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सियासी चकल्लस 
 
नीतीश का ?kVrk जलवा

जलवा शब्द नीतीश कुमार जैसे गंभीर राजनेता के लिए ठीक नहीं है। लेकिन पत्रकारिता और राजनीति में यह शब्द चल गया है। इसका आशय अंग्रेजी के शब्द औरा या आभा मंडल से है। वैसे भी कहा जाता है कि सियासत हो या जीवन] समझौते करने के बाद व्यक्ति वही रह जाता जो वह पहले होता है। बचना या बचा होना अक्सर आपके तेज को धुंधला करता है। उदाहरण के तौर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को लिया जा सकता है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक समय में देश के प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के तौर पर] खासकर नरेंद्र मोदी की काट के रूप में लिया जा सकता है। वह विकास के मॉडल भी माने जाते हैं। बिहार को उन्होंने लालू&राबड़ी के जंगलराज से मुक्ति दिलाई। लेकिन जब से उन्होंने राजद से नाता तोड़कर भाजपा के साथ रिश्ता जोड़ा उनका आभा मंडल कम हो गया। उन्होंने भाजपा से गठबंधन कर सरकार जरूर बचा ली लेकिन उनका कद कम हो गया। भाजपा विरोधी दलों की उम्मीदों पर तो पहले ही पानी फेर दिया था। अब तो मीडिया भी नीतीश को पहले की तुलना में कम तरजीह देने लगा है। पहले वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बरक्स थे अब वह उनके अधीन हो गए हैं। देखने वाली बात यह है कि अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में इसके चुनावी नतीजे क्या होते हैं\ क्या नीतीश को भाजपा के साथ रहकर सरकार बचाने का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है\ इसका असर भाजपा और राजद पर भी होगा\

महारानी को भय

राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया का समय बहुत खराब चल रहा है। उनको चुनावी नतीजों के भय का भूत सता रहा है। उनको अब हार के सपने आते है। उनका भय प्रदेश में उपचुनाव के नतीजों ने और अधिक बढ़ा दिया है। दो लोकसभा और एक विधानसभा] तीनों सीटों पर भाजपा को करारी शिकस्त मिली है। वैसे यह मान लिया गया है कि राजस्थान में बारी&बारी से भाजपा&कांग्रेस सरकार बनती रही है। उस हिसाब से भी इस बार बारी कांग्रेस की है। लेकिन इस बार मामला बराबरी का नहीं महारानी के प्रति जनता में बढ़ती नाराजगी का है। उनकी महारानीय शैली को वहां की जनता पचा नहीं पाती है। महारानी अपने प्रदेश की जनता को प्रजा मानती है। वैसे राजस्थान के विधानसभा उपचुनाव में राहुल फैक्टर ने काम नहीं किया। उसकी वजह वसुंधरा के प्रति नाराजगी के साथ&साथ सचिन पायलट की मेहनत का नतीजा माना जा रहा है। सचिन को कांग्रेस की तरफ से मुख्यमंत्री का प्रबल दावेदार माना जा रहा है। जिन क्षेत्रों में उपचुनाव हुए वहां सचिन पायलट का प्रभाव माना जा रहा है। कांग्रेस भीतर कांग्रेस का मामला भी कांग्रेस को कमजोर करने वाला है। कांग्रेस में दो गुट हैं अशोक गहलोत और सचिन पायलट। इस गुटबाजी का लाभ महारानी नहीं उठा पा रही हैं। इस साल अंत में विधानसभा चुनाव और अगले साल लोकसभा चुनाव] दोनों में भाजपा की नैय्या कैसे पार लगेगी] यह भाजपा&la?k के लिए गहरी चिंता का विषय बना हुआ है।

नेताजी की खुन्नस

उत्तराखण्ड में एक बड़े भाजपा नेता हैं। वह पिछला विधानसभा चुनाव अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद हार गए। अगर जीत गए होते तो  इस बार की प्रबल संभावना थी कि प्रदेश के मुख्यमंत्री वहीं होते। लेकिन तकदीर ने उनका साथ नहीं दिया। उनकी तुलना में एक कम कद वाला व्यक्ति मुख्यमंत्री की कुर्सी पर है] यह भी उनको भीतर ही भीतर सताता रहता होगा। कुछ लोग कहते हैं कि दस महीने हो गए भाजपा के वह बड़े नेता अपनी हार को हजम नहीं कर पा रहे हैं। दिक्कत तब होती है जब वह अपनी हार की खुन्नस कुछ पत्रकारों पर निकालते हैं। कुछ खास पत्रकारों को वह अपनी पराजय का सबब मानते हैं। नेताजी अभी युवा हैं। सामने लंबा राजनीतिक कॅरियर है। इस बात की उम्मीद की जानी चाहिए कि अपनी खुन्नस को छोड़कर अपनी सदाशयता को परिचय देंगे।


 

 
         
 
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  • योगेंद्र यादव

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जैसे शुरू में माना जा रहा था कि यहां विविधता के चलते लोकतंत्र पनप नहीं पाएगा] दरअसल लोकतंत्र

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