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vad 26 16-12-2017
 
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चिंतन
 
म्यर&इस्कूल

आज कहां हैं ऐसे चिंताराम मास्टर साहब या भीम सिंह हेडमास्टर साहब। शिक्षा देना उनका आँार्म ही नहीं जीवन था। उस समय छोटी सी तनख्वा थी। बिजली] पानी] टेलीफोन] सड़क कोई सुविआँाा नहीं थी] एक भावना थी] एक लक्ष्य व लगन थी। इसलिए प्राईमरी व जूनियर हाईस्कूल और हाईस्कूल के शिक्षक भी याद आते हैं। जीवन के हर पड़ाव में हर ऊंचाई को छूने पर मुझे ये दोनों चेहरे याद आते हैं। इनका स्मरण एक नया बाल सुलभ उत्साह भर देता है। मुझमें कुछ और आगे बढ़ने का। कितनी बड़ी बिडंबना है। मुझे बीए] एलएलबी में पढ़ाने वाले शिक्षकों के चेहरे व नाम याद करने में परिश्रम करना पड़ता है। परंतु अपने प्राईमरी व जूनियर हाईस्कूल के अआँयापकों के नाम] चेहरे] व्यवहार सब कुछ मुझे आज भी याद हैं और हमेशा याद रहेंगे-मरते दम तक। शिक्षक-शिष्य का एक भावनात्मक रिश्ता-जिसमें कुछ भी मशीनी या कृत्रिम नहीं था। सब स्वभाविक व हार्दिक था

 

आज प्राईमरी से माध्यमिक शिक्षा तक देश स्पष्टतः भारत व इंडिया में बटा हुआ है। इंडिया की शिक्षा बच्चों से उसका बचपन छीन रही है। दो-ढ़ाई वर्ष के बच्चे पर पढ़ाई का बोझ लाद रहे हैं और इस हेतु बेशुमार पैसा खर्च कर रहे हैं। इण्डियावासियों में इन खर्चीले स्कूलों में पढ़ाने की होड़ लगी है। दूसरी ओर भारत है] जहां स्कूल तो हैं] मगर पढ़ाई में आत्मियता का अभाव है। यहां की शिक्षा जम्हाई लेती सी] थकी सी लगती है। पढ़ाई में जिंदगी का अभाव है। हमारी पीढ़ी] अनपढ़ मां-बापों की पीढ़ी थी] मगर पढ़ाई के साथ मां-बाप] शिक्षक] गांव सबका जुड़ाव था। आज मां-बाप उच्च शिक्षित हैं] मगर शिक्षा व शिक्षक के साथ अपनत्व का अभाव है। मैंने कक्षा-१ से ५ तक सिरमोली प्राईमरी स्कूल में पढ़ा व अच्छे नंबरों से पास हुआ। उस समय कक्षा-५ का भी इम्तिहान बोर्ड की तर्ज पर होता था। हमारा इम्तिहान प्राईमरी स्कूल जीनापानी में हुआ था। सिरमोली मेरे गांव मोहनरी से लगभग २ किमी पर है। उस समय पैदल जाना पड़ता था और एक गधेरा व दो रौले पार करने पड़ते थे। अब सिरमोली सड़कों से जुड़ गया है। अब वहां हाईस्कूल है और अड़ोस-पड़ोस की लड़कियों को पढ़ाई की सुविधा हो गई है।

