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vad 26 16-12-2017
 
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आवरण&कथा&2
 
लुटती संपदा

दिनेश पंत

न्यायालय के आदेश पर अवैध खनन निरोधक सतर्कता ईकाई का गठन तो हुआ] लेकिन नदियों] जंगलों और गाड-गधेरों को बेतरतीबी से उजाड़ने का सिलसिला कभी रुका नहीं। अकेले पिथौरागढ़ जिले में राज्य गठन के बाद अवैध खनन के ६०० से अधिक मामले सामने आए हैं।

 

प्रदेश में जितना वैध खनन होता है] उससे कहीं अधिक अवैध रुप से यह कारोबार चलता है। इस अवैध खेल में सरकार को हर वर्ष करोड़ों रुपयों के राजस्व का नुकसान उठाना पड़ता है। यह सब जानते हुए भी सरकार खनन माफिया के खिलाफ सख्त कदम उठाने से डरती है। इसके दो ही अभिप्राय निकलते हैं या तो सरकार के नुमाइंदे इन खनन माफियाओं से डरते हैं या फिर अवैध तरीके से इनसे भेंट लेकर इन पर मेहरबानी होती रहती है। केवल वैध खनन की बात करें तो प्रदेश का खान महकमा राज्य को हर वर्ष २०० करोड़ से ऊपर की आय देता है जबकि वन निगम ५५ व सैल्स टैक्स ६५ करोड़ का ही राजस्व दे पाता है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि प्रदेश की आय में खनन का कितना महत्वपूर्ण स्थान है। बीते सालों में खनन एक बड़े कारोबार के रूप में सामने आया है। माना जाता है कि वैध -अवैध खनन का कारोबार तकरीबन १००० करोड़ रुपए से भी अधिक का है। इससे इस बात का पता लगता है कि वैध की तुलना में अवैध कारोबार कई गुना अधिक होता है। इसी लिए प्रदेश में खनन कारोबारियों का सियायत में काफी दखल रहता है और यही उनके बेलगाम होने का कारण भी बनता है। 

आज तक की किसी भी प्रदेश सरकार ने अवैध खनन रोकने के लिए स्पष्ट एवं ठोस नीति बनाने की जरूरत ही महसूस नहीं की जबकि पूर्व में प्रदेश के उच्च न्यायालय ने खनन पर पूरी तरह पाबंदी लगाते हुए अपने आदेश में कहा था कि नदियों] जंगल] गाड़ गधेरों में अतिक्रमण तथा वैध-अवैध खनन कर इसे उजाड़ा जा रहा है जबकि उत्तराखण्ड की प्राकृतिक संपदा देश दुनिया में अद्वितीय है। ये सब यहां की शुद्ध आबोहवा व यहां की पहचान है। इनकी सुरक्षा व संरक्षण करना प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। तब उच्च न्यायालय ने खनन के मुद्दे पर कहा था कि खनन से हिमालयी क्षेत्र में पहाड़] जंगल तबाह होने के साथ ही प्रदूषित भी हो रहे हैं। प्रदेश में इस समय दो तरह का खनन हो रहा है। पहला] जिसमें पहाड़ों को खोदकर खनिज निकाला जाता है। इसमें चूने का पत्थर एवं खड़िया मुख्य हैं। दूसरा] नदियों से निकाले जाने वाली सामग्री। खड़िया खनन जहां भूस्खलन की वजह बन रहा है तो नदियों का अवैध दोहन बाढ़ का कारण बन रहा है। प्रदेश में खनन के लिए बेदर्दी के साथ नदियों व पहाड़ों को छलनी किया जा रहा है। प्रदेश के कुमाऊं मंडल के चार जिले पिथौरागढ़] चंपावत] बागेश्वर व अल्मोड़ा बुरी तरह अवैध खनन की चपेट में हैं इसके चलते जहां सरकार को करोड़ों का चूना लग रहा है तो वहीं इससे पर्यावरण को भी भारी नुकसान पहुंच रहा है। लेकिन जनहित की बात करने का दावा करने वाले राजनीतिक दलों एवं उसके प्रतिनिधियों के लिए यह मुद्दा गौण है। राजनीतिक दलों की इस मुद्दे पर खामोशी बताती है कि जनहित एवं पर्यावरण को लेकर वह कितने गंभीर हैं

