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vad 45 30-04-2017
 
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प्रदेश 
 
नींव की ईंटें हिले नहीं

 

 

बात सिर्फ यह नहीं है कि कोई भी सामाजिक संगठन अपने तौर-तरीकों से ही कार्यक्रम आयोजित करेगा। बल्कि सवाल यह भी है कि क्या आज से पहले जमीनों के धंधों में लिप्त लोगों के सहयोग के बिना सामाजिक सांस्कृतिक कार्यक्रम या जन आंदोलन नहीं चले हैं?

 

उत्तराखण्ड के पुराने लोग व्यावहारिक रूप से जितने सुलझे हुए थे उनकी सोच उतनी ही दूरगामी भी थी। कृषि पशुपालन और कुटीर उद्योगों पर आधारित श्रमदान और कड़ी मेहनत से अपनी आजीविका पर जीवन निर्भर करते और तमाम विषम परिस्थितियों से जूझते हुए भी उन्होंने जहां शराब जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ व्यापक आंदोलन चलाए वहीं अपनी भावी पीढ़ी के उज्ज्वल भविष्य के लिए जगह-जगह स्कूलों की स्थापना और सड़कों का निर्माण भी किया। ऐसा संपूर्ण पहाड़ में हुआ। इन स्कूलों से पढ़े-लिखे बच्चों को जब उच्च शिक्षा की आवश्यकता पड़ी तो सन् १९७१ में जनता ने व्यापक रूप से ऐतिहासिक विश्वविद्यालय आंदोलन चलाया और अंततः गढ़वाल और कुमाऊं दो विश्वविद्यालय अस्तित्व में आए। इसी दौर में जंगलों पर स्थानीय लोगों के हक-हकूक और पर्यावरण सुरक्षा को लेकर भी व्यापक आंदोलन चले। 

 

सच कहें तो जन संघर्ष उत्तराखण्ड की संस्कृति का हिस्सा रहे। उत्तराखण्ड में जनांदोलनों का समृद्ध इतिहास रहा है। इन आंदोलनों में जनता ने व्यापक एकजुटता दिखाई। पहाड़ से लेकर प्रवास तक हर जगह लोगों ने अपनी एकता का प्रदर्शन कर दिखा दिया कि उसकी एकता को कोई खंडित नहीं कर सकता। और जो समाज एकजुट रहता है वह कभी टूट नहीं सकता। प्रवास में भी उत्तराखण्ड के लोग सदैव एकजुट रहे। देश की आजादी से काफी पहले पहाड़ छोड़कर मैदानों में गए लोगों ने पट्टी और जिला स्तर की संस्थाएं बनाकर अपने-अपने क्षेत्रों के विकास और छोटी-छोटी समस्याओं के निराकरण के लिए चिंतन-मनन और प्रयास किये। वृहद लड़ाई के लिए ये संस्थाएं समाज हित में हमेशा एकजुट हुईं। मुझे याद है कि राज्य आंदोलन के दौरान सन्‌ १९९४ में दिल्ली के गढ़वाल भवन में १०३ संस्थाओं की अहम बैठक हुई थी। राज्य आंदोलन में सभी संस्थाओं ने एकजुट होकर भागीदारी निभाई।

 

