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vad 31 20-01-2018
 
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राजनीति
 
फंडिंग पैटर्न पर यूटर्न

  • कृष्ण कुमार

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अपने शासन के दौरान केंद्र के फंडिंग पैटर्न से राज्य को होने वाले नुकसान का मसला उठाया तो तमाम भाजपा नेता उन पर हमलावर हो गए। भाजपा विधायक] सांसद और पदाधिकारियों ने उन पर नाच न जाने आंगन टेढ़ा वाले अंदाजा में आरोप लगाए कि हरीश रावत खुद तो वित्तीय प्रबंधन कर पाने में सक्षम नहीं हैं और उल्टे केंद्र पर दोष मढ़ रहे हैं। लेकिन अब राज्य की भाजपा सरकार भी फंडिंग पैटर्न में हुए बदलाव के चलते लाचार है। राज्य में निरंतर बढ़ते आर्थिक संकट के कारण उसे कर्मचारियों को दीवाली का बोनस देने के लिए भी कर्ज लेना पड़ा। राज्य को इस विषम हालात से उबारने के लिए ^दि संडे पोस्ट^ ने कुछ ऐसे राजनेताओं और विशेषज्ञों के विचार जाने जो अर्थव्यवस्था की समझ और अनुभव रखते हैं

 

उत्तराखण्ड विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा राज्य की तत्कालीन हरीश रावत सरकार पर निरंतर आरोप लगाती रही। आबकारी और खनन नीति को लेकर भाजपा बेहद आक्रामक दिखाई दी। सबसे बड़ी बात यह कि वित्तीय कुप्रबंधन के लिए मुख्यमंत्री हरीश रावत को कोसती रही। भाजपा नेताओं ने आरोप लगाए कि अपने वित्तीय कुप्रबंधन को छिपाने के लिए सरकार और मुख्यमंत्री रावत केंद्र के फंडिंग पैटर्न को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। रावत सरकार पर हमले दर हमले कर भाजपा सत्ता में तो आ गई] लेकिन आज उसे खुद केंद्र के फंडिंग पैर्टन के बदलाव से राज्य के हितों हो रहे नुकसान को मानने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। एक स्वर में भाजपा सरकार फंडिंग पैर्टन में राज्य के हितों के लिए बदलाव की मांग कर रही है।

उल्लेखनीय है कि मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही पूर्व से चले आ रहे योजना आयोग के स्वरूप में बदलाव कर नीति आयोग का गठन किया और राज्यों को दी जाने वाली मदद में बदलाव किया। हालांकि यह बदलाव राज्य के हित में सही प्रतीत होता दिखाई दिया। केंद्र सरकार द्वारा केंद्र की योजनाओं में ५०ः५० का हिस्सा ९०ः१० कर दिया गया। इससे राज्य को ज्यादा बजट मिलने की उम्मीद जगी] लेकिन असल में इसके उलट होने लगा। उत्तराखण्ड में योजनाओं पर केंद्र सरकार की हिस्सेदारी ज्यादा होने से राज्य के बजट में कमी कर दी गई। यही असल में समस्या का मुख्य कारण बना।

पूर्ववर्ती कांग्रेस की हरीश रावत सरकार के द्वारा इसका विरोध किया गया। तब राज्य सरकार ने केंद्र के फंडिंग पैटनी में बदलाव के बाद राज्य को हर वर्ष तकरीबन १४ सौ करोड़ के नुकसान का अंदेशा जताया। तब विपक्ष की भूमिका निभाने वाली भाजपा के हर नेता यहां तक कि सांसद] विधायक और प्रदेश संगठन के पदाधिकारी केंद्र सरकार के फंडिंग पैर्टन को ऐतिहासिक औेर राज्य के लिए सबसे बेहतर बताते रहे। इसके साथ ही वे तत्कालीन हरीश सरकार के वित्तीय प्रबंधन पर सवाल खड़े करके राज्य सरकार को ही इसका दोषी बताने में कोई कसर नही छोड़ रहे थे। विधानसभा चुनाव के बाद जैसे ही भाजपा सत्ता में आई तो महज आठ माह में ही सरकार और भाजपा दोनों को केंद्र के फंडिंग पैर्टन से राज्य को हो रहे नुकसान याद आने लगे। पिछले दिनों नीति आयोग के उपाध्यक्ष के साथ देहरादून में सम्पन्न बैठक में राज्य सरकार ने फंडिंग पैटर्न में बदलाव से राज्य के नुकसान की भरपाई की मांग उठाई। बैठक में सरकार ने कहा कि फंडिंग पैटर्न से कुछ दिक्कतें आ रही हैं।