मेरे मानस में अपनी मां] नानी व गांव के बाद किसी का चित्र बार-बार उभरता है] तो वह है सिरमोली का स्कूल व स्व श्री चिंताराम] प्रधानाध्यापक जी का। खद्दर की सफेद टोपी पहनने वाले बहुत ही अपनत्व भरे] मगर सख्त हेडमास्टर थे] स्व श्री चिंताराम। अपने गांव से प्रतिदिन ५ किमी पैदल आते-जाते थे। कभी एक मिनट देर नहीं करते थे। दो अध्यापक और होते थे] मगर चिंताराम जी उनसे पहले पहुंचकर मेज व ब्लैकबोर्ड साफ करते थे। कक्षा-४ व ५ के मांनीटरों व उपमांनीटरों की ड्यूटी होती थी] स्कूल को झाड़ने साफ करने की] मैंने यह काम दो वर्ष किया। चटाई बिछाने के काम दो और बड़े लड़कों का था। मजाल काम में जरा सी चूक हो जाए। हम प्रार्थना में सरस्वती वंदना व रद्घुपति राद्घव-राजा राम गाते थे] फिर कक्षा-४ व ५ के लड़कों को आधा द्घंटा पीटी करनी होती थी। स्कूल के दस सबसे शरारती बच्चों को उन्होंने पाटी ¼लिखने की तख्ती)] कमेटू का डिब्बा व कलम चैक करने की ड्यूटी लगाई थी। उनमें एक मैं भी था। कलम बांस या रिंगाल की होती थी। कभी-कभी लकड़ी की भी होती थी। चिंताराम जी अपने जेब में काफी कलमें व चौक रखते थे। हमें छोटे बच्चों की मदद करने व कभी-कभी उन्हें टट्टी-पेशाब करवाने के लिए प्रेरित करते थे। ऐसा करने वाले को प्रार्थना में सबके सामने पेंशन कोर ईनाम में देते थे। छोटे बच्चों के लिये उनकी जेब में हमेशा छोटे-छोटे गट्टे ¼मीठे सकरपाले½भरे होते थे। हाफटाईम में वे कोट दरवाजे पर टांग कर अपनी रोटी खाते थे और हम लोग उनको पानी देने के बहाने उनकी जेब से एकाध मुठ्ठी गट्टे निकाल लेते थे। मजाल कोई उनकी नजर व प्यार से वंचित रह जाए। उनको यह भी मालूम रहता था कि] मैं और किशन राम हॉफ टाईम में आज फिर लड़ेंगे] क्योंकि मैं पिछले दो माह से उसे मुर्गा-झपट में हरा नहीं पा रहा था। मुर्गा-झपट में छोटे बच्चों को चोट न लगे वे फिल्ड के कंकड़ उठवा देते थे। बड़े बच्चों को कहते थे कि छोटे बच्चों को अड्डू ¼पत्थरों का खेल½खेलने दो।

हमारे गांव के बच्चे थे छोटे-छोटे] मगर शरारतें बड़ी-२ करते थे। कभी स्कूल न जाना हो तो रास्ते के जंगल में भूमिया पूजते थे] दूसरे दिन स्कूल में हमें दस-दस बार हजार तक गिनती व बारखड़ी] बड़ों को किताब का पाठ या कविता खड़े-खड़े पढ़नी पड़ती थी। रास्ते के गांवों में हम कभी-कभी प्याज] माल्टा] गन्ना] ककड़ी] रैंसें ¼मटर½चोर देते थे। स्कूल में शिकायत आती थी तो] उस दिन हमें कान पकड़कर मुर्गा बनना पड़ता था और दूसरे दिन अपनी पाटी या कापी में एक अतिरिक्त पाठ लिखकर लाना पड़ता था। मेरे पिताजी जानते थे] उनका बेटा शैतानी करता है] इसलिए हर महीने स्कूल आकर एक डंडा हैडमास्टर साहब को देते थे और कहकर जाते थे] इसको इससे पीटना। परंतु चिंताराम जी ने कभी मेरी पिटाई नहीं की। परंतु उस डंडे को कभी-कभी अपने हाथ में रखकर मेरी कापी-किताब चैक जरूर करते थे। मुझे आश्चर्य होता है] आज के मां-बाप पर] जब पढ़ता हूं कि] बच्चे को डांटने या थोड़ा पीटने पर अध्यापक पर वह कहर बनकर टूट पड़ते हैं। चिन्ताराम जी एक-दो महीने में हमारे गांव आकर मेरी बड़ी मां से और कभी-कभी पिताजी से मेरी पढ़ाई की तारीफ करते थे और मां को] यह जानते हुए भी कि वह अनपढ़ हैं] कहते थे कि] हम बच्चों को दूध देने से पहले अपने सामने बैठाकर कुछ लिखने को कहो। मैं आज स्मरण करता हूं कि] कितनी रुची थी उनकी अपने स्कूल व बच्चों में। मुझे आज भी उनका पढ़ाया और उनका चेहरा दोनों स्मरण हैं। मैं अच्छे नंबरों से पांच पास कर छटी में पढ़ने ढ़ाई किलोमीटर दूर चौनलिया जूनियर हाईस्कूल जाने लगा। स्कूल से मेरा गांव थोड़ा दूर] नैनीहाल के नजदीक था। मैं दोनों जगह का आनंद लेता था। मेरे बड़े भाई ¼चचरे½भी वहां अध्यापक थे। उनके जिम्मे प्राईवेट हाईस्कूल का संचालन था] मगर उनकी एक नजर मुझ पर लगी रहती थी। उनके चलते स्कूल के रास्ते की शरारतें भी बंद हो गई थी। इसलिए मैं महीने में कम से कम दस दिन नैनीहाल चला जाता था] ताकि वहां अपने बचपन को दोहरा सकूं। नैनीहाल के रास्ते में एक द्घासयुक्त बड़ी ढलान पड़ती थी] उस पर द्घुस-द्घुसी ¼लकड़ी की पटरी पर नीचे को लुढ़कने का खेल½का अपना ही आनंद होता था। कभी-कभी गधेरे में छोटी-छोटी मछलियां भी मारते थे।

