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प्रदेश 
 
सवालों में पलायन आयोग

  • जसपाल नेगी

उत्तराखण्ड में निरंतर गांव के गांव खाली हो रहे हैं। राज्य गठन के बाद पलायन की रफ्तार कुछ ज्यादा ही तेज हुई है। कोई भी सरकार इस पर अंकुश लगाने में कामयाब नहीं हो सकी तो समाज के जागरूक लोगों के बीच पलायन एक बड़ी चिंता का विषय बन गया। जनता के बीच से पलायन को लेकर उठते सवालों का राज्य की मौजूदा सरकार के पास तत्काल कोई ठोस आश्वासन या जवाब नहीं था। लिहाजा उसने पलायन पर अंकुश का समाधान निकालने के लिए आयोग के गठन की ?kks"k.kk कर दी। प्रथम दृष्टया पलायन आयोग की चाल भी पूर्व में गठित राजधानी चयन आयोग जैसी दिखाई देती है। स्थिति यह है कि आयोग की ?kks"k.kk के साढ़े तीन माह बाद अब जाकर बड़ी मुश्किल से पौड़ी में दो कमरों में आयोग का ऑफिस खुल पाया है। यहां एक उपाध्यक्ष और दो कर्मचारी बैठेंगे। 

आयोग के अध्यक्ष मुख्यमंत्री हैं। मुख्यमंत्री प्रदेश की तमाम समस्याओं को सुलझाने और नीतियां बनाने में ही व्यस्त रहेंगे। जाहिर है कि उनके बाद उपाध्यक्ष डॉ एसएस नेगी पर ही पलायन का समाधान निकालने की भारी- भरकम जिम्मेदारी है। लेकिन उपाध्यक्ष महोदय का मन पहाड़ में लगता नहीं दिखाई देता। अपनी नियुक्ति के बाद डॉ नेगी महज दो बार पौड़ी आए और प्रेस वार्ता की रस्म अदा कर चले गए। उनके कदम पहाड़ पर रुक ही नहीं पा रहे हैं।

गौरतलब है कि पिछले वर्ष २७ सितंबर को रामलीला ग्राउंड में जनता मिलन कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने पौड़ी में ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग की ?kks"k.kk की। इसके बाद ३ अक्टूबर को पलायन आयोग के नवनिर्वाचित उपाध्यक्ष डॉक्टर शरद सिंह नेगी पौड़ी पहुंचे। उन्होंने कूषि भवन] विकास भवन] ईटीसी सहित अन्य जगहों पर दफ्तर के लिए जगह तलाशी। इसके बाद सर्किट हाउस में बातचीत में पलायन को गंभीर समस्या बताते हुए उन्होंने साफ कहा कि इसी माह आयोग कार्य शुरू कर देगा। लेकिन अब तक आयोग का ढांचा तक नहीं बन पाया है। आयोग की समयावधि] नियमावली] 

पदाधिकारियों] अधिकारियों] कर्मचारियों की नियुक्ति को लेकर सरकार कुछ भी साफ नहीं कर पाई है। ग्राम्य विकास निदेशालय ने उपाध्यक्ष] सदस्यों के मानदेय] कार्यालय एवं यात्रा व्यय बैठकों पर व्यय] संविदा पर तैनात कर्मचारियों के मानदेय के बारे में १२ अक्टूबर को अपर सचिव ग्राम्य विकास को २५ लाख का प्रस्ताव भेजा गया। १७ अक्टूबर को अपर आयुक्त ग्राम्य विकास डॉक्टर आरएस पोखरिया ने इसमें संशोधन कर ५० लाख रुपए का कर दिया है। आयोग का शुरुआती खर्चा ५० लाख होगा। 

चकबंदी आंदोलन के प्रणेता गणेश गरीब कहते हैं कि पलायन रोकने की बात महज अखबारों में हो रही है। इसके लिए कोई ठोस नीति नहीं है। सरकारी नीतियों पर नाराजगी जताते हुए उन्होंने कहा कि सरकार को खेती-बाड़ी के लिए किसानों के लिए ऐसी योजना बनानी चाहिए कि वे अपने बच्चों को इसकी सीख दें। महज पलायन आयोग बना देने से पलायन नहीं रुकेगा। इसके लिए यहां के किसानों के बीच जाकर नीतियां बनाने के साथ ही उन्हें सार्थक रूप भी देना होगा। उन्होंने कहा कि पहाड़ों से पलायन की बात हर मंच पर होती है] लेकिन इसके लिए अब तक की सरकारों ने शायद ही कुछ ऐसा किया हो जो ये साबित करता है कि उनकी कार्ययोजना से लोग शहरों को छोड़ मूल गांवों को लौट आए हों।

 

सचिव ग्राम्य विकास को आकस्मिक व्यय का प्रस्ताव भेजा गया है] लेकिन अभी आयोग के लिए धनराशि जारी नहीं हो पाई है। सदस्य व अन्य कार्मिकों की नियमावली भी शासन स्तर से तैयार होनी है। उम्मीद है कि जल्द आयोग कार्य शुरू कर देगा।

आरएस पोखरिया] अपर आयुक्त ग्राम्य विकास पौड़ी

 
         
 
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  • संतोष सिंह

शिक्षक सते सिह भंडारी ने अपने प्रयास से स्कूल को मॉडर्न बनाया। शिक्षा के साथ ही पर्यावरण चेतना की अलख जगाई। वह अपनी पौधशाला से वन विभाग को

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