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vad 31 20-01-2018
 
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देश
 
विपक्षी दलों का हिंदू कार्ड
  • प्रेम भारद्वाज

सिद्धांत की बात है कि धर्म को राजनीति से अलग होना चाहिए] लेकिन व्यवहार की बात यह है कि सियासत ने धर्म को हमेशा ही एक मोहरे की तरह इस्तेमाल किया है। इतिहास में दर्ज पन्नों में लिखी बहुत पुरानी बातों को छोड़ भी दें तो वर्तमान समय में यह कोशिश जारी है। ये कोशिश उन दलों के जरिए हो रही है जो अब तक धर्म आधारित राजनीति को खून पानी पीकर कोसते थे। नवीनतम दृष्टांत दो दलों का है। कांग्रेस के साथ-साथ कांग्रेस में रह चुकी ममता बनर्जी भी धर्म का कार्ड खेल रही है। कांग्रेस हिन्दुओं को पूजा किट तो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी हजारों पंडितों को गीता बांट रही हैं।

भाजपा के शून्य से शिखर तक पहुंचने में धर्म ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। धर्म भाजपा को सत्ता तक पहुंचा सकता है] ऐसा सबसे पहले लाल कृष्ण आडवाणी ने समझा। इसी को ध्यान में रखकर उन्होंने राम आंदोलन का नेतृत्व किया। सोमनाथ से अयोध्या तक रामरथ निकाला। बेशक राम मंदिर आंदोलन तब के मंडल आंदोलन के काट के तौर पर था। लेकिन भाजपा को इसका फायदा हुआ और वह सत्ता की ओर मुखातिब हुई। पहले १३ दिन की सरकार बनी] फिर १३ महीने और फिर पांच साल तक अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा ने केंद्र में शासन किया। कई प्रदेशों में उसकी सरकार भी बनी।

नब्बे के दशक में जब सारा देश राम मंदिर आंदोलन के उबाल में था। तब रामरथ के सारथियों में एक नरेंद्र मोदी भी थे। जो तब बहुत चुप रहते थे। वह चुप रहकर पूरे माहौल को बेहद गंभीरता और बारीकी से समझ रहे थे। उन्होंने ताड़ लिया था कि इस देश की राजनीति में धर्म नसों में बहते लहू की तरह है। इसलिए जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री बने तो हिन्दुओं का मजबूती के साथ पक्ष लिया और हिन्दू समाज के सम्राट बन गये। अब वे देश प्रधानमंत्री है। नरेंद्र मोदी ने लालकूष्ण आडवाणी के बरक्स हिंदुत्व के आक्रमकता की एक बड़ी लकीर खींचकर आडवाणी को छोटा कर दिया। अब आडवाणी एक नरमपंथी नेता माने जाते हैं।

हाल ही संपन्न हुए गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने आक्रमक प्रचार शैली के तहत कांग्रेस पर हिंदुत्व का एक मायाजाल फेंका। एक रैली में कहा कि राहुल गांधी मुस्लिमपरस्त हैं। उनके इस जाल में कांग्रेस और राहुल गांधी फंस गए। तुरंत ही डिफेंसिव होते हुए राहुल गांधी खुद को हिंदू साबित करने के लिए लगातार कई गलतियां करते चले गए। गुजरात चुनाव का यह टॅर्निग प्वाइंट साबित हुआ। भाजपा को इसका जबरदस्त लाभ मिला और वह सत्ता में आ गई।

गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद भाजपा के साथ-साथ विपक्षी दल भी आगामी लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुट गए हैं। कांग्रेस का किट और ममता बनर्जी का गीता  बांटना भी इसी तैयारी का एक हिस्सा है। गुजरात विधानसभा चुनाव में २८ मंदिरों में माथा टेकने और अनेक को हिन्दू होने के आई कार्ड की तरह पेश करने के बाद फिर से वही गलती दोहराने जा रहे हैं। लेकिन कांग्रेस का एक बड़ा धड़ा मान रहा है कि इसमें कांग्रेस को चुनावी लाभ मिला है। पार्टी को सबसे ज्यादा लाभ सौराष्ट्र में हुआ है। सफर हिंदुत्व के फॉर्मूले के तहत कांग्रेस ने अब सौराष्ट्र के १४८ गांवों में राम मंदिर के कायाकल्प के लिए श्रीराम सूर्योदय संध्या आरती का गठन किया है। अब वह पूजा किट भी वितरित करेगी। कांग्रेस कर्ता सौराष्ट्र के मंदिर में सुबह-शाम नियम के मुताबिक सप्ताह में १४ बार आरती और पूजा करेंगे। यह भी खबर है कि पूजा में इस्तेमाल होने वाले शंख] झाला और नगाड़ा समेत अन्य चीजों का किट भी बांटा जाएगा।

गुजरात को भाजपा-संद्घ की प्रयोगशाला भी कहा जाता है। दोनों की वहां की जनता में गहरी पैठ है। अब कांग्रेस भी उसी राह पर चल पड़ी है। सबसे हैरानी भरा कदम पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उठाया है। मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप को लगातार झेलने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि ममता ने अपना विवेक खो सा दिया है। अब वह हिन्दुत्व की छांव में अपनी राजनीति की ताकत तलाशने में जुट गई है। ममता बनर्जी का नरम हिन्दुत्व का चेहरा सामने आया है। वीरभूमि में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की इजाजत से तृणमूल कांग्रेस ने ब्राह्मण सम्मेलन बुलाया। इस सम्मेलन में ८ हजार ब्राह्मणों को ममता बनर्जी की तरफ से भागवत गीता भेंट की गई। इसके पहले ममता बनर्जी गंगासागर के दौरे पर भी गई तो एक द्घंटा कपिल मुनी आश्रम में भी रुकी थीं। इसी तरह पुरी की यात्रा के दौरान भी वह जगन्नाथ मंदिर गईं।

असल में जिस भाजपा पर ममता सांप्रदायिक होने का आरोप लगाती हैं उसी भाजपा की बढ़ती ताकत से द्घबराकर विपक्षी दल हिन्दुत्व की तरफ मुखातिब रहे हैं। विधानसभा सीटों के उप चुनाव में भाजपा अभी भले ही छूट गई है। हो मगर उसके बढ़ते वोटों के प्रतिशत ने ममता बनर्जी की नींद उड़ा दी है। ऐसे में ममता बनर्जी कवायद में जुटी हैं कि गांवों में भाजपा के हिन्दुत्व के नाम पर कमल खिलाने की जमीन न मिल सके। तभी ममता ने गाय कार्ड भी खेला। यह ऐलान किया कि राज्य सरकार गांवों में गाय बांटेगी। गाय बांटने के पीछे तर्क दूध के व्यवसाय से जोड़कर आत्मनिर्भर बनाने का था मगर भीतर से ममता हिन्दुत्व कार्ड खेल रही हैं।  

भाजपा की राजनीतिक यह राजनीतिक विशेषता रही है कि वह विरोधी दलों की ताकत को ही उनकी कमजोरी में तब्दील कर देती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राजनीति के कुशल खिलाड़ी हैं। साफ दिख रहा है कि कैसे उनके बिछाए हिंदुत्व के जाल में विरोधी दल एक के बाद एक फंसते जा रहे हैं। पता नहीं क्या विपक्षी दल इस बात को नहीं समझ पा रहे हैं कि हिन्दुत्व की राह पर चलेन के क्रम में वह किसी भी कीमत पर भाजपा और मोदी से आगे नहीं निकल पाएंगे। दुश्मन की चाल और उसके ही हथियार से उसको कभी भी मात नहीं दी जा सकती] यह युद्ध का नियम है।

इस बात की पूरी गुंजाइश है कि जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव करीब आता जाएगा। विपक्षी  दलों की छटपटाहट बढ़ेगी। भाजपा की रणनीति में शायद शत्रु दलों को नर्वस भी कर देना है। अब देखने वाली बात यह होगी कि हिन्दू कार्ड खेलने का यह सिलसिला लोकसभा चुनाव तक किस तरह परवान चढ़ता है।

