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vad 31 20-01-2018
 
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सिनेमा
 
अदाकाराओं का जुदा अंदाज

  • गुंजन कुमार

पितृसत्तात्मक समाज का असर बॉलीवुड पर भी साफ दिखता है। यहां अभिनेत्रियां सिर्फ सहायक की भूमिका में रखी जाती हैं। इक्का-दुक्का फिल्मों को छोड़ दें तो बॉलीवुड में पुरुष प्रधान फिल्में ही बनती रही हैं। लेकिन अब बदलाव यहां भी आ रहा है। मर्दों के दबदबे वाली हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का मिजाज बदल रहा है। बॉलीवुड की अभिनेत्रियों को फिल्मों में बड़ी और दमदार भूमिकाएं मिल रही हैं। यही नहीं अभिनेत्रियां अभिनय के अलावा फिल्म निर्माण क्षेत्र में भी दम दिखा रही हैं। वे अपनी फिल्मों से नई लकीर खींच रही हैं। वे बॉलीवुड की पारंपरिक फार्मूले से बहुत हटकर फिल्म निर्माण कर रही हैं।

 

पूर्व मिस वर्ल्ड और एतराज गर्ल प्रियंका चोपड़ा ने हिंदी सिनेमा के बाद हॉलीवुड में भी अपनी अदाओं से सबको चौंका दिया है। अब प्रियंका फिल्म निर्माण के क्षेत्र में भी कूद गई हैं। वह भी लीक से हटकर फिल्में बना रही हैं। प्रियंका का ध्यान क्षेत्रीय भाषा की फिल्मों पर है। उनकी मराठी प्रोडक्शन ^वेंटिलेटर^ को इस साल नेशनल अवार्ड मिला। इस फिल्म में अभिनेता से निर्देशक बने आशुतोष गोवारिकर मुख्य भूमिका में हैं। पंजाबी और भोजपुरी में फिल्म बनाने के अतिरिक्त उन्होंने बच्चों के लिए एक फिल्म ^पहुना^ और एक डाक्यूमेंट्री ^गिरी राइजिंग^ भी बनाई है।

भारतीय क्रिकेट टीम कप्तान विराट कोहली की पत्नी और बॉलीवुड की चर्चित अभिनेत्री अनुष्का शर्मा भी फिल्म निर्माण में उतर गई हैं। उन्होंने बतौर फिल्म निर्माता अपनी पारी की शुरुआत ^एनएच १०^ से की। अनुष्का अपने भाई कर्नेश शर्मा के साथ को-प्रोडक्शन में फिल्म बना रही है। वह अपनी अगली फिल्म ^परी^ बनाने में जुट गई हैं। ^रुस्तम^]^टॉयलेट एक प्रेम कथा^ और ^पैडमैन^ जैसी फिल्मों की को-प्रड्यूसर प्रेरणा अरोड़ा का नाम फिल्मी दुनिया में पिछले एक साल में तेजी से सामने आया है। उन्होंने अलग टेस्ट की फिल्में देकर अपने इरादे जाहिर कर दिए हैं। नॉन फिल्मी बैकग्राउंड से आने वाली प्रेरणा अरोड़ा बॉलीवुड की सबसे तेजी से आगे बढ़ती निर्माताओं में से एक हैं। वह पुरुष निर्माताओं को भी पीछे छोड़ गई हैं।

