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vad 37 05-03-2017
 
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देश-दुनिया 
 
नीतीश का मोदी फोबिया

 

जैसे-जैसे २०१४ का लोकसभा चुनाव पास आता जा रहा है राजनीतिक पार्टियों की दोस्ती-दुश्मनी का फर्क धुंधला पड़ने लगा है। पिछले कुछ महीनों में कांग्रेस के साझीदार उस पर आए दिन आंखे तरेरने लगे हैं। एनडीए में भाजपा की भी कमोबेश वही हालत है।

 

नरेन्द्र मोदी का बतौर प्रधानमंत्री खुद को प्रोजेक्ट करने के लिए जोर-शोर से जारी कैंपेन किसी से छुपा नहीं है। हालांकि नीतीश कुमार ने उम्मीदवारी के सवाल को बार-बार टाला है लेकिन उनके मोदी पर जारी हमले इस बात की तस्दीक करते हैं कि आज भी रात को सपनों में वे खुद को सात रेसकोर्स की गलियों में टहलता देख रहे हैं। जनता दल यूनाइटेड की दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के दौरान नीतीश ने एक भी मौका हाथ से नहीं जाने दिया। नीतीश कुमार ने बिना मोदी का नाम लिए शुरू से आखिर तक उन्हीं पर निशाना बनाए रखा। उन्होंने मोदी के विकास मॉडल पर तो परोक्ष हमला बोला हीधर्मनिरपेक्षता के सवाल पर भी लगातार उन्हें द्घेरने की कोशिश की। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि पीएम वही हो सकता है जिसकी धर्मनिरपेक्ष छवि हो और जिसमें सबको साथ लेकर चलने की क्षमता हो। नीतीश ने सवाल उठाया कि यह कैसा विकास है जहां जीडीपी के साथ-साथ कुपोषण भी बढ़ रहा है। विकास का अर्थ सिर्फ ढांचा नहीं मानव विकास भी होता है। उन्होंने चुटकी लेते हुए यह भी साफ कर दिया कि सबको साथ लेकर चलने वालों को कभी टीका लगाना पड़ता है तो कभी टोपी भी पहननी पड़ती है। हम टोपी भी पहनते हैं और टीका भी लगाते हैं। अटल बिहारी वाजपेयी के २००२ के गुजरात दंगों के बाद (मोदी के संदर्भ में) दिया 'राजधर्म' पालन करने के बयान को भी नीतीश ने सभी को चुपके से याद दिला दिया।

 

नीतीश के इन तेवरों के इतर पार्टी के वरिष्ठ नेता शरद यादव कुछ सधे हुए अंदाज में नजर आए। उन्होंने ढंके-छुपे लहजे में स्पष्ट किया कि जदयू किसी की भी उम्मीदवारी को सपोर्ट कर सकती है अगर भाजपा धर्मनिरपेक्षता और राम मंदिर से जुड़ी गंठबंधन की शर्तों पर कायम रहे। हमारी पार्टी के लिए सिद्धांत से बढ़कर कुछ भी नहीं है। १३ दिन की एनडीए सरकार में हम शामिल नहीं हुए। हम विचारों को लेकर किसी भी कीमत पर समझौता नहीं कर सकते। 

 

नीतीश के वारों से भाजपा में खलबली मच गई है और आनन- फानन में १८ अप्रैल को दिल्ली में बिहार भाजपा के वरिष्ठ नेताओं सुशील कुमार मोदीगिरिराज सिंह अश्विनी चौबे और सी पी ठाकुर को बैठक में बुलाया गया। मोदी पर तीखे हमले से तिलमिलाई भाजपा ने भी नीतीश पर पलटवार करना शुरू कर दिया है। भाजपा के राष्ट्रीय सचिव रामेश्वर चौरसिया ने गोधरा कांड के वक्त नीतीश  की भूमिका पर सवाल उठाया है। चौरसिया ने कहा कि उस वक्त नीतीश कुमार रेल मंत्री थे। बतौर रेल मंत्री वह कैसे साबरमती एक्सप्रेस हिंसा को रोक पाने में नाकाम रहे। अगर नीतीश गोधरा कांड रोक लेते तो गुजरात में दंगे भी नहीं होते। 

 

