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सरगोशियां
 
रायबरेली का सस्पेंस

कांग्रेस में राहुल युग की शुरुआत हो चुकी है। उन्नीस साल तक कांग्रेस की कमान संभालने के बाद अब सोनिया गांधी ने स्वयं के रिटायर हो जाने की बात कह डाली। कांग्रेस के बड़े नेता लेकिन इसे स्वीकारने को तैयार नहीं। उनका दावा है कि सोनिया राजनीति में पूरी तरह सक्रिय रह नए कांग्रेस अध्यक्ष और पार्टी का मार्गदर्शन करती रहेंगी। इस बीच सोनिया गांधी की संसदीय सीट रायबरेली को लेकर भी अटकलों का दौर जारी है। पार्टी सूत्र प्रियंका गांधी के २०१९ में प्रस्तावित लोकसभा चुनावों में रायबरेली से चुनाव लड़ने की बात कर रहे हैं। दूसरी तरफ स्वयं प्रियंका ने स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव उनकी मां ही लड़ेंगी। जानकार लेकिन कह रहे हैं कि सोनिया राज्यसभा जा सकती हैं। यदि ऐसा होता है तो प्रियंका के चुनाव लड़ने की संभावना प्रबल हो जाती है। इन सब अटकलों के बीच राहुल के चचेरे भाई वरुण गांधी को लेकर भी कयासबाजी चरम पर है। वर्तमान में भाजपा सांसद वरुण के बारे में कहा जाता है कि वे भगवाधारी पार्टी में एडजस्ट नहीं हो पा रहे हैं। उनकी यही असहजता उन्हें कांग्रेस के करीब लाने का काम कर रही है। अफवाहों का बाजार गर्म है कि राहुल गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस में वरुण की वापसी हो सकती है। दोनों भाइयों से प्रियंका गांधी के अपने चचेरे भाई वरुण संग संबंध मजबूत हैं। ऐसे में २०१९ से पहले वरुण यदि कांग्रेस में शामिल हो जाएं तो ज्यादा आश्चर्य नहीं। 

शिवसेना और शरद का राहुल प्रेम

२०१९ या उससे पहले होने जा रहे लोकसभा चुनावों में नए राजनीतिक समीकरणों की आहट अभी से सुनी जाने लगी है। विपक्ष की तरफ से पीएम उम्मीदवार कहलाए जा रहे नीतीश कुमार ने यदि पाला बदल सभी को सकते में डालने का काम किया तो कुछ ऐसा ही महाराष्ट्र में भी देखने को मिल रहा है। यहां दशकों से एक&दूसरे का साथ निभाती आ रही भाजपा और शिवसेना के बीच रिश्तों में इतनी कड़वाहट आ चुकी है कि शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे अगले चुनाव अकेले दम पर लड़ने का खुला ऐलान कर चुके हैं। इतना ही नहीं शिवसेना के मुखपत्र ^सामना^ में वे प्रधानमंत्री मोदी और केंद्र सरकार पर कड़े प्रहार करने से नहीं चूक रहे हैं। यह भाजपा के लिए बड़ा संकट का कारण बनता जा रहा है तो दूसरी तरफ शरद पंवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस के बीच की खाई भी पटती नजर आ रही है। शरद पंवार इन दिनों खुलकर राहुल गांधी की प्रशंसा करते द्घूम रहे हैं। हालांकि गुजरात में इन दोनों दलों के बीच समझौत नहीं हो सका लेकिन महाराष्ट्र में गठबंधन होने की संभावना तेज हो रही हैं। शिवसेना प्रमुख भी राहुल गांधी की प्रशंसा करने से गुरेज नहीं कर रहे हैं। जाहिर है शिवसेना का मुखर विरोध और शरद पंवार का राहुल प्रेम राज्य के सीएम देवेंद्र फडनवीस के लिए बड़ा सिरदर्द बन चुका है। 

