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मेरी बात अपूर्व जोशी
 
आइए समझें बजट को

  • अपूर्व जोशी

एक फरवरी को संसद में प्रस्तुत वित्तीय वर्ष २०१८&१९ का आम बजट मोदी सरकार का अंतिम बजट भी हो सकता है। हालांकि लोकसभा के चुनाव अप्रैल २०१९ में प्रस्तावित है] लेकिन इन दिनों बड़ी चर्चा है कि केंद्र सरकार जल्द लोकसभा चुनाव कराने पर विचार कर रही है। यदि ऐसा होता है तो प्रस्तुत बजट इस सरकार का अंतिम बजट होगा। बहरहाल मेरी मित्र श्वेता मासीवाल का एक संदेश मुझे बजट के दिन मिला] जिसमें उन्होंने इच्छा जाहिर की] कि मैं यूनियन बजट की विशेषताओं और खामियों पर प्रकाश डालूं। उनका मानना है कि मेरे लिखे को पढ़कर इस समाचार पत्र के पाठकों की बजट की बाबत समझ बढ़ेगी। धन्यवाद श्वेता को जिन्होंने मुझे इस योग्य समझा। समस्या लेकिन यह है कि मेरा अर्थशास्त्र से दूर&दूर तक का कोई रिश्ता&वास्ता कभी नहीं रहा है। बजट को समझ पाना ऐसे में] बेहद कठिन कार्य है। श्वेता के अनुरोध को नजरअंदाज कर पाना भी संभव नहीं। कारण है उनके सामाजिक सरोकार उत्तराखण्ड की इस बेटी को अपने राज्य से इतना लगाव है कि मुंबई में शादी हो जाने के बाद भी] वे लगातार अपने संगठन 'वात्सल्य' के जरिए पहाड़ से जुड़ी रहती हैं। उनका संगठन उत्तराखण्ड के जनसरोकारों का सजग प्रहरी है। श्वेता आधा समय उत्तराखण्ड में ही रहती हैं जिसके लिए निःसंदेह उनके पति गगन साधुवाद के पात्र हैं। तो चलिए मिलकर समझने का प्रयास करते हैं कि आखिर यह बजट होता क्या है] इससे देश की आर्थिक स्थिति को कैसे समझा जा सकता है।

