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vad 23 25-11-2017
 
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राजनीति
 
खण्डूड़ी के नए दांव की दबिश

  • कृष्ण कुमार

पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचंद खण्डूड़ी ने भ्रष्टाचार को लेकर त्रिवेंद्र सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति पर यह कहते हुए प्रहार किया है कि सरकार उनके शासनकाल में बने लोकायुक्त कानून को लागू नहीं कर रही है। खण्डूड़ी ने पूर्व सीएम विजय बहुगुणा पर भी जमकर कटाक्ष किए। खण्डूड़ी के उग्र तेवरों के तत्काल बाद सीएम त्रिवेंद्र रावत ने दिल्ली में आयोजित एक प्रेस वार्ता के दौरान भ्रष्टाचार पर अपनी सरकार के स्टैंड को स्पष्ट करने का प्रयास किया। बकौल सीएम २४० करोड़ के एनएच-७४ ?kksVkys पर एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम काम कर रही है। ६०० करोड़ के खाद्यान्न ?kksVkys की भी युद्ध स्तर पर जांच हो रही है

 

भले ही मौजूदा दौर में बीसी खण्डूड़ी भाजपा के लिए जरूरी नहीं रह गए हों, लेकिन खण्डूड़ी के भ्रष्टाचार के खिलाफ दिए गए बयान से त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार बैकफुट पर आ गई है। सीएम त्रिवेंद्र रावत ने अपने दिल्ली प्रवास के दौरान भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की बात कह डाली। उन्होंने कहा सरकार ने कई ऐसे विभागों जिनमें वर्षों से भ्रष्टाचार-?kksVkys होने की खबरें सामने आ रही थीं, के लिए एक स्पेशल ऑडिट करवाने का निर्णय लिया है। जिसमें बहुचर्चित चावल खरीद द्घोटाला, निर्माण योजनाओं में हो रही भारी अनियमितताएं और विभागों की नियुक्तियों में भ्रष्टाचार तथा स्थानीय निकायों में वित्तीय गड़बड़ी और भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार ने कदम उठाए हैं। सरकार का यह कदम निश्चित ही स्वागत योग्य है। लेकिन इसके पीछे कई राजनीतिक कारणों को भी देखा जा रहा है। जिसे एक साथ कई समीकरणों को सरकार साधने का प्रयास कर रही है।

दरअसल पूर्व मुख्यमंत्री और पौड़ी संसदीय सीट से सांसद बीसी खण्डूड़ी ने राज्य में लोकायुक्त की नियुक्ति न होने से अपनी ही भाजपा की सरकार पर गंभीर सवाल खड़े किए और भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार की नीयत पर भी सवाल उठाए। उसका ही असर है कि सरकार को भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की नीति को स्पष्ट तोैर पर दिखाने के लिए मजबूर होना पड़ा है।

पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खण्डूड़ी अपने संसदीय क्षेत्र के दो दिवसीय भ्रमण पर आए और भ्रष्टाचार के खिलाफ मजबूत लोकायुक्त कानून न होने पर सवाल खड़े कर गए। उन्होंने अपने शासनकाल में बनाए हुए लोकायुक्त कानून के लागू न होने को राज्य के लिए द्घातक तो बताया ही साथ ही सरकार की नीयत पर यह कहते हुए सवाल खड़े किए कि पूर्ण बहुमत की सरकार होने के बावजूद राज्य में लोकायुक्त का गठन क्यों नहीं हो पा रहा है।

राजनीतिक जानकार इसे खण्डूड़ी का सरकार की दुखती रग पर हाथ रखने का काम मान रहे हैं जिसके चलते सरकार को लोकायुक्त पर स्थिति स्पष्ट करनी ही होगी। सही मायनों में देखा जाए तो उत्तराखण्ड की हर सरकार और मुख्यमंत्री की दुखती रग यही लोकायुक्त कानून बना रहा। विजय बहुगुणा रहे हों या हरीश रावत या फिर वर्तमान त्रिवेंद्र सरकार, किसी ने भी लोकायुक्त कानून को लागू करवाने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। लेकिन इतना जरूर है कि चुनाव में भाजपा ने खण्डूड़ी सरकार के लोकायुक्त कानून को राज्य के लिए सबसे बड़ा हितैषी बताकर पूर्व कांग्रेस पर कई आरोप लगते हुए जमकर प्रचार किया और सत्त में आने के बाद सौ दिनों के भीतर ही लोकायुक्त कानून के गठन करने का वादा तक किया। जनता ने भी भाजपा के हर वादे पर भरोसा जताते हुए भाजपा को प्रचंड बहुमत से सत्ता पर काबिज कर दिया। यही चुनावी वादा भाजपा के लिए एक तरह का गरम दूध बन चुका है और सरकार आठ महीने बीत जाने के बाद भी लोकायुक्त कानून पर कोई मजबूत इच्छाशक्ति नहीं दिखा पाई है।

