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सम्मान
 
सोबती को ज्ञानपीठ

 

  • सिराज माही
हिंदी की महान लेखिका कूष्णा सोबती को इस साल का ज्ञानपीठ पुरस्कार देने की ?kks"k.kk हुई है। यह पुरस्कार साहित्य में योगदान के लिए दिया जाने वाला देश का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान है। पिछले कई सालों से वह इस सम्मान की हकदार मानी जा रही थीं। ज्ञानपीठ का यह ५३वां पुरस्कार है। ज्ञानपीठ पुरस्कार पहले किसी रचना विशेष के लिए दिया जाता था] लेकिन अब इसे रचनाकार के जीवन भर के लेखन को देखकर दिया जाता है। 
कूष्णा सोबती के दो उपन्यास ^सूरजमुखी अंधेरे के^ ¼१९७२½ और जिंदगीनामा ¼१९७९½ हिंदी कथा साहित्य में बहुत चर्चित रहे हैं। ^सूरजमुखी अंधेरे के^ में एक महिला की कहानी है जो अलगाव से जूझती है। जिंदगीनामा उपन्यास में कूष्णा ने पंजाबी की जिंदगी को अलग ढंग से पिरोया है। ^मित्रो मरजानी^ उपन्यास के प्रकाशन के बाद हिंदी के पाठकों के दिलों में कूष्णा सोबती के लिए एक अलग ही जगह बनी। कूष्णा सोबती ने हाल ही में एक अद्भुत उपन्यास ^गुजरात पकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान^ लिखा है जिसमें उनके लंबे जीवन का वर्णन है। यह उपन्यास जैसे उन ?kVनाओं को याद करना है जो भारत ¼और पाकिस्तान½ की आजादी के दौरान के अंतिम दो-तीन वर्षों में ?kV रही थीं। 
ज्ञानपीठ के निदेशक लीलाधर मंडलोई के मुताबिक प्रो. नामवर सिंह की अध्यक्षता में वर्ष २०१७ का ज्ञानपीठ पुरस्कार हिंदी साहित्य की सशक्त हस्ताक्षर कूष्णा सोबती को देने का निर्णय किया गया। लीलाधर मंडलोई ने बताया कि पुरस्कार स्वरूप कूष्णा सोबती को ११ लाख रुपए] प्रशस्ति पत्र और वाग्देवी की कांस्य प्रतिमा प्रदान की जाएगी। कूष्णा सोबती को उनके उपन्यास ^जिंदगीनामा^ के लिए साल १९८० का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। उन्हें १९९६ में अकादमी के उच्चतम सम्मान ^साहित्य अकादमी फेलोशिप^ से नवाजा गया। इसके अलावा कूष्णा सोबती को पद्मभूषण] व्यास सम्मान] शलाका सम्मान से भी नवाजा जा चुका है। कूष्णा सोबती के कालजयी उपन्यासों ^सूरजमुखी अंधेरे के^] ^दिलोदानिश^] ^जिंदगीनामा^] ^ऐ लड़की^] ^समय सरगम^] ^मित्रो मरजानी^] ^जैनी मेहरबान सिंह^] ^हम हशमत^] ^बादलों के ?ksjs^ ने कथा साहित्य को अप्रतिम ताजगी और स्फूर्ति प्रदान की है।
पुरस्कार की ?kks"k.kk होने के बाद साहित्य जगत में यह चर्चा है कि कूष्णा सोबती ने दो बार मना करने के बाद कैसे इस पुरस्कार के लिए राजी हो गईं। एक बार कूष्णा जी को किसी दूसरी भारतीय भाषा के लेखक के साथ संयुक्त रूप से पुरस्कार देने का प्रस्ताव किया गया था जिसे उन्होंने मना कर दिया था। दूसरी बार जब हिंदी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह को ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया उस बार भी कूष्णा सोबती को ज्ञानपीठ पुरस्कार देने की चर्चा चली थी] लेकिन उस बार भी उन्होंने मना कर दिया था। हिंदी में दिए जाने वाले पुरस्कारों को लेकर उन्होंने कई बार विवादित बयान दिए हैं। कूष्णा सोबती ने एक बार कहा था कि दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में पुरस्कार तय किए जाते हैं।
