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सुर्खियां जो नहीं बनीं
 
सिपाही ने रोकी बैंक लूट

पांच फरवरी की देर रात जयपुर में एक कांस्टेबल ने अपने साहस की नई कहानी लिखी। शहर के रमेश मार्ग स्थित एक्सिस बैंक को लूटने के लिए १३ बदमाश आए। उस वक्त बैंक में ९२६ करोड़ रुपए कैश मौजूद था। यदि बदमाश सफल हो जाता तो यह देश के इतिहास में सबसे बड़ी लूट होती] लेकिन इनका रास्ता बैंक में तैनात एक कांस्टेबल सीताराम ने रोका। सीताराम ने अपने हिम्मत से बदमाशों को भागने पर मजबूर कर दिया। इस तरह सिपाही सीताराम ने देश की सबसे बड़ी लूट को रोकने में कामयाब हुए।

सरकारी इंजीनियरों का कमाल

अधिकतर मामलों में सरकारी इंजीनियरों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं। मीडिया में ऐसी खबरें सुर्खियां भी बटोरती हैं] लेकिन गोरखपुर के रेलवे इंजीनियरों ने अपने अनुभव का इस्तेमाल कर सरकार के करोड़ों रुपए बचाए हैं। उन्होंने २८ कबाड़ हो चुकी बोगियों में अपनी मेहनत से जान फूंक दी है। ये बोगियां दो लाख रुपए में नीलाम होने जा रही थीं। जबकि उन्होंने अपने कौशल से १८ लाख रुपए खर्च कर इनकी सूरत बदल डाली। अब हर कोच ५० लाख रुपए कीमत का बन गया है। इस प्रकार इंजीनियरों ने रेलवे के ८.४० करोड़ रुपए बचाए हैं। १९९१ से १९९३ के बीच बने यात्री गाड़ियों के २८ कोच दो महीने पहले कबाड़ ?kksf"kr किए गए थे। इन्हें नीलामी के लिए भेज दिया गया] जहां नीलामी के बाद कोच काट कर ठेकेदार उठा ले जाते हैं। इसी स्क्रैप की ठेकेदारी ने पूर्वाचल के कई ठेकेदारों को करोड़पति बनाया है। इस बार इन कोच पर नीलामी के पहले कुछ इंजीनियरों की निगाह पड़ी। उन्होंने डिप्टी सीएमई वर्क्‌स फणीन्द्र कुमार से कहा कि ज्यादातर कबाड़ कोच पर काम करके एनएमजी (न्यू मॉडिफाइड गुड्स) कोच बनाया जा सकता है। एनएमजी कोच कार और हाथी की ढुलाई में इस्तेमाल होते हैं। नया एनएमजी कोच ५० लाख रुपए में तैयार होता है। सीपीआरओ संजय यादव ने बताया कंडम २८ कोचों में से १३ तैयार हो चुके हैं। कंडम कोच को स्क्रैप में बेचा जाता था। इससे रेलवे को प्रति कोच ३० लाख रुपए की बचत हुई है। डिप्टी सीएमई वर्र्क्‌स फणीन्द्र कुमार ने बताया कि अप्रैल तक ६० कंडम कोच एनएमजी में तब्दील करने का लक्ष्य मिला है। २८ पर काम हो चुका है। ६० कोच बनाने का लक्ष्य वर्कशॉप के लिए यह बिल्कुल नया काम था। हमने एनएमजी कोच बनाने के लिए जरूरी सामान वर्कशॉप में ही बनाया और काम पूरा किया।

 
         
 
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  • अपूर्व जोशी

संपादक] दि संडे पोस्ट 

अपने पुराने लिखे को पढ़ता हूं तो अपनी ही समझ पर गहरा पछतावा होता है। तारीफों

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