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vad 23 25-11-2017
 
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प्रदेश 
 
सिर्फ अपनों को ^रैबार^

  • कृष्ण कुमार

रैबार कार्यक्रम को लेकर सरकार की मंशा पर सवाल उठ रहे हैं। लोग हैरान हैं कि जब मुख्यमंत्री गढ़वाली बोली में जनता से विकास के सुझाव मांग रहे थे तो फिर कार्यक्रम महज फोटो सेशन क्यों बनकर रह गया\ आम लोगों और मीडिया को कार्यक्रम से क्यों दूर रखा गया\ राज्य के विकास का ऐसा कौन सा नया सुझाव सामने रखा गया जो भविष्य की बेहतर संभावनाएं जगा सके

 

उत्तराखण्ड राज्य अब १८वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। अट्ठारह वर्ष की आयु में कोई भी नागरिक अपने और देश के भविष्य के प्रति परिपक्व और सचेत हो जाता है। स्वाभाविक है कि इन विगत वर्षों में परिपक्व हो चुके राज्य से भी बड़े बदलाव की उम्मीदें हं। खासकर उन आंदोलनकारियों के मन में कई सवाल उठ रहे हैं जिन्होंने अलग राज्य के लिए वर्षों तक लड़ाई लड़ी। सवाल यह है कि क्यों आज भी राज्य का आम नगरिक जरूरी ओैर संविधान प्रदत्त बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहा है\ क्यों पहाड़ी क्षेत्रों में प्रसूताओं को सड़कों और पुलों पर बच्चों को जन्म देने को मजबूर होना पड़ रहा है\ क्यों आज भी जनता को बेरोजगारी] बिजली की कमी] पीने का पानी] चौपट खेती] पलायन एवं लचर या नकाम स्वास्थ्य सेवाओं की भारी कमी से जूझना पड़ रहा है। शायद आम नागरिकों के साथ-साथ इन सवालों को राजनीति भी अपने-अपने हिसाब से देख रही है और सवालों से जूझ रही है या जूझने का दिखावाभर कर रही है। ^रैबार^ कार्यक्रम शायद इन्हीं सवालों को लेकर किया गया दिखावा है। इस मायने में कि इसमें न तो जन भागीदारी रखी गई और न ही प्रदेश के मीडिया को इसमें शामिल किया गया। कई सारे सवाल हैं जो प्रदेश की रजनीति में गूंज रहे हैं।

उत्तराखण्ड राज्य की अट्ठारहवी वर्षगांठ के उपलक्ष्य में प्रदेश सरकार ने राज्य के विकास के लिए योगदान और सुझाव के उद्देश्य से रैबार कार्यक्रम का अयोजन किया। सरकार के मुखिया ने मीडिया को बताया कि अनेक विद्वान व्यक्तियों ने राज्य के विकास का खाका खींच कर सरकार को अपने-अपने सुझाव दिए। इससे आने वाले समय में राज्य को बेहतर स्थिति में लाने में सहयोग मिलेगा। देश में अहम पदों पर बैठे लोगों ने कई मुद्दों पर अपने-अपने विचार रखे और सरकार को सुझाव दिए। जिनमें राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के अध्यक्ष अजीत डोभाल के बारे में कहा जा रहा था कि वे रैबार में आएंगे लेकिन वे नहीं आए। उनके सुपुत्र और इंडिया फाउंडेशन के अध्यक्ष शौर्य डोभाल] कवि और गीतकार प्रसून जोशी] थल सेना अध्यक्ष जनरल विपिन रावत] प्रधानमंत्री के सचिव भास्कर खुल्वे] रेलवे बोर्ड के चेयरमैन अश्विनी लोहानी] कोस्टगार्ड निदेशक राजेंद्र सिंह] पलायन आयोग के अध्यक्ष एसएस नेगी] आलोक अमिताभ डिमरी संयुक्त सचिव विदेश मामले] आचार्य बालकूष्ण मुख्य कार्यकारी पतंजलि] नेहरू मांउटनेरिंग संस्थान के कर्नल अजय कोठियाल] पर्यावरणविद् अनिल जोशी] मुख्य सचिव उत्पल कुमार सिंह के अलावा सरकार के कई नौकरशाहों ने इस कार्यक्रम में  शिरकत की औेर अपने-अपने सुझाव रखे। 

