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देश
 
नोटबंदी की राजनीतिक रस्साकशी

  • सिराज माही

नोटबंदी का एक साल पूरा हुआ और गुजरात चुनाव सिर पर। भाजपा नोटबंदी के फायदे गिना रही है तो कांग्रेस नोटबंदी के नुकसान। कांग्रेस ने आठ नवंबर को 'काला दिवस' के रूप में मनाया तो भाजपा ने 'कालाधन विरोधी दिवस' के रूप में। पूरे साल दोनों पार्टियों ने नोटबंदी को लेकर राजनीति की है। नोटबंदी को लेकर राजनीतिक रस्साकशी अब भी बनी हुई है। यह बात गौर करने वाली है कि नोटबंदी को लेकर तब सरकार कई दावे कर रही थी और तमाम तकलीफों के बावजूद ज्यादातर लोग उसके इस फैसले को काले धन के खिलाफ एक ऐतिहासिक कदम के रूप में देख रहे थे, वहीं अब सरकार और भाजपा बचाव की मुद्रा में हैं। लोगों में नोटबंदी के प्रति पहले वाली भावना नहीं है। 

गौरतलब है कि पिछले साल आठ नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पांच सौ और हजार रुपए के नोटों को चलन से बाहर कर दिए थे। सरकार के इस कदम का एक अरब लोगों पर प्रभाव पड़ा था। इसके एक साल पूरे होने के मौके पर सत्तापक्ष और विपक्ष ने एक-दूसरे पर हमले तेज कर दिए हैं। नोटबंदी के एक साल पूरे होने के मौके पर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कांग्रेस की तरफ से सरकार पर तीखा हमला बोला। मनमोहन सिंह ने नोटबंदी को 'संगठित लूट और कानूनी डकैती' करार दिया। जबकि सरकार की तरफ से वित्तमंत्री अरुण जेटली ने मोर्चा संभाला। उन्होंने नोटबंदी को ढांचागत सुधार का कदम बताया और कहा कि इससे कुछ परेशानी भले हुई हो, देर-सबेर इसके सुपरिणाम अवश्य सामने आएंगे। इसके अलावा कांग्रेस उपाध्यक्ष ने गुजरात में कई व्यापारियों से मिलकर नोटबंदी और जीएसटी पर बात की। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आठ नवंबर को नोटबंदी हादसा कहा।नोटबंदी पर सत्ता और विपक्ष के बीच जारी बहस से ये पता नहीं चल पाया कि नोटबंदी के फायदे हुए या नुकसान। लेकिन नोटबंदी के वक्त जो वादे किए गए थे वह वादे पूरे नहीं हुए। नोटबंदी का मकसद भी मोदी ने बाद में यह कहकर बदल दिया कि नोटबंदी इसलिए की गई थी ताकि डिजिटल लेन देन को बढ़ावा मिले। नोटबंदी के वक्त कहा गया था कि काला धन तो खत्म होगा ही, जाली मुद्रा से निजात मिलेगी और आतंकवाद की कमर टूट जाएगी। लेकिन जो आंकड़े रिजर्व बैंक ने नोटवापसी के बारे में दिए उन्होंने जाहिर कर दिया कि देश में कालाधन न के बराबर था। आर्थशास्त्रियों के मुताबिक नोटबंदी से भारतीय अर्थव्यवस्था से लेकर आम आदमी को नुकसान ही उठाना पड़ा है। छोटे कारोबारियों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा है। रही सही कसर जीएसटी ने पूरी की। सरकार के मुताबिक नोटबंदी से देश के गरीबों को फायदा होना था। लेकिन नोटबंदी के बाद सबसे ज्यादा गरीब ही बैंक के सामने लाईन में लगे दिखे। कई बेटियों की शादी रुक गई। पूरे देश में सौ से ज्यादा लोगों की जानें चली गईं। लेकिन नोटबंदी के आंकलन में मौतों का जिक्र नहीं होता। अधिकांश बहस जीडीपी पर पड़े असर को लेकर होती रही है। नोटबंदी से जीडीपी की वृद्धि दर में करीब दो फीसद की गिरावट आने की आशंका सही साबित हुई। 

नोटबंदी के कारण कुछ फायदे भी हुए हैं जिनकी उम्मीद नहीं की गई थी। बैंक पैसों से भर गए। इसकी वजह से ब्याज दरों को कम किए रखने में मदद मिली। करदाताओं का दायरा बढ़ा। नोटबंदी ने भारत के सबसे ऋणग्रस्त सरकारी बैंकों को सरकारी पैकेज देने में मदद की। डिजिटल लेनदेन में भी बढ़ोतरी हुई और ये तर्क दिया जाता रहा है कि भारत नकदी पर कम से कम निर्भर रहने वाला देश बन जाएगा, हालांकि अभी इस बारे में बहुत कुछ नहीं कहा जा सकता। साफ तौर पर कहें तो नोटबंदी के मामले में पिक्चर अभी बाकी है। इसने अर्थव्यवस्था पर नुकसान किया है जिसकी जानकारियां सामने आने में अभी भी वक्त लगेगा। सबसे बड़ी बात सरकार ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि नोटबंदी के पीछे क्या कारण था।

आठ नवंबर को नोटबंदी होने के बाद इतनी बार नियमों में बदलाव हुए कि जनता परेशान हुई। नोटबंदी का ऐलान कर मोदी जापान चले गए थे। जब वह जापान से लौटे तब तक देश में हंगामा बर्पा हो चुका था। छोटे कारोबारी अपनी दुकान बंद कर चुके थे। कई शादियां रद्द हो चुकी थीं। कई लोग मर चुके थे। इसके बाद मोदी ने लोगों को संबोधित किया। उन्होंने दावा किया कि भारत को 'कैशलेस और डिजिटल अर्थव्यवस्था' की ओर ले जाने के लिए नोटबंदी जरूरी थी। जबकि नोटबंदी करते हुए मोदी ने दूसरे कारण बताए थे।

कुल मिलाकर इन दिनों गुजरात चुनाव सर पर है इसलिए सत्तापक्ष हो या विपक्ष दोनों नोटबंदी की कमियां खूबियां बता रहे हैं। नोटबंदी के बाद उत्तर प्रदेश चुनाव हुआ था। अटकलें लगाई जा रही थीं कि भाजपा यूपी विधानसभा चुनावों में नोटबंदी के कारण हार जाएगी। लेकिन हुआ इसके बिल्कुल उलट था। यूपी में भाजपा पूर्ण बहुमत से जीती थी। अब देखना यह है कि गुजरात की जनता किस तरफ झुकती है। वह सत्तापक्ष को चुनती है जिसने नोटबंदी कर लोगों को मुश्किल में डाला या विपक्ष को चुनेगी जो लगातार नोटबंदी की खामियों को गिना रही है।

 

 

 
         
 
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