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सियासी चकल्लस 
 
किधर जाएंगे कुमार

कुमार विश्वास को राज्यसभा नहीं भेजा जाना था तो नहीं भेजा गया। उनको इस कारण नाराज होना था। तो वह भी नाराज हुए। अब दौर कयासों&कवायदों का है। राज्यसभा मामले में मायूस होने के बाद कुमार क्या कोशिश कर रहे हैं यह तो वही बेहतर ढंग से जानते होंगे। लेकिन सहसा ही कयासों का दौर तेज हो गया है। कहा जा रहा है कि उनकी कांग्रेस में जाने की बात चल रही है। बात कौन कर रहा है इस बाबत कोई खुलास नहीं हो पा रहा है। कुछ अदृश्य शक्तियां इस काम में जी जान से जुटी हुई हैं] ऐसा बताया जा रहा है। सियासी गलियारों में यह भी सरगोशियां हैं कि सपा के अखिलेश यादव भी कुमार को अपनी पार्टी में शामिल करना चाहते हैं। लेकिन कुमार की तरफ से हां या ना का कोई संकेत नहीं मिल पा रहा है। कुमार विश्वास की विशेषताओं को रेखांकित करते हुए कहा जा रहा है कि वह किसी भी पार्टी के बहुत सशक्त प्रवक्ता साबित हो सकते हैं। लेकिन यह बातें वही कर रहे हैं जो कुमार को ठीक से नहीं जानते। जो जानते हैं वह यह भी जानते हैं कि कुमार सिर्फ प्रवक्ता की परिधि में फिट नहीं हो सकते। उनकी महत्वाकांक्षाओं का आकार काफी बड़ा है। फिलहाल वह अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर चिंतित हैं। इस चक्कर में उनकी कविता भी पीछे छूट गई] मालूम होती है। दिल्ली सरकार द्वारा आयोजित राष्ट्रीय कवि सम्मेमलन में भी उनका सानिध्य नहीं रहा।

विधायक ने कराया बवाल

राजनीति कुछ लोगों का माथा खराब कर देती है। कुछ लोग चुनाव जीतकर विधायक या मंत्री बनते ही अपना विवेक खो देते हैं। इस बात को उत्तराखण्ड के एक विधायक सुरेश राठौर के माध्यम से समझा जा सकता है। भाजपा विधायक सुरेश राठौर ने अपनी बेटी की शादी के कार्ड पर राज्य सरकार का ही लोगो लगा दिया। जब सोशल मीडिया पर उत्तराखण्ड सरकार का यह लोगो आया तो खूब बवाल मचा हुआ है। कमाल की बात तो यह है कि इस विवाद के बाबत जब विधायक राठौर का पक्ष लिया गया तो उन्होंने बड़ी मासूमियत से कहा& 'मैं सरकार का हिस्सा हूं] इसलिए कार्ड पर राज्य सरकार का लोगो लगा दिया। यह कोई जुर्म नहीं है।' सुरेश राठौर हरिद्वार की ज्वालापुर विधानसभा सीटघ्से विधायक हैं। उन्होंने एक गोद ली हुई बेटी की शादी कार्ड में राज्य सरकार का लोगो लगाया था। विपक्षी दल इसको सियासी रंग देते हुए यह कह रहे हैं कि यह जानबूझ कर किया गया है। शादी कार्ड में लोगों के जरिए भाजपा अपनी सरकार का प्रचार कर रही है।

जिग्नेश की जगह

गुजरात चुनाव खत्म हो गया है। नतीजे आ चुके हैं। भाजपा की वहां सरकार भी बन गई है। सांप के निकल जाने पर हमारे यहां लाठी पीटने का पुराना दस्तूर है। अब हार&जीत के कारणों का विश्लेषण करने के साथ&साथ भविष्य की राजनीति का भी आकलन किया जा रहा है। इस बार गुजरात विधानसभा चुनाव में जिग्नेश चर्चा के केंद्र में रहे। जिग्नेश मेवाणी दलित नेता के रूप में उभरे हैं। वह प्रभावी और आक्रमक दलित नेतृत्व के प्रतीक के रूप में उभरते दिखे हैं। राजनीतिक के जानकार इस बात का संकेत दे रहे हैं कि बहुत संभव है कि जिग्नेश की आक्रमक दलित राजनीति भाजपा के हिंदुत्व के लिए खतरा बन सकती है। जिग्नेश को दलित और मार्क्सवादी चेतना के मिलने के रूप में देखा जा रहा है। जिग्नेश की आक्रमकता] मराठी दलित आंदोलन की आक्रमकता खासकर दलित पैंथर आंदोलन की आक्रमकता से मेल खाती है। यही  आक्रमकता उत्तर प्रदेश की मायावती में भी दिखती थी। उनकी राजनीति अब पतन की ओर है। अब देखने वाली बात यह है कि जिग्नेश कितना कुछ कर पाते हैं। यह भी कि आने वाले दिनों में वह गुजरात में भाजपा की राजनीति को कितना प्रभावित करते हैं। क्या वह गुजरात से बाहर भी अपना विस्तार करेंगे] यह एक यक्ष प्रश्न है। 

 
         
 
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  • गुंजन कुमार

इस वक्त पूरी दुनिया नए साल के जश्न में डूबी हुई हैं। दुनिया का आधा से  ज्यादा हिस्सा कड़ाके की ठंड की चपेट में है। यहां तक कि विश्व का सबसे ऊंचा न्याग्रा फॉल भी

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