पहाड़ हो या प्रवास विकास और संघर्ष की जो भी गतिविधियां चलीं उन्हें जनता ने खुद अपनी क्षमता के मुताबिक एक रुपए एक सौ रुपए या जिससे जितना हो सकता था एकत्रित कर संचालित किया। लेकिन यह बात समझ से परे है कि आखिर अब वह कौन सी आफत आ पड़ी है कि प्रवास में काम कर रही कुछ संस्थाओं की गतिविधियों या कार्यक्रमों के आयोजन में जमीनों के धंधे में लिप्त लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भागीदारी निभाने लगे हैं। क्या यह मान लिया जाना चाहिए कि अब पहाड़ के सामाजिक संगठनों के कार्यक्रम इन्हीं पर अश्रित होकर रह गए हैं या इनके बिना कार्यक्रम नहीं हो सकते हैं? या फिर कार्यक्रमों में ऐसे लोगों को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए? इस बीच एक बात यह भी उभरकर आई है कि कोई भी संगठन अपने तौर-तरीके से ही कार्यक्रम आयोजित करायेगा। अगर पूरा समाज इसका समर्थन करता है तो तब आंख मूंदकर यह बात मान ली जानी चाहिए। लेकिन जब हम अपनी जड़ों से जुड़े रहने का दंभ भरते हैं तो अपने पुराने लोगों के उस संघर्ष और त्याग पर भी गौर  करना होगा जिसके तहत उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत और एक-एक पैसा जोड़कर खुद अपने सामाजिक राजनीतिक आंदोलनों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का संचालन किया। नंदा देवी राजजात जैसी दुनिया की अनोखी सांस्कृतिक यात्राएं जनता सातवीं-आठवीं सदी से अपने प्रयासों से संचालित करती आ रही है। जब राजनीतिक पार्टियां भी समाज के हिसाब से चलने की बात करती हैं तो फिर सामाजिक संगठन तो बने ही समाज के लिए होते हैं।

 

कोई बुरा माने या भला लेकिन सामाजिक राजनीतिक और सांस्कृतिक चेतना का जो स्वरूप हमारे पुराने लोगों ने स्थापित किया है उसके बने रहने में ही उत्तराखण्ड का भविष्य उज्ज्वल है। उसी से उत्तराखण्ड का समाज बना रहेगा। वह टूटेगा नहीं। वर्षों पहले पूर्वजों ने जिस समाज की रचना की अगर जरा सी भूल के चलते उससे खतरे की आशंका पैदा होती है तो यह सबके लिए कष्टकारी होगा। यहां मैं हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि स्वर्गीय रद्घुवीर सहाय को स्मरण करना चाहता हूं। एक जगह पर उन्होंने कहा था कि जब कोई समाज टूट रहा होगा तो कुछ लोग ऐसे भी होंगे जो उस टूटते समाज को बचाने नहीं बल्कि उसमें अपना हिस्सा लेने पहुंचेंगे। इसलिए यह ध्यान रखना बहुत जरूरी है कि अतीत की जिन नींव की ईंटों पर हमारा समाज टिका हुआ है वे ईंटें हिलनी नहीं चाहिए।

 

 

 

अवैध टैम्पू का फैलता जाल

 

हल्द्वानी में अवैध रूप से चल रहे सैकड़ों टैम्पू वाहनों के कारण स्थानीय लोगों पर्यटकों और वैध परमिटधारी टैम्पू चालकों को काफी परेशानियां उठानी पड़ रही हैं। इसके अलावा वाहन दुर्घटनाएं भी बढ़ रही हैं लेकिन टै्रफिक पुलिस और परिवहन विभाग ये सब देखते हुए भी आंख मूंदकर बैठे हुए हैं

 

कुमाऊं की आर्थिक राजधानी हल्द्वानी में अवैध ऑटो (टैम्पू का जाल फैलता जा रहा है। लेकिन परिवहन विभाग इसे रोक नहीं पा रहा है। वर्तमान में नैनीताल रोड पर एक हजार से अधिक टैम्पू चल रहे हैं। जबकि इस मार्ग पर केवल २८८ टैम्पुओं को ही परमिट मिला है। शेष टैम्पू टै्रफिक पुलिस आरटीओ को चढ़ावा चढ़ाकर चलाये जा रहे हैं। 

 