फिल्म निर्माता रिहा कपूर और उनकी बहन अभिनेत्री सोनम कपूर को फिल्में बनाते अब छह साल हो रहे हैं। हालांकि उन्हें अपने द्घर में ही पिता अनिल कपूर और भाई हर्षवर्धन के रूप में अभिनेता हासिल हैं। लेकिन उन्हें बाहर के अभिनेता को लेने में कोई हिचकिचाहट नहीं है। सोनम और रिहा कपूर ने अपनी फिल्म ^खूबसूरत^ के लिए बतौर अभिनेता पाकिस्तानी एक्टर फवाद खान को लिया। इनकी फिल्में महिला सशक्तिकरण पर जोर देती हैं। निश्चित ही यह सिने-दुनिया का क्रांतिकारी दौर है। रिहा अपनी तीसरी फिल्म ^वीरे दी वेडिंग^ को लेकर एक बार फिर चर्चा में हैं। दोनों बहनों (रिहा और सोनम) ने यह फिल्म अपने दम पर बनाई है जिसमें फिल्म के लिए रकम जुटाना भी शामिल है। दोनों ने ^रिहसन^ की शुरुआत की है जो एक अफर्डेबल ब्रांड है और इसकी अपील बाहर के देशों में भी है। रिहसन ने पाकिस्तान] बांग्लादेश सहित विदेशों में रह रहे एशियाई लोगों और भारतीयों का ध्यान अपनी तरफ खींचा है।

अनुराग कश्यप की देखरेख में फिल्मों के हुनर सीखने वाली अशी दुआ की अब तक दो फिल्में आ चुकी हैं। उन्होंने अपनी पहली फिल्म ^बाम्बे टॉकिज^ के नाम से बनाई। जिसमें भारतीय सिनेमा का सौ साल पूरा होना दिखाया गया था। अशी चाहतीं तो बड़ी फिल्म बना सकती थीं]लेकिन उन्होंने ^कालाकांडी^ बनाने की सोची जो सेंसर बोर्ड की वजह से कुछ लटक गई। लेकिन सब्र रखना काम आया। फिल्म इस साल (२०१८) जनवरी में रिलीज होने वाली है।

लारा दत्ता और प्रीति जिंटा जैसी अभिनेत्रियों ने भी फिल्में प्रोड्यूस की हैं। प्रीति जिंटा की बनाई फिल्म ^इश्क इन पेरिस^ की रिलीज में कुछ रुकावट आ रही है]लेकिन इरोस इंटरनेशनल के साथ बनाई लारा दत्ता की फिल्म ^दिल्ली चलो^ ने खूब प्रशंसा बटोरी है। कहा जा सकता है कि मेकअप-रूम की आराम की जिंदगी को छोड़ ये अभिनेत्रियां अपना पैसा या फिर साख अपने पसंद के विषय पर लगा रही हैं। शायद इससे इन अभिनेत्रियों के लिए पैसा कमाने का एक और विकल्प भी पैदा हो रहा है। ये अभिनेत्रियां अभी जोखिम उठा सकती हैं क्योंकि एकता कपूर को अपवाद मानें तो इन सबका एक्टिंग करिअर अभी पटरी पर है और प्रोडक्शन की राह पर नाकामी मिलती है तो सहारे के लिए अभिनय का करिअर इन अभिनेत्रियों के पास है।

फिर यह भी याद रखने की बात है कि ये अभिनेत्रियां सीमित बजट की मनोरंजक फिल्में बना रही हैं। फिल्म flusek?kjksa में खास कमाई नहीं कर पाती तब भी उन्हें अपने निवेश पर रिटर्न की एक तरह से गारंटी है क्योंकि उन्होंने रकम निकालने के लिए अलग से तरीके निकाल रखे हैं। उनमें से कोई भी अभिनेत्री अपनी जमा-पूंजी को दांव पर नहीं लगा रही।

बहरहाल]ये सभी अभिनेत्रियां सोच-समझ की बहुत धनी हैं। इसलिए यह बात बिल्कुल तर्कसंगत जान पड़ती है कि उन्हें सारी जिंदगी ^गुड़िया^ या मेकअप रूम में बने रहना मंजूर नहीं। वे फिल्म निर्माता का ओहदा संभालकर अपनी मर्जी की फिल्में रजतपट पर उतारना चाहेंगी। सोनम कपूर और उनके बाकी हमजोलियों के फिल्म-प्रोडक्शन के क्षेत्र में उतरने के बहुत पहले इस राह पर अभिनेत्री से निर्देशक बनी पूजा भट्ट चलीं और राह बनाई। अपने पिता के बैनर तले सिमटे रहने की जगह उन्होंने बोल्ड और सेक्सुअलिटी का उत्सव मनाने वाली फिल्मों को निर्देशित और प्रोड्यूस किया। पूजा भट्ट ने १२ फिल्में का प्रोडक्शन किया]जिसमें किन्नर की जिंदगी पर बनी फिल्म तमन्ना को अवार्ड हासिल हुए।

