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vad 26 16-12-2017
 
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आवरण कथा
 
खनन के असली खलनायक

  • गुंजन कुमार

भाजपा बेशक गंगा को जीवदायिनी मानती हो। लेकिन सच यही है कि हाईकोर्ट ने जब इसे जीवित व्यक्ति का दर्जा दिया तो उत्तराखण्ड की त्रिवेंद्र रावत सरकार बेचैन हो उठी। तत्काल स्टे लेने सुप्रीम कोर्ट जा पहुंची। सनातन संस्कृति की पैरोकार त्रिवेंद्र सरकार की गंगा के प्रति बेरुखी समझ से पूरे है। हरिद्वार में मातृ सदन के संत अवैध खनन से त्रस्त गंगा को बचाने के लिए अनशन पर हैं लेकिन दूसरी ओर खनन माफिया बेखौफ अपने अवैध कारनामों को अंजाम दे रहे हैं। जो भी उनके खिलाफ आवाज उठा रहे हैं उन पर हमले हो रहे हैं। अकेले गंगा ही नहीं] बल्कि राज्य की तमाम अन्य नदियां जिस कदर माफिया के तांडव से कराह उठी हैं उससे तो यही लगता है कि सरकार से उन्हें खुली छूट मिली हुई है

 

पिछले साल नैनीताल हाईकोर्ट ने गंगा में प्रदूषण को लेकर दायर पीआईएल पर महत्वपूर्ण फैसला दिया था। न्यायाधीश राजीव शर्मा की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने गंगा के साथ ग्लेशियर आदि को जीवित व्यक्ति का दर्जा दिया था। गंगा पर इस फैसले को फ्रांस के नेशनल सेंटर फॉर साइंस रिसर्च और सेंटर फॉर हिमालयन स्टडीज में अब अध्ययन के लिए शामिल किया गया है। वहां के शोधार्थी पिछले सप्ताह ही इस पर शोध करने यहां पहुंचे। फ्रांस की इस पहल को वहां गंगा को महत्व देने के तौर पर समझ सकते हैं मगर अपने देश में हाल यह है कि जिस उत्तराखण्ड प्रदेश से गंगा निकलती है] [kqn वहीं की सरकार  ने नैनीताल हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देकर स्टे ले लिया। दूसरी तरफ सरकार और नौकरशाहों की शह पर गंगा का किनारा ही नहीं] बल्कि तलहटी को भी चीरा जा रहा है। माफिया बेखौफ अंधाधुंध खनन कर गंगा के अस्तित्व के लिए चुनौती बन गया है। प्रदेश की अब तक की किसी भी सरकार का उस पर अंकुश नहीं रहा।

गंगा&यमुना जैसी पवित्र एवं उत्तर भारत की जीवनदायिनी नदियों का उद्गम राज्य उत्तराखण्ड है। गंगा&यमुना जैसी नदियां उत्तर भारत के अधिकांश हिस्सों की प्यास बुझाती हैं। इनकी उपजाऊ बेल्ट किसानों के लिए किसी सौगात से कम नहीं है। लाखों किसानों के खेतों को ये नदियां लहलहाती हैं। जिससे देश का पेट भरता है। मगर कम समय में ही अपार धन कमाने की प्रवृत्ति के कारण भविष्य में ये नदियां अपने उद्गम राज्य में ही खत्म हो जाएं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। गंगा के धरती पर उतरते ही उसको छलनी करने के लिए खनन माफियाओं ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। जेसीबी] पोर्टलैंड से गंगा की तलहटी में जमे पत्थरों को निकाला जा रहा है। वो भी कई पाबंदियों और रोक के बावजूद। खनन माफियाओं ने राजनेताओं और नौकरशाहों से ऐसा गठजोड़ बनाया है कि इनमें किसी प्रकार का भय भी नहीं रहा है।

