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vad 31 20-01-2018
 
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राजनीति 1
 
^सरकार में साहस नहीं^

डॉ  इंदिरा हृदयेश्

पूर्व वित्तमंत्री उत्तराखण्ड

उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद पहली निर्वाचित सरकार कांग्रेस की बनी। तब मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी जी का बड़ा व्यक्तित्व था। अगर कभी राज्य में वित्तीय संकट हुआ भी तो उन्होंने अपने कुशल वित्तीय प्रबंधन से उसे महसूस नहीं होने दिया। मैं तब लोक निर्माण मंत्री थी और मुझे याद है कि उन्होंने कभी एक भी सड़क नहीं रोकी कि पैसा नहीं है] यह नहीं बनेगा। तिवारी जी के कुशल वित्तीय प्रबंधन के चलते राज्य में कभी भी विकास की योजनाओं को रोका नहीं गया। चाहे वित्तीय संकट रहा हो या कोई समस्यायें आई हों। शायद नारायण दत्त तिवारी जी के समय में ही राज्य मे ंसबसे ज्यादा विकास हुआ। उद्योग के क्षेत्र में भी] निर्माण के क्षेत्र में भी और व्यवसाय के क्षेत्र में भी विकास हुआ। कभी पैसे का रोना उन्होंने नहीं रोया। वे भारत सरकार में किसी से भी टेलीफोन पर बात करते थे तो उनकी बातें गंभीरता से सुनी जाती थी। उस समय केंद्र में अटल बिहारी बाजपेयी जी की सरकार थी और स्वयं प्रधानमंत्री जी उनकी बात का महत्व समझते थे।

आज राज्यों पर आर्थिक संकट आ रहे हैं। उत्तराखण्ड ही नहीं कई राज्यों पर संकट है। इसका मुख्य कारण है कि इन्होंने प्लानिंग कमीशन खत्म कर दिया। प्लानिंग कमीशन में यह प्लान हो जाता था कि इस इस मद में हमें इतना-इतना रुपया चाहिए। इसी के चलते तिवारी जी  की सरकार के समय हमने प्लानिंग कमीशन से जितने रुपये मांगे हमें पूरा का पूरा एक-एक पाई तक मिल जाता था। अब मुझे सबसे बड़ा संकट जो दिखाई दे रहा है वह प्लानिंग कमीशन को खत्म करने से हो रहा है। यह प्लानिंग कमीशन जवाहर लाल नेहरू लाये थे कि पांच-पांच वर्ष की प्लानिंग करेंगे और उसी के आधार पर योजनाओं के लिए बजट आवंटन होगा। अब ये नीति आयोग लेकर आए हैं। मेरी समझ में आज तक नहीं आया है या आप मुझे कम जानकार मान लें तो मैं कह सकती हूं कि नीति आयोग क्या कर रहा है] कैसे कर रहा है। मेरा चालीस वर्ष का राजनीतिक जीवन है लेकिन हम भी इसे आज तक समझ नहीं पाये हैं। या तो हम अज्ञानी हैं या भारत सरकार हमें समझा ही नहीं पाईं आज इसीलिए उन सभी राज्यों जहां बीजपी की सरकारें हैं] संकट बना हुआ है।