अकेले पिथौरागढ़ जनपद में खनन के ४०] खनिज के २४] उपखनिजों के १६ वैध पट्टे हैं जिससे दस करोड़ रुपया प्रतिवर्ष का राजस्व सरकार को मिलता है। जनपद में सरयू] रामगंगा] गोरी] काली नदियों में खनन का काम होता है। सेरा?kkV] ?kkV] रामेश्वर] नाचनी] थल] किमतोली] मुवानी] मदकोट] छोरीबगड़ में उपखनियों का खनन होता है। तो वहीं देवथल] द्घटियाबगड़] पूरानाथल] राईगढ़स्यारी] बेड़ाआगर] रेतोली] जाड़ापानी] चौड़मन्या] डसीलाखेत] ओलियागांव] रौलगाड़] रीठा] दुबोड़ा में खड़िया खनन के २४ पट्टे हैं। कनालीछीना में १६ उपखनिजों के पट्टे हैं। लेकिन जितना वैध खनन होता है उससे कहीं अधिक अवैध खनन होता है। वर्षों से जहां अवैध खनन को रोकने की मांग होती रही है। प्रशासनिक अमला इस अवैध कारोबार को रोकने की बात भी करता है। जनपद पिथौरागढ़ में वर्ष २००२ से अब तक अवैध रूप से निकाले जा रहे रेत-पत्थर के ६०० से अधिक मामले सामने आए हैं। उच्चतम न्यायालय के आदेश के अनुसार अवैध खनन निरोधक सतर्कता ईकाई के गठन के बाद भी जमकर अवैध सामग्री का कारोबार हो रहा है। अवैध रूप से पकड़ी गई सामग्री का नीलाम कर प्रशासन राजस्व तो जुटा लेता है लेकिन इस कारोबार में लगे लोग उसकी पकड़ में नहीं आ पाते। जनपद के मुनस्यारी के ग्राम भैंसखाल के लोग स्थानीय नदी में खनिज पट्टा न देने की मांग करते आ रहे हैं। यहां की जमीन दैवीय आपदा में बरबाद हो गई। तब से लोग स्थानीय रामगंगा नदी में वैध-अवैध खनन के खिलाफ रहे हैं। गांववालों का तर्क है कि इससे उनका गांव खतरे में आ रहा है। अब गांव के लोग इस बात से नाराज हैं कि माफिया लोग समय-समय पर जमीन से रेता निकाल रहे हैं] लेकिन उस पर प्रशासन कोई अंकुश नहीं लगा पा रहा है। अवैध खनन की शिकायत पर तहसीलदार मौका मुआयना कर इतिश्री कर लेते हैं। ग्राम पंचायत भैंसखाल] वन पंचायत रसियाबगड़] वन पंचायत भैंसखाल के ग्रामीण पूर्व में कई बार राम नदी में हो रहे अवैध खनन पर जिलाधिकारी को फैक्स भी प्रेषित कर चुके हैं। यहां तक कि ग्रामीणों ने रेता बजरी के धंधेबाजों के खिलाफ निंदा प्रस्ताव भी ग्राम पंचायत में पास किया है लेकिन आज भी जनपद से निकलने वाली रामगंगा में कई स्थानों पर खुले आम अवैध खनन का धंधा जोरों पर है। पुलिस एवं वन विभाग की तमाम चौकियों के बाद भी अवैध रूप से खनन सामग्री ले जा रहे वाहनों की बेरोकटोक निकासी हो रही है। रामगंगा] भुजगड़ सहित तमाम नदियां अवैध खनन की शिकार हैं। इससे भूकटाव एवं पर्यावरण को नुकसान पहुंच रहा है। 

