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vad 31 20-01-2018
 
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विविध
 
फिर एक दिन ऐसा आएगा

अली सरदार जाफरी

जन्म % २९ नवम्बर १९१३

निधन % ०१ अगस्त २०००

जन्म स्थान % बलरामपुर] उत्तर प्रदेश] भारत

कुछ प्रमुख d`fr;ka %

^परवाज^ ¼१९४४½] ^जम्हूर^ ¼१९४६½] ^नई दुनिया को सलाम^ ¼१९४७½] ^खघ्ूब की लकीर^ ¼१९४९½] ^अम्मन का सितारा^ ¼१९५०½] ^एशिया जाग उठा^ ¼१९५०½] ^पत्थर की दीवार^ ¼१९५३½] ^एक खघ््‌वाब और ¼१९६५½ पैराहने शरर ¼१९६६½] ^लहू पुकारता है^ ¼१९७८½] मेरा सफर ¼१९९९½।

विविध %

वर्ष १९९७ में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

 

वो बिजली&सी चमकी] वो टूटा सितारा]वो शोला&सा लपका] वो तड़पा शरारा]जुनूने&बगावत ने दिल को उभारा]बढ़ेंगे] अभी और आगे बढ़ेंगे!

 

गरजती हैं तोपें] गरजने दो इनको

दुहुल बज रहे हैं] तो बजने दो इनको]

जो हथियार सजते हैं] सजने दो इनको

बढ़ेंगे] अभी और आगे बढ़ेंगे!

 

कुदालों के फल] दोस्तों] तेज कर लो]

मुहब्बत के सागर को लबरेज कर लो]

जरा और हिम्मत को महमेज कर लो]

बढ़ेंगे] अभी और आगे बढ़ेंगे!

 

विजारत की मंजिल हमारी नहीं है]

ये आंधी है] बादे&बहारी नहीं है]

जिरह हमने तन से उतारी नहीं है]

बढ़ेंगे] अभी और आगे बढ़ेंगे!

 

फिर वही मांगे हुए लम्हे] फिर वही जाम&ए&शराब

फिर वही तारीक रातों में खयाल&ए&माहताब

फिर वही तारों की पेशानी पे रंग&ए&लाजवाल

फिर वही भूली हुई बातों का धुंधला सा खयाल

फिर वो आंखें भीगी भीगी दामन&ए&शब में उदास

फिर वो उम्मीदों के मदफन जिन्दगी के आस&पास

फिर वही फर्दा की बातें फिर वही मीठे सराब

फिर वही बेदार आंखें फिर वही बेदार ख्वाब

फिर वही वारफ्तगी तनहाई अफसानों का खेल

फिर वही रुखसार वो आगोश वो जुल्फ&ए&सियाह

फिर वही शहर&ए&तमन्ना फिर वही तारीक राह

जिंदगी की बेबसी उफ्फ वक्त के तारीक जाल

दर्द भी छिनने लगा उम्मीद भी छिनने लगी

मुझ से मेरी आरजू&ए&दीद भी छिनने लगी

फिर वही तारीक माजी फिर वही बेकैफ हाल

फिर वही बेसोज लम्हें फिर वही जाम&ए&शराब

फिर वही तारीक रातों में खयाल&ए&माहताब

 

आवो कि जश्न&ए&मर्ग&ए&मुहब्बत मनाएं हम

आती नहीं कहीं से दिल&ए&जिंदा की सदा

सूने पड़े हैं कूचा&ओ&बाजार इश्क के

है शम&ए&अंजुमन का नया हुस्न&ए&जां गुदाज

शायद नहीं रहे वो पतंगों के वलवले

ताजा न रख सकेगी रिवायात&ए&दश्त&ओ&दर

वो फित्नासर गए जिन्हें कांटें अजीज थे

अब कुछ नहीं तो नींद से आंखें जलाएं हम

आओ कि जश्न&ए&मर्ग&ए&मुहब्बत मनाएं हम

सोचा न था कि आएगा ये दिन भी फिर कभी

इक बार हम मिले हैं जरा मुस्कुरा तो लें

क्या जाने अब न उल्फत&ए&देरीना याद आए

इस हुस्न&ए&इख्तिd`fr;kaर पे आंखें झुका तो लें

बरसा लबों से फूल तेरी उम्र हो दराज

संभले हुए तो हैं पर जरा डगमगा तो लें

 

फिर एक दिन ऐसा आएगा 

आंखों के दिए बुझ जाएंगे 

हाथों के कंवल कुम्हलाएंगे 

और बर्ग&ए&जबां से नुक्तो&सदा 

की हर तितली उड़ जाएगी 

 

इक काले समंदर की तह में 

कलियों की तरह से खिलती हुई 

फूलों की तरह से हंसती हुई 

सारी शक्लें खो जाएंगी 

खूं की गर्दिश] दिल की धड़कन 

सब रागनियां सो जाएंगी 

 

और नीली फजा की मखमल पर 

हंसती हुई हीरे की ये कनी

ये मेरी जन्नत मेरी जमीं 

इस की सुबहें इस की शामें 

बेजाने हुए बेसमझे हुए 

इक मुश्त गुबार&ए&इन्सां पर 

शबनम की तरह रो जाएंगी 

 