ऐसे तो अवैध खनन का खेल पूरे प्रदेश में चल रहा है। लेकिन हरिद्वार] देहरादून] उधमसिंह नगर और नैनीताल में इसका वीभत्स चेहरा सामने आता है। जहां नदियों को नदी नहीं बल्कि खान की तरह खोद कर तहस&नहस कर दिया गया है। यह सिलसिला अभी भी बंद होने का नाम नहीं ले रहा। हरिद्वार चण्डी और मनसा पहाड़ी के बीच स्थित है। इन दोनों पहाड़ियों के आधार पर ही शहर बसा है। पहाड़ियों के कारण इसकी तलहटी में पत्थर हैं। यह पत्थर इसके स्थायित्व के लिये नितांत आवश्यक हैं। गंगा इसी शहर से हो कर बहती है। हरिद्वार में गंगा बहुत वेग से बहती है। यदि इसकी तलहटी में पत्थर न रहें या उन्हें निकाल लिया जाए तो समस्त मिट्टी और बालू बहा लेगी। बालू बहने के बाद गंगा हरिद्वार में ही धरती में समा जाएगी। गंगा का मैदानी क्षेत्र सूखाग्रस्त हो जाएगा। किसानों की खेती खत्म होने के साथ ही लोगों की प्यास बुझाना भी मुश्किल हो जाएगा।

हरिद्वार&प्रशासन ने जिस आधार पर खनन खोला है उसकी एक झलक मात्र से स्पष्ट हो जाता है कि खनन का अवैध खेल कितने वृहद् स्तर पर खेला जाता है। इसमें निचले कर्मचारी से लेकर सरकार तक शामिल है। यह तय है कि बिना सरकार की सहमति के नियमों की धज्जियां नहीं उड़ाई जा सकती। राज्य के वन विकास निगम ने गंगा में खनन खोलने के लिए एफआरआई नामक कंपनी को हायर किया। इस कंपनी को गंगा में खनन की आवश्यकता पर रिपोर्ट तैयार करनी थी। इनके अध्ययन में यह भी शामिल था कि गंगा में पत्थर ऊपर से बहकर आता है या नहीं। इस कंपनी की प्राथमिक रिपोर्ट पर ही केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ¼एमओईएफ½ को गलत सूचना देकर पर्यावरण स्वीकृति प्राप्त कर ली गई। इस पर हरिद्वार के एक समाजसेवी डॉक्टर विजय वर्मा ने एनजीटी में वाद दायर किया। इसमें एफआरआई ने जवाब दिया कि उसने तो रिपेनिसमेंट का अभी अध्ययन ही नहीं किया है। इसके लिए तो कम से कम ३ साल का समय चाहिए। यह तीन साल इसलिए कि प्रत्येक साल मानसून के पूर्व और मानसून के बाद गंगा की तलहटी के पत्थरों को जांचना था। इस तरह लगातार तीन साल यही प्रक्रिया अपनाई जाती। इसके अध्ययन के बाद ही ऊपर से बहकर आता है या फिर पहले से ही गंगा में मौजूद है।

उत्तराखण्ड वन विकास निगम की गलत सूचना पर केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने निगम को फटकार लगाई। मंत्रालय ने निगम को कारण बताओ नोटिस भेजा और कहा कि क्यों नहीं तुम्हारी पर्यावरण स्वीकृति को रोक कर रख दिया जाए। निगम को १५ दिन में जवाब देने के लिए भी कहा। यह नोटिस १८ जुलाई २०१७ को दिया गया था। समय पर जवाब न देने के कारण उसने एनजीटी को कहा कि पर्यावरण स्वीकृति को रोककर रख दिया गया है। इस बीच निगम ने भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान को गंगा में पत्थर पर अध्ययन का जिम्मा सौंपा। उसे भी कम से कम ३ साल का समय चाहिए। पर्यावरण स्वीकृति रोककर रखे जाने के बावजूद मुख्यमंत्री और हरिद्वार के जिलाधिकारी उसी दौरान बार&बार द्घोषणा करते रहे कि अक्टूबर में खनन जरूर खोलेंगे। एनजीटी के अलावा सीपीसीबी भी हरिद्वार के रायवाला से लेकर भोगपुर तक खनन नहीं करने का आदेश पूर्व में ही दे चुका है। 