वैसे उत्तराखण्ड राज्य की वित्तीय स्थिति बेहद गंभीर हो चली है। भले ही राज्य सरकार इसको नकार रही है] लेकिन हकीकत में आज राज्य सरकार को अपने कार्मचारियों को वेतन देने के लिए कर्ज पर कर्ज लेना पड़ रहा है। वित्तीय प्रबंधन पर इस बात से भी सवाल खड़े होते हैं कि राज्य सरकार को अपने कर्मचारियों को दीपावली पर बोनस देने के लिए भी लाखों का कर्ज लेना पड़ा।

 उत्तराखण्ड राज्य के बजट का एक बड़ा हिस्सा कर्मचारियों के वेतन] पेंशन और अन्य देयों में ही खर्च हो रहा है। महज २० फीसदी बजट ही राज्य की विकास योजनाओं के लिए है। अगर यह बीस फीसदी भी नियोजित तरीके से खर्च हो जाये तो राहत की बात है] परंतु आज हकीकत यह है कि राज्य की जनता के बुनियादी सुविधाओं की कमी सिर्फ इसीलिए बनी हुई है कि सरकार के बजट में इनके लिए महज २० फीसदी ही खर्च हो रहा है।

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का सरकार पर सीधा आरोप है कि उनकी सरकार ने चार माह तक के लिए कर्मचारियों के वेतन आदि के लिए पूरे इंतजाम किए थे जिसके चलते सरकार को चाह माह तक कोई परेशानी नहीं हुई है। लेकिन अब सरकार वेतन के लिए कर्ज ले रही है तो साफ है कि सरकार का वित्तीय प्रबंधन  फेल हो चुका है। हरीश रावत के यह आरोप कहीं न कहीं सरकार के वित्तीय प्रबंधन पर सवाल तो खड़े करते ही हैं। आज वास्तव में सरकार चारों ओर से द्घिर चुकी है। सातवें वेतनमान को लागू करके राज्य के खजाने पर प्रतिवर्ष करोड़ों का बोझ बढ़ चुका है। कई अन्य विभागों के कर्मचारी सातवें वेतन आयोग को लागू करने के लिए आंदोलन की चेतावनी दे चुके हैं। अब सरकार १५वें वित्त में इसका तोड़ निकालने का प्रयास कर रही है।

१४वें वित्त में जिस तरह बदलाव के चलते राज्य को प्रतिवर्ष १४०० करोड़ का नुकसान हो रहा है इसके लिए अब १५ वें वित्त में नॉन प्लान हिमाचल के जैसे करने का प्रस्ताव है। दरअसल हिमाचल में राज्य कर्मचारियों की संख्या उत्तराखण्ड से अधिक है। इसके चलते केंद्र सरकार ने हिमाचल को नॉन प्लान में खर्च की सीमा और बजट बढ़ा दिया है] जबकि उत्तराखण्ड में कर्मचारियों की संख्या कम है। इसके चलते यहां नॉन प्लान में कटौती की गई है। यही राज्य सरकार का सिरदर्द बना हुआ है। शायद इसी के तहत राज्य में बम्पर सरकारी सेवाओं का मुंह खोलने का प्रयास सरकार कर रही है।

