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vad 26 16-12-2017
 
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मेरी बात अपूर्व जोशी
 
+ + +ताकि व्यवस्था पर विश्वास बना रहे

  • अपूर्व जोशी

^दि हिंदू^ के २६ नवंबर का अंक एक विशेष आलेख लिए था जिसने मुझे एक ग्रामीण महिला के la\k"kZऔर उसके प्रति जनआस्था से परिचय कराया। सोनी सोरी आज छत्तीसगढ़ के माओवाद प्रभावित क्षेत्र में माओवादियों और सुरक्षाबालें के बीच जारी la\k"kZमें पिस रहे आदिवासियों की सबसे मुखर आवाज बन उभर चुकी हैं। छत्तीसगढ़ पुलिस के हाथों क्रूरतम निर्ममता की शिकार बनी सोनी सोरी का la\k"kZउन सभी को प्रेरणा देने का काम करता है जो अन्याय के खिलाफ जंग छेड़े हुए हैं। 

^दि हिंदू^ की इस कथा ^मई मैथड इज ए मिक्स ऑफ गांधी एंड भगत सिंह^ ¼My method is a mix of Gandhi and Bhagat Singh½ पढ़ने के बाद मैंने इस योद्धा की बाबत जानकारी जुटाई जिसे आप संग इस बार साझा कर रहा हूं ताकि जोर&जुल्म के खिलाफ लड़ने वालों का हौसला बना रहे और जो उदासीन हो अपने चारों तरफ हो रहे अत्याचार&अनाचार को देखते रहते हैं] उनमें भी क्रांति ज्वार के बीज प्रस्फुटित हो सकें। तो चलिए सोनी सोरी की कहानी को बांचा जाए।