सीमा से अधिक टैम्पू चलने के कारण नैनीताल रोड पर आए दिन जाम लगा रहता है। इसके कारण स्थानीय निवासियों के अलावा कुमाऊं के पर्वतीय क्षेत्रों में आने-जाने वाले पर्यटकों को परेशानी उठानी पड़ती है। इसके साथ ही रूट के लिए परमिट धारक टैम्पू चालकों को भी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। इन लोगों ने इसकी शिकायत पविहन विभाग पुलिस प्रशासन से लेकर क्षेत्र की विधायक एवं कैबिनेट मंत्री इंदिरा हृदयेश तक से की। लेकिन अभी तक इस पर कोई कार्यवाही नहीं हो पाई क्योंकि इन अवैध टैम्पुओं के संचालन के पीछे एक कांग्रेसी नेता का हाथ बताया जाता है।

 

गौरतलब है कि नब्बे के दशक में हल्द्वानी नगर पालिका क्षेत्र में १६ किलोमीटर की परिधि में टैम्पू चलाने का परमिट दिया जाता था। कुछ वर्ष बाद इसमें संशोधन कर अलग-अलग रूटों पर चलाने के लिए परमिट दिये जाने लगे जिसमें रामपुर रोड लालकुआं रोड कालाढूंगी रोड कुसुम खेड़ा आदि रूट चिन्हित किये गये। इन रूटों पर टैम्पू चलाने के परमिट दिये गये। नियमतः टैम्पू को जिस रूट के लिए परमिट दिया जाता है वह उसी रूट पर चल सकता है। दूसरे रूट पर चलने पर टैम्पू चालक और मालिक पर आर्थिक दंड का प्रावधान है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से अधिकतर टैम्पू बिना परमिट के ही व्यस्त रूट पर चलने लगे। इसे शुरू में रोका नहीं गया। नतीजतन वर्तमान में व्यस्त रूट पर टैम्पुओं की भरमार हैं।

 

हल्द्वानी नगर निगम में सबसे व्यस्त मार्ग नैनीताल रोड है। इस मार्ग पर कई बाजार स्कूल कॉलेज एवं दफ्तर हैं। इनके अलावा कुमाऊं के विभिन्न पर्यटक स्थलों पर जाने वाले पर्यटक भी इस मार्ग से जाते हैं। इस कारण इस रूट पर हमेशा सबसे अधिक यात्रियों की भीड़ रहती है। नैनीताल रोड पर वहीं टैम्पू चल सकता है जिसे १६ किलोमीटर दूर वाला परमिट मिला है। नगर पालिका निगम क्षेत्र के १६ किलोमीटर की परिधि में कुल २८८ टैंपुओं को परमिट मिला हैलेकिन वर्तमान समय में इस रूट पर एक हजार से अधिक टैम्पू चल रहे हैं। फिर भी परिवहन विभाग की नजर आज तक इस पर नहीं गई है। या यह कहें कि विभाग जानबूझकर अनजान बना हुआ है। एक रूट पर पांच गुना अधिक टैम्पू होने के कारण इस मार्ग पर टैम्पुओं के बीच सवारी बैठाने को लेकर होड़ रहती है। जिस कारण कई चालक ओवर स्पीड में टैंपू चलाते हैं। नतीजतन हल्द्वानी में सबसे अधिक सड़क दुर्घटनाएं इसी मार्ग पर होती हैं।

 