हर चीज भुला दी जाएगी 

यादों के हसीं बुतखाने से 

हर चीज उठा दी जाएगी 

फिर कोई नहीं ये पूछेगा 

^सरदार^ कहां है महफिल में 

 

लेकिन मैं यहां फिर आऊंगा 

बच्चों के दहन से बोलूंगा 

चिड़ियों की जबां से गाऊंगा 

 

जब बीज हंसेंगे धरती में 

और कोंपलें अपनी उंगली से 

मिट्टी की तहों को छेड़ेंगी 

मैं पत्ती&पत्ती कली&कली 

अपनी आंखें फिर खोलूंगा 

सरसब्ज हथेली पर लेकर 

शबनम के कतरे तोलूंगा 

 

मैं रंग&ए&हिना] आहंग&ए&गजल] 

अंदाज&ए&सुखन बन जाऊंगा 

रुखसार&ए&उरूस&ए&नौ की तरह 

हर आंचल से छन जाऊंगा 

 

जाड़ों की हवाएं दामन में 

जब फस्ल&ए&खजां को लाएंगी 

रहरू के जवां कदमों के तले 

सूखे हुए पत्तों से मेरे 

हंसने की सदाएं आएंगी 

 

धरती की सुनहरी सब नदियां 

आकाश की नीली सब झीलें 

हस्ती से मेरी भर जाएंगी 

 

और सारा जमाना देखेगा 

हर किस्सा मेरा अफसाना है 

हर आशिक है सरदार यहां 

हर माशूका सुल्ताना है 

 

मैं एक गुरेजां लम्हा हूं 

अय्याम के अफ्सूंखाने में 

मैं एक तड़पता कतरा हूं 

मसरूफ&ए&सफर जो रहता है 

माजी की सुराही के दिल से 

मुस्तक्बिल के पैमाने में 

 

मैं सोता हूं और जागता हूं 

और जाग के फिर सो जाता हूं 

सदियों का पुराना खेल हूं मैं 

मैं मर के अमर हो जाता हूं

 

द मुद्दत उन्हें देख कर यूं लगा

जैसे बेताब दिल को करार आ गया

 

आरजू के गुल मुस्कुराने लगे

जैसे गुलशन में बहार आ गया

 

तिश्न नजरें मिली शोख नजरों से जब

मैं बरसने लगी जाम भरने लगे

 

साकिया आज तेरी जरूरत नहीं

बिन पिए बिन पिलाए खुमार आ गया

 

रात सोने लगी सुबह होने लगी

शम्म बुझने लगी दिल मचलने लगे

 

वक्त की रोश्नी में नहाई हुई

जिंदगी पे अजब स निखार आ गया

 

द मुद्दत उन्हें देख कर यूं लगा

जैसे बेताब दिल को करार आ गया

 

आरजू के गुल मुस्कुराने लगे

जैसे गुलशन में बहार आ गया

 

तिश्न नजरें मिली शोख नजरों से जब

मैं बरसने लगी जाम भरने लगे

 

साकिया आज तेरी जरूरत नहीं

बिन पिए बिन पिलाए खुमार आ गया

 

तुम्हारे लहजे में जो गर्मी&ओ&हलावत है

इसे भला सा कोई नाम दो वफा की जगह

 

गनीम&ए&नूर का हमला कहो अंधेरों पर

दयार&ए&दर्द में आमद कहो मसीहा की

 

रवां&दवां हुए खुश्बू के काफिले हर सू

खला&ए&सुबह में गूंजी सहर की शहनाई

 

ये एक कोहरा सा ये धुंध सी जो छाई है

इस इल्तहाब में सुरमगीं उजाले में

 

सिवा तुम्हारे मुझे कुछ नजर नहीं आता

हयात नाम है यादों का तल्ख और शीरीं

 

भला किसी ने कभी रग&ओ&बू को पकड़ा है

शफक को कैद में रखा सबा को बंद किया

 

हर एक लमहा गुरेजां है जैसे दुश्मन है

तुम मिलोगी न मैं] हम भी दोनों लम्हे हैं

 

एक जू&ए&दर्द दिल से जिगर तक रवां है आज 

fi?kyk हुआ रगों में इक आतिश&फिशां है आज 

 

लब सी दिये हैं ता न शिकायत करे कोई 

लेकिन हर एक जख्म के मुंह में जबां है आज 

 

तारीकियों ने द्घेर लिया है हयात को 

लेकिन किसी का रू&ए&हसीं दर्मियां है आज 

 

जीने का वक्त है यही मरने का वक्त है 

दिल अपनी जिंदगी से बहुत शादमां है आज 

 

हो जाता हूं शहीद हर अहल&ए&वफा के साथ 

हर दास्तान&ए&शौक मेरी दास्तां है आज 

 

आए हैं किस निशात से हम कत्ल&गाह में 

जख्मों से दिल है चूर नजर गुल&फिशां है आज 

 

जिंदानियों ने तोड़ दिया जुल्म का गुरूर 

वो दब&दबा वो रौब&ए&हुकूमत कहां है आज


 
         
 
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