सोनी का जन्म छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के गांव बडे बेदमा में वर्ष १९७५ में एक आदिवासी परिवार में हुआ। स्कूली शिक्षा के दौरान ही उन्हें महाराष्ट्र से दंतेवाड़ा आ बसे नवयुवक अनिल फटाने से प्रेम हो गया। नागपुर के मूल निवासी अनिल संग सोनी ने अपने परिजनों की इच्छा विरुद्ध विवाह कर लिया। २००२ में सोनी को सरकारी शिक्षक की नौकरी मिल गई। २००६ तक सोनी की जिंदगी में सब कुछ सामान्य चल रहा था। दंतेवाड़ा में २००६ के दौरान माओवादी गतिविधियां अपने पैर पसारने लगीं थीं। स्थानीय पुलिस को शक था कि माओवादियों को स्थानीय ग्रामीणों द्वारा संरक्षण दिया जाता है। सोनी सोरी के पति अनिल को भी पुलिस माओवादी समर्थक मानने लगी थी। २००८ आते&आते सोनी को भी पुलिस पूछताछ के लिए बुलाने लगी। २००८ में एक ऐसी
\kVuk \kVh जिसने एक सामान्य गृहणी की जीवन दिशा और दशा बदलने का काम कर दिया। बकौल सोनी सोरी बड़ेपारा गांव के तीन ग्रामीणों को स्थानीय पुलिस ने माओवादियों के कपड़े पहना एन्काउंटर कर मारा डाला। इस \kVuk की एकमात्र चश्मदीद गवाह सोनी सोरी थीं। उन्होंने पूरी \kVuk को एक टीवी पत्रकार को इस शर्त पर बताया कि उनकी पहचान गोपनीय रखी जाए लेकिन खबर आने के बाद पुलिस को पता चल गया कि सोनी सोरी ने ही पत्रकार को यह राज खोला था। इसके बाद से ही दंतेवाड़ा पुलिस ने सोनी को अपने निशाने पर ले लिया। २०१० में एक स्थानीय कांग्रेसी नेता अवधेश गौतम पर माओवादियों ने प्राणद्घातक हमला किया। पुलिस ने सोनी सोरी के पति को इस \kVuk के लिए जिम्मेदार मानते हुए गिरफ्तार कर लिया। पति को छुड़ाने थाने पहुंची सोनी संग पुलिस का बर्ताव अभद्र रहा। पुलिस सोनी को माओवादी समर्थक मानने लगी। दूसरी तरफ माओवादियों ने सोनी पर आरोप लगा डाला कि वे माओवादियों के नाम पर वसूली करती हैं। इस तरह से सोनी सोरी पुलिस और माओवादियों के बीच पिसने लगीं। दंतेवाड़ा पुलिस से बचने के लिए सोनी अक्टूबर २०१० में दिल्ली आ पहुंची। वे अपनी गिरफ्तारी के विरुद्ध कोर्ट से स्टे लेने का प्रयास कर रही रही थीं कि उन्हें दिल्ली में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। छत्तीसगढ़ की पुलिस उन्हें दंतेवाड़ा ले आई। यहां उनके साथ वह हुआ जिसकी कल्पना लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोई नहीं कर सकता। जेल में उनके संग बलात्कार किया गया। उनके गुप्तांगों में पत्थर डाले गए। अगले ढाई बरस वे जेल में ही बंद रहीं। २०१३ में मानवाधिकार कार्यकर्ता और वकील कोलिन गोन्सालवेस और प्रशांत भूषण के चलते उन्हें जेल से रिहाई मिली। इसी दौरान उनके पति पर लगाए गए आरोप कोर्ट ने खारिज कर अनिल को भी बरी कर दिया। जेल से बाहर आने के मात्र एक माह बाद ही अनिल की मृत्यु हो गई। जेल में मिली यातना] परिवार का दरबदर होना और पति की मृत्यु ने सोरी को कमजोर नहीं किया] बल्कि वे आदिवासी समाज की आवाज बन उभरने लगीं। प्रशांत भूषण की सलाह पर उन्होंने आम आदमी पार्टी की सदस्यता ले ली। वे २०१४ में आप प्रत्याशी के तौर पर लोकसभा चुनाव भी लड़ी। नवंबर २०१५ में एक आदिवासी महिला का सुकमा क्षेत्र से अपहरण हो गया। सोनी सोरी ने इस महिला के अपहरण को जन आंदोलन में बदल डाला। तीन दिनों तक ग्रामीणों ने राष्ट्रीय राजमार्ग को बंद कर दिया। जनदबाव का असर रहा कि स्थानीय पुलिस ने अपहृत महिला को छुड़ाने में सफलता पा ली। इस आंदोलन की सफलता ने सोनी सोरी को आदिवासियों का अद्घोषित नेता बना डाला। जून २०१६ में सुकमा जिले के द्घने जंगलों में स्थित गुमपद गांव की एक २३ वर्षीय लड़की का पहले बलात्कार हुआ] बाद में उसे मार डाला गया। सुरक्षा बलों ने इसे माओवादियों के खिलाफ अपनी बड़ी जीत बताया। मदकम हिदमे नामक यह लड़की सुरक्षा बलों के अनुसार एक दुर्दांत माओवादी थी। गुमपद गांव के निवासियों ने सोनी सोरी से न्याय की गुहार लगाई। उन्होंने तुरंत इस लड़की को न्याय दिलाने के लिए आंदोलन छेड़ दिया। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के निर्देश पर मदकम हिदमे के शरीर को जमीन से निकाल उसकी दोबारा आटोप्सी कराई गई। अब मामले की न्यायिक जांच चल रही है। सोनी सोरी को माओवादियों से मिल रही धमकियों के चलते फिलहाल सरकारी सुरक्षा दी गई है। हालांकि वे स्वयं जमानत पर हैं जिसके चलते उन्हें हर सप्ताह दंतेवाड़ा पुलिस स्टेशन में हाजिरी लगानी पड़ती है। पुलिस का उन पर लगातार दबाव बना रहता है। माओवादी उनके शांतिपूर्वक तरीके से किए जाने वाले आंदोलनों को अपने सशस्त्र la\k"k Zके कमजोर होने का कारण मानते हैं। इस तरह एक तरफ सरकार सोनी को संदेह की नजर से देखती है तो दूसरी तरफ माओवादी भी उन्हें अपना दुश्मन मानते हैं। इस सबके बावजूद सोनी सोरी आदिवासियों की समस्याओं को लेकर अपने la\k"kZको जारी रखे हैं। आज हालात यह हैं कि उनकी एक आवाज पर लाखों आदिवासी इकट्ठे हो जाते हैं। सोनी कहती हैं कि ^कभी&कभी मुझे स्वयं पर क्रोध आता है कि क्यों इतना अत्याचार सहने के बाद भी मुझमें हिंसक प्रवृत्ति नहीं जागती। पर मैं खुश हूं कि मैंने अहिंसा का पथ नहीं छोड़ा। मेरी काम करने की शैली महात्मा गांधी और भगत सिंह की मिली&जुली शैली हैं।^ सोनी सोरी कहती हैं कि उन्हें सभी शुभचिंतक बस्तर छोड़ कहीं और जा बसने की सलाह देते रहते हैं लेकिन मैं किसी भी सूरत में आदिवासियों की इस लड़ाई को नहीं छोड़ूंगी] चाहे मुझे अपनी जान ही क्यों न गंवानी पड़े।

^दि हिंदू में प्रकाशित सोनी सोरी की कहानी आपके साथ साझा करने का एक विशेष कारण हमारी मजबूत लोकतांत्रिक व्यवस्था पर दाग लगाती ऐसी \kVuk एं हैं जो आमजन का व्यवस्था से विश्वास तोड़ने का काम करती हैं। राजनीतिक हस्तक्षेप और भ्रष्टाचार के चलते हमारी पूरी व्यवस्था रामभरोसे चल रही है। माओवादियों संग लड़ाई लड़ रहे हमारे सुरक्षाबलों पर आदिवासियों का शोषण करने] उन्हें झूठे मामलों में फंसाने के आरोप तक सही प्रतीत होने लगते हैं जब हमें अपने चारों तरफ] दिल्ली&नोएडा जैसे शहरों में] हरिद्वार] हल्द्वानी में पुलिस का ऐसा ही आचरण देखने को मिलता है। अभी पिछले दिनों हरिद्वार में हमारे संवाददाता अरुण कश्यप पर अवैध खनन करने वालों ने जानलेवा हमला किया। स्थानीय पुलिस ने पत्रकार के बजाय माफिया की बात पर भरोसा कर अरुण और उसके साथियों पर ही अवैध वसूली की एफआईआर दर्ज कर डाली। बाद में उच्च अधिकारियों के दबाव में आकर हमारे साथियों की तरफ से काउंटर 