अवैध टैम्पुओं का खामियाजा नैनीताल रोड के लिए परमिट प्राप्त २८८ टैम्पुओं चालकों को भी भुगतना पड़ता है। एक तो उनकी आमदनी कम हुई है दूसरी तरफ अवैध परमिट वाले टैम्पू चालक और मालिक नैनीताल रोड पर चलने के लिए पुलिस एवं आरटीओ को चढ़ावा चढ़ाते हैं। जिस कारण इन टैम्पू वालों पर इनका डंडा नहीं चलता। जब कभी भी आरटीओ एवं पुलिस प्रशासन कार्यवाही करता है तो डंडा वैध परमिट वालों पर ही चलता है क्योंकि ये लोग इन्हें चढ़ावा नहीं चढ़ाते। कई बार वैध परमिट वालों ने इसकी शिकायत पुलिस एवं विभाग को की है। लेकिन अभी तक इस पर कार्रवाई नहीं हुई है। यह टैम्पू मार्ग को लेकर भष्टाचार के खेल को उजागर करता है। कुछ माह पूर्व कुछ वैध परमिट वाले टैम्पू चालक तत्कालीन पुलिस आधीक्षक भंडारी को लिखित शिकायत की थी। उनसे इन लोगों को सिर्फ आश्वासन ही मिला। आश्वासन कभी कार्रवाई में नहीं बदल पाया। १६ किलोमीटर परिधि में टैम्पू चलाने के लिए परमिट प्राप्त टैम्पू चालक शिवाजी जोशी कहते हैं इस गौरखधंधे को बंद करने के लिए कई अधिकारियों से शिकायत की लेकिन कभी किसी ने कोई कार्रवाई नहीं की। यहां तक कि कैबिनेट मंत्री इंदिरा हृदयेश से भी लिखित शिकायत की लेकिन उन्होंने भी हमारी समस्या को अनसुना कर दिया।'

 

दरअसल अवैध परमिट वाले टैम्पू पर कार्रवाई इसलिए नहीं होती क्योंकि इनमें कई बड़े लोगों के टैम्पू शामिल हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनके सौ से ज्यादा टैम्पू चलते हैं। इनका क्षेत्र के नेताओं और प्रशासन पर दबाव रहता है। जिस कारण इन पर कार्रवाई नहीं होती। हालांकि हल्द्वानी में तिपहिया ऑटो टैक्सी मालिक-चालक वेलफेयर ग्रीन सिटी हल्द्वानी नामक संगठन भी है। लेकिन इनका यह संगठन भी अवैध टैम्पू के साथ खड़ा है। कई डंपर परमिट वाले टैम्पू चालकों ने आरोप लगाया कि संगठन को भी हफ्ता भेजा जाता है। ऑटो यूनियन के अध्यक्ष केदार पलड़िया कांग्रेस के नेता हैं। जिस कारण अवैध टैम्पू चालकों पर कार्रवाई नहीं होती है। एक अन्य ऑटो चालक महेश चन्द्र परगाई कहते हैं कि हमने संगठन को भी लिखित शिकायत की थी। उन्होंने कुछ नहीं किया। जब अधिकारियों से शिकायत की तो संगठन के लोगों ने फोन पर धमकी तक दी। इसी से साबित होता है कि इसमें संगठन के लोग भी शामिल हैं। ज्ञात हो कि यहां पांच साल के लिए परमिट दिया जाता है। प्रत्येक पांच साल बाद परमिट रिन्यू होता है। दस साल पुराने ऑटो को चलाने की अनुमति नहीं है।

 

 

अध्यक्ष का नहीं होता चुनाव

तिपहिया ऑटो टैक्सी मालिक चालक वेलफेयर ग्रीनसिटी हल्द्वानी १९८३-८४ में रजिस्टर्ड हुआ है। जैसा कि नाम से स्पष्ट होता है कि यह संगठन ऑटो मालिक और चालक के वेलफेयर की रक्षा के लिए कार्य करेगा लेकिन यह अवैध टेैम्पू मालिकों का रक्षक बना हुआ है। केदार पलड़िया १९८३-८४ से ही संगठन के अध्यक्ष हैं। इसके अलावा उपाध्यक्ष महासचिव प्रत्येक साल नए बनते हैं। लेकिन अध्यक्ष नहीं बदला गया है। केदार पलड़िया कांग्रेस के नेता बताए जाते हैं। ये अपने छात्र जीवन में एसबी डिग्री कॉलेज हल्द्वानी के छात्र संघ अध्यक्ष रह चुके हैं। परमिट वाले टैक्सी चालकों का आरोप है कि इन्हीं की छत्र छाया में अवैध परमिट वाले ऑटो नैनीताल रोड पर चलते हैं। कांग्रेस नेता होने के कारण प्रशासन कोई कार्रवाई नहीं करता।

 

 

 

 
         
 
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