खण्डूड़ी ने अपने दूसरे अल्पकालीन कार्यकाल में मजबूत और सशक्त लोकायुक्त कानून बनाया जिसको विधानसभा में पास करवा कर राष्ट्रपति को भेजा। २०१२ के चुनाव में कांग्रेस सरकार में आई और विजय बहुगुणा राज्य के मुख्यमंत्री बने। बहुगुणा सरकार ने पहले तो छह माह तक लोकायुक्त कानून को राष्ट्रपति से स्वीकूति को ही छुपाए रखा। जब मामला सामने आया तो विधानसभा में प्रस्ताव लाकर खण्डूड़ी के लोकायुक्त कानून को ही रद्द करवाकर नए लोकायुक्त कानून के गठन की बात की। नया लोकायुक्त कानून बनाया भी गया और छह माह के भीतर लोकायुक्त के चयन की सीमा तक निर्धारित कर दी गई। लेकिन अपने पूरे दो वर्ष के कार्यकाल में विजय बहुगुणा अपने ही लोकायुक्त कानून को लागू करवाने की हिम्मत नहीं जुटा पाए।

कांग्रेस की अंदरूनी सियासत और केदारनाथ आपदा के दौरान बहुगुणा सरकार की द्घोर लापरवाही के चलते राज्य में नेतृत्व परिवर्तन हुआ और हरीश रावत राज्य के नए मुख्यमंत्री बने। अपनी ही कांग्रेस सरकार के बनाए नए लोकायुक्त कानून को लागू करवाने के लिए जनता हरीश रावत से मांग करने लगी। लेकिन हरीश रावत ने भी लोकायुक्त कानून को लागू करवाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।

आज भले ही सत्ता से करारी हार के बाद बाहर होने के बाद हरीश रावत राज्य में भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने बयान देते नहीं थक रहे हैं और समाचार पत्रों में बड़े-बड़े आलेख लिख रहे हैं। सच यह है कि हरीश रावत ने ही लोकायुक्त के चयन के लिए निर्धारित छह माह की समय सीमा को ही प्रावधान से हटा दिया  था और राज्य में कब लोकायुक्त का चयन होगा इस पर पूरी तरह से प्रश्न-चिह्न लगा दिया।

बहरहाल भाजपा राज्य में पहली बार तीन चौथाई बहुमत से सत्ता पर काबिज हुई। सरकार गठन के बाद ही भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस नीति की द्घोषणा के तहत सौ दिनों में राज्य को खण्डूड़ी सरकार के दौरान बनाया गया सबसे ताकतवर लोकायुक्त कानून देने का विश्वास दिलाया। सदन में महज ११ विधायकों की संख्या वाली कांग्रेस ने भी सरकार के लोकायुक्त विधेयक को पूर्ण समर्थन देकर यह संदेश देने का प्रयास किया कि कांग्रेस राज्य में भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार की हर कार्यवाही का समर्थन कर रही है। लेकिन सरकार इसके बाद बैकफुट पर आ गई। लोकायुक्त विधेयक के साथ-साथ खण्डूड़ी सरकार के समय बने स्थानांतरण एक्ट को भी प्रवर समिति को भेज दिया। तब से लेकर आठ माह बीत चुके हैं राज्य में लोकायुक्त और स्थानांतरण कानून लागू नहीं हो सका है।