कूष्णा काफी विवादित भी रही हैं। कूष्णा सोबती ने अमृता प्रीतम पर उनकी कूति हरदत्त का जिंदगीनामा को लेकर केस किया था। लेकिन फैसला अमृता प्रीतम के पक्ष में आया था। दरअसल अमृता प्रीतम की किताब हरदत्त का जिंदगीनामा] जब छपी तो कूष्णा जी को लगा कि ये शीर्षक उनके चर्चित उपन्यास जिंदगीनामा से लिया गया है और वह कोर्ट चली गईं। साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता कूष्णा सोबती और ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजी गईं अमृता प्रीतम के बीच इस साहित्यिक विवाद की उस वक्त पूरे देश में खूब चर्चा हुई थी। जब केस का फैसला अमृता जी के पक्ष में आया तब तक अमृता प्रीतम की मौत हो गई थी। केस के फैसले के बाद कूष्णा सोबती ने बौद्धिक संपदा का तर्क देते हुए कहा था कि हार जीत से ज्यादा जरूरी उनके लिए अपनी बौद्धिक संपदा की रक्षा के लिए संद्घर्ष करना था। उस वक्त भी कई लेखकों ने कूष्णा सोबती को याद दिलाया था कि जिंदगीनामा का पहली बार प्रयोग उन्होंने नहीं किया था। कूष्णा सोबती के उपन्यास के पहले फारसी में लिखी दर्जनों किताबें इस शीर्षक के साथ मौजूद हैं।
कूष्णा सोबती उन साहित्यकारों में से हैं जो वृद्ध होने के बाद भी काफी सक्रिय हैं। हिंदी के बड़े आलोचक नामवर सिंह अब भी गोष्ठियों की शान हैं। रामदरश मिश्र लगातार अपने लेखन से समकालीन साहित्य में सार्थक हस्तक्षेप कर रहे हैं। कूष्णा सोबती की बात की जाए तो वह रचनात्मक रूप से सक्रिय हैं ही साथ ही राजनीतिक-साहित्यिक मोर्चे पर भी बेहद सक्रिय हैं। पिछले दिनों जब पूरे देश में असहिष्णुता के खिलाफ कुछ लेखकों ने आंदोलन और पुरस्कार वापसी का अभियान चलाया था तो उसके बाद दिल्ली में देशभर के लेखकों का एक जमावड़ा हुआ था। कूष्णा सोबती जी उस जमावड़े में पहुंची थीं और अपनी बात उन्होंने रखी थी। लेखक के तौर पर उनको अपनी बात कहने का हक है और साहित्य से इतर राजनीति पर भी अपनी राय प्रकट करने का अधिकार है। 
१८ फरवरी १९२४ को गुजरात ¼वर्तमान पाकिस्तान½ में जन्मी सोबती साहसपूर्ण रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए जानी जाती हैं। १९५० में कहानी ^लामा^ से साहित्यिक सफर शुरू करने वाली सोबती स्त्री की आजादी और न्याय की पक्षधर हैं। वह अपनी संयमित अभिव्यक्ति और सुथरी रचनात्मकता के लिए जानी जाती हैं। भारत पाकिस्तान के विभाजन के बाद वे दिल्ली में आकर बस गईं और तब से यही रहकर साहित्य सेवा कर रही हैं।
ज्ञानपीठ पुरस्कार को देने के लिए करीब चार हजार लेखकों और संस्थाओं से प्रस्ताव मंगवाए जाते हैं। इसके बाद भारत की तेइस भाषाओं की सलाहकार समिति के पास इन प्रस्तावों को भेजा जाता है जहां से उनसे दस नाम मांगे जाते हैं। उन नामों को फिर जूरी के सदस्यों के सामने रखा जाता है और वो अपनी सम्मति देते हैं। उन सम्मतियों के आधार पर जिस नाम पर सहमति बनती है या जिनको सबसे अधिक जूरी के सदस्य चाहते हैं उनको ये सम्मान दिया जाता है। इस बार भी कूष्णा जी के नाम के साथ अमिताभ द्घोष का नाम भी था। उनके नाम पर भी जूरी में व्यापक चर्चा हुई] लेकिन जूरी के पाच सदस्यों ने कूष्णा जी के नाम पर सहमति दी और तीन ने अमिताभ द्घोष के नाम पर। इस तरह ज्ञानपीठ पुरस्कार के लिए कूष्णा सोबती चुनी गईं। गौरतलब है कि पहला ज्ञानपीठ पुरस्कार १९६५ में मलयालम के लेखक जी शंकर कुरूप को प्रदान किया गया था। सुमित्रानंदन पंत ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित होने वाले हिंदी के पहले रचनाकार थे। कूष्णा सोबती ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित होने वाली हिंदी की ११वीं रचनाकार हैं। इससे पहले हिंदी के १० लेखकों को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिल चुका है। इनमें पंत] दिनकर] अज्ञेय और महादेवी वर्मा शामिल हैं।

कूतियां % डार से बिछुड़ी] मित्रो मरजानी] यारों के यार] तिन पहाड़] बादलों के ?ksjs] सूरजमुखी अंधेरे के] जिंदगीनामा] ऐ लड़की] दिलोदानिश] हम हशमत भाग एक और दो] समय सरगम तक उनकी कलम ने उत्तेजना] आलोचना विमर्श।
सम्मान % साहित्या अकादमी सम्मान] साहित्य शिरोमणि सम्मान] शलाका सम्मान] मैथिली शरण गुप्त पुरस्कार] साहित्य कला परिषद पुरस्कार] कथा चूड़ामणि पुरस्कार] महत्त  सदस्य] साहित्य अकादमी।
 
         
 
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