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मुहिम 
 
नजीर बनीं शायरा

आकाश नागर@हरवंश बिष्ट

शायरा बानो को ससुराल में मारा-पीटा गया। बार-बार गर्भपात के लिए विवश किया गया। बाद में तलाक देकर बच्चों को भी उसी के हवाले कर दिया। लेकिन वह चुप नहीं बैठी। उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया। अंततः उनका la?klZ रंग लाया। सर्वोच्च न्यायालय ने तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया। इसके बाद देश भर में तीन तलाक पर बहस छिड़ी। लोकसभा में ट्रिपल तलाक के विरुद्ध बिल पास हो चुका है। हालांकि राज्यसभा में फिलहाल यह लटक गया है] लेकिन निकट भविष्य में जल्द ही कानून बन जाने की संभावनाएं हैं। शायरा का la?klZ भविष्य में आम मुस्लिम महिलाओं के लिए नजीर बन जाएगा

 

वर्ष २०१७ सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले के लिए भी याद रखा जाएगा। अगस्त महीने में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए पिछले १४०० साल से प्रचलित ट्रिपल तलाक को असंवैधानिक करार दिया था। पांच जजों वाली संवैधानिक पीठ ने सैकड़ों वर्षों से चली आ रही इस कुरीति पर रोक लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अल्पसंख्यक महिलाओं की जिंदगी संवरने की लंबी बहस चली। यह बहस आम आदमी से शुरू हो लोकसभा में पास होकर राज्यसभा तक पहुंच गई है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इस ऐतिहासिक फैसले के पीछे जिन पीड़ित महिलाओं ने la?klZ किया उनमें से कई को भुला दिया गया। इनमें से एक है उत्तराखण्ड के काशीपुर निवासी शायरा बानो। 

शायरा वह भुक्तभोगी महिला हैं जो ट्रिपल तलाक की जद में आकर न केवल ससुराल से निकलने को अभिशप्त हुईं बल्कि न्याय के लिए दर-दर भटकती रहीं। शायरा बानो ने आप बीती के मद्देनजर अल्पसंख्यक महिलाओं के दर्द को करीब से जाना। इसके मद्देनजर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में ट्रिपल तलाक के खिलाफ एक याचिका दायर की। ट्रिपल तलाक पर शायरा बानो उत्तराखण्ड की एकमात्र महिला हैं जिन्होंने महिला सशक्तीकरण की दिशा में सुप्रीम कोर्ट की शरण में जाना उचित समझा। एमबीए करने के बाद शायरा बानो ने दांपत्य जीवन में प्रवेश के दौरान जो सुखद सपने देखे थे वह बहुत जल्दी ही न सिर्फ धूल-धूसरित हुए बल्कि वह द्घर से बेद्घर होकर रह गईं। वह तो भला हो शायरा के मायके वालों का जो उसे और उसके दो बच्चों को सहारा दिया। शायरा बानो कहती हैं कि आज अल्पसंख्यक महिलाओं की ज्यादातर यही त्रासदी है कि उन्हें एक कपड़े की तरह उतार कर फेंक दिया जाता है] लेकिन ट्रिपल तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब महिलाएं पुरुषों की उतरन भर बनकर नहीं रहेगी।  

काशीपुर की शायरा बानो की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के एतिहासिक फैसले के बाद देश में एक बार फिर ८० के दशक के शाहबानो केस की याद ताजा हो गई है। तलाक के बाद पति से गुजारा भत्ता पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट गई शायरा बानो की तुलना आज शाह बानो से की जा रही है जो सबसे पहले तीन तलाक के मसले को सुप्रीम कोर्ट लेकर गई थी। हालांकि शाह बानो को मिला इंसाफ तुष्टिकरण की राजनीति की भेंट चढ़ गया था। लेकिन शायरा बानो को देश की सबसे बड़ी अदालत ने जो न्याय दिया वह उसके लिए ही नहीं उसकी तरह की पीड़ित महिलाओं के लिए वरदान बन सकता है।