हमारे संविधान के अनुच्छेद ११२ में केंद्रीय बजट की व्याख्या की गई है जिसके अनुसार यह भारतीय गणराज्य का वार्षिक वित्तीय लेखा&जोखा है जिसे हर वर्ष फरवरी के अंतिम कार्य दिवस २८ तारिख को पेश किए जाने की परंपरा रही थी। मोदी सरकार में इसमें बदलाव करते हुए पिछले वर्ष से यह एक फरवरी को संसद में रखा जाने लगा है। मोरारजी देसाई ने अब तक सबसे अधिक दस बार बजट संसद में बतौर वित्त मंत्री रखे। हमारा पहला बजट २६ नवंबर १९४७ को नेहरू सरकार में वित्त मंत्री आर क़े  ़शनमुखम चेट्टी ने पेश किया था। वर्ष २०१७&१८ के बजट अनुसार बाइस लाख सत्रह हजार सात सौ पचास करोड़ रूपया भारत सरकार को विभिन्न प्रकार के टैक्सों के माध्यम से] सरकारी योजनाओं के लिए गए कर्जे तथा अन्य मदों  के जरिए प्राप्त हुआ था। जबकि खर्चा हुआ है कुल उन्नतीस लाख सैंतिस हजार आठ सौ उड़तीस करोड़। यानी कुल नुकसान रहा सात लाख अठासी करोड़ का। इसे बजटीय ?kkVk कहा जाता है। सरल शब्दों में कहा जाए तो हमारा राष्ट्रीय बजट ?kkVs sमें है क्योंकि सरकार को मिलने वाली धनराशि जिसका मुख्य स्रोत विभिन्न प्रकार के टैक्स और विदेशों से लिया गया ऋण होता है] खर्च के अनुपात में कम पड़ती है। सरकार को इस कर्ज के ब्याज की भारी&भरकम राशि हर वर्ष चुकानी होती है जिसके चलते बजट में ?kkVk बढ़ रहा है। अगले वित्तीय वर्ष २०१८&१९ का जो बजट वित्तमंत्री ने संसद में पेश किया है उसमें यह उम्मीद जताई गई है कि सरकार इस ?kkVs sको २०१८&१९ में कम कर पाने में सफल होगी। जाहिर है कि इसके लिए सरकार नए स्रोतों पर टैक्स लगाने जा रही है ताकि उसे अधिक राजस्व मिल सके। सरकार ने लक्ष्य रखा है कि कम से कम ० ़२ प्रतिशत ?kkVk कम किया जाए। बजट को समझना आम आदमी के लिए बेहद टेड़ी खीर है। मोटे तौर पर इसे वित्त मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों की मदद से यदि समझा जाए तो पहले यह जानना जरूरी है कि सरकार को किन&किन स्रोतों में कितना रूपया मिलता है। देश भर के निगमों द्वारा लगाए गए टैक्स के जरिए सरकार को १९ प्रतिशत] आयकर से १६ प्रतिशत] सीमा शुल्क यानी कस्टम विभाग से ४ प्रतिशत] उत्पादक शुल्क यानी एक्साइज विभाग से आठ प्रतिशत] जीएसटी से २३ प्रतिशत अन्य विभिन्न करों से ११ प्रतिशत तो १९ प्रतिशत रकम उधार के तौर पर मिलती है। इसमें से २४ प्रतिशत धनराशि राज्यों को उनके करों में हिस्से के रूप में जाती है। पांच प्रतिशत सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारियों की पेंशन] केंद्र द्वारा प्रायोजित विभिन्न योजनाओं के लिए नौ प्रतिशत] केंद्र सरकार की सीधे पोषित योजनाओं में १० प्रतिशत] रक्षा विभाग के लिए ९ प्रतिशत] नीति आयोग द्वारा विभिन्न मदों में दी जाने वाली राशि पर आठ प्रतिशत तो कुल बजट का १८ प्रतिशत केंद्र सरकार  ब्याज के रूप में ऋण में लिए धन पर देती है। यह तो रही बजट को समझने की बात। अब चलते हैं वित्त मंत्री द्वारा पेश वर्ष २०१८&१९ के बजट पर। 

इस बजट में सबसे महत्वपूर्ण है। पचास करोड़ जनता को सरकारी स्वास्थ्य योजना के अंतर्गत लाना। यह विश्व की सबसे बड़ी ऐसी योजना है जिसमें पांच लाख तक का आर्थिक व्यय केंद्र सरकार उठाएगी। इनमें कौन शामिल होंगे] क्या इसका आधार होगा] यह जल्द ही सरकार स्पष्ट करेगी। छोटे एवं मझोले किसानों के लिए सरकार बाइस हजार ग्रामीण कृषि बाजार बनाने जा रही है। निश्चित ही इससे इन किसानों को बिचौलियों से राहत के साथ&साथ अपनी पैदावार के अच्छे दाम भी मिलेंगे। वित्त मंत्री ने इन्फ्रास्ट्रक्चर] ग्रामीण क्षेत्रों] गरीबों की स्वास्थ्य समस्याओं तथा रोजगार बढ़ाने के लिए अपने सीमित संसाधनों के बावजूद कई महत्वपूर्ण ?kks"k.kkएं इस बजट में की हैं जो स्वागत योग्य हैं। सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में विभिन्न योजनाएं के तहत चौदह लाख करोड़ तो इन्फ्रास्ट्रकचर के लिए ६ लाख करोड़ का प्रावधान इस बजट में किया है जिससे रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। हालांकि इस सबसे मोदी जी का प्रति वर्ष २ करोड़ रोजगार देने का वायदा पूरा होते नहीं दिखता लेकिन लगभग ७० लाख नए रोजगार के अवसर पैदा होने की उम्मीद है। शिक्षा के क्षेत्र में केंद्र सरकार ने इस बजट में विशेष ध्यान दिया है। सरकार २४ नए मेडिकल कॉलेज] बड़ोदरा में केंद्रीय यूनिवर्सिटी] आदिवासियों के लिए एकलव्य विश्वविद्यालय आदि खोलने जा रही है। वित्त मंत्री ने आलू] प्याज और टमाटर के भाव नियंत्रित रखने के लिए बजट में अलग से पांच सौ करोड़ की व्यवस्था की है। चुनावी वर्ष होने के नाते ऐसा करना राजनीतिक दृष्टि से भी उनके लिए जरूरी था। अकेले प्याज के भावों ने पूर्व में कई सरकारों को बाहर का रास्ता दिखा दिया था। बजट बाद कर्नाटक में एक रैली को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने एक नया शब्द 'टॉप' ईजाद कर डाला जिसका अर्थ ट से टमाटर] अ से आलू और प से प्याज है। उन्होंने 'टॉप' को अपनी सरकार की प्राथमिकता बताया। सदन में वित्त मंत्री ने किसानों को फसल मूल्य का डेढ़ गुना दिए जाने की बात कही है। 