यह एक सरकारी कार्यक्रम की सामान्य प्रक्रिया है। सरकार के संवाद मीडिया में रखे गए ओैर प्रकाशित भी हुए कि फलां-फलां विद्वान ने क्या कहा। जबकि हकीकत में यह कार्यक्रम कोई रैबार जैसा बन ही नहीं पाया। साफ तौेर पर दिखाई दिया कि सरकार हर हालत में जनता के सवालों से बचने का प्रयास कर रही है। हैरानी इस बात की है कि कुछ दिनों से मुख्यमंत्री गढवाली बोली में जनता को यह संदेश देते दिखाई दे रहे थे कि रैबार में आईए और अपने- अपने सुझाव हमारे सामने रखें। लेकिन कार्यक्रम केवल कुछ खास वर्ग तक ही सीमित रहा और बेहद गोपनीय तरीके से के किया गया। प्रदेश मीडिया को इससे दूर रखा गया। केवल फोटो सेशन तक ही चुनिंदा मीडिया को बुलाया गया। यहां तक कि वर्षों से अपने-अपने क्षेत्र में बेहतर कार्य करने वाले राज्य के नागरिकों और अधिकारियों तक को इससे दूर रखा गया।

अब सवाल उठता है कि आखिर सरकार ने राज्य के लिए अति महत्वपूर्ण इस कार्यक्रम को क्यों इतना गोपनीय रखा ओैर क्यों उस पर सार्वजनिक चर्चा नहीं की। जबकि पूर्व में सरकार इसकी बात कर रही थी। द्घंटों तक चले इस रैबार कार्यक्रम के बाद मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने प्रेसवार्ता की। लेकिन किसने क्या कहा] क्या सुझाव दिए और सरकार उन सुझावों पर किस तरह से अमल करेगी] इस पर कोई जबाब मुख्यमंत्री की ओर से प्रेसवार्ता में नहीं मिला। राजनीतिक तौेर पर देखा जाए तो यह रैबार कार्यक्रम पूरी तरह से सरकार का राजनीतिक कार्यक्रम ही था। सरकार ने विजन ट्वेंटी-ट्वेंटी को सामने रखकर प्रदेश का मौजूदा खाका आगे रखने का प्रयास किया। कार्यक्रम में राज्य में हवाई और सड़क संपर्क बेहतर होने] हर क्षेत्र की आवश्यकतानुसार योजनाएं बनाए जाने] प्रत्येक जनपद में दस वर्ष की मैपिंग किए जाने] नए हिल स्टेशनों की स्थापना] स्कूली पाठ्यक्रमों में पर्यटन] कूषि और बागवानी को शामिल करना] सीमांत गांवों में शिक्षा और शिक्षकों की उपस्थिति] कौशल विकास को बढ़ावा देना] सड़कों की हालत में सुधार]पर्वतीय क्षत्रों में मानव संसाधनों को बढ़ावा देना और रोजगार के साधन पैदा करना जेैसे सुझाव दिए गए। सरकार इन सुझावों को कार्यक्रम की उपलब्धि बता सकती है। लेकिन उसे अहसास होना चाहिए कि इस तरह के सुझाव पूर्व में लगभग हर सरकार के कार्यकाल के दौरान राज्य की जनता की ओर से आ चुके हैं। राज्य बनने के बाद से ही इस तरह के सुझाव सरकार को समय-समय पर बुद्धिजीवी वर्ग देता रहा है। राजनीतिक दलों के नेता भी अपनी-अपनी सरकार में ऐसे सुझाव देते रहे हैं। वर्तमान में स्वयं आरएसएस भी त्रिवेंद्र सरकार को कमोबेश यही सुझाव दे चुका है। फिर आखिर इस रैबार में क्या खास रहा और क्या नए सुझाव राज्य और सरकार को मिले हैं जिनसे विकास का खाका बेहतर हो सकेगा] यह बड़ा सवाल है।

