख्यमंत्री की कार्यशैली पर अपना असंतोष जता चुके हैं। इसके कई कारण हैं] जो समय-समय पर सामने आते रहे हैं। चाहे वह नौकरशाही के बेलगाम होने या फिर नौकरशाही में गुटबाजी का मसला हो] कहीं न कहीं मुख्यमंत्री की लचर कार्यशैली के कारण ही ऐसा संभव हो पाया है। हालत इस कदर हैं कि सचिवालय में मुख्यमंत्री के चहेते अफसरों की मनमानी से कई नौकरशाहों में खासा रोष पनप चुका है।

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के इस अल्प कार्यकाल में ही राजनीतिक माहौल गरमाने लगा था। सरकार के कई मंत्रियों और मुख्यमंत्री के बीच मतभेदों की खबरें इस दौरान जमकर उड़ती रहीं। इनमें मतभेद के साथ मनभेद तक उभरने लगा] लेकिन इसको दूर करने का कोई ठोस प्रयास न तो मुख्यमंत्री के स्तर से किया गया और न ही भाजपा प्रदेश संगठन के स्तर पर ही हो पाया। सरकार के कई मंत्रियों के बीच शीतयुद्ध सार्वजनिक मंच पर आ चुका है। वन मंत्री हरक सिंह रावत और शिक्षा मंत्री अरविंद पांडे के बीच मचा ?keklku अभी शांत नहीं हो पाया था कि पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज और पशुपालन मंत्री रेखा आर्य के बीच मनमुटाव की खबरें आने लगी। इससे साफ होता है कि मंत्रियों के बीच वर्चस्व की जंग खत्म नहीं होने वाली है। ऐसा नहीं है कि मुख्यमंत्री की कार्यशैली से केवल मंत्रियों में नाराजगी है। विधायक और संगठन के कई नेता भी मुख्यमंत्री की कार्यशैली से नाराज हैं। मुख्यमंत्री के भारी भरकम निजी सचिवों और सलाहकारों की फौज को असंतोष का कारण बताया जा रहा है। मुख्यमंत्री से मिलने के लिए भाजपा के विधायकों और नेताओं को ऐड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है।  मुख्यमंत्री के सलाहकारों की फौज जिसे चाहती है केवल उसे ही मुख्यमंत्री  से मिलने का समय दिया जाता है। 

यह भी गोैेर करने वाली बात है कि विगत कई दिनों से समाचार पत्रों और सोशल मीडिया में ऐसे कई चेहरे सामने आए हैं जिनकी मुलाकात मुख्यमंत्री से हुई है। उनमें कई ऐसे चेहरे भी हैं जो साहूकारी और प्रॉपर्टी के कारोबार से जुड़े रहे हैं। इन्हें मुख्यमंत्री से मुलाकात में कोई परेशानी नहीं हुई। जबकि भाजपा के कई विधायकों को मुख्यमंत्री से मिलने का समय तक नहीं दिया जा रहा है। सूत्र यह भी बताते हैं कि पूर्व मुख्यमंत्री डॉ रमेश पोखरियाल निशंक को मुख्यमंत्री से मिलने के लिए दो द्घंटा इंतजार करना पड़ा। हालांकि इस खबर की कोई पुष्टि नहीं हो पाई मगर इस पर चर्चा गरम है।

मुख्यमंत्री के सलाहकार और ओएसडी पर सरकार के कामकाज में  हस्तक्षेप करने का भी आरोप लग रहा है। ओएसडी तो जनता दरबार लगाकर जनता की समस्या सुनने लगे हैं] जबकि मुख्यमंत्री का ओएसडी कोई संवैधानिक पद नहीं होता है। यही नहीं ओएसडी विभागों के अधिकारियों के साथ-साथ जिलाधिकारियों की बैठक ले रहे हैं। वे अपने स्तर से निर्देश तक जारी कर रहे हैं। सलाहकारों के बारे में कहा जा रहा है कि वे मीडिया में अपने नाम से प्रेस रिलीज जारी कर अपनी ब्राडिंग में लगे हैं। यहां तक कि कई ओएसडी और सलाहकार अपना सम्मान करवाने की भी जुगत में लगे रहते हैं।

 शासन - प्रशासन की बात करें तो मुख्यमंत्री पर अपने ही अधिकारियों पर नियंत्रण न होने के आरोप भी लग रहे हैं। इस कारण भाजपा के कई विधायकों के सचिवालय में नौकरशाहों के साथ विवाद तक सामने आ चुके हैं। भाजपा के विधायक  अपने क्षेत्रों के विकास प्रस्तावों की फाइलों को दबाये जाने से नाराज हैं। विधायकों और नौकरशाहों में विवाद का कारण भी यही है। हाल ही में भाजपा के एक युवा और तेज तर्रार विधायक के साथ एक चर्चित नौकरशाह का विवाद भी इसी के कारण हुआ है। चर्चा तो यहां तक है कि विवाद इस कदर बढ़ा कि नौकरशाह और विधायक के बीच हाथापाई तक की नौबत आ चुकी थी।