उधर भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान को गंगा में पत्थर पर अध्ययन करने का जो जिम्मा निगम ने सौंपा था] उसमें उसकी जल्दबाजी ने उसकी रिपोर्ट पर ही सवाल खड़ा कर दिया। जिस अध्ययन को करने में एक विशेषज्ञ कंपनी ने कम से कम तीन साल का समय लगना बताया। उस अध्ययन को भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान ने मात्र तीन दिन में कर दिया। यही नहीं उसने १२ नवंबर २००१७ यानी रविवार के दिन ही वन विकास निगम को रिपोर्ट भेज दी। वन विकास निगम ने उससे भी ज्यादा तेजी से उसी दिन उस रिपोर्ट को पर्यावरण मंत्रालय और एनजीटी को भेज दिया। रिपोर्ट का अध्ययन करने पर पता चला कि यह सर्वे ६ अक्टूबर को किया गया था। ६ अक्टूबर को गंगा नहर बंद थी। गंगा की संपूर्ण धारा खनन लॉट से होकर ही गुजरती थी। जब उनसे पूछा गया कि उस समय आपने सर्वे कैसे किया तो उन्होंने जवाब दिया कि वृहद् सर्वे भी उन्होंने ८] ९ और १० नवंबर को किया। ११ और १२ नवंबर को रिपोर्ट तैयार की। आश्चर्यजनक है कि जिसके लिए कम से कम ३ साल का समय चाहिए था उस रिपोर्ट को उन्होंने मानसून के पश्चात तीन दिन में ही तैयार कर दिया और छुट्टी के दिन शनिवार एवं रविवार को ही रिपोर्ट तैयार कर भेज भी दी।

नियमतः रिपोर्ट पर पर्यावरण मंत्रालय को अपना निर्णय एनजीटी में जमा करना था। जिसके बाद वादी इस पर अपना मंतव्य कोर्ट में देता। फिर कोर्ट में बहस के बाद कोर्ट अपना निर्णय देता। पर यहां ऐसा कुछ नहीं हुआ। जो रिपोर्ट जिलाधिकारी हरिद्वार को नहीं भेजी गई थी उसे जिलाधिकारी ने लॉगिंग ऑफिस से मंगाकर तत्काल खनन खुलने का आदेश दे दिया। आदेश देते ही तत्काल खनन खुल गया। २३ नवंबर को जब एनजीटी में सुनवाई हुई तो पीठासीन जजों ने यही दोहराया। उसी दिन उन्होंने आदेश दिया कि जब पर्यावरण स्वीकृति को रोककर रखा गया है तो खनन कैसे खेला गया। जो खनन खुला है] वह अवैध है। एनजीटी ने खनन खुलने की रिपोर्ट उत्तराखण्ड पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड से एक सप्ताह के अंदर मांगी है। इस बार तो सरकार ने कोर्ट] एनजीटी और सीपीसीबी के आदेश को भी दरकिनार करते हुए खनन खोल दिया। न केवल खनन खुला है बल्कि नए \kkV भी खोल दिए गए हैं। इससे जैसा लगना स्वाभाविक है कि प्रदेश सरकार और प्रशासन दोनों खनन माफिया के साथ सभी नियम&कायदों को दरकिनार करते हुए खड़े हैं।

सर्व प्रथम पोंटी चड्ढा ग्रुप ने १९८६ में गंगा सफाई के नाम पर १९५१ के नोटिफिकेशन जिसमें अजीतपुर तक गंगा के किसी पदार्थ को निकालने पर पूर्ण पाबंदी थी को दबाकर खनन खुलवाया। परंतु वह किसी कारण कुछ समय बाद बंद हो गया। फिर१९९६ में पुनः पट्टा लिया। १९९८ में हरिद्वार महाकुंभ था। उस समय प्रकाश में आया कि कुंभ क्षेत्र में खनन से जो गड्ढे हुए उसमें कुछ को भरने में ही जितना खनन से राजस्व की प्राप्ति हुई थी उससे ज्यादा खर्च हुआ। मामला मातृ सदन के संज्ञान में आने पर उसी समय से कुंभ क्षेत्र को खनन&क्रशिंग वर्जित क्षेत्र \kksf"kr करने के लिए अनेक स्तर पर la\k"kZ किया गया। जिसमें मातृ सदन का सत्याग्रह एक मुख्य हथियार था। अंत में २००० में जांच के उपरान्त पोंटी चड्ढा ग्रुप को तत्कालीन ईमानदार जिलाधिकारी आराधना शुक्ला ने तत्कालीन सिटी मजिस्ट्रेट एनपी सिंह की संस्तुति पर ५ साल के लिए काली सूची में डाल दिया।