चौनलिया आकर हमारे खेल बदल गए। यहां बॉलीबाल] कबड्डी] फुटबाल और नाना प्रकार की दौड़ें मैंने दौड़ीं] खूब ईनाम जीते। एक द्घंटा कूषि कार्य करना होता था। स्कूल के पास बड़े-बड़े खेत थे] हमारे कूषि मास्टर साहब जिले सिंह जी थे। मेरठ के रहने वाले थे] वहीं चौनलिया में डेरा लेकर रहते थे। खूब सब्जी व फूल बोआते थे। उन्होंने हमें फूलों के नाम रटा दिये थे। मैंने ?kj व नैनीहाल में भी कनस्तर काटकर या क्यारी में खूब फूल लगाए] ?kj प्यारा-प्यारा सा लगता था। दीवाली में गैंदे व गुलदावरी के फूलों की माला से सभी मकानों को हम सजा देते थे। इसके बदले में सभी भाइयों को चवन्नी व मुझे अठन्नी मिलती थी] जिसकी हम भतरौजखान बाजर जाकर दूध-जलेबी खाते थे व 

गुब्बारे लेते थे। जिले सिंह जी बहुत मेहनती शिक्षक थे। खेत] क्लास व खेल तीनों क्षेत्रों में हम बच्चों पर बड़ी मेहनत करते थे। उनके सिखाये से मैं अच्छा बॉलीबाल व कबड्डी खिलाड़ी बना और बाद में प्रांतीय व विश्वविद्यालय स्तरीय प्रतियोगिताओं में] उनका सिखाया मेरे बड़े काम आया। 

हमारे हेडमास्टर श्री भीम सिंह बिष्ट जी थे। छोटे कद के बड़े चयल-सजग व सरल व्यक्ति। गांव में हमारी शरारतों से परेशान पिताजी व बड़े ददा ¼भाईसाहब½ने छटी की वार्षिक परीक्षा के एक माह पहले मुझे हैडमास्टर साहब के डेरे पर भेज दिया। खूब पढ़ाते थे बिष्ट जी] मैं उनका पढ़ाया सबसे पहले कंठस्थ कर लेता था। रात को उनके सोने के बाद कुछ लड़कों के साथ आस-पड़ोस के गांवों में जहां भी रामलीला होती थी] वहां जाता था और वापस आकर दुबक कर सो जाता था] अपनी किताब खोलकर सिरहाने रख देता था। बिष्ट जी मुझे बड़ा पढ़ाकू बताते थे। कभी-कभार अड़ोस-पड़ोस के गांवों से हमारी शरारतों की शिकायतें आती थी तो] उन्हें डांटघ्देते थे। छटी व सातवीं में एक महीने को डेरा तो चल गया] मगर आठवीं में पिताजी ने मुझे डेरा-डफेरा लेकर छह माह पहले बिष्ट जी के हवाले कर दिया। हम पांच बच्चे थे] उनकी लड़की इंद्रा सहित दो लड़कियां] तीन लड़के। बिष्ट जी ने हमें प्रमेथ] साध्य से लेकर कविता] संस्कूत के श्लोक] अंग्रेजी के पाठ सब रटा डाले थे। मेरी ड्यूटी थी] शेष चार को पाठ रटाने की तथा स्कूल के क्लास में भी छात्रों का पाठ सुनाने की। सबको] सब रटना पड़ता था। बिष्ट जी की आवाज बीच में गूंजती रहती थी। 'बाई हार्ट याद करो] फिर मैं पुछूंगा'। उनके द्वारा याद कराए गए महाद्वीप] महासागर] नदियां] देशों की राजधानियां] पहाड़ या इतिहास की महत्वपूर्ण तिथियां मुझे आज भी याद हैं। आठवीं की परीक्षा बोर्ड की होती थी] यदि कोई लड़का-लड़की जरा कमजोर दिखता था तो बार-बार कहते थे] ये जरूर भीम सिंह की नाक कटवाएगा। रात को याद करने व लिखने को सबक देते थे और कहीं हम सो न जाये अपनी चुटिया से हमारी चुटिया बांध देते थे। हमारे ऊंद्घते ही उनकी नींद खुल जाती थी और फिर पढ़ाने पर जुट जाते थे। अपने हिस्से का दूध मुझे देते थे और कहते थे ¼इंद्रा की मां½ये मोहनरी के प्रधान का लड़का आगे कुछ जरूर बनेगा। अपने छात्रों के प्रति हैडमास्टर साहब का सत-प्रतिशत अपनत्व था] पितृत्व भाव था। किसी बच्चे को ज्वर आने पर रात को चार-छह बार उसकी नब्ज व छाती टटोलते थे। जागते-सोते पढ़ाई-पढ़ाई] यही उनका धर्म था। सन १९८० में मेरे एमपी बनने के बाद दो वर्ष जिंदा रहे। अपने गांव के निकट मेरी जनसभावों में आकर मुझे आर्शीवाद देते थे। मैं उस समय उनकी बूढ़ी आंखों की चमक में उस अध्यापक का संतोष देखता था। जिसे अपने शिष्य के आगे बढ़ने में अपने कर्तव्य की सफलता दिखाई देती है।