मनमोहन सरकार के समय हमने नये राज्य होने के चलते फंडिंग पैटर्न ९०ः१० का करवाया था। उसके बाद कई स्थानों पर यह द्घटा और द्घटा भी तो ८०-२० हो गया। फिर ७०ः३० का रहा। लेकिन फंडिंग पैटर्न पर हमारा बहुत जोर था। और लगातार हमको यह फंडिंग पैर्टन प्राप्त होता रहा चाहे डबल इंजन की सरकार हो या न हो। हम आर्थिक संकट में उतना नहीं थे। रही कर्ज की बात तो कर्ज तो बहुत किस्म का होता है। नाबार्ड का भी कर्ज होता है वर्ल्ड बैंक का भी कर्ज होता है और बाजार से भी कर्ज होता है। पूरा देश कर्ज पर चलता है। राज्यों की सरकारें ही नहीं भारत सरकार भी कर्ज लेती है। लेकिन वापस होने के भी आसार बने रहते हैं। एक लिमिट के बाहर हम कर्ज नहीं ले सकते। रजिर्व बैंक की आपत्ति आ जाती है। अभी तक हमारी दोनों सरकारों के समय यह नौबत नहीं आई कि रिजर्व बैंक ने आपत्ति की हो। मौजूदा सरकार में भी यह स्थिति नहीं आई हैं। अभी तो इनका कार्यकाल कुछ ही महीने का हुआ है। अभी शुरुआत है लेकिन हमने यह देखा कि यह सरकार अपने कर्मचारियों को सैलरी तक नहीं दे पा रही है। सैलरी देने के लिए सरकार कर्ज ले रही है। जबकि सैलरी कमिटेड ऐक्स्पेंडिचर है इसे तो देना ही है। हमारी सरकार के समय जब कभी ऐसी नौबत आई तो हम फाईनेंस सेक्रटरी को फोन पर ही कह देते थे कि यह तो कमिटेड है। इसे तो आपको पहले ही से रखना है। अब यह सरकार पर्याप्त कर्जा ले चुकी है और फंडिंग पैटर्न को नहीं बदलवा पाए हैं। मुझे लगता है कि प्रदेश सरकार भारत सरकार के समक्ष अपने प्लान का प्रजेंटेशन सही तरीके से नही रख पा रही है। पैसा कोई ऐसे ही थोड़े भेज देता है। इसके लिए प्लान देना पड़ता है। जबकि इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। उत्तराखण्ड एक ऐसा प्रदेश है जहां बाढ़] भूकंप] प्राकृतिक आपदा आती रहती है। इससे जो गांव बर्बाद हो चुके हैं उनका विस्थापन और पुनर्वास नहीं हो पाया है। हम भी नहीं कर पाये और इन्होंने करने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया। मुझे लगता है कि आज केंद्र और प्रदेश में भाजपा की सरकारें हैं। जिसे डबल इंजन की सरकार कहा जा रहा है] लेकिन साफ है कि यहां अब बोलने की आजादी नहीं है। सरकार के प्रतिनिधि अपनी बात को उतना सही तरीके से केंद्र के सामने नहीं रख पा रहे हैं जितना हमारे समय में आजादी रहती थी। शायद यह भाजपा की कोई मजबूरी होगी पर जितना हम केंद्र सरकार के सामने अपने राज्य के हितों के लिए मुखर रहते थे आज उतना नहीं दिख रहा है। शायद भय है या अन्य कोई कारण या फिर अनुभव की भी कमी हो सकती है। नौकरशाही का सही उपयोग नहीं कर पाना भी इसका एक कारण हो सकता है।

राज्य में राजस्व की प्राप्तियां कम हैं। उनको बढ़ाने की आवश्यकता है। बाहरी सहायता से ही काम चलाना पड़ता है] लेकिन कम से कम अपने राजस्व को बढ़ाने के लिए प्रयास होना चाहिए। आज कुल बजट का अधिकांश वेतन और पेंशन में खर्च हो रहा है और इस खर्च को हम रोक नहीं सकते। कुल बजट का ८० फीसदी खर्च वेतन पेंशन में ही खर्च हो रहा है तो हमारा दायित्व है कि हम अपना राजस्व बढ़ाये। हमारी सरकार में हमने कई प्रयास किए थे जिससे राजस्व बढ़ा था।

हमारे प्रदेश में राजस्व प्राप्तियों के आधार नहीं हैं। राजस्व प्राप्ति के दो आधार हैं। एक वैट जिससे भारी कर मिलता था। नंबर दो है खनन] जिस खनन से राज्य को सबसे अधिक राजस्व मिलता था उसे खोलने में सरकार ने रुचि नहीं ली। एक अक्टूबर को खनन खुलता था लेकिन सरकार दो महीने तक सोती रही। पूरे दो महीने गुजर जाने के बाद खनन खोला गया। इस एक माह में राज्य को करोड़ों का नुकसान हुआ। आय के साधनों का सही उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। जीएसटी लागू होने से पहले भारत सरकार का कहना था कि तीन वर्ष तक के द्घाटे को हम सहेंगे। लेकिन अभी जीएसटी की ही वसूली नहीं हो पा रही है औेर ये रोज राहत की बात कर रहे हैं। एक वित्त मंत्री रहने के नाते और अपने चालीस वर्ष के राजनीतिक जीवन के अनुभव से मैं इतना कह सकती हूं कि वर्तमान में प्रदेश सरकार केवल प्रचार पर ही नहीं रहे। जनता को इसका लाभ कैसे पहुंचे इस पर काम करे। खनन इस राज्य का दूसरा बड़ा राजस्व देने वाला क्षेत्र है। इसको सही तरीके से राज्य में लागू करे। शराब भी हमारा राजस्व देने वाला तीसरा क्षेत्र है। इसके लिए सही पॉलिसी बनाई जाये। यह सरकार जिस तरह से शराब की नीति को बार बार बदल रही है] वह ठीक नहीं है। इससे राजस्व का नुकसान हो रहा है। आय के साधनों के प्रति सतर्क रहना जरूरी है। मैं सरकार में अनुभव की कमी मानती हूं कि सरकार इस पर पूरा ध्यान नहीं दे पा रही है। मैं अभी यह नहीं कह सकती कि राज्य वित्तीय अराजकता की स्थिति में जा रहा है। अभी बहुत गुंजाइश बची है। सरकार बाह्‌य सहायता और भारत सरकार से पैसा मांगेगी तो फिलहाल वित्तीय अराजकता तो नहीं है। लेकिन भविष्य में क्या होगा यह कहना अभी मुश्किल है। मेरी स्पष्ट राय यह है कि इस प्रदेश को पर्यटन प्रदेश बनाकर ही स्थितियों में बेहतर सुधार आएगा। सरकार को इस सोच पर काम करना होगा।