जेएनयू से एक और छात्र

देश के प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से ८ जनवरी को एक पूर्व छात्र लापता हो गया है। लापता छात्र मुकुल जैन का अब तक कोई पता नही चल पाया है। वसंत कुंज पुलिस ने तलाश शुरू कर दी है। पुलिस के मुताबिक मुकुल जैन जेएनयू से पीएचडी कर चुका है। उसने अपनी थीसिस भी जमा कर दी है। फिलहाल वह जेएनयू का रजिस्टर्ड स्टूडेंट नहीं है] मगर अपने पीएचडी प्रोफेसर के पास आता-जाता रहता है। इस बात की पुष्टि जेएनयू प्रशासन ने भी की है। पुलिस और जेएनयू प्रशासन ने माना है कि मुकुल ८ जनवरी को दोपहर में लैब आया था। अपने साथियों से मिलकर बाहर निकला। यह सीसीटीवी कैमरे में भी कैद है। पुलिस अभी तक मुकुल के लोकेशन का इसलिए भी पता नहीं लगा पाई है क्योंकि वह अपना मोबाइल जेएनयू के लैब में ही छोड़ गया है। वैसे इस मामले पर आधिकारिक तौर पर ना तो पुलिस और ना ही उसके परिवार के लोग कुछ बोलने को तैयार हैं। परिवार का बस इतना ही कहना कि हम तो बस यही चाह रहे हैं कि वो वापस किसी तरह लौट आए। वहीं पुलिस कह रही है] 'वो बालिग है और सीसीटीवी फुटेज से साफ दिख रहा है कि अपनी मर्जी से जा रहा है। इसलिए अभी हम गुमशुदगी का ही मामला दर्ज कर तलाशी कर रहे हैं। अगर कहीं कोई संदेह होगा तो फिर हम एफआईआर भी दर्ज कर लेगा' इस मामले के सामने आने के बाद पुलिस की नींद इसलिए भी उड़ी है क्योंकि अक्टूबर २०१६ से लापता हुए जेएनयू के छात्र नजीब का अब कोई पता नहीं चल पाया है।

 

स्वतंत्र जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट में

चर्चित सोहराबुद्दीन मुठभेड़ मामले के ट्रायल जज बीएच लोया की मौत की जांच पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई करेगा। महाराष्ट्र के एक पत्रकार बंधुराज संभाजी लोने ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की है। याचिका में पत्रकार बंधुराज ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया है कि जज लोया की मौत की स्वतंत्र जांच कराई जाए। सुप्रीम कोर्ट इस मामले की सुनवाई को तैयार हो गया है। १२ जनवरी को इस मामले की सुनवाई शुरू होगी। गौरतलब है कि जज लोया की मौत पर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं। इस मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट में भी एक याचिका दाखिल की गई है। दरअसल २००५ में सोहराबुद्दीन शेख और उसकी पत्नी कौसर बी को गुजरात पुलिस ने हैदराबाद से अगवा किया था। आरोप लगाया गया है कि दोनों को मुठभेड़ में मार डाला गया। शेख के साथी तुलसीराम प्रजापति को भी २००६ में गुजरात पुलिस द्वारा मार डाला गया। उसे सोहराबुद्दीन मुठभेड़ का गवाह माना जा रहा था। २०१२ में सुप्रीम कोर्ट ने उक्त ट्रायल को महाराष्ट्र में ट्रांसफर कर दिया। २०१३ में सुप्रीम कोर्ट ने प्रजापति और शेख के केस को एक साथ जोड़ दिया। शुरुआत में जज जेटी उत्पत केस की सुनवाई कर रहे थे लेकिन आरोपी अमित शाह के पेश ना होने पर नाराजगी जाहिर करने पर अचानक उनका तबादला कर दिया गया। फिर केस की सुनवाई जज बीएच लोया ने की और नवंबर २०१४ में नागुपर में उनकी मौत हो गई थी।

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  • गुंजन कुमार

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