एनपी सिंह ने कुंभ क्षेत्र को खनन मुक्त क्षेत्र \kksf"kr करने की संस्तुति भी की थी। इसी को आधार बनाकर भिन्न&भिन्न स्तर पर la\k"kZ के उपरांत कुंभ क्षेत्र से खनन और क्रशिंग बंद हुआ। इसी बीच एक स्टोन क्रशर को बचाने के लिए कुंभ क्षेत्र को ही सरकारी दस्तावेज में जालसाजी करके जगजीतपुर तक सिकुड़ा दिया गया। इसके लिए भी मातृ सदन के संतों ने सत्याग्रह किया। उस सत्याग्रह और la\k"kZ के परिणामस्वरूप स्वामी निगमानंद शहीद हुए। निगमानंद की हत्या सरकार और माफियाओं के निर्देश पर की गई] ऐसा मातृ सदन के संतों का कहना है। उनकी शिकायत पर निगमानंद की हत्या की जांच सीबीआई कर रही है। सीबीआई कोर्ट देहरादून ने कहा कि सीबीआई ने तो उचित जांच की ही नहीं। कुछ बिंदुओं पर फिर जांच के आदेश दिए। मातृ सदन के संतों का आरोप है कि सीबीआई ठीक से जांच नहीं कर रही है। यदि उन बिंदुओं पर जांच हुई तो बड़े&बड़े मगरमच्छ निगमानंद की हत्या के आरोप में फसेंगे। इससे माफियाओं का मनोबल इतना बढ़ गया कि अब वे हरिद्वार में पूरी गंगा को ही नष्ट करने पर लगे हुए हैं। 

मातृ सदन  के संतों के सत्याग्रह ¼तपस्या½ को खत्म करने के लिए माफियाओं की ओर से कई प्रकार के कूत किए गए। संतों के कमरे के दरवाजे को काटना] बंद कमरे में विषैली गैसों को छोड़कर अपने रास्ते से हटाने का असफल प्रयास भी किया। फिर भी मातृ सदन के संत संकल्पित हैं कि जब तक गंगा जी हरिद्वार में खनन माफियाओं से मुक्त नहीं कराई जाएगी तब तक तपस्या जारी रहेगी। इस बीच अनेक जांच प्रमाण के बाद केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने स्टोन क्रशर को गंगा से ५ किलोमीटर दूर भोगपुर तक खनन पर पूर्ण पाबंदी के लिए पर्यावरण संरक्षण अधिनियम ५ के तहत कार्रवाई भी की। लेकिन उत्तराखण्ड में माफियाओं का इतना वर्चस्व है कि सरकार इस पर अमल नहीं कर पा रही है।

वर्तममान मुख्यमंत्री त्रिवेंन्द्र सिंह रावत की सरकार ने हरिद्वार में तैनात जिलाधिकारी मुरुगेशन को यहां से कुछ ही महीने में हटाकर नये जिलाधिकारी दीपक रावत की तैनाती कर दी। मातृ सदन का आरोप है कि पूर्व की सरकार में भी दो रावत ने गंगा में अवैध खनन के लिए सभी प्रकार के हथकंडे अपनाए। इस बार भी तीन रावत गंगा को चीरने में लगे हुए हैं। 