थल की जनता क्षेत्र में आने वाले हर जिलाधिकारी से मिलकर अवैध खनन पर अंकुश लगाने की मांग कर चुकी है लेकिन रोक तो दूर की बात इधर केदारेश्वर क्षेत्र में भी अवैज्ञानिक तरीके से खनन शुरू हो गया है। वर्ष २०१३ में जब यहां पर केएमवीएन द्वारा रेत व बजरी का खनन किया गया तो लोगों में इसको लेकर भी विरोध था। स्थानीय लोगों का कहना था कि यह खनन अवैज्ञानिक तरीके से किया गया जिसके चलते नदी का प्रवाह बदल गया। अब यहां स्थित केदारेश्वर मंदिर भी खतरे की जद में आ गया है। जनपद के ही हुपली] दुल्यिाबगड़] थल] बांसबगड़] चिल्किया] महरगाड़] मुवानी] ?kkV] पनार  में तो खुलेआम अवैध खनन का कारोबार हो रहा है। इसमें स्थानीय युवाओं व क्षेत्रीय लोगों को पैसे का लालच देकर यह काम करवाया जा रहा है। 

भारत-नेपाल सीमा पर बहने वाली काली नदी भी अवैध खनन कारोबारियों का निशाना बनी हुई है। अभी हाल में कई द्घन मीटर अवैध रेत यहां सीज की गई। इस नदी पर लंबे समय से अवैध खनन का धंधा जोरों पर है। इधर जिला मुख्यालय से १५ किमी दूर जाख पंत में अवैध खनन के चलते पेयजल स्रोत व विद्युत सब स्टेशन खतरे की जद में आ गया। जलस्रोतों को नुकसान पहुंचा है। राजस्व एवं वन विभाग द्वारा कार्यवाही हुई] खनन सामग्री पकड़ी गई। लेकिन अभी भी अवैध खनन के चलते कई परिवारों के ऊपर खतरा मंडरा रहा है। खनन विभाग का रोना यह है कि उसके पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं जबकि अवैध खनन करने वाले काफी शक्तिशाली] सत्ता में पकड़ वाले होते हैं। इस धंधे में लगे कारोबारियों का सूचना तंत्र इतना विकसित है कि प्रशासनिक कार्यवाही की खबर उन्हें शीद्घ्रता से मिल जाती है और वह समय पर रफूचक्कर हो जाते हैं। दूसरी ओर बाबू एवं चपरासी के सहारे जिले के खान कार्यालय चल रहे हैं। 

बागेश्वर जनपद में कांडा] रीमा] फौट क्षेत्र में खनन के चलते दर्जनों गांव छलनी किए जा चुके हैं। खड़िया जिसे कास्टैमिक वस्तुओं एवं दवाओं के निर्माण में उपयोग में लाया जाता है। खड़िया सोप स्टोन को निजी खेतों से निकालकर दूसरे राज्यों में स्थापित औद्योगिक द्घरानों को बेचने का कार्य इस कदर हो रहा है कि ग्रामीणों के खेत गड्ढ़ों में तब्दील हो गए हैं। ग्रामीण मामूली लालच में अपनी जमीन बेच रहे हैं। अन्न उगलते खेत सफेदनुमा पाउडर वाले खेतों में तब्दील हो चुके हैं। असुरक्षा व भय के वातावरण के चलते असरहीन ग्रामीण इसका विरोध करने से बचते हैं। खड़िया के इस खेल में जमीन तो जा ही रही है बल्कि सामाजिक व पर्यावरणीय तबाही भी साफ तौर पर हो रही है। खड़िया खनन के कारोबारी ठेकेदार तो चांदी काट रहे हैं लेकिन स्थानीय लोग अ्रज्ञानतावश गुमराह हो रहे हैं। रूपल्ली भर में अपनी अचल विरासत का सौदा कर रहे हैं। 