उन्होंने कहा कि रबी की फसल की भांति खरीफ की फसल को भी सरकार डेढ़ गुना मूल्य देकर खरीदेगी। प्रथम दृष्टया यह किसानों के लिए बड़ी राहत वाला कदम प्रतीत होता है। मैंने इस पर किसान आंदोलनकारी और अब समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजकुमार भाटी के विचार जानने चाहे। राजकुमार भाटी से इसलिए क्योंकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उन्होंने बरसों किसानों के लिए संद्घर्ष किया है। रिलाइंस इंडस्ट्री को दादरी में पावर प्लांट लगाने के लिए दी गई जमीन के अधिग्रहण के खिलाफ उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह संग मिलकर लंबी लड़ाई लड़ी थी। बकौल भाटी जी किसानों के लिए यह ?kks"k.kk एक छलावा मात्र है क्योंकि इसमें स्वयं किसान के श्रम] खेतीहर मजदूरों की लागत को नहीं जोड़ केवल खाद व बीज की रकम को आधार बना न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया जाता है। रबी की फसल जैसे गेहूं का न्यूनतम मूल्य सरकार १६०० रुपया प्रति कुंतल देती है जबकि इसकी लागत लगभग २४०० रुपया आती है। यानी सरकार का डेढ़ गुना मूल्य लागत से भी कम है जिसके चलते किसान ठगा रह जाता है। यदि सरकार सही में रबी की फसल का डेढ़ गुना दे तो वह ३६०० रुपया प्रति कुंतल बनता है। भाटी जी का यह भी कहना है कि वित्तमंत्री ने अपने बजट भाषण में खरीफ की फसल को भी डेढ़ गुना मूल्य देने की जो बात कही वह असल में २०१४ के लोकसभा चुनावों के दौरान नरेंद्र मोदी का वायदा था जिसे अब चुनावी वर्ष में लागू करना स्पष्ट तौर पर राजनीतिक बयानबाजी मात्र है क्योंकि जब तक रबी की फसल तैयार होगी चुनाव सिर पर आ चुके होंगे। वित्त मंत्री ने पचास करोड़ यानी आधी आबादी को स्वास्थ्य बीमा योजना के अंतर्गत लाने की ऐसी महत्वाकांक्षी और जनकल्याणकारी योजना का ऐलान किया है जो विश्व में अकेली इतनी बड़ी योजना है। संकट लेकिन वित्त मंत्री के पास मौजूद संसाधनों का है। सरकार ने राजस्व प्राप्ति का जो अनुमान बजट में पेश किया है उसे हासिल कर पाना टेढ़ी खीर है। पहले से ही सरकार जीएसटी की दरों में कई बार संशोधन कर चुकी है जिसके चलते लगभग चालीस हजार करोड़ का राजस्व नुकसान हो रहा है। गत्‌ वर्ष रिजर्व बैंक द्वारा सरकार को दिए लाभांश ¼डिविडेंड½ में भारी कमी आई है। बैंक ने २७]५०० करोड़ रुपये कम लाभांश केंद्र सरकार को दिया है। इसी प्रकार दूर संचार के मोबाइल सर्विसेज स्पेक्ट्रम से मिलने वाले राजस्व भी अपने अनुमान से १४]५०० करोड़ रूपया कम मिला है। तेल और डीजल की बिक्री से मिलने वाला एक्साइज मद में राजस्व १३]००० करोड़ रुपये कम रहा है। कुल मिलाकर सरकार को ९४]८०० करोड़ रुपया की कमी राजस्व में रही है। इतना ही नहीं औद्योगिक विकास दर में भी इस वक्त कमी देखने को मिल रही है। निर्यात में भारी गिरावट] निजी पूंजी निवेश का अभाव और खेती की बदहाली के चलते सरकार कैसे राजस्व प्राप्ति के लक्ष्यों को पाएगी] यह आर्थिक विशेषज्ञों के बीच बड़ी चर्चा का विषय बन चुका है। २०१७&१८ के बजट में सरकार ने राजकोषीय ?kkVs sको इस बजट का ३ ़२ प्रतिशत  रखने का लक्ष्य रखा था जो वह प्राप्त नहीं कर सकी और ?kkVk ३ ़५ प्रतिशत रहा। २०१८&१९ के बजट में कैसे सरकार अपने राजकोषीय ?kkVs sको कम करती है यह भी वित्त मंत्री के समक्ष बड़ी चुनौती है। राजकोषीय ?kkVs sको कम करने के लिए सरकारी खर्चों में कटौती के साथ&साथ राजस्व के नए स्रोत पैदा करना भी है। वित्त मंत्री ने इसी नियत से एक नया टैक्स] लागटर्म कैपीटल गैन टैक्स लगाए जाने की ?kks"k.kk की है। जैसा मैंने पहले ही स्पष्ट किया अर्थशास्त्र पर अपनी पकड़ कमजोर है] इसलिए इस टैक्स को मैं पूरी तरह समझ नहीं सका हूं। बहुत पढ़ने के बाद इतनी अपनी पकड़ में आया कि स्टोक मार्केट पर दांव लगाने वालों को टैक्स के रूप में ज्यादा देना पड़ेगा। इस ?kks"k.kk के बाद शेयर बाजार में आई गिरावट से भी यही समझ आता है। कुल मिलाकर यही कुछ इस बजट को मैं अभी तक समझ पाया हूं। चूंकि अपने देश में जो कुछ भी होता है उसे सीधे राजनीति से जोड़कर देखने की आदत सी हमें पड़ गई है। इसलिए इस बजट के भी राजनीतिक निहितार्थ अर्थशास्त्री और राजनीतिक विश्लेषक निकाल रहे हैं। कहा जा रहा है कि राजस्थान] कर्नाटक] मध्य प्रदेश] और छत्तीसगढ़ में इस वर्ष प्रस्तावित विधानसभा चुनावों के दृष्टिगत जेटली ने बजट लोकलुभावन बनाने का पूरा प्रयास किया है। न्यूनतम समर्थन मूल्य की बात किसान को तो नेशनल हैल्थ केयर गारंटी स्कीम गरीब&गुरबा को अपनी तरफ आकर्षित करने की बड़ी रणनीति का हिस्सा। जो भी हो यदि सरकार इस स्कीम को लागू कर पाती है और यदि किसान की फसल का सही मूल्य तय कर उसे डेढ़ गुना कीमत में खरीदती है तो निश्चित ही इससे कुछ राहत तो उन तक पहुंचेगी जो आजादी के बाद से ही मूल&भूत सुविधाओं तक के लिए तरसते रहने को अभिशप्त हैं। 