गंगा के चार खनन लॉटों को खोल दिया गया है। प्रत्येक खनन लाटों में चार से पांच \kkV हैं। प्रत्येक \kkV से कम से कम १०० से १५० ट्रक और ट्रैक्टर तीन से चार बार गंगा से पत्थर एवं बजरी लाते हैं। इस तरह प्रतिदिन गंगा के १० किलोमीटर के दायरे में खनन से गंगा की कोख को चीरा जा रहा है। साथ ही साथ बड़ी संख्या में ट्रक और ट्रैक्टर से गंगा के पवित्र जल को गंदा भी किया जा रहा है। जहां एक ओर गंगा में वाहन धोने से ५००० रु का जुर्माना किया जाता है वहीं हजारों ट्रक और ट्रैक्टर से गंगा के पवित्र धारा को रौंदा जा रहा है। यही नहीं गंगा की जलीय जीव एवं मछली भी इसके शिकार हो रहे हैं। इस सब की जवाबदेही सरकार और शासन प्रशासन में बैठे भ्रष्ट अधिकारियों की है।

प्रशासन का कहना है कि हाईकोर्ट के आदेश से क्रेशर खुले हैं। जब उनसे पूछा जाता है कि आदेश तो क्रेशर और खनन बंद करने के लिए हैं। इसके लिए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आदेश का पालन जरूरी है तो उनके पास कोई उत्तर नहीं होता है।

कानून से ऊपर माफिया

  • अरुण कश्यप

धर्मनगरी में खनन माफियाओं के हौसले इतने बुलंद हैं कि उन्होंने कानून व्यवस्था को बौना साबित कर दिया है। किसान हो या आम आदमी सब के अंदर खनन माफिया इतना खौफ पैदा करके रखते हैंंं कि उनके खिलाफ बोलने का किसी के अंदर साहस नहीं होता। गंगा में खनन के साथ&साथ माफिया लोगों ने मोटे मुनाफे के लालच में खेतों से मिट्टी और आरबीएम के खनन में भी करोड़ों कमाने के रास्ते निकाले हैंं। अधिकारियों की मिलीभगत से समतलीकरण के नाम पर किसी भी खेत में १०००\kuehVj तक मिट्टी उठाने की अनुमति प्राप्त कर ली जाती हैंं। आश्चर्य की बात ये है कि इस पूरे क्षेत्र में जहां समतलीकरण के नाम अनुमतियां ली जाती हैंं वहां की भूमि पहले ही समतल है। यानी केवल आंखों में धूल झोंककर अनुमति हासिल की जाती है। उसके बाद शुरू होता है हरी भरी फसलों को उजाडकर खेतों को हमेशा के लिए बर्बाद करने का वो सिलसिला जिसने अब हजारों बीद्घा खेती की भूमि को तहस&नहस कर दिया है। १०००\kuehVj की अनुमति की आड़ में १५ से २५ हजार\kuehVj तक मिट्टी और आरबीएम का खनन किया जाता है। एक\kuehVj के लिए ११० रूपये का राजस्व जमा करना होता है जबकि अवैध रूप से खनन करने पर इसके पांच गुना यानि ५५० रूपये प्रति \kuehVj तक का जुर्माना किया जा सकता है यानी हर अनुमति के बाद ये खनन माफिया ७७ लाख ५०]००० हजार तक का राजस्व का चूना लगाते हैंंं और प्रशासन मिलीभगत के चलते इन्हें और इस अवैध काम में संरक्षण देता है। माफियाओं से मिलीभगत का  प्रमाण २२ नवंबर को भी देखने को मिला जब पथरी पुलिस के थाना प्रभारी गजेंद्र बहुगुणा को सूचना देने के बाद पुलिस की जगह दर्जनों खनन माफिया मौके पर आ गये और कानून को हाथ मेंं लेकर पत्रकारो पर टूट पड़े और जानलेवा हमला कर दिया उसके बाद भी खनन माफियाओं के ईशारे पर उल्टा पत्रकारों पर मुकदमा दर्ज कर लिया गया जबकि एसओ गजेंद्र बहुगुणा ये भलीभांति जानते थे कि पत्रकारों के साथ बंधक बनाकर मारपीट और लूटपाट की गई है फिर भी उन्होंने पत्रकार अरूण कश्यप] सुनील शर्मा और नायब पर मुकदमा दर्ज कर लिया। 