संभवतः सरकार की दुखती रग पर खण्डूड़ी ने हाथ रखा है जिसकी तपिश सरकार महसूस कर रही है। इसी के चलते अचानक सीएम भ्रष्टाचार के खिलाफ युद्ध करने का दावा कर रहे हैं। मुख्यमंत्री ने राज्य स्थापना दिवस से पांच दिन पूर्व दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर भ्रष्टाचार पर कड़ा रुख अपनाने की बात कही। दरअसल, इस समय सरकार के सामने सबसे बड़ा संकट एनएच-७४ ?kksVkys का है। सरकार इसकी जांच सीबीआई से करवाने के लिए कई बार सीबीआई को रिमाइंडर तक भेज चुकी है लेकिन अभी तक इस पर कार्यवाही नहीं हो पाई है। नैनीताल हाईकोर्ट की याचिका पर दखल देने के बाद सीबीआई जरूर सक्रिय हुई है और जल्द ही स्थिति साफ हो जाएगी। दूसरा मामला तकरीबन ५०० करोड़ के चावल खरीद ?kksVkys का है जिसमें सरकार एसआईटी से जांच करवा चुकी है लेकिन कार्यवाही के नाम पर केवल एक अधिकारी की सेवा विस्तार को समाप्त करने और दो-चार को निलंबित करने और स्थानांतरण करने के अलावा कोई कार्यवाही अमल में नहीं ला पाई है। इसी तरह से वन विभाग में जारी कई भ्रष्टाचार के मामलों पर भी सरकार कार्यवाही से बचती दिखाई दे रही है। चंपावत के प्रभागीय वनाधिकारी एके गुप्ता के खिलाफ विभागीय जांच पूरी हो चुकी है और फाइल सचिवालय में द्घूमती जा रही है। जांच रिपोर्ट पर कार्यवाही नहीं हो पा रही है। इसी तरह वन विभाग में भी कई बड़े मामले हैं जिन पर विभागीय जांच रिपोर्ट लग चुकी है। लेकिन कार्यवाही के नाम पर कुछ नहीं हुआ। जैसे फर्जी प्रमाण पत्रों से शिक्षक बनकर वर्षों से सरकारी नौकरी पाने वाले शिक्षकों पर भी सरकार जांच पर जांच का खेल-खेल रही है जबकि इस पर कार्यवाही करने से सरकार बच रही है।

समाज कल्याण में पेंशन और छात्रवृति ?kksVkys पर भी सरकार कोई कार्यवाही नहीं कर पाई है जबकि करोड़ों के ?kksVkys समाज कल्याण विभाग में वर्षों से होते आ रहे हैं। पूर्ववर्ती सरकारों के समय से ही राज्य में समाज कल्याण विभाग पर करोड़ों के पेंशन और छात्रवृति के ?kksVkys पर जांच तक की जा चुकी है।

अब राजनीति की बात करें तो सरकार गैरसैंण में शीतकालीन सत्र ला रही है और बकौल सरकार सत्र में लोकायुक्त कानून को पास करवाने की भी बात कर रही है। लेकिन जिस तरह से सूत्र बता रहे हैं कि सरकार के भीतर कई ऐसे लोग भी हैं जो लोकायुक्त कानून को लागू करवाने से बचने का प्रयास कर रहे हैं। चर्चा तो इस बात की भी है कि किसी तरह से जनता में सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ी कार्यवाही के कदमों को प्रचारित किया जाए जिससे यह कहा जा सकता है कि सरकार स्वयं ही इतनी सक्षम है कि भ्रष्टाचार पर कठोर से कठोर कार्यवाही कर सके और इसके लिए लोकायुक्त कानून का सहारा न लेना पड़े। यह बात भी खासी गौेर करने वाली है कि बीसी खण्डूड़ी ने मौजूदा सरकार के लोकायुक्त कानून के लागू न करवाने पर सवाल खड़ा किया। साथ ही पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा पर भी कई सवाल खड़े करते हुए उनकी सरकार के दोैरान जमकर भ्रष्टाचार होने का आरोप तक लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 

अब बहुगुणा भाजपा में शामिल है और उनके समर्थक नेता भाजपा सरकार में मंत्री पदों में है इससे भी भाजपा की परेशानियां बढ़ने के आसार दिखाई दे रहे हैं। खण्डूड़ी की उपेक्षा के आरोप तो भाजपा और सरकार पर पहले ही लगते रहे हैं। अब देखना है कि खण्डूड़ी के इन नए बयानें से सरकार किस तरह से अपना बचाव करती है। पहला बचाव को भ्रष्टाचार के खिलाफ कई विभागों में स्पेशल ऑडिट करवाने का निर्णय लेना ही है। लेकिन यह भी गौर करने वाली बात है कि पूर्व में भी स्पेशल ऑडिट रिपोर्ट कार्यवाही की राह देख रही है। कहीं ऐसा न हो कि सरकार जिस तरह से जांच-जांच का खेल-खेल रही है उसी तरह से विभागों के भ्रष्टाचार पर ऑडिट-ऑडिट का खेल खेलने की तैयारी में तो नहीं है।

krishan.kumar@thesundaypost.in

 
         
 
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