शायरा बानो उत्तराखण्ड के जिला उधमसिंह नगर के काशीपुर की रहने वाली हैं। वर्ष २००२ में उन्होंने इलाहाबाद के रिजवान अहमद से निकाह किया था। उनके दो बच्चे भी हैं। शायरा के मुताबिक ससुराल में उन्हें बहुत प्रताड़ित किया जाता था। उनसे दहेज की मांग की जाती थी और मारा पीटा जाता था। यही नहीं बल्कि उसकी मर्जी के खिलाफ सात बार गर्भपात तक कराया गया। इन सबके चलते शायरा बानो बीमार रहने लगी थी। इसके बाद रिजवान ने शायरा को जबरदस्ती काशीपुर वापस उसके पिता के द्घर भेज दिया। साल २०१५ में शायरा बानो के शौहर रिजवान अहमद ने उसे डाक के जरिए तलाक भेजकर रिश्ता खत्म कर लिया। बाद में तलाक के मुद्दे पर वह इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंची। लेकिन यहां किसी ने भी उनको गंभीरता से नहीं लिया। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शायरा बानो की याचिका को खारिज कर दिया। अल्पसंख्यक समाज की महिलाओं की यही सबसे बड़ी त्रासदी है कि तलाक के मामले पर वह अपने आपको असहाय पाती हैं। कानून] अदालत उनके तलाक के किसी मामले पर बहस आदि करने तक से बचते नजर आते हैं। बाद में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में शरण ली। सुप्रीम कोर्ट में उन्होंने ट्रिपल तलाक के मुद्दे पर एक याचिका दायर की। सुप्रीम कोर्ट ने इस आधार पर कि ट्रिपल तलाक संविधान के आर्टिकल १४ में दिए गए समानता के अधिकार का हनन करता है] शायरा बानो की याचिका स्वीकार की। याचिका में सऊदी] पाकिस्तान और अन्य मुस्लिम देशों में तीन तलाक पर प्रतिबंध का भी जिक्र किया गया था। इतना ही नहीं शायरा बानो की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई याचिका में यह भी कहा गया कि भारत जैसे प्रगतिशील देश में इन चीजों की कोई जरूरत नहीं है। 

गौरतलब है कि ट्रिपल तलाक के मुद्दे पर शायरा बानो के अलावा मध्य प्रदेश की इशरत जहां भी याचिकाकर्ता रही हैं। इशरत जहां को उनके पति ने फोन पर ही तीन बार तलाक] तलाक] तलाक कह कर अपना रिश्ता खत्म कर लिया था। इशरत जहां और चार बच्चों को भी शायरा बानो की तरह उसके पति ने भगवान भरोसे छोड़ दिया था। इसके अलावा भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की एक संस्था ने मुस्लिम वीमेंस क्वेस्ट फॉर इक्वेलिटी नाम से एक लेटर लिखा था। कोर्ट ने इस पर संज्ञान लेते हुए यािचका के रूप में स्वीकार किया और सुनवाई शुरू कर दी। ये तीनों याचिकाएं ही ट्रिपल तलाक केस के नाम से जानी जाती हैं।

 

ट्रिपल तलाक से जुड़े तथ्य

 

  • तीन तलाक के खिलाफ आवाजें हमेशा उठती रही हैं] लेकिन कथित तौर पर धर्म से  जुड़ा मसला होने की वजह से किसी राजनीतिक दल या सरकार ने इस पर कभी खुला स्टैंड नहीं लिया। केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद ७ अक्टूबर २०१६ को राष्ट्रीय विधि आयोग ने जब इस मुद्दे पर लोगों की राय मांगी तो एक नई बहस की शुरुआत हुई।द चीफ जस्टिस जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय पीठ ने अपने फैसले में कहा कि तीन तलाक धार्मिक प्रैटिक्स है] इसलिए सरकार को इसमें दखल देना चाहिए। तलाक के लिए कानून बनना चाहिए।

 

 

 

  • इस केस को समानता की खोज बनाम जमात उलेमा-ए-हिंद नाम दिया गया। केस की सुनवाई करने वाले पांचों जज अलग-अलग समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं। द ऑल इंडिया मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से दलील दी गई कि तीन तलाक इस्लाम का मूल हिस्सा नहीं है। कुरआन में तलाक के लिए पूरी प्रक्रिया बताई गई है। पैंगबर की मौत के बाद हनीफी में जो लिखा गया वह बाद में आया है। उसी में तीन तलाक का जिक्र आया है। कुरआन में तीन तलाक का कहीं भी जिक्र नहीं है। 

 

 