अगर माफियाओं और उनके मोटे मुनाफे के बीच कोई आता हैंं तो वो इन खनन माफियाओं का शिकार बन जाता है। २२ नवंबर को पथरी क्षेत्र के पथरी पुल निकट डांडी चौक के पास पत्रकारों पर हुए जानलेवा हमले की \kVuk इसी का उदाहरण हैंं इससे पहले भी खुद सरकारी नुमांइंदों पर भी इस पूरे क्षेत्र में खनन माफिया कई बार हमले कर चुके हैं। लगभग ४ साल पहले आजाद और नवाब नाम के दो खनन माफियाओं ने रामनाथ नाम के पटवारी पर जानलेवा हमला कर दिया। पटवारी रामनाथ ने बताया कि करीब चार साल पहले आजाद ने मेरे ऊपर ट्रैक्टर चढ़ाकर मुझे जान से मारने का प्रयास उस समय किया जब मैं ग्रामीणों की सूचना पर उस जगह पहुंचा जहां ये लोग खनन कर रहे थे। ये लोग अनुमति से कहीं ज्यादा खनन कर चुके थे। उसके बाद बाहर निकालकर मैंने पथरी थाने में इन लोगों के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज कराया था।

इस अवैध काम का बेताज बादशाह कहा जाने वाला अंसारी कांट्रैक्टर कंपनी का मालिक मुशर्रफ अली पुत्र यासीन निवासी सराय है। ये वही है जिसने २३ नवंबर को पत्रकारों के खिलाफ झूठा मुकदमा पथरी थाने मेंं दर्ज कराया था। बता दें कि मुशर्रफ अली एक तानाशाही रवैये का आदतन अपराधी भी है। नवंबर २०१५ में जब ज्वालापुर हल्के में तैनात पटवारी तेलूराम ने अवैध खनन ढोते इनके ट्रैक्टर को पकड़ा तो पीछे से आकर मुशर्रफ ने पटवारी तेलूराम को पकड़ लिया और ट्रैक्टर चालक को आगे चलने को कहा। उसके बाद पटवारी के साथ हाथापाई भी की गई जिसके बाद ज्वालापुर कोतवाली में मुशर्रफ के खिलाफ संबधित धाराओं में मुकदमा भी पटवारी तेलूराम ने दर्ज कराया था।

पथरी थाने का सबसे बड़ा दलाल

बाइस नंवबर की शाम को आबिदपुर भगतनपुर उर्फ इक्कड कला में पत्रकारों पर जो हमला हुआ था उसमें सबसे बड़ी भूमिका कुरबान अली निवासी एक्कड ने निभाई थी। जोर&जोर से ये शख्स चिल्ला&चिल्ला कह रहा था कि जेसीबी का गड्ढा खोद कर जिंदा दफन कर दो इन साले पत्रकारों को पुलिस को तो मैं देख लूंगा। सूत्रों से पता चला है कि कुरबान अली नाम का ये शख्स दिन के चार से पांच द्घंटे पथरी थाने में ही डेरा डाले रहता है और पथरी थाना पुलिस के स्टाफ का इसको संरक्षण प्राप्त है।

^सरकार भी अवैध खनन में शामिल^

मातृ सदन के संस्थापक स्वामी शिवानंद महाराज से खनन पर विशेष 

बातचीत


स्वामी जी आपका आंदोलन करीब दो दशक से चल रहा है फिर भी गंगा खनन मुक्त नहीं हो पाई है। क्या कारण मानते हैं\

उत्तराखण्ड बनने के बाद चार ही जिले हैं] जहां से शासन&प्रशासन और पुलिस को धन की प्राप्ति हो सकती है। इन जिलों में खनन और शराब से ही पैसा मिलता है। तीसरा भूमाफिया भी है मगर खनन का व्यापक प्रभाव पड़ता है। क्योंकि इसका पैसा नीचे से लेकर ऊपर तक सभी को पहुंचता है उत्तर प्रदेश के समय ऐसा नहीं होता था। उस वक्त खनन ज्यादा होता भी नहीं था। १९८६ में कुछ दस्तावेजों को दबाकर सर्वप्रथम गंगा की सफाई के नाम पर खनन शुरू किया गया। लेकिन जब मातृ सदन ने १९९७ में आंदोलन किया तो तत्काल उसे रोक दिया गया। उत्तर प्रदेश के समय आंदोलन करने पर सरकार तुंरत हरकत में आती थी। लखनऊ से ईमानदार अधिकारी भेजे जाते थे। कल्याण सिंह को हमने जो कहा] वह उन्होंने किया। पर उत्तराखण्ड में यह सब खत्म हो गया है। महीने भर हमारे संत अनशन पर रहते हैं फिर भी सरकार सोई रहती है क्योंकि अवैध खनन का पैसा सभी को पहुंचता है। इसलिए हमारा आंदोलन तो छोड़िए] ये एनजीटी] सीपीसीबी यहां तक की नैनीताल हाईकोर्ट के आदेश को भी नहीं मानते। जब कोर्ट बहुत सख्ती करता है तब कुछ दिनों के लिए खनन बंद कर दिया जाता है। फिर कुछ दिनों बाद खोल दिया जाता है।