 

^गरीब राज्य के अमीर लोग^

प्रो  मनोज भट्ट

अर्थशास्त्री] दून विश्वविद्यालय

राज्य बनने के बाद एक बात अच्छी हुई कि हमें प्लानिंग कमीशन ने स्पेशल कैटेगरी में डाल दिया। हमें ८० प्रतिशत ग्रांट और २० प्रतिशत लोन मिलने लगा। इससे नये राज्य को बहुत लाभ मिला। योजनायें बनीं और उन पर काम हुआ। लेकिन इन सबके बावजूद स्टेट अपना रेवेन्यू जनरेट करने में सफल नहीं रहा। अगर रेवेन्यू जनरेट और खर्च के बराबर सब होता रहता तो आज इतनी समस्यायें न होती जो हो रही हैं। सरकार नॉन पलानिंग में ही बजट का अधिक खर्च करने को मजबूर है। सैलरी पेंशन और अन्य एक्सपेंडिचर में ही खर्च हो रहा है। एक बात यह भी बड़ी गंभीर है कि सरकार अपने राजस्व को बढ़ाने के लिए अन्य प्वाइंटों पर फोकस नहीं कर रही है। विदेशो में खास तौर पर यूरोपीय देशों में रेवेन्यू के कई प्वांट हैं जिन पर सरकारें फोकस करती हैं।

मोदी सरकार ने नया फाइनेंस कमीशन बनाया है जिसे नीति आयोग कहा जा रहा है। इसमें राज्यों को अपने अपने रेवेन्यू को मेंटेन करने और उसके अनुसार काम करने को कहा गया है। इससे उन राज्यों को जो अभी अपने पैरों पर ठीक से खड़े नहीं हैं] उनको दिक्कतें आने लगी] जैसे उत्तराखण्ड। अब उत्तराखण्ड को दिकक्तें तो आनी ही हैं। हालांकि ऐसा नहीं है कि यह सब छोटे राज्यों में ही हो रहा है। जो राज्य बड़े हैं और उनके बारे में कहा जाता है कि उनकी स्थिति बेहतर है] वहां भी स्थिति अच्छी नहीं है। जैसे पंजाब को ही लें। आज पंजाब की स्थिति भी ठीक नहीं है।

उत्तराखण्ड की बात और भी गम्भीर है। पहले कहा जाता था कि राज्य अमीर है लेकिन उसके नागरिक गरीब हैं। आज उत्तराखण्ड के लिए कहा जा रहा है कि उत्तराखण्ड गरीब है] लेकिन इसके लोग अमीर हैं] क्योंकि उत्तराखण्ड की प्रति व्यक्ति आय बहुत बढ़ चुकी है। हालांकि यह भी अच्छा है कि जिस तरह से अन्य राज्यों के हालात हैं उससे उत्तराखण्ड की स्थिति अभी उतनी गंभीर नहीं है। लेकिन आने वाले समय में यह गंभीर हो सकती है। मेरा मानना है कि नई फाईनेंस नीति के कारण ऐसा हो रहा है। फाईनेंस पैटर्न में जो बदलाव किये गए हैं यह उनके साईड इफैक्ट ही हैं।

 अब इसका समाधान क्या है और क्या होना चाहिये]  इस पर भी बात होनी चाहिये। सरकार को चाहिये कि वह अपना खर्च कम करे और राजस्व को बढ़ाये। इन दोनों कामों को सरकार बहुत अच्छी तरह से कर सकती है। खर्च कम करना सरकार के हाथ में है। राजस्व के नये-नये स्रोतों को खोजें और उन पर तत्काल कम करना शुरू कर दें। यह कहना कि इससे तत्काल फायदा नहीं होगा यह मैं भी मानता हूं। लेकिन अगर सरकारों ने राज्य बनने के बाद इन स्रोतों पर काम करना शुरू कर दिया होता तो आज क्या स्थिति बेहतर नहीं होती। हमारे पास पर्यटन है] यात्रा है] वन सम्पदा है] खनन है] इन पर सही फोकस करें तो राज्य को फायदा होना निश्चित है।

 
         
 
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