बहरहाल जो भी हो राज्य सरकार अब पूर्ववर्ती हरीश रावत सरकार द्वारा केंद्र सरकार के फंडिंग पैर्टन में बदलाव से राज्य को हो रहे नुकसान की बात मजबूर होकर मान रही है। इसमें फिर से बदलाव चाह रही है। अब देखना दिलचस्प होगा कि हरीश रावत सरकार पर जो अन्य आरोप भाजपा ने लगाये थे उनसे कब सरकार पलटती है।

^आर्थिक स्थिति में तेजी से सुधार^

प्रकाश पंत

वित्तमंत्री] उत्तराखण्ड

जब उत्तराखण्ड राज्य बना तब और आज की परिस्थितियों को देखें तो इन सत्रह वर्षों में हमने जो प्रगति की है उसमें आज भी सामंजस्य स्थापित करने की आवश्यकता महसूस होती है। जब राज्य की स्थापना हुई तो हम पर लगभग साढ़े चार हजार करोड़ का कर्ज था जो आज बढ़कर चौवालीस हजार करोड़ तक पहुंच गया है। इस मध्य एक बार भारतीय जनता पार्टी की सरकार और दो बार कांग्रेस की सरकार रही। इन दोनों के ही समय में क्योंकि जब हम राज्य के विकास की बात करते हैं तो बाह्‌य सहायतित परियोजनाओं से केंद्र सरकार की परियोजनाओं से विश्व बेैंक की परियोजनाओं के स्रोत से पैसा लेना पड़ता है। विशेष राज्य होने के नाते इस राज्य में यह सुविधा थी कि हमको ९०- १० प्रतिशत की सहायता मिलती थी। १० प्रतिशत का हमें लंबी अवधि का ऋण मिलता था और ९२ प्रतिशत अनुदान मिलता था। इसके पश्चात जब हम कांग्रेस और भाजपा सरकार के पिछले दस वर्ष के कार्यकाल को देखते हैं तो २२ हजार करोड़ का कर्ज राज्य पर हुआ। हमारी दिक्कत यह है कि राज्य के जो अपने संसाधन हैं] जो स्रोत हैं वो द्घटते चले गये। ये इस आधार पर है कि जो टैक्स रैवेन्यू है वह टेक्स रेवैन्यू हमारे व्यापारी] ट्रेडर्स के माध्यम से जमा होते है। यह एक निरंतर प्रक्रिया है जो चलती है। ज्यों ज्यों राज्य में व्यवसाय बढ़ेगा राज्य को टैक्स मिलता रहेगा। जो पहले वैट के रूप में मिलता था अब जीएसटी के रूप में मिलेगा। इसका एक ग्रोथ रेट है जो मिनीमम १४ प्रसेंट होना चाहिये। अगर यह ग्रोथ रेट किसी राज्य का नहीं है तो राज्य की आर्थिक स्थिति कमजोर होगी।

दूसरा बड़ा फैक्टर नॉन टैक्स रेवेन्यू है। इसमें हमारी वन सम्पदा से आने वाला रेवेन्यू] खनन] आबकारी और उर्जा के क्षेत्र से मिलने वाला रेवन्यू हैं] ये हमारे नान टैक्स रेवेन्यू हैं। इस संसाधन में हमको २०१२-१३ में १६०० करोड़ का राजस्व मिला] लेकिन २०१६-१७ में जब माननीय मुख्यमंत्री हरीश रावत जी सत्ता छोड़ कर गये तो उस समय यह द्घटकर के १२०० करोड़ रह गया। तकरीबन ४०० करोड़ का नुकसान हुआ। इसी रेवेन्यू को बढ़ाने की आवश्यकता है। अब हमने इस वर्ष २०१७-१८ में यह तय किया है कि जो हमारे ऑल ओवर टैक्स रिसोर्स हैं या अन्य क्षेत्रों जहां से हमें इंकम होती है उसको हम ने १५५७ करोड़ बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। हम अपने आबकारी] वन संपदा] खनन और ऊर्जा इन तीन-चार क्षेत्रों में अपना राजस्व बढ़ाने के लिए काम कर रहे हैं। इसमें प्रगति भी हो रही है। ऊर्जा को लीजिये तो हम सरप्लस ऊर्जा के क्षेत्र में धीरे-धीरे प्रगति कर रहे हैं। आज हम अन्य राज्यों की अपेक्षा ऊर्जा में बेहतरीन तरक्की कर रहे हैं। अब जीएसटी से हमको लाभ मिलेगा। १९ से २० प्रतिशत हमारी ग्रोथ रहेगी। इस वित्तीय वर्ष में अक्टूबर तक की हमारे पास जो फिगर है उसमें पिछले वर्ष जो कि ३०५२ करोड़ रुपया प्राप्त हुआ था वह इस वर्ष अक्टूबर तक ३५५७ करोड़ प्राप्त हुआ जो कि पांच सौ करोड़ ज्यादा है। अब ^एक राष्ट्र एक टैक्स^ की नीति है इससे किसी संस्थान के राज्य से चले जाने से हमको कोई नुकसान नही होने वाला।