इतना जरूर है कि रैबार कार्यक्रम में प्रदेश के मूल निवासी जो कि वर्षों से देश के कई बड़े-बड़े क्षेत्रों में अपने काम के चलते प्रसिद्धि पा चुके हैं] एक साथ एक मंच पर अवश्य दिखाई दिए। लेकिन यह शुभ अवसर भी आम नागारिकों के बजाय उसी सरकार के नुमाइंदों को ही नसीब हुआ जो कि इस कार्यक्रम और इस तरह के आयोजनों को करती रही हैं।

राजनीतिक तोैर पर देखें तो रैबार त्रिवेंद्र रावत सरकार के लिए महज अपनी सरकार और राज्य की आर्थिक स्थिति पर उठ रहे सवालों से बचने का प्रयास भर ही रहा है। जिस तरह से सरकार ने अपने वित्तीय विभाग के जरिए राज्य को गुजरात से बेहतर साबित करने का प्रयास किया है उससे भी सरकार कई सवालों को अनदेखा करने में सफल रही है। सरकार ने राज्य की प्रति व्यक्ति आय को गुजरात से बेहतर बताते हुए कहा कि जहां २००० में उत्तराखण्ड में प्रति व्यक्ति आय महज १५००० रुपए थी] वहीं इन अट्ठारह वर्षों में राज्य की प्रति व्यक्ति आय १ लाख ६० हजार ७९५ हो गई है। जबकि गुजरात में एक लाख ४० हजार प्रति व्यक्ति आय है। गौेर करने वाली बात यह है कि गुजरात की जनसंख्या ६ करोड़ के आस-पास है और उत्तराखण्ड की जनसंख्या महज सवा करोड़ के लगभग है। फिर किस आधार पर सरकार गुजरात से बेहतर होने का दावा कर रही है] यह समझ से परे है। सरकार ने यह नहीं बताया कि आज उत्तराखण्ड के हर नगरिक पर जन्म लेते ही ४५ हजार का कर्ज क्यों है और क्यों सरकार को आज भी वेतन आदि खर्च के लिए ऋण लेने को मजबूर होना पड़ता है\ आज भी सरकार क्यों अपने राजस्व के स्रोत पेैदा नहीं कर पाई है] इन सवालों से सरकार ने अपना पूरा बचाव किया।

साफ है कि सरकार का पूरा जोर रैबार के तहत अपनी सरकार की उपलब्धियों का बखान करने में ही रहा। यही वजह है कि रणनीति के तहत यह कार्यक्रम बंद कमरे की किसी बैठक जैसा ही हुआ। जिस तरह से भाजपा अपनी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं की बैठक करती है जिसमें मीडिया की उपस्थिति केवल फोटो सेशन तक ही सीमित कर दी जाती है। इस रैबार में भी कुछ इसी तरह से किया गया। कुल मिलाकर रैबार कार्यक्रम वैसा नहीं हुआ जिस तरह से सरकार और स्वयं मुख्यमंत्री पूर्व में प्रचार कर रहे थे। हैरानी इस बात को लेकर है कि इस कार्यक्रम की रूपरेखा दिल्ली स्थित एक गैर सरकारी संस्था हिल मेल से तैयार कराई गई बताया जा रहा है कि आयोजन का खाका केवल दिल्ली और उसके जेैसे शहरों के अनुसार खींचा गया जिसमें उत्तराखण्ड के नगारिकों] बुद्धिजीविजयों और सामामजिक कार्य करने वाले व्यक्तियों के साथ-साथ प्रदेश के मीडिया को भी दूर ही रखा गया। ऐसा क्यों किया गया यह सवाल भी अनुत्तरित ही रह गया है।

krishan.kumar@thesundaypost.in

 
         
 
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