 राज्य के इतिहास में यह भी पहली बार हुआ है कि सीनियर और जूनियर पदों को ताक पर रखा गया है। चहेते नौकरशाहों के स्थानांतरण में इस बात का भी ख्याल नहीं रखा गया कि कौन जूनियर है और कौन सीनियर। अभी हाल में ही पीसीएस अधिकारियों के स्थानांतरण में साफ तौर पर देखा गया कि वरिष्ठ पीसीएस अधिकारी का तबादला कनिष्ठ अधिकारी के पद पर कर दिया गया। इस स्थानांतरण में मुख्यमंत्री के चहेते नौकरशाहों पर उंगलियां उठी मामले को किसी तरह से शांत किया गया और दोबारा तबादला सूची जारी की गई। लेकिन इससे यह बात साफ हो गई कि मुख्यमंत्री नौकरशाहों के सामने लाचार हैं। 

 पूर्व मुख्य सचिव एस रामास्वामी और अपर मुख्य सचिव ओम प्रकाश के बीच चला शीत युद्ध खासा चर्चाओं में रहा। रामास्वामी पर ओमप्रकाश भारी पड़े और उन्हें मुख्य सचिव पद से ही हटना पड़ा। वर्तमान मुख्य सचिव उत्पल कुमार भी उसी दोैर से गुजर रहे हैं। कहा जा रहा है] एक बार फिर से सचिवालय में नौकरशाहों के बीच शीतयुद्ध का आगाज हो चुका है। स्वयं मुख्य सचिव उत्पल कुमार भी सचिवालय की कार्यशैली से खिन्न हो चुके हैं। उनके कई आदेशों की गोपनीयता भी एक साजिश के तहत भंग हुई जिस कारण मुख्य सचिव पर उंगलियां उठ रही हैं। कहा जा रहा है कि इसके पीछे मुख्यमंत्री के चहेते अधिकारियों का एक समूह कुछ मीडिया कर्मियों के साथ मिलकर इस तरह का माहौल बना रहा है। 

 इन सभी कारणों से ही एक बार फिर राज्य में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाएं तेजी से उठा रही हैं।  इस तरह की चर्चाएं राज्य के राजनीतिक इतिहास में पहली बार नहीं हो रही हैं। राज्य की नित्यानंद स्वामी की अंतरिम सरकार के छह माह बाद ही इस तरह की चर्चायें उठनी आरम्भ हो चुकी थीं और नित्यानंद स्वामी को आखिरकार अपनी कुर्सी से हाथ धोना पड़ा था। नारायण दत्त तिवारी की पहली निर्वाचित सरकार के समय में भी इस तरह की चर्चायें कम नहीं हुई। हालांकि तिवारी ने अपने राजनीतिक कौशल से सरकार का कार्यकाल पूरा किया।

 खण्डूड़ी सरकार का तो एक वर्ष भी पूरा नहीं हुआ था कि खण्डूड़ी को हटाये जाने की चर्चाएं तेजी से होने लगी। खण्डूड़ी को मुख्यमंत्री की कुर्सी से दो वर्ष में ही चलता किया गया। निशंक को राज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी नसीब हुई। निशंक के मुख्यमंत्री बनने के एक वर्ष बाद फिर से नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाएं उठने लगी और ढाई वर्ष में ही निशंक को मुख्यमंत्री पद से चलता कर खण्डूड़ी को फिर से मुख्यमंत्री बना दिया गया।

कांग्रेस की विजय बहुगुणा सरकार भी अपनी स्थापना के समय से ही कई अंतर्विरोधों और अंतर्द्वद्वों के बीच दो वर्ष तक झूला झूलती रही। इसका ही असर रहा कि महज २३ माह के कार्यकाल में उन्हें अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी। इसके बाद हरीश रावत को राज्य की कमान मिली। हरीश रावत के मुख्यमत्रंी बनने के बाद से ही सरकार की स्थिरता पर सवाल खड़े होने लगे। हरीश रावत को अपनी सरकार बचाने के लिए बड़े से बड़ा जतन करना पड़ा। फिर भी वे अपनी पार्टी को टूटने से नहीं बचा पाए। प्रदेश में पहली बार राष्ट्रपति शासन तक लगाया गया। अगर उत्तराखण्ड के राजनीतिक इतिहास को देखे तो जब-जब राज्य में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाएं उठी हैं तो वे सही साबित भी हुई हैं। देखना है कि इस बार भी ये चर्चाएं सही साबित होंगी या नहीं।

krishan.kumar@thesundaypost.in

 

 
         
 
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