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vad 31 20-01-2018
 
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मेरी बात अपूर्व जोशी
 
विश्वास नहीं] जन विश्वास संग धोखा

  • अपूर्व जोशी

गुप्ता बंधुओं का जनआंदोलनों से जन्मी पार्टी के टिकट पर राज्यसभा जाना जन विश्वास के संग केजरीवाल का विश्वासद्घात है। इसलिए मुझे अल्बेयर कामू याद आए। जैसा आन्द्रे मालरो ने अपने पत्र में कामू को लिखा। केजरीवाल और विश्वास न तो आपसी संबंध स्थापित कर पाए] न ही जनता के विश्वास पर खरे उतरे। इनकी निजी महत्वाकांक्षाओं ने एक आंदोलन को ही नहीं कुचला बल्कि आम जनमानस के सपनों को ध्वस्त करने का काम किया है। अब लंबे समय तक किसी नए आंदोलन का जन्म नहीं होगा। जनता हरेक के इरादों पर शक करेगी। अब कोई पत्थर तबियत से उछालने की सोचेगा भी नहीं। यदि सोचेगा तो भी सुराख नहीं कर पाएगा क्योंकि वह अकेला होगा] उसका साथ देने वाले आप से मिले धोखे और vk?kkr को याद कर पीछे हट जाएंगे

 

  • &आदमी होना बड़ा कठिन काम है लेकिन इससे भी कठिन है एक&दूसरे से संवाद स्थापित करना। विभाजन और वैमनस्य बढ़ाना तो बड़ा आसान है] इसमें कहां समय लगता है& ^फ्रेंच साहित्यकार आन्द्र मालरो के अपने समकालीन साहित्यकार अल्बेयर कामू को लिखे पत्र से^
  • बचपन से मुझे जो प्यार की गर्माहट मिली] उसके कारण कम से कम ईर्ष्या जैसी ओछी भावना का शिकार तो मैं नहीं हुआ। ईर्ष्या से उन्मुक्त स्वभाव के लिए मैं नहीं मेरा परिवार जिम्मेदार है&¼फ्रेंच साहित्यकार अल्बेयर कामू की डायरी से½
  • हर नई क्रांति सत्ता के नाम पर दमन का नए से नया मुखौटा लगाकर खड़ी हो जाती है] जो आम आदमी के खिलाफ ही जाता है ¼कामू की पुस्तक ^द रिबेल^ से½

अल्बेयर कामू एक बड़े रचनाकार होने के साथ&साथ बड़े दार्शनिक भी थे। १९५७ में उन्हें उनके साहित्यक योगदान के लिए नोबल पुरस्कार दिया गया था। कामू से जुड़े तीन महत्वपूर्ण कथन मुझे अनायास ही याद नहीं हो आए बल्कि देश के राजनीतिक फलक पर बजरिए जनआंदोलन अद्भुत सफलता पाने वाली आम आदमी पार्टी की वर्तमान दशा और दिशा ने मुझे इनका स्मरण कराया। तो चलिए कामू के कथनों और आन्द्रे मालरो के उनके संग हुए पत्र व्यवहार के जरिए आप में मचे द्घमासान को] करोड़ों आप समर्थकों में छाई मायूसी को और जन आंदोलनों की प्रासंगिकता को समझने का प्रयास करते हैं।

अन्ना हजारे के नेतृत्व में शुरू हुए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के चलते तीन चेहरे बहुत प्रमुखता से राष्ट्रीय] अंतरराष्ट्रीय] सामाजिक] राजनीतिक] परिदृश्य में उभरे आरटीआई एक्टिविस्ट अरविंद केजरीवाल] पत्रकार मनीष सिसोदिया और हिंदी कवि डॉ ़ कुमार विश्वास। इन तीनों के बीच मित्रता का रिश्ता था। मनीष सिसोदिया और कुमार विश्वास बचपन के मित्र हैं। सिसोदिया २००५ में आरटीआई मुहिम के दौरान केजरीवाल के संपर्क में आए। २००६ में जब सूचना के अधिकार का मसौदा तैयार हो रहा था तब सिसोदिया] केजरीवाल के चलते उस प्रक्रिया का हिस्सा रहे। इंडिया अगेंस्ट क्रप्शन का हजारे के नेतृत्व्व में आंदोलन शुरू हुआ तो हताशा के गहरे सागर में हिचकोले ले रहा हमारा समाज जागृत हुआ। उसे टीम हजारे के चलते यह उम्मीद बंधी की अब कुछ ऐसा जरूर होगा जो भय&भूख और भ्रष्टाचार के दावानल से इस राष्ट्र को मुक्ति दिलाने का काम करेगा। अन्ना के नाम और इस तिकड़ी के काम ने हर उसको कहीं न कहीं गहरा प्रभावित किया जो रसातल में जा चुके हमारे लोकतंत्र के पुनर्जीवन की आस संजोए था। ऐसों को दुष्यंत याद हो आए कि ^कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता]  एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो।^ आसमान में सुराख उछालने का उन्माद ही तो था जिसने जंतर&मंतर की इस लड़ाई को पूरे देश में फैला दिया। पांच अप्रैल २०११ के दिन किशन बाबू राव हजारे ने जंतर&मंतर से जनलोकपाल कानून की मांग को लेकर अपना आंदोलन शुरू किया। इस आंदोलन ने देश में सक्रिय अलग&अलग विचारधाराओं वाली आंदोलनकारी ताकतों को नई हिम्मत दी। किरण बेदी] प्रशांत भूषण] योगेंद्र यादव] जैसे नामचीन नामों के साथ लाखों आम हिंदुस्तानी इस आंदोलन से जुड़ आए। तत्कालीन यूपीए सरकार ने अंततः १६ अगस्त २०११ के दिन लोकसभा में एक लोकपाल विधेयक पेश किया। 