सत्तर के दशक से पहाड़ों को खोदने का जो खेल शुरू हुआ वह अब आजीविका का एक बड़ा साधन बन गया है। ठेकेदारी प्रथा ने विरोध के स्वरों को खत्म कर दिया है। बागेश्वर जनपद में कमस्यार] पेटशाली ढाई ईजार] मैठरा] नौगांव] तीख] सानी उडियार] पोखरी] जोशीगांव] बंगच्यूडी] खाती] बैकुड़ी] महौली] सुन्यौड़ा] रताइय] बढ़ालांव] बज्यूड़ा] कुनौली] थर्प] सुनेड़ा] पंपु] बसकूणा] झारकोट] ढूंगापाटली] शीशाखानी] सुरकाली] धपौली] सिरालगांव] ओलियागांव] मजरूवा] चौड़ास्थल] जखेड़ा] विजयपुर] बास्तोली] मालता] दफौट] लीति] दोफाड़] चौंरा] वनलेख] पचार आदि गांव तो खड़िया की भंेंट चढ़ चुके हैं। राज्य खनन नीति के अनुसार नदी क्षेत्र से उपखनिजों की निकासी के लिए चुगान किया जा सकता है] खुदान नहीं। चुगान के लिए सिर्फ ७५ सेंटीमीटर तक उत्खनन हो सकता है। इससे अधिक उत्खनन खुदान की श्रेणी में आता है। जिसके लिए जुर्माना हो सकता है। इसके अलावा नदी के दोनों ओर एक चौथाई भाग छोड़कर बीच के आधे भाग पर ही चुगान किया जा सकता है। लेकिन यह सब नियम ताक पर हैं। सवाल यह उठ खड़े हुए हैं कि इस धंधे में शामिल खनन माफिया] वन विभाग तथा सरकार के रिश्ते की पड़ताल कौन करे। 

चंपावत जनपद में शारदा नदी तो अल्मोड़ा में कोसी] सरयू नदी माफियाओं के शिकंजे में है। अवैध खनन से सरकार को लाखों का चूना लग रहा है। खनन माफियाओं एवं भ्रष्ट अधिकारियों का गठजोड़ इसके लिए जिम्मेदार माना गया है। उत्तराखण्ड राज्य की सदाबहार नदियों का उद्गम कहलाने वाली नदियां कई सरकारी लोगों के लिए सोने की खान साबित हुई है।


नियमों की उड़ाई जा रही धज्जियां

नियम यह है कि नदी के किनारे से सौ मीटर की दूरी छोड़ते हुए खनन होना चाहिए। खनन की गहराई कहीं भी डेढ़ मीटर से अधिक नहीं होनी चाहिए। मैदानी जिलों में उप खनिजों के पट्टों से अधिक स्टोन क्रशर काम कर रहे हैं। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने नदियों से बालू खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाते हुए कहा था कि खनन के लिए पर्यावरण संबंध्ी मंजूरी जरूरी होगी। इसके लिए राज्यों से अवैध खनन मामले में जबाव भी मांगा गया था लेकिन फिर वही ढाक के तीन पात। यही हाल स्ट्रोन क्रशरों का भी है। अल्मोड़ा में १] बागेश्वर में ०३] चमोली में १७] चम्पावत में ४] देहरादून में २] हरिद्वार में ७८] नैनीताल में ३२] पौड़ी में ९] पिथौरागढ़ में ६] रूद्रप्रयाग में ११] टिहरी में १५] ऊधमसिंहनगर में ५२ व उत्तरकाशी में ११ स्टोन क्रशर संचालित हैं। अध्कितर स्टोन क्रशर नियम-कानूनों को ताक में रखकर चल रहे हैं। इसमें पर्यावरण संबंध्ी मानकों का कतई ध्यान नहीं रखा जा रहा है। पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आदेश इनके लिए कोई मायने नहीं रखते। स्टोन क्रशर का धंधा जारी है १०० से अधिक स्टोन क्रशर अवैध तरीके से संचालित हो रहे हैं। नियम कहते हैं कि आबादी] वन] अस्पताल व नदी क्षेत्र में सौ से लेकर ५०० मीटर तक की दूरी पर स्टोन क्रशन नहीं लगाया जा सकता। लेकिन यहां तो आबादी] वन व नदियों के बीचों-बीच संचालित हो रहे हैं। पूर्व में ६ को क्लोजर यानी बंदी नोटिस तो १५ को कारण बताओ नोटिस जारी किए जा चुके हैं। कुल मिलाकर खनन पहाड़ की बर्बादी का कारण बने हुए हैं।

 
         
 
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