^आगे और लड़ाई है + + +^

ट्रिपल तलाक के मुद्दे पर याचिका दायर करने और इतनी लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने की हिम्मत कैसे जुटाई

वर्ष २०१५ की बात है। काशीपुर (उत्तराखण्ड) में रहने के दौरान मेरे पति ने मुझे स्पीड पोस्ट से तलाक भेजा। मेरे दो छोटे-छोटे बच्चे हैं। मुझ पर तो जैसे मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा। मैंने खुद को परिवार वालों की मदद से संभाला। पहले तो कुछ समझ में नहीं आया] लेकिन बाद में मेरे भाई अरशद ने काफी साथ दिया। वह मुझे दिल्ली लेकर गया और वहां जाकर मैं सुप्रीम कोर्ट के वकील बालाजी श्रीनिवासन से मिली। उन्होंने मुझे भरोसा दिलाया और मेरी लड़ाई लड़ी। 

आगे की कार्यवाही पर कैसे काम किया

वकील साहब की मदद से याचिका तैयार की। इसके बाद तीन तलाक के खिलाफ अर्जी दाखिल कर उसे गैर संवैधानिक ?kksf"kr करने और उसे निरस्त करने की गुहार लगाई। मुझे पूरा भरोसा था कि मुझे न्याय मिलेगा और फिर सुप्रीम कोर्ट के जजों ने ऐतिहासिक फैसला दे दिया।

इस फैसले से आप अपने जीवन में क्या बदलाव देखती हैं

सच जानिए तो मेरे पति ने जब मुझे तलाक भेजा था तो मेरे जीवन में अंधेरा सा छा गया था। लेकिन इस लंबी लड़ाई के बाद अब एक रोशनी दिखाई दी है।

जब आप सुप्रीम कोर्ट में केस लड़ रही थी तो कट्टरपंथियों के द्वारा आपको डराया धमकाया भी गया होगा या धमकी भी दी गई होगी

किसी ने कोई धमकी नहीं दी। हालांकि मैं किसी के दबाव में भी आने वाली नहीं थी। लेकिन फिर भी मुस्लिम संगठन की ओर से कहा गया कि इससे कुछ नहीं होगा। इससे हमारा नाम ही खराब होगा। लेकिन मैंने मन बना लिया था कि अब अपने और तमाम मुस्लिम महिलाओं के हक के लिए लड़ाई लडूंगी और मैंने यही किया।

अल्पसंख्यक समाज में बहु विवाह और हलाला जैसी बुराइयां भी हैं] उनका खात्मा कैेसे होगा

मैंने ट्रिपल तलाक के साथ ही मुस्लिम समाज में बहु विवाह और हलाला के मुद्दे को भी अपनी याचिका में शामिल किया था। जिसमें से सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिपल तलाक के मामले पर ही सुनवाई की। अभी हमारी लड़ाई जारी रहेगी। अगली लड़ाई बहु विवाह और हलाला को खत्म करने की होगी।

मुस्लिम महिलाओं के लिए आप क्या करना चाहती हैं

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मुस्लिम महिलाओं में एक उम्मीद की लौ जगी है। अब मुस्लिम महिलाओं को इस तरह तलाक देकर कोई द्घर से बेद्घर नहीं कर सकता है। मुस्लिम महिलाओं के लिए अभी और भी बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है। सबसे पहले उनमें अपने अधिकारों और मान-सम्मान के प्रति जागरूकता फैलाना जरूरी है।

अफगानिस्तान की तरह भारतीय मुस्लिम समाज में भी ^अजी सुनती^] ^हो^ का प्रचलन बढ़ने लगा है। इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया रहेगी

सही कहा आपने अफगानिस्तान में महिलाओं का नाम लेने का चलन नहीं है। अफगान समाज में महिलाओं का नाम नहीं लेना एक तरह से गुस्सा जाहिर करना माना जाता है। इसी तरह की परिपाटी अब भारत के मुस्लिमों में भी देखने को मिल रही है। ^अजी सुनती हो^ को खत्म करके महिलाओं का नाम लेने की सम्मान के लड़ाई भी लड़नी पड़ी तो मैं पीछे नहीं हटूंगी। मैं चाहती हूं कि हर मुस्लिम महिला अपने नाम से पहचानी जानी चाहिए।

 

 
         
 
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