गत्‌ वर्ष बजट पेश करते समय वित्त मंत्री जेटली यूपीए सरकार पर तंज कसते हुए कवि हो गए थे। उन्होंने कहा&कश्ती चलाने वालों ने जब हार कर दी पतवार हमें/लहर&लहर तूफान मिले और मौज&मौज मझधार हमें। फिर भी दिखाया है हमने और फिर यह दिखा दंगे सबको/इन हालातों में आता है दरिया पार करना हमें/ उम्मीद की जानी चाहिए कि वित्त मंत्री ने जो लोक लुभावनी ?kks"k.kkएं इस बजट में की हैं] उन्होंने राजकोषीय ?kkVs का कम करने का संकल्प दोहराया है] विभिन्न योजनाओं के लिए जो धनराशि आवंटित की है] उन सभी को सरकार बल दे पाने में सफल हों ताकि हमारा मुल्क तरक्की की उस राह को पकड़ सके जिसका हम सभी को बेस्रबी से इंतजार है।

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  • विनोद अग्निहोत्री

२०१३ की आशा से अधिक सफलता और सत्ता के अल्पकालीन स्वाद ने आम आदमी पार्टी में नेतृत्व स्तर प नेताओं के बीच परस्पर अविश्वास और गुटबाजी को जन्म दिया।

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