लोहियावादी समाजवाद की राजनीति से निकले और इमरजेंसी के दौरान कांग्रेस के खिलाफ झंडा उठाकर राजनीति में शामिल हुए नीतीश के लिए दंगों का दाग लिए और अपने अहंकार व विभाजनकारी राजनीति के लिए मशहूर मोदी के साथ खड़े होना हमेशा से ही मुश्किलों भरा रहा है। दरअसल बिहार की राजनीति में मुसलमानों का वोट एक अहम भूमिका निभाता आया है। मोदी की सांप्रदायिक छवि की वजह से मुसलमान वोटों का नीतीश के पाले से शिफ्ट होना लगभग तय माना जा रहा है। इसी की फिक्र में नीतीश लगातार मोदी पर हमले कर खुद की सेक्युलर छवि को बचाए रखना चाहते हैं। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि मोदी की कीमत पर नीतीश की बात को भाजपा में कोई तरजीह मिले ऐसा इन परिस्थितियों में लगभग नामुमकिन है। इसके अलावा नीतीश खुद भी भाजपा से सुनना पसंद करेंगे कि वह गठबंधन छोड़ दें। इससे लोगों में यह संदेश जायेगा कि वे गठबंधन छोड़ना नहीं चाहते थे बल्कि सेक्युलर बने रहने की शर्त पर उन्हें ऐसा करने पर मजबूर होना पड़ा है। 

 

दरअसल नीतीश दो तरह की विचारधाराओं को एक साथ जोड़ने की कोशिश में हैं। पहला धर्मनिरपेक्ष होने के मुद्दे पर सभी सेक्युलर पार्टियों के बीच सबसे बड़े नेता के रूप में सामने आना दूसरी तरफ वे पिछड़े राज्यों को एक मंच पर आने का संकेत देकर तीसरे मोर्चे की संभावना का दांव खेलने के लिए भी माहौल तैयार कर रहे हैं। ऐसे में आने वाले लोकसभा चुनावों में अगर इन मुद्दों पर मुसलमान दलित और पिछड़ों के वोटों का ध्रुवीकरण होता है तो नीतीश के एक अगुवा के रूप में सामने आने की संभावनाएं बनती नजर आ रही हैं। 

 

 

पाक में चुनावी बिगुल

लंबे समय तक राजनीतिक अस्थिरता का दंश झेलने वाले पाकिस्तान में आगामी ११ मई को आम चुनाव होने तय हैं। देश की राजनीतिक पार्टियां तरह-तरह के चुनावी प्रचार- प्रसार में जुट गई हैं। सभी राजनीतिक दल अलग- अलग वादे कर लोगों को लुभा रहे हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि वहां के सियासी इतिहास में पहली बार पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार ने पांच वर्षों का कार्यकाल पूरा किया है। इससे पहले की सरकारों को पूरा कार्यकाल कभी मयस्सर नहीं हुआ। उनको बार-बार फौजी बूटों के तले रौंदा जाता रहा।

 

पिछले दिनों जब पाकिस्तान के सामने चुनाव के दबाव में समस्याएं खड़ी हुई थीं तो आश्चर्यजनक तरीके से देश ने उनका समाधान खोजा। इस बार इसने पूर्व जज हजर खान खोसो को अंतरिम प्रधानमंत्री बनाया। वह स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए प्रतिबद्ध हैं। इनके अलावा के सेना प्रमुख परवेज कियानी ने देश को स्वतंत्र चुनाव का भरोसा दिलाया है। खुद देश छोड़कर चले गए पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ पाकिस्तान लौट आए हैं। उन्होंने अस्पष्ट संदेश दिया है कि वह निष्पक्ष चुनाव चाहते हैं। लेकिन पहले के चुनावों में अपने पसंदीदा उम्मीदवारों को जिताने के लिए उन्होंने ही दखल दी थी। इसी बीच पाक चुनाव ट्रिब्युनल ने परवेज मुशर्रफ को चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य करार दे दिया है। इससे पहले उनका तीन जगहों से नामांकन भी खारिज हो गया था।

 