आंदोलनकारी इस विधेयक के मसौदे से सहमत नहीं थे। अन्ना ने १६ अगस्त की सुबह से अनशन पर बैठने का ऐलान कर दिया जिससे द्घबरा दिल्ली पुलिस ने उन्हें तड़के सात बजे ही गिरफ्तार कर लिया था। सरकार और टीम अन्ना के बीच इसके बाद लगातार गतिरोध जारी रहा। इसी बीच टीम अन्ना की तिकड़ी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा जग उठी। उन्होंने अन्ना हजारे की सलाह के खिलाफ जा एक राजनीतिक संगठन बनाने का निर्णय ले लिया। २६ नवंबर २०१२ को आम आदमी पार्टी अस्तित्व में आई तो केजरीवाल] विश्वास] सिसोदिया] प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव इसके संस्थापक सदस्य बने। दूसरी तरफ अन्ना आंदोलन से जुड़े किरण बेदी] जस्टिस संतोष हेगड़े आदि ने राजनीतिक दल बनाने पर अपनी असहमति दर्ज कराई। इस तरह से भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुआ एक शक्तिशाली आंदोलन दम तोड़ गया। आज लोकपाल की कहीं कोई चर्चा नहीं है। न तो केंद्र और न ही राज्य सरकारों की कोई मंशा लोकपाल&लोकायुक्त को लेकर है। आम आदमी पार्टी को जरूर जनमानस ने हाथों हाथ लिया। दिल्ली विधानसभा के लिए चार दिसंबर २०१३ को हुए चुनाव में पार्टी नंबर वन बनकर उभरी। उसके २९ उम्मीदवार विधायक बन गए। यहीं से हमारे ^क्रांतिवीरों^ की क्रांतिकारिता पर जंक लगना शुरू हो गया। चुनावों में पहले उम्मीदवारों के चयन पर लेन&देन के आरोप लगे। चुनाव बाद जिस कांग्रेस के खिलाफ भ्रष्टाचार का बिगुल फूंक पार्टी चुनावों में उतरी] उसी का समर्थन ले अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गए। इस अप्रत्याशित जीत ने हमारे इन क्रांतिवारीरों की महत्वाकांक्षा को धधकाने का काम कर दिया। मुझ जैसे सैकड़ों शुभचिंतकों की सलाह को ठोकर मार केजरीवाल ने २०१४ के लोकसभा चुनाव में ४३२ सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार डाले। पंजाब की चार सीटों को छोड़ सभी जगह] यहां तक कि दिल्ली में भी पार्टी प्रत्याशी बुरी तरह पराजित हो गए। यहीं से आप में बिखराव की शुरूआत होने लगी। पार्टी का चर्चित चेहरा रही शाजिया इल्मी ने पार्टी नेतृत्व यानी केजरीवाल पर गंभीर आरोप लगाते पार्टी छोड़ दी। इसी बीच केंद्र संग भीषण टकराव के चलते केजरीवाल सरकार ने त्याग पत्र दे दिया। २०१५ में दोबारा हुए चुनाव में एक बार फिर आप पर जनता ने आस्था जताई। नतीजे इतने अप्रत्याशित थे कि सभी अचंभित रह गए। ७० में से ६७ विधायक आप के जीत गए। इस जीत ने आप नेतृत्व को तानाशाह प्रवृत्ति की तरफ धकेल दिया। पार्टी के संस्थापक सदस्य योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को बुरी तरह अपमानित कर बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। इन दोनों का केजरीवाल संग टकराव उनकी कार्यशैली को लेकर था। इन दोनों को बाहर निकाल अरविंद केजरीवाल ने पार्टी पर भले ही पूरी तरह अपना कब्जा कर लिया] उनकी छवि इससे खासी प्रभावित हुई। आप से जुड़े बुद्धिजीवियों] सामाजिक कार्यकर्ताओं