सभी कोर्टों] संबंधित एजेंसियों यहां तक कि सरकारों ने भी आपकी बात को सही मानते हुए कई बार खनन पर रोक लगाई। फिर भी खनन बंद न होना क्या दर्शाता है\

इसका एक मात्र कारण भ्रष्टाचार है। त्रिवेंद्र सिंह रावत खनन पिछली हर सरकार से एक कदम आगे निकल गया है। उत्तर प्रदेश के समय सिर्फ अधिकारी और माफिया मिलकर अवैध खनन करते थे। पर अब तो सरकार तक इसमें शामिल है। सरकार से इन्हें निर्देश मिलते हैं] तो कैसे खनन रुकेगा। भोगपुर तक गंगा के नीचे पत्थर है। उसके बाद बालू है। हमारा कहना है कि हरिद्वार और गंगा के लिए ये पत्थर बहुत जरूरी है। इसलिए आप नियमों का पालन कर भोगपुर के बाद बालू निकालें] हमें कोई आपत्ति नहीं है।

क्या प्रदेश में खनन माफिया सरकार से ज्यादा पावरफुल हो गया है\

हरेक सरकार से ये माफिया ताकतवर तो हो ही गया है। उसका कारण यह है कि यहां ऐसे नेता मुख्यमंत्री बनते हैं जो उत्तरप्रदेश के समय मंत्री भी नहीं बन सकते थे। उन्हें ज्ञान कुछ भी नहीं है। सरकार के साथ&साथ अधिकारियों में भी धन की आकांक्षा प्रबल है। इसलिए पैसे का लोभ देकर माफिया सरकार और अधिकारियों को अपने इशारे पर नचाते हैं।

पूरा संत समाज गंगा की बात करता है मगर खनन पर संत समाज एकजुट क्यों नहीं होता\

हरिद्वार में अब संत रहे ही कहां\ सिर्फ गेरूवा वस्त्र पहन लेने से कोई संत नहीं बनता। जब हमारे यहां कामना भरी हुई है। एसी कमरों में रहना और एसी गाड़ियों में द्घूमना किसी सच्चे संत की आकांक्षा नहीं होती। ये तो रावण भी करता था। प्रकृति के साथ रहना और उसे जन के लिए उपयोगी बनाना संत करता है। प्रकृति का दोहन करने वाला संत नहीं हो सकता। ये लोग तो संत के नाम पर कलंक हैं।

खनन रुकने से विकास कार्य में समस्या आती है\

किसी परिवार की आय जितनी होगी] वह उतना ही खर्च करेगा न। यदि आपका पड़ोसी आपसे ज्यादा कमाता है तो क्या आप उनके इतना खर्च करेंगे। मैटेरियल की पूर्ति के लिए गंगा को खत्म नहीं कर सकते। यदि मैटेरियल की पूर्ति अपने यहां से नहीं हो तो बाहर से मंगाया जा सकता है। जहां नहीं होता है] वह राज्य आखिर बाहर से मंगाता है या नहीं। हम खनन के विरोधी नहीं हैं। खनन को सिर्फ नियमानुसार करने का आग्रह करते हैं। नियम यह कहता है कि आप सिर्फ गंगा ही नहीं किसी भी नदी से उतना ही पत्थर या बालू निकाल सकते हैं] जिसकी पूर्ति अगले मानसून में हो जाए। हरिद्वार में गंगा में पत्थर ऊपर से आता नहीं है। मैंने पर्यावरण मंत्रालय के अधिकारियों को दिखा दिया कि पत्थर ऊपर से नहीं आया है। बालू भी कहीं रूकी नहीं है। फिर यहां खनन क्यों हो रहा है। हम अपनी अगली पीढ़ी के लिए क्या छोड़ेंगे। कम से कम हमें जो पूर्वजों से मिला है उतना तो छोड़ें। यदि गंगा में इसी तरह खनन होता रहा तो आने वाली पीढ़ी गंगा नदी के बारे में भूगोल में नहीं इतिहास की किताबों में पढ़ेगी।