पाकिस्तान में ऐसे समय में चुनाव होने वाले हैं जब अर्थव्यवस्था के बिगड़ते हालात इस अस्थिरता के माहौल को और बदतर बनाने में कारक हैं। एशियन डेवलपमेंट बैंक ने पाकिस्तान को चेतावनी दी है कि साल खत्म होने तक उसे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से करीब नौ अरब डॉलर का उधार लेना पड़ेगा। आम नागरिक अल्पसंख्यक और सैन्य बल सभी चरमपंथियों का निशाना बन रहे हैं। साथ ही पाकिस्तान के बड़े शहरों (कराची क्वेटा लाहौर और पेशावर) में रोजाना औसतन १०-२० लोग मारे जा रहे हैं। पिछले महीनों में सबसे ज्यादा हमले सुन्नी चरमपंथियों ने शिया समुदाय पर किए हैं। चरमपंथियों ने ज्यादा आबादी वाले इलाकों में पुलिस स्टेशनों पर आत्मद्घाती हमले किए हैं। २८ फरवरी को उत्तर-पश्चिमी कबायली इलाके के चार स्कूलों को निशाना बनाया गया था। बलूचिस्तान में एक अलग विद्रोह चल रहा है इसमें भी आम नागरिक मारे जा रहे हैं। जाहिर है बिना कानून व्यवस्था के चुनाव कैसे होंगे इस पर संदेह बरकरार है। सेना ने साफ कर दिया है कि वह हर पोलिंग बूथ पर तैनात नहीं हो सकती वहीं पुलिस भी कई इलाकों में काम करने के बारे में आश्वस्त नहीं दिखती।

 

सेना प्रमुख जनरल परवेज कियानी कहते हैं कि वे कोई कदम तभी उठाएंगे जब सरकार उन्हें कहेगी। सरकार ऐसा कर चुनाव से ठीक पहले अपनी कमजोरी नहीं दिखाना चाहती। पिछले सालों में पीपीपी के नेतृत्व वाली सरकार ने चरमपंथियों पर नकेल न कसकर उन्हें और ताकतवर होने दिया है। बाकी राजनीतिक पार्टियों ने भी जाहिर किए बगैर इसका समर्थन किया है। चरमपंथियों की धमकी की वजह से राजनीतिक पार्टियों को कई चुनावी रैलियों को स्थगित करना पड़ा है। इसमें पाकिस्तानी तालिबान की हिट लिस्ट में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी है। पीपीपी के अलावा पाकिस्तानी तालिबान की हिट लिस्ट में एमक्यूएम यानी मुहाजिर कौमी मूवमेंट और पख्तूनों का प्रतिनिधित्व करने वाली अवामी नेशनल पार्टी भी है। एमक्यूएम कराची शहर में मजबूत पकड़ रखती है जबकि एएनपी पार्टी का जनाधार मुल्क के सूबे खैबर पख्तूनख्वां में है। एएनपी का असर कराची शहर में भी देखा जाता है। ये तीनों सियासी पार्टियां खुद को सेक्युलर जमातें बताती हैं और पिछले महीने अपना कार्यकाल पूरा करने वाली सरकार में साझीदार भी रही थीं। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या देश की सेक्युलर जमातें चरमपंथियों का सामना कर सकती हैं और चुनाव के दौरान बराबरी के मुकाबले के लिए इन हालात का दृढ़तापूर्वक मुकाबला कर सकती हैं?

 

देश के पश्चिमोत्तर इलाकों में इन चरमपंथियों का ठिकाना होने की बात जगजाहिर है। खैबर पस्तूनख्वां में मौजूदा सरकार की अगुवाई कर रही एएनपी पार्टी को चरमपंथियों के हमले का सबसे अधिक निशाना बनना पड़ा है। आने वाले दिनों में ही यह साफ हो पाएगा कि क्या ये सेक्युलर जमातें अपने दूसरे दक्षिणपंथी विरोधियों के मुकाबले में चुनाव अभियान ठीक से चला पाएंगी या नहीं। वे ऐसा करने के लिए बेचैन दिखाई देते हैं। आखिरकार चुनाव तो होंगे। लेकिन ये स्वतंत्र और निष्पक्ष हों इसके लिए हिंसा का कम होना जरूरी है जिसकी जिम्मेदारी सेना राजनीतिक पार्टियों पुलिस और मीडिया सभी पर है।

 

एक नजर

सन् १९५६ में पहले संविधान के लागू होने के बाद पाकिस्तान लोकतांत्रिक संसदीय संघीय गणराज्य बना। इस्लाम को राज्य के धर्म के रूप में स्वीकारा गया। वर्ष १९५८ में अयूब खान ने इस संविधान को निलंबित कर दिया। देश में पहले लोकतांत्रिक चुनाव १९७० में हुए। फिर १९७३ में दूसरा संविधान लागू हुआ लेकिन जनरल जियाउल हक ने १९७७ में इसको निलंबित कर दिया। १९८५ में यह पुनः लागू हुआ।

 

 

 
         
 
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