और मध्यम वर्ग के बीच निराशा गहराने लगी। राज्यसभा प्रत्याशियों के चयन बाद आप के प्रति उपजी निराशा पूरी तरह हताशा में बदल गई है। योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को निकाले जाने के बाद केजरीवाल के निशाने पर कभी उनके अभिन्न मित्र रहे कुमार विश्वास आ गए। विश्वास संग उनके मतभेत तेजी से मनभेद में बदलते चले गए। विश्वास आंदोलन के दौरान अपने हिस्से के संद्घर्ष की कीमत राज्यसभा सदस्यता से माप रहे थे। दूसरी तरफ केजरीवाल किसी भी कीमत पर विश्वास पर विश्वास करने को तैयार नहीं थे। आम आदमी पार्टी से निकटता से जुड़े हर शख्स को यह बात पता थी लेकिन किसी को यह इल्हाम नहीं था कि केजरीवाल विश्वास को ठिकाने लगाने के साथ&साथ पार्टी के प्रति लोगों के विश्वास को भी ठिकाने का काम करेंगे। पार्टी सूत्र तो यहां तक कहते हैं कि संजय सिंह को भी राज्यसभा भेजने के केजरीवाल कतई इच्छुक नहीं थे। उन्हें ऐसा इसलिए करना पड़ा क्योंकि जमीनी नेता होने के चलते संजय की दिल्ली के विधायकों पर मजबूत पकड़ है। चूंकि केजरीवाल दो ऐसे नामों को राज्यसभा लाने की तैयारी कर चुके थे जिनका पार्टी अथवा उसके कथित सिद्धांतों से दूर&दूर तक का नाता नहीं था इसलिए पार्टी विधायकों को थामे रखने के लिए संजय सिंह का चयन अंतिम समय पर करना पड़ा। इसमें कोई संदेह नहीं कि संजय सिंह एक बेहद समर्पित जनआंदोलनकारी होने के साथ&साथ सुलझे विचारों वाले ऐसे नेता हैं जिनकी बदौलत पार्टी को पंजाब में भारी जनसमर्थन मिला। यदि केजरीवाल अति महत्वाकांक्षा के चलते स्वयं को पंजाब का संभावित सीएम ?kksf"kr करने का आईडिया बजरिए मनीष सिसोदिया] सामने न लाते तो शायद आप का ज्यादा बेहतर प्रदर्शन रहता। केजरीवाल ने गुप्ता द्वय को राज्यसभा में भेज मेरी समझ से एक ऐतिहासिक भूल की है। जनता के विश्वास संग यह ऐसा धोखा है जिसके लिए इतिहास उन्हें कभी क्षमा नहीं करेगा। कुमार विश्वास को भले ही उनकी तमाम योग्यता होने के बावजूद राज्यसभा न भेजते यह आप समर्थकों के लिए स्वीकारना आसान होता यदि पार्टी के ही अन्य सदस्यों में से किसी का चयन किया गया होता] लेकिन गुप्ता बंधुओं का जनआंदोलनों से जन्मी पार्टी के टिकट पर राज्यसभा जाना जन विश्वास के संग केजरीवाल का विश्वासद्घात है। इसलिए मुझे अल्बेयर कामू याद आए। जैसा आन्द्रे मालरो ने अपने पत्र में कामू को लिखा] केजरीवाल और विश्वास न तो आपसी संबंध स्थापित कर पाए] न ही जनता के विश्वास पर खरे उतरे। इनकी निजी महत्वाकांक्षाओं ने एक आंदोलन को ही नहीं कुचला] बल्कि आम जनमानस के सपनों को ध्वस्त करने का काम किया है। अब लंबे समय तक किसी नए आंदोलन का जन्म नहीं होगा। जनता हरेक के इरादों पर श्ाक करेगी। अब कोई पत्थर तबियत से उछालने की सोचेगा भी नहीं। यदि सोचेगा तो भी सुराख नहीं कर पाएगा क्योंकि वह अकेला होगा] उसका साथ देने वाले आप से मिले धोखे और vk?kkr को याद कर पीछे हट जाएंगे।

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