वैज्ञानिकों की जांच से मचा हड़कंप

तीस अक्टूबर को हरिद्वार में खनन खोलने की शिकायत मातृ सदन ने केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से की थी। उस शिकायत पर मंत्रालय के दो वैज्ञानिक गंगा में खनन पर जांच करने २८ नवंबर को हरिद्वार पहुंचे। दो सदस्यीय वैज्ञानिकों की टीम में शामिल डॉ एससी कटियार और केके गर्ग ने हरिद्वार के तीन द्घाटों पर जांच की। जांच की जानकारी वन विभाग को पता होने के कारण २८ नवंबर को दो द्घाटों पर खनन बंद करवा दिया गया था। वन विभाग इहीं बंद द्घाटों पर वैज्ञानिकों को जांच कराने पहुंचा। जांच के दौरान मातृ सदन के स्वामी शिवानंद महाराज एवं अन्य संत भी मौजूद थे। 

 जांच के दौरान कई आश्चर्यचकित करने वाले तथ्य सामने आए। दो सदस्यीय टीम पहले भोगपुर जांच करने पहुंची। वहां खनन को एक दिन के लिए बंद करवा दिया गया था। इसके बाद टांडा भागमल और रामकुंडी में जांच करने पहुंची। टांडा भागमल में हालांकि खनन बंद था लेकिन वहां वैज्ञानिकों को पिलर की हदबंदी मिली। वैज्ञानिकों ने जब वन विकास निगम के लोगों से पूछा कि पत्थर निकालने के लिए कितना खोदो गए तो निगम के लोगों ने कहा डेढ़ मीटर। कहां खोदा गया] यहां तो पत्थर है नहीं। तब निगम के लोगों ने जवाब दिया कि टापू को खोदेंगे। ये उसी टापू को खोदने की बात कर थे जो सदियों से प्राकृतिक रूप से बना हुआ। ऐसे कितने ही टापुओं को हरिद्वार में खत्म कर दिया गया है। 

इसके बाद वैज्ञानिकों ने बिशनपुर जाने को कहा। जिस पर निगम के लोग चकित हो गए। क्योंकि वहां खनन बंद नहीं करवाया गया था। मातृ सदन के संत ब्रह्मचारी दयानंद कहते हैं कि निगम के लोगों की गाड़ी को हम लोगों की गाड़ी से पीछे रहने को कहा गया पर आगे निकलकर स्पीड में अपनी गाड़ी बिशनपुर ले गए। वहां पहुंचने पर करीब १५० गाड़ियां लाइन में खड़ी दिखीं। जिस पर पत्थर भरा था। निगम से दल ने पूछा एक दिन में कितना पत्थर 

निकालते हो। उनका जवाब था १००० टन। लेकिन एक गाड़ी में ९ टन पत्थर आता है। यानी डेढ़ सौ गाड़ियों में १००० टन से कहीं ज्यादा पत्थर भरा था। यह एक समय का था जबकि एक गाड़ी कम से कम तीन से चार बार फर्जी रव्वना पर पत्थर ले जाती है। इसका सरल आकलन करने पर पता चला कि करीब रोजाना एक \kkV से २४ लाख रुपए का पत्थर बिना रॉयल्टी के माफिया ले जा रहे हैं। हरिद्वार में करीब ऐसे दस द्घाटों पर खनन हो रहा है। इससे समझा जा सकता है कि सरकार को कितने राजस्व का नुकसान हो रहा है। 

gunjan@thesundaypost.in

 

 
         
 
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