एकता कपूर को टेलीविजन की महारानी कहा जाता है। लेकिन उन्होंने लीक से हटकर फिल्में भी बनाई हैं। उनकी ^ए-लिस्टर^ फिल्में भी गैर-परंपरागत और अलग मिजाज की कही जायेंगी। यह एकता कपूर के दिमाग का ही कमाल है जो उन्होंने ^डर्टी पिक्चर^ में सिल्क स्मिता की भूमिका के लिए विद्या बालन का नाम सोचा। नसीरुद्दीन शाह को इस फिल्म में एक बुढ़ाते सुपरस्टार की भूमिका निभाने के लिए तैयार करना भी कोई कम कमाल की बात नहीं थी। एकता कपूर देश में जारी नैतिक पहरेदारी पर सवाल उठाने वाले विषय चुनती हैं। इसमें केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड पर भी सवाल उठाना शामिल है। वे इन बातों के बावजूद जोखिम उठाने से द्घबराती नहीं। उन्होंने ^लिपिस्टिक अंडर माय बुर्का^ जैसी फिल्म का समर्थन किया जबकि इस फिल्म के भारत में रिलीज होने के आसार बहुत कम थे।

एकता कपूर ने अब डिजिटल फार्मेट में कदम रखा है और कई तरह की चीजें लेकर आ रही हैं। इनमें जहां एक तरफ पहले से ज्यादा बोल्ड ^रागिनी एमएमएस^ है तो फिर दूसरी तरफ नेताजी सुभाष चंद्र बोस पर आधारित धारावाहिक भी। बॉलीवुड रिपोर्टिंग करने वाले कई वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है]^एकता ने लगातार साहस दिखाया है। उन्होंने वेबसीरीज के रूप में क्या चीजें सामने रखी हैं। इसमें एक तरफ आपको रोमी और जुगल जैसे किशोर के बीच पनपते समलैंगिक संबंधों की कहानी मिलेगी तो दूसरी तरफ सुभाष चंद्र बोस पर गहन-गंभीर शोध कर बनाई कथा भी। कथा रचने के किसी मोर्चे पर कोई और पहुंचे]इसके पहले ही वहां एकता कपूर पहुंच चुकी होती हैं। उन्होंने अपने मेलोड्रामाई पारिवारिक धारावाहिक के जरिए भारतीय टेलीविजन पर राज किया है। फिल्म]टेलीविजन और वेब माध्यमों पर नये अवसर तलाशने का साहस दिखाया है और इन माध्यमों के मिजाज के हिसाब से चीजें बनाई हैं। एकता कपूर के मन में यह बात बिल्कुल स्पष्ट है कि वेब-माध्यम इंडिविजुअल कंज्यूमर(व्यक्तिक उपभोक्ता) के लिए है और टेलीविजन एक ऐसा माध्यम जिसे पूरा परिवार साथ बैठकर देखता है इसलिए दोनों के लिए एक सी चीजें नहीं बनाई जा सकती। जिन फिल्मों की उन्होंने मदद की है]उसमें भी उन्होंने जोखिम उठाया है।

आखिर एलएसडी जैसी फिल्म का मददगार होने की बात कौन सोच सकता था? यही बात ^लिपिस्टिक अंडर माय बुर्का^ या ^फिर डर्टी पिक्चर^ जैसी फिल्मों के बारे में भी कही जा सकती है। इस वजह से मैं एकता कपूर को मनोरंजन- उद्योग में सक्रिय सबसे साहसी महिला मानती हूं। वह सिर्फ कहानी के विषय के साथ ही नहीं उसके माध्यम के साथ भी लगातार प्रयोग करती हैं।

gunjan@thesundaypost.in

 

 
         
 
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