एफआईआर दर्ज हुई। मामला पत्रकारों का था इसलिए पुलिस के बड़े अफसरों तक पहुंच हो पाई अन्यथा कल्पना कीजिए किसी आम आदमी के संग ऐसा हो तो वह न्याय की आस में दम तोड़ देगा लेकिन उसको न्याय नहीं मिलेगा। हरिद्वार के जिस पथरी थाना क्षेत्र की यह \kVuk है] वहां के थाना प्रभारी बहुगुणा वही अफसर हैं जिन्होंने कुछ अर्सा पहले एक गैंगरेप पीड़िता की रिपोर्ट तक दर्ज नहीं की थी। अरुण कश्यप की खबर के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय के निर्देश पर उक्त प्रकरण की दोबारा जांच के आदेश हुए। जाहिर है गजेंद्र बहुगुणा इस प्रकरण के चलते अरुण कश्यप संग रंजिश रखते हैं जिसके फलस्वरूप उन्होंने खनन माफिया की एफआईआर तो दर्ज कर ली] लेकिन पत्रकारों की शिकायत पर कोई कार्यवाही नहीं की। गाजियाबाद में उत्तराखण्ड के एक नवयुवक मंदीप की मृत्यु पर भी पुलिस की भूमिका बेहद संदेहास्पद रही है।

गुरुग्राम के रेयान इंटरनेशनल स्कूल में कुछ अर्सा पहले एक छात्र की हत्या के बाद जिस प्रकार गुरुग्राम की पुलिस ने स्कूल बस के कंडक्टर अशोक को हत्यारा ठहराया उससे सभी वाकिफ हैं। इस हत्याकांड की सीबीआई जांच से यह स्पष्ट हो गया है कि अशोक पर जबरदस्त जुल्म किए गए। पुलिस की निर्ममता के आगे द्घुटने टेक अशोक ने वह जुर्म कबूल लिया जो उसने किया ही नहीं। बहरहाल] हमारे पत्रकार साथी अरुण कश्यप की खनन माफिया के खिलाफ काउंटर एफआईआर कराने के लिए मैं विशेष रूप से उत्तराखण्ड पुलिस के अपर पुलिस महानिदेशक ¼कानून व्यवस्था½ श्री अशोक कुमार का आभार व्यक्त करता हूं जिन्होंने मामले की गंभीरता को समझते हुए इसमें हस्तक्षेप किया। यदि समय रहते वे जिला पुलिस को अरुण कश्यप की एफआईआर दर्ज करने के निर्देश न देते तो निश्चित ही कश्यप को निशाने पर लेने की योजना परवान चढ़ जाती। हालांकि अब मामले की विवेचना उन्हीं पुलिस अधिकारी श्री बहुगुणा के पास है जिन्होंने माफिया की शिकायत को तुरंत एफआईआर में बदल डाला] दूसरी तरफ पत्रकारों की शिकायत पर कोई कार्यवाही नहीं की थी। ऐसे में प्रश्न उठना लाजिमी है कि क्या वे निष्पक्ष जांच कर पाएंगे\

ऐसे एक नहीं सैकड़ों उदाहरण हैं जहां व्यवस्था न्याय दिलाने में अक्षम रही है अथवा न्यायपालकों पर ही शोषण के गंभीर आरोप लगे हैं। जो कुछ छत्तीसगढ़ की सोनी सोरी के साथ थाने में हुआ उसके बावजूद सोनी का हिंसा के मार्ग में न जाना एक बेहद सराहनीय] प्रेरणादायक कदम है। लोकतंत्र जिंदा रहे] फले&फूले इसके लिए आवश्यक है कि आमजन का विश्वास शासन&व्यवस्था पर बना रहे। अन्यथा माओवाद&नक्सलवाद जैसी प्रवृत्तियों का विस्तार होता जाएगा। जुल्म के शिकार हथियार को अपना आदर्श बना लेंगे। सुरक्षाबलों के तमाम प्रयासों के बावजूद देश में लाल गलियारे का लगातार विस्तार मेरी आशंका को बलवती करता है। इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने का एकमात्र तरीका न्याय व्यवस्था] शासन व्यवस्था को सुदृढ़ करना है ताकि आम जनता को शोषण से मुक्त कराया जा सके अन्यथा यह ऐसी बीमारी है जो हमारे लोकतंत्र की नींव हिलाने का माद्दा रखती है। 

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