फंडिंग पैटर्न के बारे में यह जानना जरूरी है कि पहले जो भी टैक्स के तौर पर केंद्र सरकार को मिलता था उसका २८ प्रतिशत राज्य सरकार को मिलता था और उसके साथ केंद्र की योजनायें भी मिलती थी। जब नीति आयोग आया तो अब केंद्र ने राज्यांे को ४२ प्रसेंट देना शुरू कर दिया है और राज्यों को कहा है कि अपनी योजनाओं का क्रियान्वयन और नियोजन स्वयं कीजिये। अभी हमको केंद्र सरकार के बड़े प्रोजेक्ट मिले हैं जैसे चारधाम सड़क योजना ऑलवेदर रोड] रेलवे लाईन] नमामी गंगा परियोजना] पैरियर वन योजना] अमृत योजना मिली है और स्मार्ट सिटी योजना मिली है। यह सभी हमको केंद्र से ही मिली हैं।

नए फंडिंग पैटर्न से राज्य को नुकसान हुआ हो] ऐसा कह नहीं सकते और न ही हमने कभी कहा है। आप देखिये २८ प्रसेंट से ४२ प्रसेंट हमको मिल रहा है तो नुकसान कैसे हो सकता है। पहले लगभग १५ हजार करोड़ रुपया हमको पांच साल में मिलता था और आज हमको ४२ हजार करोड़ रुपया मिल रहा है तो लाभ ही हुआ है। लेकिन केंद्र सरकार अपने बड़े प्रोजेक्ट पर पूर्ण अनुदान देती है और हम डिमांड कर रहे हैं कि हमको कई क्षेत्रों में काम करना है। पेयजल की योजनायें हैं] हमको सड़क बनाने के लिए पैसा चहिये इस पर केंद्र सरकार हमको पैसा दे। यह थोड़ी समस्या है।

मैं राज्य का वित्त मंत्री हूं और मेरी प्राथमिकता और चुनौती है कि इस राज्य की आर्थिक स्थिति में बेहतर सुधार लाना। हमारे रेवैन्यू के रिसोर्स को ठीक मुकाम तक ले कर आना। राज्य के भीतर जो वित्तीय असंतुलन की स्थिति है उसको सुधार मे ंलाना और गैर योजनामद का खर्च तो बढ़ता जा रहा है उसको नियंत्रण में लाना। हम इन सभी कदमों पर काम कर रहे हैं। इसका असर प्रदेश को दिखाई भी देने लगा है। हां] लेकिन दिक्कत यह है कि जो पिछली सरकार अनाप-शनाप कर्ज और खर्च कर गई यहां तक कि जो गैर जरूरी चीजें थी उसमें भी उन्होंने द्घोषणाएं कर दी उसको भी नियंत्रित करना पड़ रहा है।

krishan.kumar@thesundaypost.in

 

 
         
 
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