बदली&बदली सी दिखी राज्यसभा

संसद का शीतकालीन सत्र समाप्त हो चुका है। इस सत्र में राज्यसभा का पूरा नजारा बदला&बदला सा दिखा। सदन में भाजपा के वरिष्ठ सदस्यों में से एक वेंकैया नायडू अब सभापति की कुर्सी पर विराजमान हैं तो भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पहली बार सदन में निर्वाचित हो प्रथम पंक्ति की सीट पा चुके हैं। पहले इस सीट पर नायडू बैठा करते थे। भाजपा के सदस्यों की बढ़ोतरी हुई है तो कांग्रेस का संख्या बल राज्यसभा में द्घटा है। जदयू के शरद यादव इस बार सदन में मौजूद नहीं थे क्योंकि उनको सभापति नायडू ने सदस्यता से अयोग्य द्घोषित कर दिया है। हालांकि अब मामला दिल्ली उच्च न्यायालय पहुंच गया है लेकिन कोर्ट ने शरद यादव को अंतिम निर्णय आने तक सांसद की तनख्वाह एवं बंगला आदि को रखे रहने का निर्णय दे दिया है लेकिन वे सदन की कार्यवाही का हिस्सा नहीं हो सकते हैं। कम्युनिस्ट नेता सीताराम येचुरी दो बार लगातार राज्यसभा सदस्य रहकर अब रिटायर हो चुके हैं। बसपा प्रमुख मायावती भी इस सत्र में नजर नहीं आईं क्योंकि वह सदन की सदस्यता से इस्तीफा दे चुकी हैं। जदयू के आरसीपी सिंह भी अब पार्टी नेता के बतौर फ्रंट लाइन में बैठ रहे हैं। उन्हें शरद यादव से स्थान पर जदयू का नेता बनाया गया है। कुल मिलाकर इस सत्र में विपक्ष कमजोर तो गुजरात और हिमाचल की जीत से उत्साहित भाजपा पूरे दमखम के साथ मैदान में दिखी। हालांकि ट्रिपल तलाक विधेयक को वह राज्यसभा में कांग्रेस विरोध के चलते पारित नहीं करा सकी।

रितू के मंत्री न बनने का राज

यमकेश्वर से पहली बार भाजपा के टिकट पर चुनाव जीत विधानसभा पहुंची रितू पूर्व मुख्यमंत्री जनरल बीसी खण्डूड़ी की पुत्री हैं। सूत्रों की मानें तो भाजपा की राज्य स्तरीय कोर कमेटी में रितू को राज्यमंत्री बनाने पर सहमति बन गई थी। लेकिन उनकी ताजपोशी पर अडंगा उनके ही पिता और कोर कमेटी के सदस्य जनरल खण्डूड़ी ने लगा दिया। खण्डूड़ी का मानना था कि पहली बार विधायक बनी रितू को अभी बतौर विधायक ही जनसेवा करनी चाहिए। उन्होंने किसी वरिष्ठ विधायक को मंत्री बनाने की सलाह दी। इसके बाद ही रेखा आर्य का नाम सामने आया। आर्या दो बार की विधायक होने के साथ&साथ अनुसूचित जाति की भी हैं। फिर क्या था उनके नाम पर सहमति बन गई। जानकारों की मानें तो बाद में जनरल खण्डूड़ी की पत्नी ने कोर कमेटी के सदस्यों को फोन पर रितू की सिफारिश की किंतु तब तक मंत्रिमंडल के सदस्यों के नाम पर आखिरी मुहर लग चुकी थी। इस तरह से अपने पिता के एतराज चलते रितू मंत्री न बन सकीं। हालांकि अब चर्चा है कि अगले फेरबदल में उन्हें मंत्री बनाया जा सकता है। खबर यह भी है कि किडनी कांड का मामला यदि तूल पकड़ता है या फिर बेनामी संपत्ति का मसला उछलता है तो रेखा आर्य की भी विदाई राज्य मंत्रिमंडल से हो सकती है। 

 
         
 
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