आज कहां हैं ऐसे चिंताराम मास्टर साहब या भीम सिंह 

हेडमास्टर साहब। शिक्षा देना उनका धर्म ही नहीं जीवन था। उस समय छोटी सी तनख्वा थी। बिजली] पानी] टेलीफोन] सड़क कोई सुविधा नहीं थी] एक भावना थी] एक लक्ष्य व लगन थी। इसलिए प्राईमरी व जूनियर हाईस्कूल और हाईस्कूल के शिक्षक भी याद आते हैं। जीवन के हर पड़ाव में हर ऊंचाई को छूने पर मुझे ये दोनों चेहरे याद आते हैं। इनका स्मरण एक नया बाल सुलभ उत्साह भर देता है। मुझ में कुछ और आगे बढ़ने का। कितनी बड़ी बिडंबना है। मुझे बीए] एलएलबी में पढ़ाने वाले शिक्षकों के चेहरे व नाम याद करने में परिश्रम करना पड़ता है। परंतु अपने प्राईमरी व जूनियर हाईस्कूल के अध्यापकों के नाम] चेहरे] व्यवहार सब कुछ मुझे आज भी याद हैं और हमेशा याद रहेंगे-मरते दम तक। शिक्षक-शिष्य का एक भावनात्मक रिश्ता -जिसमें कुछ भी मशीनी या कूत्रिम नहीं था। सब स्वभाविक व हार्दिक था। शायद ऐसे ही पहले हमारे गुरूकुल रहे होंगे। काश आज हम सभी साधनों के होते हुए एक दशवां हिस्सा भी अपने हृदय का शिक्षक-शिक्षार्थी के रिश्तों में समावेसित कर सकें] जो उस समय था। कितना बड़ा अंतर पैदा हो जाएगा। शिक्षा मशीनी नहीं हो सकती है] इसमें मानव मूल्यों को समावेसित करना पड़ेगा। टूटे-पानी टपकते हुए] टूटी कुर्सी वाले स्कूलों ने देश को एक ऐसी पीढ़ी दी] जिसने आधुनिक भारत या उत्तराखण्ड को बनाया। यदि और ऊंचाइयों को छूना है तो हमें अपने चिंतारामों व भीम सिंहों का महत्व समझना पड़ेगा। गुरू-गोविंद दोनों खड़े के कथानक को वास्तविकता में ढालना पड़ेगा।

उत्तराखण्ड में सारी संभावनााएं हैं] मगर हम अपनी शिक्षा को तराश नहीं पा रहे हैं] उसे मांज नहीं पा रहे हैं। मैंने शिक्षा के क्षेत्र में बहुत सारी पहलें प्रारंभ कीं] शिक्षकों से ससम्मान संवाद भी रखा] मगर वह अपनत्व जो मेरे शिक्षकों का मुझसे था] उसको तलाशता रह गया। पदों से एक दिन सबको निवृत होना होता है] मैं भी निवृत्त हुआ हूं। मगर यह कमी मुझे हमेशा सालती रहेगी] एक टीस सी रहेगी। जय चिंताराम-जय भीम सिंह।

 
         
 
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  • आकाश नागर

प्रदेश में माफिया ही नहीं] बल्कि सरकारी निर्माण एजेंसियां तक अवैध खनन में पीछे नहीं रही हैं। शासन-प्रशासन तक माफिया की पकड़ बताती है कि प्रदेश

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